क्राइम्स

क्यों ख़तरनाक है इंडिगो और गो एयर में सफ़र करना ?

डॉयरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) ने बहुत सारी गड़बड़ियों के बावजूद विवादित नए विमान एयरबस 320/321 नियो (नए इंजन के साथ) को उड़ान भरने के लिए हरी झंडी दे दी है। DGCA इतना तो कर ही सकती है कि इंडिगो और गो एयर में यात्रा करने वाले यात्रियों को इंजन से जुड़ी सही सूचना मुहैया करवा दे ताकि वे अपने हिसाब से सही फैसला ले सकें।

 

सच के साथ|डॉयरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) ने विवादित नए विमान एयरबस 320/321 नियो (नए इंजन के साथ) को उड़ान भरने के लिए हरी झंडी दे दी है। इसमें ”प्रैट एंड व्हटिनी 1100G” इंजन का इस्तेमाल किया गया है।

 

 

बता दें सुरक्षा मानकों को जांचने और उन्हें नियमित करने की जिम्मेदारी DGCA की होती है। अब नागरिकों को खतरे की संभावना वाले विमान एयरबस 320/321नियो में अगले कुछ महीनों के लिए सफर करना होगा।भारत में इंडिगो के पास 92 और गोएयर के पास ऐसे 35 विमान हैं। कुल-मिलाकर दुनियाभर में चल रहे इस मॉडल के 436 विमान में से 127 भारत में हैं। इंडिगो के इससे बड़े हित जुड़े हुए हैं। क्योंकि कंपनी इसी मॉडल के 730 विमानों का ऑर्डर दे चुकी है। हालांकि कंपनी के पास इस विमान में ”इंजन का चुनाव” करने का वक्त अब भी मौजूद है। हो सकता है भविष्य में कंपनी कुछ विमान में ”CFM LEAP-1A” इंजन लगाए जाने की सिफारिश करे। इस इंजन को अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक और फ्रांस की सैफ्रान ने मिलकर बनाया है।

 

 

लगातार उभरती समस्याएं और DGCA की प्रतिक्रिया

हाल में ”एयरबस 320” मॉडल, जिसमें P&W 1100-G का इस्तेमाल किया गया है, उसके बारें में दुनियाभर से शिकायतें आई हैं। खासकर भारत में। पिछले तीन सालों से दोनों कंपनियां (इंडियो और गोएयर) इस विमान का इस्तेमाल कर रही हैं। इस दौरान कई बार इंजन खराब होने और हवा में रहने के दौरान भी तमाम तरह की समस्याएं सामने आईं। कई बार इन विमानों को वापस एयरपोर्ट पर लैंडिंग भी करवानी पड़ी।

 

 

शुरूआत में विमान में आई समस्याओं पर DGCA ने ”EU एविएशन सेफ्टी एजेंसी (EASA)” के नियमों के पीछे चलना जरूरी समझा। DGCA ज्यादातर ऐसा करती है। बोइंग 737 मैक्स विमान के मामले में भी DGCA ने चीन के सुरक्षा मानकों को माना था।

 

DGCA ने EASA की तरह सभी P&W इंजन की जांच करने के आदेश दिए। जिन इंजनों में भी समस्या पहचानी गई, उन्हें बदलने को कहा गया।अप्रैल 2019 में एयरबस के इस विमान के इंजन में जरूरत से ज्यादा कंपन होने के चलते 6 उड़ानें रद्द की गईं। इसके बाद एक पूर्व एयरलाइन सुरक्षा कर्मचारी ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसने कोर्ट से अपील में कहा कि जबतक सभी एयरबस नियमों में जरूरी बदलाव नहीं हो जाते, सब प्लेनों की उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। कोर्ट में इंडिगो और DGCA ने कहा कि वे सिर्फ ”सुरक्षित विमान” को ही उड़ान भरने देंगे। कोर्ट ने उनकी बात मानी और प्रतिबंध नहीं लगाया।

 

 

अक्टूबर, 2019 में इंडिगो के विमानों में उड़ान के दौरान इंजन खराब होने की 6 घटनाएं हुईं। इसके चलते कई बार उनकी इमरजेंसी लैंडिंग हुई, तो कई बार उन्हें एयरपोर्ट वापस लाया गया। एक ही महीने में इतनी शिकायतों के बाद, DGCA ने एयरलाइन को 2900 घंटों से ज्यादा की उड़ान भर चुके विमानों के दो में से एक इंजन को ”नए बदलाव वाले इंजनों” से बदलने के लिए कहा। ऐसा न कर पाने की स्थिति में उड़ानों पर प्रतिबंध लगाने की भी बात DGCA ने कही। इंडिगो के पास इस तरह के 16 और गोएयर के पास 13 विमान थे। लेकिन वे DGCA की शर्तें तय वक्त में पूरी नहीं कर पाए और उन्हें एक हफ्ते का वक़्त और दिया गया। एक नवंबर, 2019 को DGCA ने इंडिगो को सभी P&W1000 G इंजनों को 31 जनवरी, 2019 तक बदलने का आदेश दिया।

