क्राइम्स

पड़ताल : देविंदर सिंह मुजरिम या मोहरा? किसका ‘गेम’ हुआ ख़राब!

कश्मीर में आतंकवादियों के साथ डीएसपी देविंदर सिंह के पकड़े जाने से कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। केवल देविंदर सिंह पर नहीं, बल्कि सरकारी एजेंसियों के रोल पर भी।

 

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श्रीनगर- जम्मू हाईवे से हिज्बुल के दो कमांडर का पकड़ा जाना तो बड़ी बात थी लेकिन सबसे अधिक चौंकाने वाली यह बात थी कि इन दो आतंकवादियों के साथ डीएसपी रैंक का एक अधिकारी जो काउंटर इंसर्जेन्सी टीम का हिस्सा था, उसे पकड़ा गया? डीएसपी रैंक का अधिकारी देविंदर सिंह आतंकवादियों के साथ क्या कर रहा था? उन आतंकवादियों के साथ जिन पर बीस- बीस लाख रुपये का इनाम था, जो हिज्बुल के कमांडर हैं, जिनमें से एक पर सेब के बागान में काम करने वाले 18 गैर कश्मीरियों को मारने का आरोप है?

 

 

सूत्रों का कहना है कि देविंदर सिंह यह काम 12 लाख रुपये के एवज में कर रहा था तो यह सोचने वाली बात है कि जिनको पकड़वाने से 40 लाख रुपये मिल सकता है, उनके लिए एक पुलिस अधिकारी 12 लाख की डील क्यों करेगा?

 

 

सूत्रों के हवाले से ख़बर ये आ रही है कि देविंदर सिंह रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के अलावा दो और खुफिया एजेंसियों के लिए काम करता था। इस पर सूत्रों का ही कहना है कि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग को ख़बर नहीं थी कि देविंदार सिंह कुछ ऐसा करने जा रहा है। बारह लाख रुपये के एवज में किसी आतंकवादी के लिए काम करने जा रहा है। देविंदर सिंह के पिछले रिकॉर्ड के साथ अगर यह ख़बर भी पढ़ी जाए कि वह बारह लाख के एवज में ऐसा कर रहा था तो इसका मतलब है कि देविंदर सिंह करप्ट है।

 

 

 

तो क्या खुफिया एजेंसियों के शीर्ष पदों में करप्ट अधिकारियों का जमवाड़ा है। अगर ऐसे शीर्ष पदो पर करप्ट अधिकारियों का जमवाड़ा है तो ऐसा क्यों न कहा जाए कि राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला जा रहा है। अगर ऐसे पदों पर बैठे लोग अपने पद का गलत फायदा उठाते हैं तो यह क्यों न कहा जाए कि वह आतंकवादियों का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं? ऐसे में आतंकवादी भी रॉ को अपने फायदे में इस्तेमाल करे, इसकी संभावना पर कैसे इंकार किया जा सकता है? अगर यह प्रवृत्ति है तो यह भी तय है कि स्टेट पावर आतंकवाद रोकने के नाम पर आतंकवाद पनपाने का काम भी करता है।

 

 

 

जब देविंदर सिंह पकड़ा जाता है तो पकड़ने वाले अधिकारी से यह क्यों कहता है कि “सर, यह गेम है, इस गेम को खराब मत कीजिये।” उसके इस बात का मतलब क्या है? क्या भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियां आतंकवादियों के मदद से काम करती है? क्या जिस भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी के लिए देविंदर सिंह काम कर रहा था, उसकी ख़बर दूसरी ख़ुफ़िया एजेंसी को नहीं थी? अगर गेम है तो क्या बड़े अधिकारी और नेता भी इसमें शामिल है? क्या देविंदर सिंह के साथ जा रहे आतंकवादी भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों के लिए काम करते हैं? देविंदर सिंह इन आतंकवादियों के साथ मिलकर क्या करने जा रहा था?

 

 

क्या मीडिया रिपोर्टों में छपने वाली यह ख़बर सही हैं कि 26 जनवरी को लेकर इनके दिमाग में भारत में किसी आतंकवादी कार्रवाई को अंजाम देने की प्लानिंग चल रही थी? अगर किसी काम को अंजाम देने वाले थे तो सवाल यह कि किस के इशारे पर यह काम कर रहे थे? क्या ऐसी बातों में दम होता है कि ऐसी कार्रवाइयां राजनीतिक लाभ के लिए की जाती है?

