अखण्ड भारत

सच के साथ: शिक्षा की साख बचाने का समय

हमें युवाओं की ऊर्जा, स्वप्न, और सामाजिक सरोकारों के साथ तालमेल बिठाना होगा। उन्हें खुद निर्णय लेने के लिए तैयार करना होगा कि कैसे वे एक बेहतर दुनिया के निर्माता बनें? हम अपने परिसरों को राज्य बनाम विद्यार्थी, राज्य बनाम शिक्षक के जिस गतिरोध को देख रहे हैं उसे समाप्त ही करना होगा। अन्यथा उच्च शिक्षा में कक्षा शिक्षण, शोध और रोजगार के अवसरों की उपलब्धता के ठोस लक्ष्यों से हम भटक जाएंगे।

 

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शिक्षा से समाज की अपेक्षा को धरातल पर उतारने का काम राज्य करता है। औपचारिक शिक्षा से समाज की अपेक्षा और राज्य की नीतियों में इसके स्वर आजकल बेसुरे होते जा रहे हैं। नई शिक्षा नीति के मसौदे को लेकर खासी हलचल हुई, पर अब तक यह किसी ठोस नीतिगत संरचना में तब्दील नहीं हो पाई है। शिक्षा के अन्य स्तरों और क्षेत्रों में देखें तो विद्यालय स्तर पर शिक्षा का माध्यम, स्कूलों में सुरक्षा, परीक्षा में विफलता के कारण आत्महत्या, राष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थियों का गिरता उपलब्धि स्तर, शिक्षकों की नियुक्ति और नियमितीकरण के मुद्दे छाए रहे। स्कूलों में बढ़ती हिंसा, खासकर यौन हिंसा की समस्याएं भी चिंता का कारण बनी रहीं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सरकार ने खुद संस्थानों की खस्ता हालत और शोध के गिरते स्तर को चिंतनीय माना। पिछले वर्ष भी उच्च शिक्षा की गुणवत्ता रैकिंग में कोई विशिष्ट उपलब्धि नहीं रही। साल बीतते-बीतते उच्च शिक्षा के परिसर राजनीतिक आंदोलनों के अखाड़ो में तब्दील हो गए। व्यावसायिक शिक्षा और रोजगार के मसले को लेकर किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति औपचारिक शिक्षा के बाद भविष्य की राह को कठिन ही बनाती जा रही है। शिक्षा की बढ़ती लागत सबके लिए चिंता का कारण है। ऐसी स्थिति में शिक्षा क्षेत्र एक ठोस कार्ययोजना की बाट जोह रहा है।

 

 

हम दुनिया के अन्य विकासशील देशों के समान स्कूली शिक्षा की स्थायी वैश्विक चुनौतियों जैसे- बच्चों का स्कूल में बने रहना, वंचित वर्ग खासकर लड़कियों, आदिवासियों और दिव्यांगों को मुख्यधारा की शिक्षा में शामिल करना, अध्यापकों को शिक्षण व्यवसाय के लिए आकर्षिक करना, शिक्षा की अधोसंरचना का विकास करना आदि से जूझ रहे हैं। हमारे लिए अच्छी शिक्षा इन समस्याओं के निराकरण के बिना संभव नहीं है। इसके लिए पूर्व विद्यालयी संरचना के क्षेत्र में विकास करना होगा। स्कूलों में बच्चों को सुरक्षित माहौल देना भी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। शाश्वत विकास के लक्ष्य को साकार करने के लिए बच्चों की सांस्कृतिक-सामाजिक अस्मिताओं का समावेशन करना होगा। पाठ्यचर्या संबंधी सुधारों द्वारा उन्हें दुनिया के बदलावों के प्रति सचेत और उसके बारे में विवेकपूर्ण फैसला करने के लिए तैयार करना होगा। उन्हें यंत्र के उपयोग का ज्ञान देने मात्र के बजाय आपसी रिश्तों और यंत्र का गुलाम बनने से रोकने की अभिवृत्ति भी देनी होगी।