 

 

पिछले हफ्ते अज्ञात वजहों से DGCA ने इंजन बदलने की अंतिम तारीख को और पांच महीने के लिए बढ़ा दिया। अब यह तारीख 31 जनवरी, 2020 है। इतना ज़्यादा वक्त देने के बावजूद भी DGCA इंडिगो से एयरबस नियमों के अपने बेड़े में सिर्फ सत्तर फ़ीसदी इंजनों के बदलावों की उम्मीद रखता है।

 

 

DGCA द्वारा अंतिम तारीख बढ़ाने का यह रवैया क्या नागरिकों की जान के साथ खिलवाड़ नहीं है? अगर इस बीच कोई अनचाही दुर्घटना हो जाती है, तो क्या इसकी जिम्मेदारी DGCA लेगा? क्या यह सिर्फ इंडिगो के हितों की रक्षा के लिए लिया गया फ़ैसला है? क्योंकि पर्यटन के मौसम में अगर विमानों की उड़ान पर प्रतिबंध लगा दिया जाता, तो कंपनी को बहुत नुकसान होता।किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले, हमें इसकी पृष्ठभूमि समझनी होगी।

 

 

बेहतर ईंधन क्षमता और कम उत्सर्जन की मांग

पिछले दशक के लगभग मध्य में बोइंग और एयरबस जैसी अग्रणी विमान मैन्यूफैक्चर कंपनियों ने बेहतर बदलावों के साथ ”कम चौड़ाई वाले विमान” पेश किए। बोइंग ने अपना 737MAX पेश किया। लेकिन बदतर विमान कंट्रोल सिस्टम के चलते यह मुसीबतों में पड़ गया और पूरे बेड़े की उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वहीं एयरबस ने अपने बेहद सफल एयरबस 320, 321 और 319 विमानों के लिए नए इंजन बनाए।

 

 

एक दशक पहले शुरू हुए इन विमानों का विकास और डिज़ाइन बेहतर ईंधन औसत, कम आवाज और उत्सर्जन, ज्यादा माल ढोने की क्षमता को ध्यान में रखकर किया गया था। जनता, नियामकों, राष्ट्रीय संस्थाओं और दूसरे पर्यावरण कैंपेनर्स, जिनमें ICAO, UNFCCC भी शामिल हैं, उनके सवालों के जवाब में यह विमान बनाया गया था। बता दें अंतरराष्ट्रीय एविएशन पहले ही तीन फ़ीसदी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का हिस्सेदार है। हालांकि इसे ”ग्लोबल कंट्रोल एग्रीमेंट” से अलग रखा गया है।

 

 

एयरफ्रेम में नए बदलाव हुए। इनमें बोइंग 737 के शार्कलेट, एयरबस के विंगलेट जैसे परिवर्तन समेत बेहतर फ्लाइट कंट्रोल सॉफ्टवेयर और सिस्टम शामिल थे। इनके ज़रिए तीन से सात फ़ीसदी तक ईंधन की बचत की गई। लेकिन ज्यादातर ईंधन बचत, कम उत्सर्जन और दूसरे सुधार इंजन के ज़रिए आने हैं।

 

 

दुनिया में इंजन बनाने वाली अग्रणी कंपनियां इन मांगों को पूरा करने वाले ‘एयरो इंजन’ बनाने की कोशिश कर रही हैं। यूनाइटेड टेक्नोलॉजी प्रैट एंड व्हिटनी ने टर्बो फैन इंजन के ज़रिए इस क्षेत्र में बड़ा कदम बढ़ाया। इसका नाम P&W 1100-G रखा गया। वहीं अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक और फ्रांस की सैफ्रान ने इसके जवाब में मिलकर CFM LEAP इंजन पेश किया। बता दें सैफ्रान ही मिराज 2000 का इंजन बनाती है, जिसे भारतीय वायुसेना इस्तेमाल करती है। CFM LEAP में इसके पूर्ववर्ती CFM56 (दुनिया का सबसे ज्यादा बिक चुका इंजन) की तुलना में कई अहम बदलाव किए गए। CFM 16 फ़ीसदी ईंधन बचाने का दावा करता है, वहीं P&W1100 G 20 फ़ीसदी या इससे ज्यादा। दोनों की क्षमता आसपास ही है।

 

 

इस प्रतिस्पर्धा में तीसरी, पर छोटी खिलाड़ी यूके की रॉल्स रॉयस है। इसके इंजन का नाम ट्रेंट इंजन है। लेकिन इसमें भी समस्या है। अब हम गहराई में जाकर इस लेख को और उलझाने से बचते हैं।

