अच्छी सोच

गांधी ने किया था भारतीय रेल का सबसे अधिक राजनीतिक इस्तेमाल

बंबई में 1853 का एक दिन. उस दिन वहाँ सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया गया था. दोपहर तीन बजकर पैंतीस मिनट पर 21 तोपों की सलामी के साथ बोरीबंदर से ठाणे के लिए पहली बार 14 डिब्बों की एक ट्रेन रवाना हुई थी.

उस पर सवार थीं बंबई के गवर्नर फ़ॉकलैंड की पत्नी लेडी फ़ॉकलैंड और 400 अति विशिष्ट आमंत्रित लोग. इस ट्रेन को तीन इंजन खींच रहे थे, सिंध, सुल्तान और साहब.

उस ट्रेन ने 34 किलोमीटर का सफर 1 घंटा 15 मिनट में तय किया था. उस समय बोरीबंदर से ठाणे का पहले दर्जे का किराया 2 रुपये 10 आने तय किया गया था.

दूसरे दर्जे का किराया था एक रुपये 1 आना और तीसरे दर्जे का किराया था 5 आना 3 पैसा. तब से लेकर आज तक भारतीय रेल ने यहाँ के लोगों पर ऐसी छाप छोड़ी है जिसे मिटाया नहीं जा सकता.

 

जल्दी ही छा गया था रेलवे का जादू
अगर 1846 में अमरीका में कपास की फ़सल बरबाद नहीं हुई होती तो शायद रेलवे को भारत में आने में थोड़ा समय और लगता.

दरअसल रेलवे की शुरुआत इसलिए की गई थी ताकि भारत में उगने वाले कपास को मैनचेस्टर की कपड़ा मिलों तक आनन-फानन में पहुंचाया जा सके.

पाँच सालों में ही रेलवे का जादू इस क़दर बोलने लगा था कि बहादुर शाह ज़फ़र ने आज़मगढ़ उद्घोषणा में साफ़ कहा था, “अगर हम दोबारा भारत के बादशाह बनते हैं, तो ये हमारा वादा है कि भारत के व्यापारियों को शासन की तरफ़ से रेलवे लाइनें उपलब्ध कराई जाएंगी, ताकि वो सारे देश में खुलेआम तिजारत कर सकें.”

द परवेयर्स ऑफ़ डेस्टिनी– अ कलचरल बायॉग्राफ़ी ऑफ इंडियन रेलवेज़’ के लेखक अरूप चटर्जी बताते हैं, “रेलवे का ऐसा जाल बिछा कि पहले 20 मील को तय करने में जितना समय लगता था, उतने ही समय में 400 मील तय किए जाने लगे.”

 

इंग्लैंड से नौ गु ना ज़्यादा

वो कहते हैं, “ट्रेन ने न सिर्फ़ रानीगंज की कोयला खदानों से कोयले की आपूर्ति को तेज़ किया, बल्कि उस दौरान अक्सर पड़ने वाले सूखे में शासन की तरफ़ से होने वाले राहत कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाई. इन रेलवे लाइनों को बिछाने में जहाँ इंग्लैंड में प्रति किलोमीटर दो हज़ार पाउंड लगते थे, वहीं भारत में इसका खर्चा था अठ्ठारह हज़ार पाउंड प्रति किलोमीटर, यानि इंग्लैंड से नौ गुना ज़्यादा.”

 

दिलचस्प बात ये थी कि 1857 के बाद से बनाए गए ज़्यादातर रेलवे स्टेशन सैनिक छावनियों के पास बनाए गए थे और उनको इस तरह से डिज़ाइन किया गया था कि ज़रूरत पड़ने पर उन्हें एक मज़बूत सैनिक ठिकाना बनाया जा सके.

