अखण्ड भारत

बेबाक बोल- देश की दशा

70 विधानसभा सीटों वाली दिल्ली जो पूर्ण राज्य नहीं है और ज्यादातर शक्तियां केंद्र के अधीन हैं वहां चुनाव को ऐसे नफरती नारे में झोंक दिया गया कि दिल्ली से बाहर का एक नाबालिग अपने हिसाब से चुने हुए गद्दार को गोली मारने पहुंच गया। चुनाव प्रचार में कोई गद्दारों को गोली मारने कह रहा है तो कोई मुख्यमंत्री को आतंकवादी कह रहा तो कोई एक खास कौम के लोगों से डरा रहा कि वे आपके घरों में घुस कर अत्याचार करेंगे। इसके बाद चुनाव आयोग इन पर महज कुछ घंटों या चार दिन का प्रतिबंध लगाता है। एक बार ऐसे नारे लगा कर ये नेता अपना मकसद पूरा कर चुके जो उत्तर प्रदेश तक पहुंच गया। सोशल मीडिया के खाते में इन नारों का चक्रवृद्धि ब्याज पूरी हिंसक फौज तैयार कर देता है। वैसे प्रतिबंध लगाने में चुनाव आयोग को विमानन कंपनियों से सबक लेना चाहिए कि अभद्र भाषा और व्यवहार पर कितनी कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। दिल्ली का चुनाव किस तरह देश की दिशा तय कर रहा इस पर बेबाक बोल।

 

 

सच के साथ|विधान की प्रस्तावना का पाठ पढ़ रहे हैं, गांधी वाली आजादी के नारे लगा रहे हैं। सड़क पर एक पुस्तकालय बना लिया है और वहां पढ़ाई कर रहे हैं। इन नारों को शिक्षा और नौकरी के सवालों से जोड़ रहे हैं। इससे त्रासद हालात और क्या होंगे कि देश के युवा ही दुश्मनों की तरह आमने-सामने खड़े हो गए। एक युवा दूसरे युवा पर गोली चला रहा है।

 

 

देश के गद्दारों को
गोली मारो…
हम इस स्तंभ की शुरुआत अक्सर शेर से करते हैं। शेर के चंद शब्द आगे के हजार शब्दों की रवानगी तय कर देते हैं। ‘देखिए पाते हैं उश्शाक बुतों से क्या फैज/इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है’। गालिब की ये पंक्तियां उम्मीद की ऊर्जा हैं। मुझे यही आगे बढ़ने और अच्छा सोचने को मजबूर करती हैं। सबने उम्मीद जताई, वादे किए कि अच्छे दिन आएंगे। लेकिन साल की शुरुआत से पहले महीने के अंत तक ख्वाबिदा उम्मीद खौफ में है। दिल्ली में जो हो रहा है और उसके जो नतीजे आएंगे उससे देश की दिशा तय होनी है। पहले महीने की अहम 30 तारीख गवाह बन गया कि समाधि और स्मारकों पर उठे हथियार अब जिंदा कौम की तरफ उठ चुके हैं।

 

 

 

दुखद है कि इस बार शुरुआत उस गाली वाले नारे से जिसने हमारे देश के युवा (आधिकारिक तौर पर नाबालिग) में सड़क पर खूनी खेल करने की ऊर्जा भर दी। भारी बल उठाते हुए श्रमिक या कारीगर बोलते हैं जय श्रीराम, अपने अंदर शक्ति का संचार करने के लिए। लेकिन जब जय श्रीराम को नफरती चुनावी नारों के बीच उतार दिया गया तो उसका जयकारा लगाते हुए उत्तर प्रदेश से जामिया के छात्रों और शाहीन बाग को ‘ले लो आजादी’ कहता हुआ जामिया नगर पहुंच गया।

 

 
दिल्ली के चुनाव में अति होगी इसका तो खौफ था लेकिन महात्मा गांधी के शहादत दिवस पर इस मंजर की उम्मीद नहीं थी। शाहीन बाग के बाद दिल्ली के चुनाव पर पूरी दुनिया की नजर है। दुनिया देख रही है कि महात्मा गांधी की याद में राजघाट की ओर जो जुलूस जा रहा था उस पर पुलिस ने रोक लगाई। तभी ‘ले लो आजादी’ कहता हुआ लड़का आता है और जामिया के एक विद्यार्थी पर गोली चला देता है। यह तस्वीर 30 जनवरी को आनी कितनी खतरनाक है, यह देश का हर संवेदनशील इंसान समझ रहा होगा।

