अखण्ड भारत

आखिर किसने और कब लिखी थी मनुस्मृति, जानिए इस रहस्य को…

220+10,000= 10,220 ईसा पूर्व मनुस्मृति लिखी गई होगी अर्थात आज से 12,234 वर्ष पूर्व मनुस्मृति उपलब्ध थी। किसने रची मनु स्मृति : धर्मशास्त्रीय ग्रंथकारों के अतिरिक्त शंकराचार्य, शबरस्वामी जैसे दार्शनिक भी प्रमाणरूपेण इस ग्रंथ को उद्धृत करते हैं।

 

images(70)

 

सच के साथ|सभी भाषाओं के मनुष्य-वाची शब्द मैन, मनुज, मानव, आदम, आदमी आदि सभी मनु शब्द से प्रभावित है। सभी मनु मानव जाति के संदेशवाहक हैं। संसार के प्रथम पुरुष स्वायंभुव मनु और प्रथम स्त्री थी शतरूपा। इन्हीं प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री की संतानों से संसार के समस्त जनों की उत्पत्ति हुई। मनु की संतान होने के कारण वे मानव कहलाए।

कौन है मनु : मनु है एक मनुष्य जो अपने कर्मों से महान बन गए। जिन्होंने मानव समाज को शिक्षित, विकसित और समझदार बनाने के लिए धर्म, शिक्षा, तकनीक, व्यवस्‍था और कानून दिया। ठीक उसी तरह जिस तरह जैन धर्म में 14 कुलकरों ने समाज के लिए काम किया। इन्होंने स्वयं को कभी भगवान नहीं माना बल्कि यह वेदों की सच्ची राह पर चलते गए और महान बन गए। दरअसल, मनु ही भारतीय समाज और राष्ट्र के निर्माता रहे हैं, लेकिन ऐसे कई कारण थे कि मनुओं को हाशिये पर धकेल दिया गया उन्हें समझे बगैर। उनके हाशिये पर चले जाने से ही हिन्दू समाज अपने मुख्‍य इतिहास से कट गया। खैर…

 

हम बताना चाहते हैं कि वर्तमान में जो मनुस्मृति पाई जाती है वह किस काल के मनु ने लिखी है और उनका नाम क्या था। तो सबसे पहले क्रमवार जान लीजिये की कौन कौन से मनु हुए हैं… एक अनुमानित गणना अनुसार लगभग 9500 ईसा पूर्व स्वायंभुव मनु का जन्म हुआ था। उसके बाद उनके ही कुल में क्रमश: स्वारो‍‍चिष, औत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मासावर्णि, धर्मसावर्णि, रूद्रसावर्णि, देवसावर्णि और इन्द्रसावर्णि।

 

 

माना जाता है कि वर्तमान में जो मनु स्मृति अस्तित्व में है उसे 14वें मनु इन्द्रसावर्णि के मार्गदर्शन में सूत्रबद्ध किया गया था। लेकिन कालांतकर में इसमें परिवर्तन होते रहे। इन्द्रसावर्णि मनु ने इस मन्वन्तर के प्रारंभ में वैदिक संस्कार और सभ्यता को पुर्नस्थापित कर भारतीय सामज को उन्नत और संगठित किया था। इनका अवतरण श्रावण मास में कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को हुआ था।

 

ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार उनके पुत्र का नाम वृषध्वज था। यह नरेश वृषध्वज भगवान शंकर के परम भक्त थे। लेकिन वे विष्णु, लक्ष्मी और यज्ञ की निंदा करते रहे थे। अभिमान में चूर होकर वे भाद्रमास में महालक्ष्मी की पूजा में विघ्न डाला करते थे। उसके ऐसे व्यवहार के चलते एक दिन भगवान सूर्य ने उन्हें शाप दे दिया कि हे राजन! तेरी श्री नष्ट हो जाए।

 

मनु स्मृति की ऐतिहासिकता : ऐतिहासिक प्रमाणों और साहित्यिक तथ्‍यों के अनुसार महाभारत का रचनाकाल 3150 ईसा पूर्व का लिखा ग्रंथ माना जाता है। ‘महाभारत’ में महाराजा मनु की चर्चा बार-बार की गई है (महाभारत अनुशासन पर्व और शांतिपर्व देखें), किंतु मनुस्मृति में महाभारत, कृष्ण या वेदव्यास का नाम तक नहीं है।