 

 

अगर यह बातें सही हैं तो किस को इससे लाभ मिलेगा?

ऐसे बहुत सारे सवालों का जवाब मिलना बहुत मुश्किल है? फिर भी देविंदर सिंह की ज़िंदगी के कामकाज की पृष्ठभूमि की जानकारियां ऐसे सवालों के जवाबों में इशारों- इशारों में बहुत कुछ कह जाती हैं? तो इन सवालों के जवाब तक पहुंचने के लिए देविंदर सिंह के कामकाज के ब्यौरों को सिलसिलेवार पढ़ने-समझने की कोशिश करते हैं।

 

 

जब डीएसपी देविंदर सिंह के पूरी जिंदगी के कामकाज के ब्यौरे को साथ में रखकर देखा जाता है तो ऐसे सवाल उठते हैं जिनका जवाब केवल उन्हीं के पास हैं जो राज्य की सत्ता में हिस्सेदारी रखते हैं। अगर इनसे साफ़ सुथरा जवाब नहीं मिलता तो इसका अर्थ यह भी निकलता है कि आतंकवाद की एक प्रकृति यह भी है राज्य की सत्ता संरचनाएं इसका ताना-बाना बुनने में अपनी भूमिका निभाती है।

 

 

जहाँ से देविंदर सिंह पकड़ा गया, वहीं से देविंदर सिंह के कामकाज से जुड़े ब्यौरे की शुरुआत कीजिये। सबसे पहले यह समझिये कि डीएसपी देविंदर सिंह की गिरफ्तारी की ख़बर पुलिस के अधिकारियों ने नहीं बताई। जब यह ख़बर सूत्रों के हवाले से कश्मीर के स्थानीय मीडिया में छपी, तब यह ख़बर राष्ट्रीय मीडिया का हिस्सा बनी। अब देविंदर सिंह की गिरफ्तारी की घटना को समझिये।

 

 

जम्मू-कश्मीर पुलिस को यह जानकरी मिलती है कि श्रीनगर- जम्मू हाईवे से हिज्बुल के दो कमांडर गुजर रहे हैं। पुलिस नाकाबंदी करती है। दक्षिण कश्मीर के डीआईजी अतुल गोयल आंतकवादियों को पकड़ने की कार्रवाई को खुद अंजाम देने निकल पड़ते हैं। जिन दो कमांडरों की जानकारी जम्मू-कश्मीर पुलिस को मिली थी, वो दोनों कुख्यात आतंकवादी थे। इनमें से एक नावेद हिज्बुल का कमांडर था। इसने कश्मीर के सेब के बागानों में काम करने वाले 18 गैर- कश्मीरियों को मारा था। दोनों आतंकवादी जम्मू-कश्मीर पुलिस की सूची में मोस्ट वांटेड आतंकवादी थे, दोनों पर 20-20 लाख का इनाम था। ऐसे में यह साफ़ था कि मामला गंभीर है।

 

 

लेकिन श्रीनगर- जम्मू हाईवे पर जिस आई -10 कार से इन आतकंवादियों को गिरफ्तार किया गया, उस गाड़ी की छानबीन से चौंकाने वाली बात यह सामने आयी कि इस गाड़ी को भारत सरकार का आला अधिकारी डीएसपी देविंदर सिंह खुद चला रहा था। देविंदर के साथ अगली सीट पर आतंकवादी संगठन हिज्बुल का कमांडर सैयद नावेद बैठा था और गाड़ी की पिछली सीट पर हिज्बुल का ही एक और आतंकवादी आसिफ राथेर और इमरान सफी बैठा था। इमरान सफी खुद को वकील बता रहा था। गाड़ी की तलाशी से पांच ग्रेनेड और एक राइफल बरामद हुए। यानी जिस इरादे से पुलिस कार्रवाई करने निकली थी, वह पूरी तो हुई लेकिन डीएसपी देविंदर सिंह के तौर पर ऐसा सवाल सामने आया जिसका पुख्ता जवाब अभी तक नहीं मिला है।

 

 

देविंदर सिंह कोई आम अधिकारी नहीं है। रक्षा मंत्रालय के अधीन आने वाली एंटीहाई-जैकिंग विंग में डीएसपी के तौर पर तैनात था। और यह तैनाती भी कोई ऐसी वैसी जगह पर नहीं हुई थी बल्कि श्रीनगर के एयरपोर्ट पर हुई थी।