 

 

 

खास विश्वविद्यालयों और विद्यार्थियों के खिलाफ राजनेताओं तथा कुछ टीवी चैनलों के नफरती बोलों का इतना घातक असर हुआ कि पहले पुलिस और प्रशासन विद्यार्थियों के खिलाफ खड़ा हो गया और उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार करने लगा। जेएनयू और जामिया जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के खिलाफ ऐसा जहर फैला दिया गया कि दिल्ली से दूर बैठा लड़का उन्हें अपना दुश्मन समझने लगा। अपने सूबे में एक खास पहचान के लड़के की हत्या का बदला उसने जामिया के विद्यार्थी से लिया। उसे पता था कि उसके साथ कुछ भी हो सकता है। अपनी फेसबुक पोस्ट में वह अपील कर रहा है कि उसे भगवा कफन दिया जाए और उसकी अंतिम यात्रा में जय श्रीराम के नारे लगाए जाएं। जय श्रीराम के नारे के साथ इतनी हिंसा और नफरत किसके खिलाफ उगल रहा है। जामिया का विद्यार्थी उसे अपना दुश्मन लग रहा है, अपने अस्तित्व के सवाल पर जवाब मांगतीं शाहीन बाग की औरतें उसके लिए नफरत का केंद्र हैं। एक विद्यार्थी की उम्र का लड़का उन विद्यार्थियों को गोली मारने के लिए पहुंच गया जो उस किताब का मान रखने के लिए सड़क पर हैं जो हमें नागरिक बनाती हैं, गरिमामय जीवन जीने के अधिकार देती हैं। जामिया के बाहर विद्यार्थी क्या कर रहे हैं? संविधान की प्रस्तावना का पाठ पढ़ रहे हैं, गांधी वाली आजादी के नारे लगा रहे हैं। सड़क पर एक पुस्तकालय बना लिया है और वहां पढ़ाई कर रहे हैं। इन नारों को शिक्षा और नौकरी के सवालों से जोड़ रहे हैं। इससे त्रासद हालात और क्या होंगे कि देश के युवा ही दुश्मनों की तरह आमने-सामने खड़े हो गए। एक युवा दूसरे युवा पर गोली चला रहा है।

 

 

 

नाबालिग की फेसबुक पोस्ट आगाह कर रही है कि सोशल मीडिया के मंच किस तरह से नफरती भावनाओं के उत्पाद के कारखाने बन रहे हैं। वह हथियारों के साथ भिन्न-भिन्न मुद्राओं में अपनी तस्वीर लगा रहा है, हथियारों को ऐसे चूम रहा है जैसे उसे देश की रक्षा का कितना बड़ा जिम्मा दिया गया है। किसी खास पहचान के साथ नफरत के नाम पर हिंसा का यह पहला मामला नहीं है। लेकिन ऐसे हर मामले के बाद नफरत में नहाए हुए युवा का सोशल मीडिया खाता हमें चौंकाता है। अब वक्त आ गया है कि सोशल मीडिया के नफरती खातों पर नजर रख उस पर कार्रवाई की जाए। आभासी दुनिया में हिंसा की फैली आग जब जमीन पर हमें जलाती है तभी हम कराहते हैं। इसका हल नागरिक संगठनों की तरफ से ही आना है। सरकार की तरफ से नियंत्रण के अपने खतरे होंगे। चूंकि यह सामाजिक मंच है तो समाज के लोगों को ही इसे सुधारना होगा। भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में चुनावों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल नकारात्मकता फैलाने के लिए किया जा रहा है।

 