 
इन सुधारों के लिए शिक्षा नीति और पाठ्यचर्या संबंधी बदलावों से अपेक्षा है। इसके साथ-साथ हमें बच्चों को उम्मीदों के बोझ से मुक्त करना होगा। बच्चों से अभिभावकों की उम्मीदें बढ़ी हैं। उनकी प्रस्तुति से वे अपने अहं को संतुष्ट करना चाहते हैं। उन्हें अपने बच्चों के भविष्य को लेकर भी भय है। वे केवल इतना चाहते हैं कि उनका बच्चा ‘कुछ’ कर ले। इसका कारण जटिलतर समाज में आर्थिक दबाव का बढ़ना है। अब वह दौर जा चुका है, जहां संपत्ति के आधार पर सुरक्षित भविष्य की कल्पना कर सकते थे। अब तो ज्ञान ही पूंजी है, लेकिन हर ज्ञान पूंजी नहीं है। जो ज्ञान पूंजी है वह सबको सुलभ नहीं है। येन-केन प्रकारेण इसे पाने के चक्कर में अभिभावकों का बच्चों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। यह भी ध्यान देने की बात है कि पूंजी के निर्माण की कुशलता देने वाला ज्ञान सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार के प्रति मौन बना देता है। जैसे- जिन विद्यार्थियों के बारे में माना जाता है कि वे सर्वाधिक ‘प्रतिभाशाली’ हैं, वे या तो प्रतिष्ठित संस्थान से प्रबंधन की उपाधि लेने के बाद सामान बनाने और बेचने की तरकीब खोज रहे हैं या ‘सिविल सेवा’ की परीक्षा पास कर राज्य के साथ मिलकर उसकी व्यवस्था चला रहे हैं। उन्हें बाजार और सत्ता की शक्ति ने ‘हायर’ कर लिया है।

 
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में इसकी साख बहाल करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। आम जनता ने बहुत पहले ही सरकारी स्कूलों पर विश्वास करना छोड़ दिया था। धीरे-धीरे उच्च शिक्षा के संदर्भ में भी यह लक्षण दिखने लगा है। पिछले कुछ वर्षों में निजी क्षेत्र के उच्च शिक्षा संस्थानों ने ऊंची कीमत पर अच्छी शिक्षा के विश्वास को अर्जित कर लिया है। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में पनपे निजी विश्वविद्यालयों ने पर्याप्त संख्या में योग्य फैकल्टी और विद्यार्थियों को अपने से जोड़ा है। अब वे उपेक्षित समझे जाने वाले क्षेत्रों- मानविकी और सामाजिक विज्ञानों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। सरकारी विश्वविद्यालय और महाविद्यालय शिक्षकों के अभाव से जूझ रहे हैं। उनकी ‘सरकारी’ शैली और विद्यार्थियों के बारे में तटस्थता और उदासीनता भी द्रष्टव्य है।

 

 

देश के अलग-अलग हिस्सों में केंद्रीय संस्थान खुले हैं, लेकिन वे संसाधनों की मार झेल रहे हैं। ऐसी हालत ने निजी क्षेत्र को उच्च शिक्षा पर कब्जा जमाने का सुरक्षित रास्ता दे दिया है। जो लोग उच्च शिक्षा को खरीद सकते हैं वे इसी रास्ते पर हैं। जो नहीं खरीद सकते वे अपनी असंतुष्टियों को नियति मान कर उसका प्रतिकार करते हुए सड़कों पर हैं! गुणवत्ता की क्षेत्रीय विषमता बढ़ रही है। हमारे संस्थान राज्य बनाम विद्यार्थी, राज्य बनाम शिक्षक की लड़ाई के अखाड़े बन रहे हैं। विचारणीय प्रश्न है कि हम अपनी शिक्षा के वर्तमान और भविष्य को किस दिशा में ले जा रहे हैं? इस सवाल का उत्तर इसके सभी हितचिंतकों राज्य, शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों को खोजना होगा।

 