 

 

पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस चेकपॉइंट पर डीआईजी गोयल और देविंदर सिंह के बीच बहस बाज़ी भी हुई तो देविंदर सिंह ने यह कहा कि, ” सर, ये गेम है. और इस गेम को खराब मत कीजिये”

 

 

देविंदर सिंह का कामकाजी जीवन का रिकॉर्ड

देविंदर सिंह की सब इंस्पेक्टर के तौर पर साल 1990 में भर्ती हुई। दो साल बाद ही देविंदर सिंह और एक और ऑफिसर को भारी मात्रा में अफीम के साथ गिरफ्तार किया गया। इन दोनों अधिकारीयों को सर्विस से बाहर कर देने का इरादा भी बना लिया गया। तभी अचानक ऐसा हुआ कि इंस्पेक्टर जनरल पद के किसी अधिकारी द्वारा इन दोनों अफसरों की बर्खास्तगी को मानवीय आधार पर रोक दिया गया। और इन दोनों अफसरों की तैनाती स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप की टीम में कर दी गई। स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप यानी एक ऐसी टीम जो काउंटर मिलिटेंसी में लगी होती है। अब यहाँ सवाल उठता है कि भारी मात्रा में अफीम मिलने के बाद देविंदर सिंह की बर्खास्तगी को अचानक से रोक क्यों लिया जाता है? उसे काउंटर मिलिटेंसी टीम का हिस्सा क्यों बना दिया जाता है? अगर काउंटर मिलटेन्सी टीम में ऐसे लोगों की भर्ती होती है तो इसका यह मतलब क्यों नहीं निकाला जाए कि हमारे देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया गया।

 

 

 

इस दौरान देविंदर सिंह पर जबरन वसूली, ड्रग तस्करी, कार चोरी और यहां तक कि चरमपंथियों के मदद के कई आरोप लगे। देविंदर सिंह का फिर से ट्रांसफर पुलिस लाइन में कर दिया गया लेकिन साल 1998 में देविंदर सिंह को फिर से स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप में शामिल कर लिया गया। ऐसी हकीकत होने के बावजूद देविंदर सिंह को किस के इशारे पर पुलिस सेवा से बाहर नहीं किया जा रहा है और स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप का हिस्सा बनने दिया जा रहा है? इसका जवाब भी भारत की पुलिस को देना चाहिए।

 

 

जम्मू कश्मीर की सिविल सोसाइटी और अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानवाधिकारियों द्वारा गठित ट्रिब्यूनल से प्रकाशित स्ट्रक्चर ऑफ़ वायलेंस रिपोर्ट के मुताबिक साल 2000 में देविंदर सिंह सहित चार पुलिस वालों पर श्रीनगर के गावकदल इलाके के 19 साल के एजाज अहमद बजाज का टॉर्चर और न्यायिक हिरासत में मारने का आरोप लगा।

 

 

रिपोर्ट के मुताबिक 15 जून 2000 को एजाज अहमद अपने घर से श्रीनगर के बेमिना इलाके में अपने रिश्तेदारों से मिलने निकला था। 17 जून 2000 को घर वालों को यह खबर पता चली कि एजाज अहमद को हुमहमा कैंप की जम्मू कश्मीर पुलिस के स्पेशल ग्रुप ने उठा लिया है। परिवार वाले भागते- भागते हमहमा कैंप गए। देविंदर सिंह और एसएचओ इम्तियाज दोनों ने माना कि एजाज अहमद उनके कैंप में है। अगर परिवार वाले 40 हजार रुपये देंगे तो वह उन्हें मिलने देगा। कहा जाता है कि उस समय तक देविंदर सिंह को जबरिया वसूली, बेकसूरों को उठाकर बंद कर देने और इनके साथ टॉर्चर करने की आदत लग चुकी थी। लोग उसे टॉर्चर सिंह के नाम से जानने लगे थे।

 

 

ठीक ऐसा ही एक और मामला सामने आया था, जिसमें देविंदर सिंह और एक डीएसपी पर पुलिस को यह आदेश दिया गया था वह कार्रवाई करे, लेकिन इस मामले पर ध्यान नहीं दिया गया।

 

 

यह मामला और देविंदर सिंह के बहाने पूरे सुरक्षा बलों की बहुत संगीन प्रवृत्ति की और इशारा करता है। क्या जम्मू कश्मीर जैसे अशांत क्षेत्र में ऐसा है कि जबरन वसूली का गिरोह सुरक्षा बलों द्वारा चलाया जाता है? अगर ऐसा है तो इसका मतलब यही होगा कि आतंकवाद रोकने के नाम पर सामान्य लोगों के मानव अधिकारों का जमकर हनन किया जा रहा है। और जिस जगह पर आम लोगों के मानवाधिकारों का हनन हो क्या वहां पर कभी किसी अन्य तरीके से शांति स्थापित की जा सकती है?