 

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P&W टर्बो फैन (GTF) इंजन

CFM और P&W, दोनों ही इन दिनों उपयोग किए जाते हैं। इनमें एक फ्रंट फैन होता है। कम मात्रा की हवा, ज्यादा क्षेत्र में फैलते हुए कंप्रेसर से गुजरती है, जहां से ये ”कंब्शन चैंबर” में जाती है और आखिर में टरबाइन तक पहुंचती है। CFM के LEAP इंजन मे कुछ दूसरी खास बातें भी हैं। जिसमें एक फ्लेक्सिबल फैन ब्लेड है। यह फैन की गति तेज होने पर मुड़ती नहीं है। इस इंजन के कंप्रेशर में एक ”ब्लिस्क फैन” और एक नया ”कंब्शन सिस्टम” भी है।

 

 

प्रैट (P&W) ने क्रांतिकारी रास्ता अपनाया। कंपनी एक नए विचार के साथ आई। जेट इंजन की खोज और उसके बाद ”फ्रंट फैन हाई बायपास आईडिया” के बाद यह अपनी तरह का पहला विचार है। आमतौर पर फ्रंट फैन को कंप्रेसर की ही शॉफ्ट पर लगाया जाता है। वहीं दूसरे हाई प्रेशर कंप्रेसर और हाई प्रेशर टरबाइन को एक दूसरी शॉफ्ट पर लगाया जाता है। P&W ने फ्रंट फैन में एक गियर लगाने का प्रयोग भी किया, ताकि जब फ्रंट फैन और कंप्रेसर-टरबाइन अलग-अलग स्पीड पर घूम रहे हों, तो फ्रंट फैन की स्पीड को अलग से कंट्रोल किया जा सके। इस प्रयोग के बाद कई दूसरे निर्माताओं के दिमाग में यह बात आई होगी कि उन्हें इतना साधारण विचार क्यों नहीं आया।

 

 

अब बिना ज़्यादा तकनीकी बारीकी में जाते हुए, इतना कहना होगा कि नए प्रयोग के साथ जो नई समस्याएं आई थीं, P&W ने उनका निदान नहीं किया। यहां दो तरह की समस्याएं सामने आईं। पहली, पंखे की कम-ज्यादा होती गति के साथ दूसरे इंजन के पैमाने और उनके कंट्रोल सिस्टम की प्रतिक्रिया। दूसरी, गियर मैकेनिज्म से पैदा होने वाला मैकेनिकल दबाव।

 

 

 

P&W पर अपने प्रतिद्वंदी सीएफएम की तरफ से भी दबाव था। इसके चलते कंपनी को अपनी इंजन डिज़ाइन जल्दी पूरी करनी पड़ी। शायद इसलिए तय वक्त से कुछ साल पहले ही इन इंजन को सेवाओं में ले लिया गया। 737 MAX को भी जल्दी सेवा में ले लिया गया था। इसकी डिज़ाइन समस्या का समाधान नहीं किया गया। खासकर इसके पंखों और इंजन के आकार से जुड़ी समस्या। इसके बाद नियामक संस्था FAA के साथ गठजोड़ कर, इसके लिए जरूरी अनुमति लेने का रास्ता अपनाया गया।

 

 

पहले दिन से ही P&W1000 G इंजन में दिक्कतें आ रही हैं। हाल की समस्याएं हैं- लो-प्रेशर कंप्रेसर, एयर सील में लीकेज और टरबाइन पर भारी दबाव। टेक ऑफ और उड़ान के दौरान भारी कंपन के चलते, टरबाइन की पंखियों में दरार आने और टूटे हुए टुकड़े फ्लाइट से टकराने से कई बार इंजन तक शटडाउन हो गए। ”रोटर बो” से घटते-बढ़ते तापमान से शॉफ्ट टेड़ी हो होना भी आम बात है। इस कंपन को रोकने के लिए हाई प्रेशर कंप्रेसर वाला पिस्टल सील बनाया गया।

 

 

भारत में ऊपर वाली समस्याओं के साथ-साथ ”कंब्शन चैंबर” में तापमान को कम करने के लिए लगाए गए ”कूलिंग नोजल” के बंद होने की समस्या को भी पाया गया। इसके चलते आग की लपटें तक उठीं और कई बार इंजन शटडाउन हुए।

 

 

P&W को लगता है कि ऐसा भारत की गर्म, आर्द्र और प्रदूषित हवा के चलते होता है। लेकिन प्रदूषण को छोड़कर बाकी कारक दूसरे देशों में भी मौजूद हैं। जैसे खाड़ी देश या दक्षिण-पूर्वी देश। ऐसा लगता है जैसे कंपनी अपना दोष मढ़ने के लिए किसी चीज को खोज रही हो। एयर ब्लीड सिस्टम भी बुरी तरह प्रभावित हुआ, जिसके चलते P&W ने तीस हजार फीट की ऊंचाई की अधिकतम सीमा की सलाह दी। इससे ईंधन औसत पर नकरात्मक प्रभाव पड़ा।