 
इस मुद्दे पर निर्णय किसी एक पक्ष में नहीं दिया जा सकता, लेकिन यह भी सच है कि शिक्षा व्यक्ति, समाज और राज्य के जीवन में अप्रासंगिक न हो, हमें इसकी जिम्मेदारी उठानी होगी। इस जिम्मेदारी का सरलीकरण करते हुए हम मान लेते हैं कि शिक्षा नितांत व्यक्तिगत दायित्व है और जो विद्यार्थी इसके भागीदार हैं वे किसी भी प्रकार का कोई प्रतिकार या विरोध नहीं करेंगे। इन दो मान्यताओं के आधार पर सारा दारोमदार विद्यार्थी पर डाल देते हैं। मानो कि वह अपना पूरा समय विषय को पढ़ने और जानने में लगा देगा। फलस्वरूप उसके सारे सपने- नौकरी, प्रतिष्ठा, दायित्व निभाने की चाहत, बदलाव का कर्ता बनने की भूमिका आदि पूरी हो जाएगी। इसी स्थापना के सहारे हम लंबे समय से चल रहे हैं। यहां हम भूल जाते हैं कि व्यक्तिगत प्रयास की सीमाएं हैं। वह निर्वात या एकांत में घटित नहीं होता है।
कोई व्यक्ति केवल पढ़ने, समझने और परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं है। इस सबके बाद वह आपसे पूछेगा कि मैं बेरोजगार क्यों हूं? वह सवाल करेगा कि जिन मूल्यों का महिमामंडन किया गया है, वास्तविक दुनिया में उनका व्यवहार क्यों नहीं दिखता है? क्यों हर निर्णय और समस्या समाधान के मूल्य में स्वार्थपूर्ति निहित होती है? अनुभवी वयस्क उसे विचारधारा के चश्मे से या क्रांति की भाषा से अपने अनुसार चुना हुआ रंग दिखाएंगे, लेकिन ये रंग अपने भीतर छिपी सच्चाई से परिचित कराने के बजाय व्यक्ति को आत्महंता बनाने के लिए होंगे। एक जिम्मेदार समाज को आत्महंता पीढ़ी की ओर बढ़ती आबादी को रोकने के लिए खड़ा ही होना होगा। हमें युवाओं की ऊर्जा, स्वप्न, और सामाजिक सरोकारों के साथ तालमेल बिठाना होगा। उन्हें खुद निर्णय लेने के लिए तैयार करना होगा कि कैसे वे एक बेहतर दुनिया के निर्माता बनें? हम अपने परिसरों को राज्य बनाम विद्यार्थी, राज्य बनाम शिक्षक के जिस गतिरोध को देख रहे हैं उसे समाप्त ही करना होगा। अन्यथा उच्च शिक्षा में कक्षा शिक्षण, शोध और रोजगार के अवसरों की उपलब्धता के ठोस लक्ष्यों से हम भटक जाएंगे। उम्मीद करें कि जल्दी ही हमारे परिसरों में शिक्षक-विद्यार्थी, दिखने वाली और न दिखने वाली भौतिक और सामाजिक दुनिया के विश्लेषण, संश्लेषण और सृजन में संलग्न होंगे। हम ताकतवर के ज्ञान के बजाय ताकतवर बनाने वाली शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने के लक्ष्य में सफल होंगे।

 

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कमजोरी कहां
भारत में शिक्षा की दुर्दशा देख कर यह अवश्य लगता है कि अवतारी महापुरुषों और महान गं्रथों के देश की शिक्षा में कोई न कोई कमी जरूर है। ऐसी क्या कमी है, इस पर शिक्षा नीति निर्माताओं, सत्ताओं और संगठनों को गंभीर विचार करना होगा।

 

अगर शिक्षा से एक सभ्य नागरिक समाज, एक शालीन और जिम्मेदार समाज का निर्माण होता है, तो प्रश्न है कि क्या ऐसा समाज हमारी शिक्षा ने रचा है? शिक्षा से राजनीति की जाती है, राजनीतिक और कभी-कभी हिंसक विवाद रचे जाते हैं, न कि संविधान की मर्यादा और लोकतंत्र में उदार विचार और संस्कार का समाज।
राजनीति अगर लोकतंत्र की देह है, तो शिक्षा उस देह में निहित आत्मा। शिक्षा का अर्थ हमारे समय में केवल स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, संस्थान और तरह-तरह की संस्थाओं से प्राप्त शिक्षा हो गया है। वह अब न परिवार, समाज, प्रकृति, पर्यावरण और आत्मार्जित अनुभवों से कट कर पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं से प्राप्त प्रमाणपत्रों में समा गई है। अगर शिक्षा से एक सभ्य नागरिक समाज, एक शालीन और जिम्मेदार समाज का निर्माण होता है, तो प्रश्न है कि क्या ऐसा समाज हमारी शिक्षा ने रचा है? शिक्षा से राजनीति की जाती है, राजनीतिक और कभी-कभी हिंसक विवाद रचे जाते हैं, न कि संविधान की मर्यादा और लोकतंत्र में उदार विचार और संस्कार का समाज। यह कैसी शिक्षा है, जो उच्च से उच्च स्तर की उपाधि के बावजूद राजनीति में शालीनता खो देती है? किस पाठ्यक्रम या पाठ्यपुस्तक में ऐसा पाठ है, जो गुंडागर्दी, गाली गलौच, अश्लील शब्दावली, असंयमित बयान और हिंसा सिखाता हो?