 

 

 

साल 2000 में देविंदर सिंह की मुलाकात संसद हमले में दोषी पाए अफज़ल गुरु से हुई। और अफ़ज़ल गुरु को देविंदर सिंह ने टॉर्चर किया, इसे खुद देविंदर सिंह ने कबूला है। अफ़ज़ल और देविंदर से जुड़ी जानकारी इसी लेख के आगे दी जाएगी। साल 2007 में फिर से देविंदर सिंह को एक व्यापारी से वसूली के आरोप में सस्पेंड कर दिया जाता है। साल 2008 से लेकर 2013 तक , जब तक अफ़ज़ल गुरु को फांसी पर नहीं लटका दिया जाता , तब तक देविंदर सिंह की तैनाती ट्रैफिक डिपार्मेंट में रहती है। जैसे ही अफ़ज़ल की फांसी हो जाती है, देविंदर सिंह अपना संत नगर का घर बेचकर श्रीनगर के इंद्रा नगर के कैंटोनमेंट आर्मी एरिया में घर के लिए जमीन खरीद लेता है। जहां पर इस समय उसके घर के कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा है। साल 2008 से 2013 तक देविंदर ट्रैफिक की सेवा क्यों मुहैया करवता है ?

 

 

अफ़ज़ल को फांसी मिलते ही फिर से उसकी तैनाती काउंटर इंसर्जेसी टीम में क्यों हो जाती है ? क्या अफ़ज़ल और देविंदर सिंह के बीच के तार को तोड़ने के लिए ऐसा किया जाता है ? और आखिरकार अफज़ल की मौत के बाद ऐसा क्या होता है कि देविंदर को अपना पुराना घर बेचना पड़ता है ?

 

 

साल 2015 में देविंदर सिंह की पुलवामा के पुलिस लाइन इलाके में डीएसपी के तौर पर तैनाती होती है। जहां पर 2017 में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों द्वारा हमला किया गया था। अगले साल राज्य सरकार से वीरता पुरस्कार मिलता है। पुलवामा में भी इसके ऊपर गलत काम करने के आरोप लगते हैं। तो उस समय के डीजीपी एसपी वैद देविंदर सिंह की तैनाती अगस्त 2018 श्रीनगर एयरपोर्ट के एंटी हाइजैकिंग यूनिट में कर देते हैं। इसकी तैनाती पर बहुत सारे सीनियर अफसर द्वारा विरोध भी दर्ज किया जाता है। इस विरोध को अनसुना कर दिया जाता है। अगर देविंदर का रिकॉर्ड बहुत बुरा है और पुलवामा की घटना उसके डीएसपी होने के समय होती है तो ऐसा क्यों न सोचा जाए कि देविंदर सिंह और पुलवामा पर हमला करने वाले आतंकवादियों के बीच कोई न कोई सम्बन्ध था?

 

 

देविंदर सिंह और अफ़ज़ल गुरु का संबंध

साल 2001 में संसद भवन में सफ़ेद अम्बेसडर में पांच आतंकी घुस आए। सुरक्षा बलों की कार्रवाई में पांचों आतंकी तो मारे गए। 8 सुरक्षाकर्मी और संसद भवन का 1 माली भी मारे गए। घटना की जांच शुरू हुई। अफज़ल गुरु नाम के शख्स को श्रीनगर से गिरफ्तार किया गया। दिल्ली लाया गया। अफज़ल गुरु पर मुक़दमा चला। फांसी की सज़ा हुई। फरवरी 2013 में अफज़ल गुरु को फांसी दी गयी। फांसी के बाद अफज़ल गुरु के घरवालों ने अफज़ल का एक पत्र सार्वजनिक किया। ये पत्र अफज़ल गुरु ने 2004 में जेल से अपने वकील को लिखा था। इस पत्र में अफज़ल गुरु ने देविंदर सिंह का नाम लिया था। साथ ही पत्रिका “कारवां” के सम्पादक विनोद के. जोश के साथ जेल में हुई बातचीत में अफज़ल गुरु ने देविंदर सिंह का ज़िक्र किया था।

