क्राइम्स

दिल्ली चुनाव2020 : क्या कोई नौकरी और वेतन के बारे में बात कर रहा है?

बेरोज़गारी लगातार बढ़ रही है, लेकिन इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही कि आख़िर नौकरियां कैसे पैदा होंगी।

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सच के साथ/दिल्ली को अक्सर सपनों का शहर कहा जाता है। लोग नौकरियों की तलाश में राजधानी की तरफ़ रुख करते हैं, ताकि वे ग्रामीण भारत में जीवन में आए ठहराव को तोड़ सकें और दुख से बच सकें और अपने जीवन को एक बेहतर रास्ते पर ला सकें। और, यह भी कहा जा सकता है कि महानगर और उसके आस-पास के इलाक़े हमेशा लाखों लोगों को रोज़गार प्रदान करते हैं। लेकिन इस ख़ूबसूरत बहाने के पीछे एक कठोर, अदृश्य वास्तविकता भी है जो अक्सर छिपी रहती है। इस पर मुख्यधारा का मीडिया, प्रमुख राजनीतिक दल और राज्य और केंद्र सरकार अक्सर चुप ही रहना पसंद करते हैं।

 

 

जबकि वास्तविकता यह है कि न केवल बेरोज़गारी बढ़ रही है, बल्कि विशाल छिपी या प्रच्छन्न बेरोज़गारी भी मौजूद है जो ज़हरीली हवा की तरह लोगों का दम घोंटने का काम कर रही है।

 

 

कुल 11 प्रतिशत से अधिक बेरोज़गार, महिलाओं में 46 प्रतिशत बेरोज़गारी

पहले बेरोज़गारी के आंकड़ों पर एक नज़र डालते है। नवीनतम सीएमआईई के अनुमानों के अनुसार, केवल पिछले दो वर्षों में, जनवरी 2018 से बेरोज़गारी दर बढ़कर दिसंबर 2019 में 11.2 प्रतिशत हो गई है। [नीचे चार्ट देखें] याद रखें, दिल्ली में व्यावहारिक रूप से कोई खेती नहीं होती है। इसलिए इस उच्च दर के मामले में सीधे खेती का कोई सामान्य संकट नहीं है, हालाँकि बड़े शहरों में नौकरी चाहने वाले हताश लोगों की बढ़ती भीड़ जो बाक़ी हिस्सों से शहरों में आती है, ऐसा अनुमान है कि उन्होंने इस बेरोज़गारी की संख्या को बढ़ाने में योगदान दिया हो।

 

 

यदि आप इसकी गहराई में जाते हैं, तो चीज़ें साफ़ और भयानक दिखेंगी। सितंबर-दिसंबर 2019 के नए सीएमआईई अनुमान के अनुसार, 10-12 वीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाले युवाओं में बेरोज़गारी की दर एक चौंकाने वाली रफ़्तार से बढ़ी है, यह 23 प्रतिशत पर है। इसका मतलब है कि चार में से हर एक व्यक्ति इस विशेष समूह में बेरोज़गार है। वे कौन लोग हैं जिन्होंने केवल इस स्तर तक की पढ़ाई की होगी? निश्चित रूप से वे मध्यम और उच्च वर्ग से तो नहीं होंगे। ये मुख्य रूप से कामकाजी लोग, मज़दूर और निम्न मध्यम वर्ग के लोग हैं जो इस संकट का सामना कर रहे हैं। स्नातकों के बीच भी, बेरोज़गारी की दर लगभग 17 प्रतिशत है।

 

 

 

इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात तो यह है कि उन महिलाओं में बेरोज़गारी की दर अधिक है जो काम करने की इच्छुक हैं और सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश में रहती हैं। इसका स्तर 46 प्रतिशत है जो काफ़ी ऊंचा स्तर है! यानी हर दो महिला में लगभग एक महिला बेरोज़गार है। याद रखें: हम उन महिलाओं के बारे में बात नहीं कर रहे हैं जो घरेलू काम-काज/कर्तव्यों की वजह से घर में रहना पसंद करती हैं। यह काम की तलाश में रहने वाली महिलाओं के बारे में है।

 

 

दिल्ली के तीनों तीन प्रमुख दलों में से किसी ने भी अभी तक इस भयानक स्थिति के बारे में कुछ नहीं कहा है। हालांकि अभी चुनाव की शुरुआत है, लेकिन इनके पिछले रिकॉर्ड के अनुसार, इसकी संभावना कम है कि आने वाले चुनाव अभियान में बेरोज़गारी पर सक्रिय रूप से चर्चा की जाएगी।

 

 

कम वेतन/मज़दूरी = छिपी हुई बेरोज़गारी

बेरोज़गारी की कोई भी परिभाषा केवल शुद्ध बेरोज़गारी को गिनने से पूरी नहीं होगी, अर्थात्, जिनके पास किसी भी तरह का कोई काम नहीं है और इसलिए, उनकी कोई आय नहीं है। वे निश्चित रूप से आर्थिक समर्थन के लिए अपने परिवारों पर निर्भर रहते हैं।