 
लोकतंत्र दलगत राजनीति से रची जाने वाली श्रेष्ठ व्यवस्था है। राजनीति शास्त्र की शिक्षा में लोकतंत्र के आदर्श, नीतियां, जन-प्रतिनिधित्व, सत्ताओं के दायित्व तो पढ़ाए जाते हैं, लेकिन आदर्श और नीति के आधार पर कर्म और दायित्व के प्रति आस्था नहीं पढ़ाई जाती। सामान्य जन शिक्षा से इतना निडर क्यों नहीं बना कि वह पुलिस से डरने के बजाय पुलिस को अपना मददगार समझे, प्रशासन के दफ्तरों में फाइलों, अफसरों, कर्मचारियों से डरने के बजाय उनसे कह सके कि वे लोग सेवक हैं, शासक नहीं। क्या शिक्षा से जिस शक्तिकरण का दावा किया जाता है, वह शक्ति केवल कुछ राजनीतिक या समर्थ शासकों-प्रशासकों का सशक्तिकरण करती है, नागरिक या सामान्य जन का नहीं?

 

 

कुछ वर्षों से हमारे देश में एक नया राजनीतिक वातावरण जन्मा है। अब राजनीतिक संवाद की जगह ऐसा विवाद रचा जाता है, जिसमें शब्द-हिंसा से लेकर शारीरिक हिंसा हो जाती है। बहुत आश्चर्य और दुख तो तब होता है जब राष्ट्रीय स्तर के अत्यंत बौद्धिक और उच्च शिक्षा प्राप्त बड़े पदों पर रहे नेता तक ऐसे बयान देते हैं जो उनकी प्रतिष्ठा, शिक्षा के संस्कार, विचार और लोकतंत्र की मर्यादा के विपरीत होते हैं। राजनीति का यह कैसा खेल, जिसमें व्यक्ति के विरुद्ध तो हर दल या नेता उग्र और अमर्यादित भाषण दे देता है, लेकिन नीति और जनता के पक्ष में कोई नहीं बोलता। राजनीति अब व्यक्ति केंद्रित है, विचार केंद्रित नहीं।

 
विश्व के लगभग सभी बड़े शिक्षाविदों ने शिक्षा से चरित्र निर्माण की बात कही, गांधी ने तो हमारे अंदर के श्रेष्ठतम गुणों को प्रकाशित करने का मंत्र दिया, लेकिन हमारे अंदर शिक्षा से आखिर आए कौन से गुण? संविधान कहता है कि हमें समानता का मौलिक अधिकार है, जबकि समानता हमारे आचरण में न राजनीति ने पैदा की, न शिक्षा ने। संविधान कहता है कि हमारा लोकतंत्र धर्मनिरपेक्ष है। कैसी धर्मनिरपेक्षता? शिक्षा से क्या सचमुच धर्मनिरपेक्षता का समाज बना? शिक्षा ने किस क्रियाशील धर्म का आचरण दिया? धर्म तो राजनीति में अधर्म हो गया है और शिक्षा, अशिक्षा।

 
पाठ्यक्रम में अर्थशास्त्र भी है। अर्थ का तो शिक्षा ने ऐसा अनर्थ कर दिया कि सरकारी विद्यालय दुर्भिक्ष-पीड़ित हो गए, उपेक्षाओं और अनदेखी से अपनी शैक्षिक चमक ही खो बैठे और एक अमीरतंत्र का अर्थशास्त्र आ गया, जिसने सिर्फ मालदारों की शिक्षा को ऊंची फीस के ठेके पर ले लिया और गरीबों को गरीबी में जीते रह कर मालदारों के मजदूर बनने पर मजबूर कर दिया। हम इतिहास पढ़ाते हैं। क्या इतिहास से युद्धों की हार-जीत के अलावा किसी प्रकार के प्रेम, सद्भाव और एकता का नया इतिहास बना? विज्ञान अब केवल उच्च संस्थानों का प्रयोग-विषय कम और पद विषय ज्यादा हो गया है। कामर्स का अर्थ अब बाजारवाद, भूमंडलवाद, उपभोक्तावाद, मॉल और बिग बाजारों, ऑनलाइन व्यापार तो हो गया, लेकिन इस कारण प्याज जैसा गरीब-नवाज खाद्य अब अमीरों की कोठी में कैद हो गया। क्या अक्षर-गिनती ज्ञान ही शिक्षा है, क्या अच्छे नागरिक का निर्माण शिक्षा नहीं?