 

 

2006 में तिहाड़ जेल में विनोद के. जोश के साथ हुई बातचीत में अफज़ल गुरु ने ज़िक्र किया कि वह एक बार बॉर्डर पार करके पाकिस्तान के तरफ वाले कश्मीर चला गया था। उसने उस समय उग्रवादियों के साथ ट्रेनिंग शुरू की। बाद में अफज़ल गुरु को लगा कि सीमापार के नेता कश्मीर को भारत के नेताओं की तरह ही इस्तेमाल कर रहे हैं। अफजल गुरु भारत वापस आकर सरेंडर कर देता है और अफज़ल को सरेंडर किए गए उग्रवादी का सर्टिफिकेट मिल जाता है।

 

 

अफज़ल ने नया जीवन शुरू किया। स्कूटर खरीदा। शादी की। लेकिन अफज़ल के मुताबिक जब भी कश्मीर में आतंकियों या अलगाववादियों की ओर से किसी घटना को अंजाम दिया जाता था, तो अफज़ल गुरु को जम्मू-कश्मीर पुलिस और एसटीएफ की ओर से सबसे अधिक परेशान किया जाता था। कई बार कई हफ्तों तक बेबुनियाद हिरासत में रखा जाता था।

 

 

अफज़ल को हुमहुमा के एसटीएफ टॉर्चर कैम्प में रखा जाता था। और डीएसपी विनय गुप्ता और डीएसपी देविंदर सिंह की अगुवाई में उसे टॉर्चर किया जाता था। देविंदर सिंह इस समय स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) का हिस्सा था। इंस्पेक्टर शांति सिंह उनका टॉर्चर एक्सपर्ट था। अफज़ल गुरु ने कहा कि टॉर्चर के दौरान उसके प्राइवेट पार्ट्स में बिजली के झटके दिए जाते थे और मोटी घूस देने पर छोड़ा जाता था।

 

 

अफज़ल गुरु ने बताया कि घूस देने के लिए उसे अपनी पत्नी के गहने और उसका स्कूटर भी बेचने पड़े। घूस इसलिए क्योंकि अधिकारी अफज़ल को झूठे केसों में फंसा देने की धमकी देते थे। अफज़ल गुरु ने कहा कि बिजली के झटके खाकर उसकी हालत ऐसी हो गयी थी कि वो अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध नहीं बना पाता था।

 

 

‘कारवां’ के मुताबिक आर्थिक तौर पर अफज़ल गुरु पूरी तरह से टूट चुका था। खुद को और परिवार को टॉर्चर न सहना पड़े, इसलिए अफज़ल गुरु ने आंख मूंदकर एसटीएफ का साथ दिया। ऐसे ही एक मौके पर देविंदर सिंह ने अफज़ल गुरु को “एक छोटे-से काम” के लिए बुलाया, अफज़ल गुरु मना नहीं कर पाया।

 

 

देविंदर सिंह ने अफज़ल गुरु से कहा कि उसे एक आदमी को दिल्ली लेकर जाना है। अफज़ल ने कहा,“मुझे उस आदमी के लिए दिल्ली में किराए पर एक घर ढूंढना था। मैं उस आदमी से पहली बार मिला था। लेकिन वो आदमी कश्मीरी नहीं बोल पा रहा था इसलिए मुझे लगा कि वो आदमी बाहरी है। उसने मुझे अपना नाम मोहम्मद बताया। ”

 

 

 

बाद में मोहम्मद की पहचान संसद भवन पर हमले में मारे गए आतंकी के तौर पर हुई।

इससे पहले अफज़ल गुरु और मोहम्मद दिल्ली आ गए। दिल्ली में रहने के दौरान दोनों की देविंदर सिंह से बातचीत होती रहती थी। अफ़ज़ल गुरु ने ध्यान दिया कि मोहम्मद दिल्ली में बहुत सारे लोगों से मिलता था। उसने दिल्ली में एक कार खरीदी। और कार खरीदने के बाद उसने अफज़ल गुरु को 35 हज़ार रुपये दिए और अपने घर कश्मीर चले जाने को कहा। अफज़ल गुरु अपने घर की ओर रवाना हो गया। उसने श्रीनगर बस स्टैंड पर सोपोर की बस पकड़ने की तैयारी थी, उसी समय अफज़ल गुरु को गिरफ्तार कर लिया गया। दिल्ली लाया गया। और अफज़ल गुरु को पता चला कि वो संसद भवन पर हुए हमलों का मुख्य आरोपी है।