 

 

लेकिन ऐसे लोगों की एक विशाल सेना है जो तकनीकी रूप से ‘बेरोज़गार’ नहीं है, लेकिन ऐसे लोग कम वेतन पर काम करते हैं, ताकि उनकी जीवन की नांव बहती रहे। ये केवल औद्योगिक श्रमिक, रिक्शा चालक या ढुलाई वाले या उस तरह के अन्य मज़दूर नहीं हैं। निम्न बेरोज़गारों में लाखों लोग शामिल हैं जो निजी क्षेत्रों में जैसे मीडिया कार्यालयों से लेकर कंपनियों के कार्यालयों, सेल्स, दुकान के कर्मचारियों, सुरक्षा कर्मचारी आदि की हैसियत से काम करते हैं।

 

 

हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (एनएसओ) की तरफ़ से किए गए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफ़एस) के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में एक ग़ैर-स्थायी मज़दूर को 2018 की पहली छमाही में लगभग 376 रुपये प्रति दिन वेतन मिला। इस हिसाब से मज़दूर का वेतन प्रति माह लगभग 9500 रुपए बैठता है। इसकी तुलना करें कि केंद्र सरकार ने घोषित न्यूनतम वेतन को सातवें वेतन आयोग के बाद एक कर्मचारी को 18,000 रुपए प्रति माह की सिफ़ारिश की है। और, यह 2016 के सिफ़ारिश है।

 

 

नियमित या वेतनभोगी कर्मचारियों के मामले में

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफ़एस) का अनुमान वास्तव में लगभग 18,760 रुपये है। लेकिन यह अनुमान से अधिक प्रतीत होता है क्योंकि दिल्ली सरकार द्वारा अधिसूचित न्यूनतम वेतन भी मात्र 13,600 रुपए है। ट्रेड यूनियनों द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चला है कि लगभग 20 प्रतिशत से अधिक श्रमिकों/कर्मचारियों को यह वैधानिक वेतन भी नहीं मिल रहा है। इतने कम वेतन को पाने के लिए बहुत से लोग 10 घंटे काम करते हैं, जो कि ग़ैर-क़ानूनी बात है। लेकिन वे ऐसे ही जीवित रहते हैं।

 

 

 

दिल्ली में नौकरियों की अनिश्चित प्रकृति की ख़बर पीएलएफ़एस रिपोर्ट में मिली अन्य जानकारी से स्पष्ट हो जाती है। दिल्ली में दो तिहाई से अधिक नियमित कर्मचारियों के पास नौकरी का कोई भी लिखित अनुबंध नहीं है। वे पलक झपकते ही अपनी आजीविका खो सकते हैं। उनमें से लगभग 45 प्रतिशत को किसी भी तरह की कमाई वाली छुट्टी (Paid Leave) नहीं मिलती है। इसका मतलब है कि अगर वे एक दिन की भी छुट्टी लेते हैं तो वे अपनी दिन की कमाई खो देंगे। नियमित श्रमिकों के 57 प्रतिशत मज़दूरों को पीएफ़, ईएसआई (चिकित्सा बीमा), ग्रेच्युटी, पेंशन, आदि जैसे सामाजिक सुरक्षा के लाभों का कोई प्रावधान नहीं है। और सभी नियमित श्रमिकों के तिहाई हिस्से के पास – नौकरी अनुबंध, कमाई वाली छुट्टी या सामाजिक सुरक्षा नहीं है।

 

 

ऐसी परिस्थितियों में कौन काम करना चाहेगा? केवल वे लोग जिन्हें काम नहीं मिल रहा है उन्हें वास्तविक समर्थन की ज़रूरत है। चूंकि वे नौकरी पाने के लिए बेताब हैं इसलिए वे एक दुलाम जैसी स्थिति में काम करने पर मजबूर हो जाते हैं। यह देश की प्रच्छन्न (छिपी) बेरोज़गारी है।

 

 

अरब डॉलर का प्रश्न यह है कि: देश की राजधानी में लोगों की ऐसी स्थिति, विशेष रूप से युवाओं की इस दुखद स्थिति का चुनावी निहितार्थ क्या है? यह एक जटिल मुद्दा है जिसका कोई भी आसान जवाब नहीं है। लेकिन संकेत यह हैं कि मोदी सरकार मुख्य रूप से इसके लिए ज़िम्मेदार है क्योंकि इसने पूरे देश को प्रभावित करने वाले आर्थिक संकट को थोप दिया है। दिल्लीवासी राज्य स्तर के मुद्दों और राष्ट्रीय मुद्दों के बीच के अंतर को जानते हैं। उन्होंने 2014 में और 2019 में दो बार मोदी को वोट दिया। इसलिए – यह संभावना है कि यह ग़ुस्सा उन लोगों के ख़िलाफ़ उतरेगा जिन्होंने 2014 में हर साल एक करोड़ नौकरी पैदा करने का वादा किया था।

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