 

 

ऐसा नहीं कि शिक्षा ने कुछ नहीं दिया और स्कूल कॉलेज-विश्वविद्यालय सब बेकार हैं, मगर जितना और जैसा होना चाहिए था वैसा और उतना नहीं हुआ। हमने जितना युद्धों और हथियारों पर खर्च किया, उतना शिक्षा पर किया होता तो सारी दुनिया नि:शस्त्र होकर शांति में सांस लेती। एक बंदूक की कीमत अगर एक ग्रामीण प्राइमरी स्कूल के भवन के बराबर है, एक टैंक, बख्तरबंद गाड़ी, एक तोप और उनके गोलाबारूद की कीमत अगर अनेक हायर सेकंडरी स्कूलों के निर्माण के बराबर है और एक जलपोत और युद्धक विमान की कीमत अगर दो-चार विश्वविद्यालयों की स्थापना के बराबर है, तो कई देशों की तीस-चालीस प्रतिशत पूंजी केवल हथियारों और युद्धों के डर पर खर्च की जाती है, वह शिक्षा पर खर्च करके क्या सारी दुनिया को युद्धोन्माद से बचाया नहीं जा सकता था?

 

 
शिक्षा हो, धर्म हो, संत-महापुरुष हों, शिक्षाविद और वैज्ञानिक हों, देश का चरित्र-निर्माण शायद ये नहीं करते।
सच पूछा जाए तो देश का चरित्र राजनीति और नेता बनाते हैं। अगर वे पवित्र मन से और पूर्ण निष्ठा से अपने शिक्षा का जनतंत्र बनाना चाहते हैं तो उनकी पवित्रता से प्रशासन पवित्र होगा, शासन पवित्र होगा और जनता के मन में ऐसी राजनीति और नेताओं के प्रति सम्मान बढ़ेगा और एक शिक्षित लोकतंत्र, सभ्य, शालीन और सक्रिय जन का लोकतंत्र होगा। शिक्षा का इक्कीसवीं सदी के दो दशक बाद यह क्या हश्र है कि आग कमाने का पाठ पढ़ कर आग लगाने का प्रयोग हो रहा है, राष्ट्रीय संपति की सुरक्षा के बजाय, उसका विनाश किया जा रहा है। विरोध की राजनीति जरूरी है, मगर विनाश की राजनीति से क्या सत्ता निरंकुश नहीं हो जाएगी? भ्रष्टाचार तो न शिक्षा से मिटा, न नेताओ से। दंड के तमाम प्रावधानों के बावजूद अपराध बढ़े हैं, यहां तक कि शिक्षा-परिसरों में भी हिंसक अपराध हो रहे हैं।

 

 
शैक्षिक भ्रष्टाचार को देखते हुए सोचना पड़ता है कि शिक्षा क्या भ्रष्ट जीवन जीने की प्रणाली बन कर रह गई है। कहा तो यह भी जाने लगा है कि रिश्वत लेते पकड़े जाओ और रिश्वत देकर छूट जाओ। चाहिए इतना कि रिश्वत की यह दफ्तरी तहजीब बदले। भ्रष्टाचार के प्रति दिन अनेक दोषी पकड़े जाते हैं वर्षों मुकदमे चलते हैं। क्या मोबाइल कोर्ट अपराधी को त्वरित सुनवाई से सजा नहीं दे सकती? कानून हैं तो उन्हें सख्ती से पालन भी कराना जरूरी है। अगर शिक्षा से नियम, कानून, संविधान, लोकतंत्र, सत्ता सभी को प्रभावशाली न बनाया गया तो शिक्षा और शैक्षिक संस्थाएं राजनीति के कंधों पर सवार होकर शिक्षा का अपराधीकरण कर देंगी।

 

 
भारत में शिक्षा की दुर्दशा देख कर यह अवश्य लगता है कि अवतारी महापुरुषों और महान गं्रथों के देश की शिक्षा में कोई न कोई कमी जरूर है। ऐसी क्या कमी है, इस पर शिक्षा नीति निर्माताओं, सत्ताओं और संगठनों को गंभीर विचार करना होगा, वरना कमियों की शिक्षा एक दिन केवल हिंसा और अपराधों का पाठयक्रम बन कर रह जाएगी।

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