 

 

अनुराधा भसीन डिजिटल साइट ‘न्यूज़लांड्री’ में लिखती हैं, “यह साफ़ नहीं है कि अफ़ज़ल गुरु को पेश करते समय देविंदर सिंह को लेकर लिखे गए खत को सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किया गया था अथवा नहीं। लेकिन यह खत 2004 से सार्वजनिक तौर पर मौजूद हैं। न ही कोर्ट और न ही पुलिस ने देविंदर सिंह के आरोपों को गंभीरता से लिया।”

 

 

अफ़ज़ल गुरु ने जब देविंदर सिंह पर इतने गंभीर आरोप लगाए तो इसकी जाँच क्यों नहीं हुई ? क्या जाँच इसलिए नहीं हुई कि क्योंकि अगर जांच होती तो बहुत सारे लोगों का नाम सामने आता और छीछालेदर मचता? या क्या ऐसा ही ‘राष्ट्र के विवेक’ के नाम पर बुरे से बुरे काम के आरोपियों की छानबीन पर ध्यान नहीं दिया जाता है। जैसे ‘राष्ट्र के विवेक’ के नाम पर अफ़ज़ल गुरु को फांसी दे दी जा सकती है इसलिए देविंदर सिंह ने अफ़ज़ल गुरु के साथ क्या किया, इस पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है। अगर यह बात सही है तो यह बात भी सही कही जा सकती कि स्टेट पावर भी आतंकवाद रोकने के नाम पर आंतकवाद का कारोबार खड़ा करता चलता है!

 

 

देविंदर के साथ आगे क्या होगा?

बहुत सारी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आने के बाद देविंदर सिंह की जांच को नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया गया है। एनआईए आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े मसलों की जांच करती है। इसलिए यह दूसरी एजेंसियों से अलग है। पिछले पांच सालों में जिस तरह से एनआईए ने काम किया है, उससे इस संस्था पर लोगों का भरोसा बहुत कम है। विपक्ष ने इस पर हमला किया है और सवाल उठाए हैं कि एनआईए की अगुवाई भी एक और मोदी ही कर रहा है। वे वाईके मोदी जिन्होंने गुजरात दंगे और हरेन पंड्या मामले की जांच की थी।

 

 

वाईके की अगुवाई में ये केस कैसे पूरी तरह से दब गया है। इसे एक उदाहरण समझते हैं ?

 

31 दिसंबर 2016 की रात का किस्सा याद कीजिये। पठानकोट के आर्मी एयर स्टेशन पर आतंकवादियों का एक हमला हुआ था। इसमें तीन जवान शहीद हो गए थे और पांच आतंकवादी मारे गए थे। ये पांचों आतंकवादी पुलिस की गाड़ी में बैठकर एयरफोर्स स्टेशन पर दाखिल हुए थे। वजह साफ़ थी कि कोई उन्हें गिरफ्तार न करे। छानबीन हुई तो पता चला कि गाड़ी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस सलविंदर सिंह की थी। पुलिस के सवाल जवाब में सलविंदर सिंह ने कहा कि उनकी गाड़ी को 31 दिसंबर की रात को आतंकवादियों ने जबरन छीन लिया था। लेकिन उन्होंने इसकी रिपोर्ट पुलिस में नहीं करवाई थी।

 

 

इससे कई सारे सवाल खड़े हुए कि सलविंदर सिंह ने पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं करवाई? अगर एसपी रैंक के अधिकारी की गाड़ी छीनी जा रही है तो आतंकवादियों ने उसे मारा क्यों नही? आतंकवादियों ने सलविंदर सिंह को जिन्दा छोड़कर इतना बड़ा खतरा क्यों उठाया? हो सकता था कि सलविंदर सिंह उनके प्लान को नाकामयाब कर सकते थे। और अगर आतंकवादियों के साथ सलविंदर सिंह की हाथापाई हुई है तो उनके शरीर पर चोट के निशान क्यों नहीं है? तब इस मामलें की जांच एनआईए को सौंपी गयी। एनआईए ने साल 2016 में एसपी सलविंदर सिंह को क्लीन चीट दे दी। इस पर कई सारे सवाल उठते हैं।