 

 

आज़ादी की लड़ाई में भूमिका
डेविड कैंपियन अपनी किताब ‘रेलवे पुलिसिंग एंड सिक्योरिटी इन कॉलोनियल इंडिया’ में लिखते हैं, “लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर बाकायदा एक शस्त्रागार और बैरक बनाई गई थी, जहाँ ज़रूरत पड़ने पर शहर की तमाम यूरोपियन आबादी को पनाह दी जा सकती थी.”

हालांकि अंग्रेज़ ये कतई नहीं चाहते होंगे, लेकिन रेलवे ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

इसकी शुरुआत हुई थी दक्षिण अफ़्रीका के नगर पीटरमैरिट्ज़बर्ग में जहाँ एक रात एक गोरे ने फ़र्स्ट क्लास के रेल के डिब्बे से महात्मा गांधी का सामान प्लेटफ़ार्म पर फेंक दिया था.

ध्यान देने योग्य बात यह है कि वही गांधी जब 1915 में भारत वापस लौटे तो उन्होंने कभी फ़र्स्ट क्लास का रुख नहीं किया और हमेशा तीसरे दर्जे के डिब्बे में ही सफ़र किया.

रेलवे का जितना राजनीतिक इस्तेमाल गांधी ने किया, उतना शायद किसी भी भारतीय नेता ने नहीं.

 

 

खिड़की भी खुली नहीं रख पाए गांधी और मौलाना
अरूप चटर्जी बताते हैं कि अप्रैल, 1915 में जब गांधी और कस्तूरबा हरिद्वार से मद्रास पहुंचे, तो स्टेशन पर उनके स्वागत में आए लोग उन्हें ढ़ूंढ़ ही नहीं पाए.

गाँधी उन्हें तब मिले जब एक ट्रेन गार्ड ने उन्हें बताया कि गांधी तीसरे दर्जे में ट्रेन के सबसे आखिरी डिब्बे में हैं.

एक बार गाँधी ने भारतीय ट्रेन में अपना अनुभव बताते हुए लिखा था, “हम बंगलौर से रात को ट्रेन से मद्रास जा रहे थे. हमें एक रात के आराम की सख़्त ज़रूरत थी, लेकिन हमें वो नसीब ही नहीं हुआ. आधी रात को हम लोग जोलारपेट जंक्शन पहुंचे. ट्रेन को वहाँ चालीस मिनट तक रुकना था. हमारे साथ चल रहे मौलाना शौकत अली ने भीड़ से चले जाने के लिए कहा. लेकिन वो जितना अनुरोध करते वो उतनी ही ज़ोर से चिल्लाते, ‘मौलाना शौकत अली की जय!’ आख़िर में मौलाना ने हार मान ली और वो आँख मूंद कर सोने का नाटक करने लगे. लोग डिब्बे की खिड़की से उटक उचक कर मौलाना और हमें देखने लगे.”

 

हरिलाल सिर्फ कस्तूरबा के लिए लाए थे संतरा
वो लिखते हैं, “हमने जैसे ही डिब्बे की बत्ती बुझाई, वो लालटेनें ले आए. आख़िर में मैंने ही सोचा कि मैं ही कुछ कोशिश करता हूँ. मैं उठा और दरवाज़े की तरफ़ गया. मुझे देखते ही लोग खुशी से चिल्ला उठे. लेकिन मेरी किसी बात का उन पर कोई असर नहीं पड़ा. थक हार कर मैंने खिड़कियाँ बंद कर दीं. लेकिन वो कहाँ मानने वाले थे. वो बाहर से खिड़कियों को खोलने की कोशिश करने लगे. अपनी समझ में वो हमारे प्रति अपना प्यार दिखा रहे रहे थे, लेकिन वास्तव में वो कितने क्रूर और अतर्कसंगत थे.”

महात्मा गाँधी और रेल के संबंध का एक बहुत ही मार्मिक चित्रण प्रमोद कपूर ने गाँधी पर लिखी जीवनी में किया है.