 
हमारे देश में तीस जनवरी का दिन मौन का दिन होता है। हत्या और नफरत के खिलाफ साझा मौन। लेकिन इस बार बिहार से लेकर दिल्ली तक गांधी के लिए निकले जुलूस से शासकों ने खतरा महसूस किया। हर जगह गांधी के प्रतीक स्थलों तक प्रस्तावित सत्याग्रह मार्च को रोका गया। इसी के साथ दिल्ली की सड़क पर तनी भौहों के साथ बंदूक ताने एक युवा आता है और हत्या के मकसद से गोली चलाता है। उसकी बंदूक उठी थी प्रदर्शनकारियों की तरफ और आधिकारिक बंदूक वाली दिल्ली पुलिस हाथ बांधे उसे देख रही थी। भीड़ से आवाज आ रही है कि देखो उसके पास बंदूक है लेकिन वह एक विद्यार्थी पर गोली चलाने में कामयाब हो जाता है। देश की राजधानी की पुलिस का यह रवैया हमारे पूरे सुरक्षा तंत्र पर सवाल उठा रहा है। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाते वक्त उसने ‘दिल्ली पुलिस जिंदाबाद’ के नारे लगाए। अपराध करने निकले लोगों का पुलिस पर इस तरह भरोसा कैसे बढ़ा? गोली से घायल विद्यार्थी को पुलिस के अवरोधक के ऊपर से चढ़कर जाना पड़ा तो जेएनयू का वह मंजर याद आया, जब घायल शिक्षकों और विद्यार्थियों की मदद के लिए आई एंबुलेंस तोड़ दी गई थी।

 

 

 

दिल्ली एक पूर्ण राज्य नहीं है। महज सात संसदीय और 70 विधानसभा सीट वाली इस दिल्ली की ज्यादातर शक्तियां केंद्र के अधीन हैं। अभी तक इसके चुनावों को निकाय चुनाव की तर्ज पर ही लड़ा जाता था। प्याज के दाम से लेकर बिजली, पानी और सड़क पर। लेकिन इस बार सारी मर्यादा ताक पर रख दी गई। एक सितारा प्रचारक एक खास कौम के लोगों के प्रति बेपरवाही से कह देता है कि वे आपके घर में घुसकर आपकी बहू-बेटियों के साथ अत्याचार करेंगे। दूसरा गाली के साथ गोली मारने के नारे लगवा देता है। तीसरा दिल्ली के मुख्यमंत्री को आतंकवादी कह देता है।

 

 
सबसे बड़ा सवाल चुनाव आयोग पर। एक नेता नफरत भरे बयान दे देता है और उस पर महज कुछ घंटों या तीन-चार दिन तक चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। शिकायत जाने और प्रतिबंध लगने तक उसके नफरत भरे नारों का असर ऐसा दिखने लगता है कि एक युवा, दूसरे युवा को गोली मारने पहुंच जाता है। गद्दार की परिभाषा सबने अपने हिसाब से चुन ली है और उसी हिसाब से गोली मार रहे हैं। चुनाव दिल्ली का और उसमें फैलाई जा रही नफरत का असर पूरे देश पर हो गया। जब एक राजनेता चुनावी वादों के साथ एक बार नफरत का नारा लगा देता है तो उसका मकसद पूरा हो जाता है क्योंकि भीड़ के लिए यह अफीम की तरह काम करता है। अब उसे लगाने वाले पर चार दिन का प्रतिबंध लगे तो क्या फर्क पड़ता है। उस नारे की नफरत का खाता चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ता रहता है। इन नारों के बाद वह जीत गया तो ऐसी गाली और हिंसा चुनाव जीतने के राा्ट्रीयष मानक बन जाएंगे।

 

 
दिल्ली चुनाव में नफरत का जो दांव खेला गया है उस पर ऐसी रोक लगे कि वह आगे की राह न बन जाए। चुनाव आयोग को विमानन कंपनियों से सबक लेना चाहिए कि वे अभद्र व्यवहार पर कितना लंबा प्रतिबंध लगाती हैं और उसके साथ रेलवे और उबर तक प्रतिबंध-प्रतिबंध का राग अलापने लगते हैं। गांधी को गाली देने और उनके हत्यारे को महिमामंडित करने का जो खेल शुरू हुआ था वह अब सड़क पर खून बहा रहा है। देश की संवैधानिक संस्थाएं देखें कि देश की दिशा तय होने का मानक क्या हो।

 

सच के साथ:

ये लेख पत्रकारिता के धर्मानुसार लिखा गया  इसमें मेरे अपने विचार नहीं है।

 

 

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