 

 

 

सलविंदर सिंह का रिकॉर्ड देखा जाता है तो पता चलता है कि उनपर करप्शन और अय्याशी के बहुत सारे चार्ज हैं। साल 2017 में पंजाब में नई सरकार आती है और सलविंदर सिंह को वक्त से पहले हटाकर बर्खास्त कर दिया जाता है। कारण यह दिया जाता है कि एसपी सलविंदर सिंह पर करप्शन के चार्ज है और रेप के चार्ज हैं। उसके बाद जब वह अफसर नहीं रहते तो उनपर फ्री एंड फेयर ट्रायल शुरू होता है और सलविंदर सिंह को रेप और करप्शन के चार्ज में 15 साल की सजा दे दी जाती है। ये उस केस के सबसे मुख्य आरोपी का अंजाम था, जिसने पठानकोट एयरबेस पर हमले में संदिग्ध भूमिका निभाई थी।

 

 

अब देविंदर सिंह के साथ जो होगा वह आगे सामने आएगा ही। लेकिन ऐसे ही मामलों में पहले क्या हुआ है एक नज़र उसकी तरफ डालते हैं। इसी तरह का स्पेशल टास्क फोर्स में एक अफसर शिव कुमार ‘सोनू’ हुआ करता था। उसके बॉस उसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहा करते थे। किश्तवाड़ – डोडा बेल्ट में उसके ऊपर 68 लोगों का एनकाउंटर करने का इल्जाम है। कश्मीर टाइम्स में शिव कुमार सोनू पर छपी स्टोरी कहती है कि वे आतंकवादियों को हथियार, गोला बारूद मुहैया करवाता था, उन्हें टारगेट भी बताता था,काम हो जाने पर खुद आतंकवादियों को मार देता था। इसके बदले में सरकार से इनाम और प्रोमोशन पाता था। उसे भी राज्य सरकार की तरफ से वीरता के पुरस्कार से नवाज़ा गया था। साल 2017 में इस अफसर पर इन्क्वारी बैठी। जाँच में दोषी पाया गया लेकिन कोर्ट के सामने 15 मुख्य गवाहों ने अपना बयान बदल दिया। तब से इस केस में कुछ नहीं हुआ है।

 

 

पत्रकार अनुराधा भसीन कश्मीर टाइम्स में लिखे अपने लेख में इसी तरह के एक और वाकये का जिक्र करती हैं। अनुराधा लिखती हैं कि साल 1996 में मानव अधिकार कार्यकर्त्ता जलील अंद्राबी को टेरिटोरियल आर्मी के मेजर अवतार सिंह तूर ने घर से बाहर निकालकर मार दिया। उस समय में इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई। दो साल बाद पत्रकार हरतोष सिंह बल ने अवतार सिंह तूर का इंटरव्यू किया। उसके बाद स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने भी पाया कि तूर पर गंभीर आरोप लगे हैं, जिसे अनसुना नहीं किया जा सकता है।

 

 

मामला कोर्ट तक पहुंचा तब तक मेजर अवतार सिंह लुधियाना में था। कोर्ट तक मामला पहुँचते ही कोर्ट की इजाजत के बिना अवतार सिंह कनाडा चला गया। उसके बाद हरतोष सिंह बल ने अवतार सिंह का फिर से इंटरव्यू किया। अवतर सिंह ने कहा कि इस मामले में उसे बलि का बकरा बनाया जा रहा है। इसमें सब शामिल हैं। सारी तरह की ख़ुफ़िया एजेंसियां शामिल हैं। अगर मुझे बचाया नहीं गया तो मैं सब कुछ पब्लिक कर दूंगा। ‘द मैन हु नोज़ टू मच’ के नाम से छपे इस आर्टिकल के बाद कनाडा के अवतार सिंह तूर के घर पर पूरे परिवार के साथ उसकी लाश मिली।

 

 

इन उदाहरणों से आप देविंदर सिंह के भविष्य को लेकर आप उन संभावनाओं के बारे में भी सोच सकते हैं, जिन संभावनाओं पर भारत सरकार अब तक काम करती आयी है? फिर भी कुछ सवाल है्ं, जिनका जवाब शायद न मिले लेकिन उन्हें चीख- चीख कर पूछा जाना बहुत ज़रूरी है।