गांधी और उनके बेटे हरिलाल गाँधी में अनबन हो गई थी और वो घर छोड़ कर चले गए थे.
भेष बदलकर पेशावर पहुंचे सुभाष चंद्रबोस
प्रमोद कपूर की किताब में लिखा गया है “एक बार हरिलाल को पता चला कि गाँधी और बा ट्रेन से कटनी रेलवे स्टेशन से गुज़रने वाले हैं. वो अपनी माँ की एक झलक पाने के लिए कटनी स्टेशन पहुंच गए. वहाँ हर कोई महात्मा गाँधी की जय के नारे लगा रहा था. सिर्फ़ हरिलाल ही थे जो चिल्ला रहे थे, ‘कस्तूरबा माँ की जय!’ अपना नाम सुनकर बा ने उस शख्स की ओर देखा जो उनका नाम पुकार रहा था. प्लेटफॉर्म पर हरिलाल गांधी खड़े थे. उन्होंने तुरंत अपने झोले से एक संतरा निकाला और कहा, बा ये मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ. ये सुन कर गांधी बोले, मेरे लिए क्या लाए हो हरिलाल ? हरिलाल का जवाब था, मैं ये सिर्फ़ बा के लिए लाया हूँ. इतने में ट्रेन चल पड़ी. ट्रेन के साथ दौड़ते-दौड़ते हरिलाल ने चिल्ला कर कहा,’ बा, ये संतरा सिर्फ़ तुम्ही खाना.”

1941 में अपने घर में नज़रबंद सुभाषचंद्र बोस मोहम्मद ज़ियाउद्दीन का भेष बना कर पहले कार से गोमो रेलवे स्टेशन गए थे और फिर वहाँ से कालका मेल पकड़ कर पहले दिल्ली और फिर वहाँ से फ़्रंटियर मेल पर बैठ कर पेशावर पहुंचे थे.

 

 

गोमो स्टेशन पर सुभाष:
सगत बोस अपनी किताब ‘हिज़ मैजिस्टीज़ अपोनेंट’ में लिखते हैं, “ठीक एक बज कर 35 मिनट पर सुभाष ने मोहम्मद ज़ियाउद्दीन का भेष धारण किया. उन्होंने सुनहरे रिम का चश्मा पहना जिसे उन्होंने एक दशक से भी पहले से पहनना छोड़ दिया था. सिसिर उनके लिए जो काबुली चप्पल लाए थे, उसे पहनने में उन्हें थोड़ी उलझन महसूस हुई, इसलिए उन्होंने उस लंबी यात्रा के लिए अपना पुराना यूरोपियन जूता ही पहनने का फ़ैसला किया. विदा लेने से पहले उन्होंने अपनी भतीजी इला को प्यार किया. सुभाष कार की पीछे की सीट पर बांई तरफ़ बैठे. सिसिर ने स्टेयरिंग संभाला और वांडरर कार बीएलए 7169 का इंजिन स्टार्ट किया. सुभाष बोस के बेड रूम की बत्ती जानबूझ कर एक घंटे तक जलते रहने दी गई.”

वो लिखते हैं, “गोमो स्टेशन पर एक कुली ने बोस का सामान उठाया. सिसिर ने देखा, सुभाष अपनी राजसी चाल से स्टेशन की सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे. थोड़ी देर में कलकत्ता की ओर से दिल्ली-कालका मेल आती दिखाई दी. सुभाष उस पर सवार हुए और मिनटों में धुएं के गुबार के बीच कालका मेल दिल्ली की तरफ़ बढ़ निकली. इसके बाद सुभाष अपने परिवार वालों से कभी नहीं मिले.”

 

 

भगत सिंह भी भागे थे तो रेल के ज़रिए
उसी तरह तेरह साल पहले भगत सिंह ने भी लाहौर से कलकत्ता भागने के लिए ट्रेन का सहारा लिया था.