 

 

इंडिगो से भी अपनी टेक ऑप तकनीक में बदलाव करने के लिए कहा गया। इंडिगो, टेक ऑफ के लिए अधिकतम ”थ्रस्ट” का इस्तेमाल करती है। वहीं गो एयर कम थ्रस्ट वाली तकनीक ”ऑल्ट क्लाइम्ब” उपयोग में लाती है। इंडिगो की तकनीक में कम ईंधन की खपत होती है। लेकिन इसके दुष्परिणाम भी हैं।

 

 

इसके चलते बहुत सारे तुरत-फुरत के समाधान निकाले गए। इस बीच P&W अधिक स्थायी समाधानों पर काम कर रही है। इसमें दो साल का वक्त लग सकता है। मुख्य गियर बॉक्स में भी कई समस्याएं हैं। P&W द्वारा सॉफ्टवेयर मोडिफिकेशन के ज़रिए इनका समाधान निकाला गया। यह ठीक वैसा ही है, जैसे बोइंग 737 MAX की समस्याओं के समाधान के लिए एमसीएएस सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।

 

 

फिलहाल मोडिफाइड सील, डैंपर के साथ-साथ एक मुख्य गियर बॉक्स और थर्ड स्टेज लो प्रेशर टरबाइन को भी अनिवार्य कर दिया गया है। जिस इंजन को वापस किया गया, उसे इन्हीं बदलावों के साथ वापस लिया गया।

 

 

इंडिगो को 2016 से 2019 के बीच 69 विमानों के इंजन को बदलना है। स्पेयर पार्ट्स और मोडिफाइड पार्ट्स के उत्पादन के मामले में P&W मांग के साथ तेजी नहीं दिखा पा रही है। इंडिगो भी सामान की दिक्कतों, फ्लाइट में अनियमित्ता, यहां तक कि जीएसटी से जुड़े मुद्दों से भी परेशान है।
एयरबस में जबसे यह समस्याएं शुरू हुई हैं, तबसे CFM LEAP के इंजन दस गुना तेजी से बिके हैं।

 

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अंतिम बात…

P&W आने वाले सालों में अपनी और अपने प्रतिनिधि GTF इंजन की विश्वसनीयता बनाने के लिए काम की योजना बना चुकी है। एयरबस, CFM इंजन पर निर्भर होकर अपनी दिक्कत का खात्मा कर सकता है। GE और सैफ्रान ने अपना उत्पादन तेज कर दिया है। अब दोनों कंपनियां मिलकर दो हजार इंजन प्रति साल बना रही हैं। वहीं एयरबस समेत P&W की ग्राहक एयरलाइन कंपनियां हर्जाने की मांग करने वाली हैं।

 

 

DGCA द्वारा इंडिगो को दिया गया पांच महीने का अतिरिक्त समय बुद्धिमत्तापूर्ण है या नहीं, फिलहाल यह भारत के लिए अहम मुद्दा है। कुछ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि दूसरी एयरलाइन्स के अनुभवों को देखते हुए यह ठीक फ़ैसला हो सकता है। स्पेयर पार्ट्स की गैरमौजूदगी या कोई भी दूसरे जिम्मेदार कारण, आज तथ्य यह है कि जब भी बिना बदलावों से लैस P&W इंजन वाला एयरबस 320 उड़ता है, तो यात्रियों की सुरक्षा खतरे में होती है।

 

 

DGCA को अच्छी तरह पूरे मामले पर सलाह मिली होगी। वह इंजन का समय बढ़ाकर एक खतरनाक खेल में घुस चुकी है। इन दोनों एयरलाइन को निर्देश दिया जाए कि वे अपने सभी ग्राहकों, टिकट करने वालों को अच्छी तरह से जानकारी दें कि किस प्लेन के दो इंजन में से कौन सा बिना जरूरी बदलावों के साथ चल रहा है। DGCA इतना तो कर ही सकती है। फिलहाल ऐसी कोई सूचना नहीं दी जाती है और न ही यात्रियों को इस बारे में जानकारी है। उन्हें बताया जाए ताकि वे अपने हिसाब से सही फैसला ले सकें।

 

 

(यह लेखक जिन्हें जानता हैं उन्हें सलाह देता है कि जब तक DGCA जरूरी कदम नहीं उठा लेती या इस संबंध में जरूरी जानकारी उपलब्ध नहीं करवा देती, तबतक इंडिगो या गोएयर से सफर न करें।)

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