 

 

 

देविंदर सिंह की पूरी ज़िंदगी की किताब पढ़ने के बाद सवालों की झड़ी लग जाती है और हर सवाल के जवाब में ये आशंकाएं मजबूती से उभरती हैं कि वह किसी ख़ुफ़िया एजेसी के लिए काम कर रहा था, उसके ऊपर बड़े अधिकारियों का हाथ था, ये एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा था, जो गोपनीयता के नाम पर अमानवीयता के हद तक जाकर काम कर रही हैं। आख़रिकार ऐसा कैसे हो सकता है कि इतने सारे आरोपों के बावजूद एक व्यक्ति भारतीय सुरक्षा के सबसे संवेदनशील जगहों का हिस्सा हो? अगर यह सच है तो फिर देविंदर सिंह के बहाने ऐसी सम्भावना खड़ी होती हैं कि स्टेट पावर के अंदर भी आतंकवाद का एक कारोबार चल रहा है, जिसे स्टेट अपनी सहूलियत के हिसाब से इस्तेमाल करती है।

 

 

 

अंत में आपको हैदराबाद पुलिस अकेडमी के पूर्व निदेशक विकास नारायण राव की ‘द वायर’ पर की गयी बातचीत का हिस्सा सुनाते हैं- “देविंदर सिंह के मामले में दो बातें स्पष्ट हैं। जहां तक देविंदर सिंह का सवाल है तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि कोई न कोई इंटेलिजेंस एजेंसी देविंदर सिंह को मॉनिटर कर रही है। यह सम्भव नहीं है कि बिना किसी इंटलीजेंस एजेंसी की मदद से वह यह कर पाए। हो सकता है कि इसमें एक से अधिक इंटेलिजेंस एजेंसी भी उसे मदद कर रही हो। यहाँ पर ये हुआ है कि जो इंटेलिजेंस एजेंसी देविंदर सिंह को मॉनिटर कर रही थी और जो इंटेलिजेंस एजेंसी देविंदर सिंह को इंटरसेप्ट कर रहे थे और जो उसे मॉनिटर कर रहे थे, दोनों एक- दूसरे से टकरा गए।

 

 

 

आतंकवादी संगठन और सिक्योरिटी एजेंसी दोनों की यह चाहत होती है कि किसी बड़े मौके पर कार्रवाई कर अपना नम्बर बढ़ा ले। आतंकवादी संगठन यह चाहता है कि किसी बड़े मौके पर कार्रवाई कर वह दूर तक अपना मेसैज फैलाये और सिक्योरिटी एजेंसी कि यह चाहत होती है कि किसी बड़े मौके पर किसी आंतकवादी को पकड़ पर अपना नाम बढ़ा ले। इस घटना को ध्यान से देखिये तो यह दोनों चीजें आपको यहाँ पर मिलती दिखेंगी। पार्लियामेंट अटैक के वीडियो को मैंने बड़े ध्यान से देखा था क्योंकि उस समय मैं प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए काम कर रहा था। मैंने वीडियो देखकर या पाया कि जिन्हें अटैक करने के लिए भेजा गया था, उन्हें चक्रव्यूह में भेजा गया था। यह सुनिश्चित करके भेजा गया था कि तुम अंदर चले तो जाओगे लेकिन मारे भी जाओगे।

 

 

 

उस वीडियो को बड़े ध्यान से देखिये तो आप पाएंगे कि आतंकवादियों की गाड़ी मेन गेट से पार्लियामेंट में इंट्री नहीं करती है, जिस गेट से बहुत सारे सांसद आ रहे थे और जा रहे थे। अगर आतंकवादी ऐसा करते तो बहुत सारा डैमेज करते। आतंकवादियों की गाड़ी वाइस प्रेसिंडेट के गेट पर रुकती है, वहाँ से इंट्री करती है। वहाँ से बहुत कम लोग आते जाते थे। उस दिन वाइस प्रेजिडेंट (उपराष्ट्रपति) आये हुए थे इसलिए गेट खुला हुआ था। जैसे ही आतंकवादियों ने गेट से इंट्री करने की कोशिश की। सिक्योरिटी के लोगों ने गेट बंद कर दिया। और मुठभेड़ हुई। अगर वाइस प्रेसिंडेट नहीं आते तो सिक्योरिटी और अधिक मुस्तैद रहती और उन्हें वहीं ढेर कर देती।”

 

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