ईश्वर दयाल गौड़ अपनी किताब ‘मार्टियर्स एज़ ब्राइडग्रूम – अ फ़ोक रिपरेज़ेनटेशन ऑफ़ भगत सिंह’ में लिखते हैं, “साउंडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद ने 17 दिसंबर, 1928 की रात लाहौर के डीएवी कालेज के अहाते में बिताई. अगली सुबह भगत सिंह, भगवतीचरण वोहरा की पत्नी दुर्गा देवी के यहाँ चले गए. उन्होंने तय किया कि वो वहाँ से कलकत्ता जाएंगे. भगत सिंह ने ‘साहब’ का वेष धारण किया. दुर्गा देवी उनकी पत्नी बनीं और राजगुरू उनके ‘नौकर’. शाम को ये ‘ड्रामा पार्टी’ एक तांगे पर लाहौर रेलवे स्टेशन पहुंची, जहाँ से उन्होंने कलकत्ता के लिए दो फ़र्स्ट और दो थर्ड क्लास के टिकट खरीदे.”

 

 

भारतीय रेल से जुड़ी कुछ और दिलचस्प कहानियाँ
वो आगे लिखते हैं, “‘नौकर’ राजगुरू और ‘साधु’ के वेष में चंद्रशेखर आज़ाद तीसरे दर्जे के डिब्बे में सफ़र कर रहे थे. रास्ते भर आज़ाद तुलसीदास के दोहे गाते रहे. ड्रामे को वास्तविक रूप देने के लिए ‘साहब’ भगत सिंह लखनऊ स्टेशन पर चाय पीने उतरे. ‘नौकर’ राजगुरू दूध की तलाश में अलग से उतरे और ‘साधु’ चंद्रशेखर आज़ाद ने स्टेशन के नल से पानी पिया. कलकत्ता पहुंचते ही ‘साहब’ ने अपना ओवरकोट उतार कर बंगालियों की पोषाक धोती और कुर्ता पहन लिया.”

इयान केर अपनी किताब ‘इंजिंस ऑफ़ चेंज’ में लिखते हैं, “एक बार एक अंग्रेज़ ने कलकत्ता हाई कोर्ट के पहले मुख्य न्यायाधीश आशुतोष मुखर्जी को ट्रेन में परेशान करने की कोशिश की थी. हुआ यूँ कि जब मुखर्जी फ़र्स्ट क्लास के डिब्बे में घुसे तो ऊपर की बर्थ पर जूट मिल के मालिक एक अंग्रेज़ लेटे हुए थे. वो किसी भारतीय के साथ उस डिब्बे में सफ़र नहीं करना चाहते थे. जैसे ही मुखर्जी की आँख लगी, उन्होंने उनकी चप्पल उठा कर चलती ट्रेन से बाहर फेंक दी. जागने पर जब मुखर्जी को पता चला कि क्या हुआ है, उन्होंने आवदेखा न ताव, उस अंग्रेज के कोट को खिड़की से बाहर उड़ा दिया. अगली सुबह जब अंग्रेज़ अपना कोट ढ़ूढ़ने लगा तो आशुतोष मुखर्जी ने उससे कहा, ‘आपका कोट मेरी चप्पल ढ़ूढ़ने गया है!”

 

 

रेलवे और चाय का नाता
भारतीय रेल और चाय का रिश्ता भी बहुत पुराना है. 1881 में बनी ‘इंडियन टी असोसिएशन’ ने भारत में चाय को प्रचलित करने के लिए रेल का ही सहारा लिया.

पहले विश्व युद्ध के बाद बंगाल, पंजाब और उत्तर पश्चिम के स्टेशनों में मुफ़्त चाय पिलाने का चलन शुरू हुआ.

अरूप चैटर्जी बताते है, सन 1900 तक भारतीय लोगों को चाय का स्वाद नहीं लगा था, लेकिन बीसवीं सदी का अंत आते आते भारतीय लोग अपने देश में पैदा हुई 70 फ़ीसदी चाय खुद पीने लगे थे.

उत्तरी भारत के रेलवे स्टेशनों में अभी भी यात्री की आँख खुलते ही पहली आवाज़ उसके कान में गूंजती है, ‘चाय गरम.’

कॉलिन टॉडहंटर चाय गरम की इस आवाज़ से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी किताब ‘चेज़िंग रेनबो इन चेन्नई’ में लिखा, “मुझे पूरी यकीन है कि इन चाय वालों के लिए दिल्ली के किसी दूरदराज़ के इलाके में चाय गरम बोलना सिखाने के लिए ज़रूर एक स्कूल होता होगा. पता नहीं भारतीय लोग स्टेशन पर इतनी चाय क्यों पीते हैं? अगर ये अच्छी चाय हो तब भी बात समझ में आती है. लेकिन ये बेकार चाय होती है. वो एक छोटे कप में चार चम्मच चीनी और दूध डाल कर चाय को बरबाद कर देते हैं. एक ऐसे देश में जहाँ इतनी ज़्यादा चाय पैदा होती है, भारतीय रेल अभी तक का एक ढ़ंग का चाय का प्याला बनाने में महारत नहीं हासिल कर पाई है.”

 

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फ़िल्मों में रेल
भारतीय फ़िल्मों में भी ट्रेनों का ज़बरदस्त चित्रण देखने को मिलता है. ‘आराधना’, ‘द बर्निंग ट्रेन’, ‘शोले’, ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘परिणीता’ और ‘दिल से…’ न जाने कितनी फ़िल्में हैं जो ट्रेनों के इर्द गिर्द घूमती हैं.

आराधना का गाना ‘मेरे सपनों की रानी…’ दार्जिलिंग की मशहूर टॉय ट्रेन पर फ़िल्माया गया था.

‘पाकीज़ा’ फ़िल्म का वो सीन याद करिए जब राज कुमार एक ट्रेन पर चढ़ते हैं जहाँ मीना कुमारी सोई हुई हैं. वो उनके लिए काग़ज पर एक नोट छोड़ कर जाते हैं, ‘ आपके पांव देखे. बहुत हसीन हैं. उन्हें ज़मीन पर न रखिएगा. मैले हो जाएंगे.’

 

पलाय़न का भी गवाह बना
1947 में आज़ादी और विभाजन के बाद भारतीय रेल इस शताब्दी के सबसे बड़े पलायन का ज़रिया बना. लाखों लोगों ने रेल पर सवार हो कर सीमाएं पार कीं और उन्हें अभूतपूर्व हिंसा, क्रूरता और बलात्कार का सामना करना पड़ा.

एक ट्रेन में बलात्कार की शिकार एक मुस्लिम महिला सकीना की त्रासदी पर सआदत हसन मंटो ने एक कहानी लिखी थी, ‘खोल दो.’

गिरजा कुमार अपनी किताब, ‘द बुक ऑन ट्रायल- फंडामेंटलिज़्म एंड सेंसरशिप’ में लिखते हैं कि ‘खोल दो’ एक मुसलमान लड़की की कहानी है जो स्टेशन पर खो गई और उसको दंगाइयों ने अमृतसर से मुगलसराय जाने वाली ट्रेन से अग़वा कर लिया.

 

 

वो लिखते हैं, “बाद में आठ नौजवान उस लड़की को वापस उसके पिता के पास पहुंचा देते हैं. वो उन्हें बताते हैं कि वो लड़की उन्हें बेहोशी की हालत में पड़ी मिली थी. सकीना बहुत सुंदर है, लेकिन जब उसे उसके पिता को लौटाया जाता है, तो उस वक्त उसकी हालत एक लाश से भी बदतर है.”

आगे वो लिखते हैं, “जब उसको देखने आया डाक्टर उसके पिता से कहता है कि ‘खिड़की खोल दो’, तो वो अपनी सलवार उतार देती है, मानो वो अपनेआप पर ज़ुल्म ढ़ाने वालों के आदेश का पालन कर रही हो.”

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