 

उसी तरह आधुनिक शोध के अनुसार राम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व हुआ था अर्थात आज से 7,129 वर्ष पूर्व। लगभग इसी काल में वाल्मीकिजी ने रामायण लिखी थी। महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण (वाल्मीकि रामायण 4-18-30, 31, 32 देखें) में मनुस्मृति के श्लोक व महाराज मनु की प्रतिष्ठा मिलती है किंतु मनुस्मृति में वाल्मीकि या भगवान राम आदि का नाम तक नहीं मिलता। महाभारत और रामायण में ऐसे कुछ श्लोक हैं, जो मनुस्मृति से ज्यों के त्यों लिए गए हैं। अतः अब सिद्ध हुआ कि ‘मनु महाराज’ भगवान श्रीकृष्ण और राम से पहले हुए थे और उनकी मनुस्मृति उन्हीं के काल में लिखी गई थी।

 

 

तब कितनी पुरानी है मनुस्मृति?
सन् 1932 में जापान के एक बम विस्फोट द्वारा चीन की ऐतिहासिक दीवार का एक हिस्सा टूट गया था। टूटे हुए इस हिस्से से लोहे का एक ट्रंक मिला जिसमें चीनी भाषा में एक प्राचीन पांडुलिपियां भरी हुई थीं।

 

चीन से प्राप्त पुरातात्विक प्रमाण-
विदेशी प्रमाणों में मनुस्मृति के काल तथा श्लोकों की संख्या की जानकारी कराने वाला एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण चीन में मिला है। सन् 1932 में जापान ने बम विस्फोट द्वारा चीन की ऐतिहासिक दीवार को तोड़ा तो उसमें से एक लोहे का ट्रंक मिला जिसमें चीनी भाषा की प्राचीन पांडुलिपियां भरी थीं। ये पांडुलिपियां सर आगस्टस रिट्ज जॉर्ज (Sir Augustus Fritz) के हाथ लग गईं और उन्होंने इसे ब्रिटिश म्यूजियम में रखवा दिया था। उन पांडुलिपियों को प्रोफेसर एंथोनी ग्रेम ( Prof. Anthony Graeme) ने चीनी विद्वानों से पढ़वाया तो यह जानकारी मिली…

 

चीन के राजा शी लेज वांग (Chin-Ize-Wang) ने अपने शासनकाल में यह आज्ञा दी कि सभी प्राचीन पुस्तकों को नष्ट कर दिया जाए। इस आज्ञा का मतलब था कि कि चीनी सभ्यता के सभी प्राचीन प्रमाण नष्ट हो जाएं। तब किसी विद्याप्रेमी ने पुस्तकों को ट्रंक में छिपाया और दीवार बनते समय चुनवा दिया। संयोग से ट्रंक विस्फोट से निकल आया।

 

चीनी भाषा के उन हस्तलेखों में से एक में लिखा है कि मनु का धर्मशास्त्र भारत में सर्वाधिक मान्य है, जो वैदिक संस्कृत में लिखा है और 10,000 वर्ष से अधिक पुराना है तथा इसमें मनु के श्लोकों की संख्या 680 (?) भी बताई गई है। …किंतु वर्तमान में मनु स्मृति में 2400 के आसपास श्लोक हैं।

 

इस दीवार के बनने का समय लगभग 220 से 206 ईसा पूर्व का है अर्थात लिखने वाले ने कम से कम 220 ईसा पूर्व ही मनु के बारे में अपने हस्तलेख में लिखा। 220+10,000= 10,220 ईसा पूर्व मनुस्मृति लिखी गई होगी अर्थात आज से 12,234 वर्ष पूर्व मनुस्मृति उपलब्ध थी।

 

 

किसने रची मनु स्मृति : धर्मशास्त्रीय ग्रंथकारों के अतिरिक्त शंकराचार्य, शबरस्वामी जैसे दार्शनिक भी प्रमाणरूपेण इस ग्रंथ को उद्धृत करते हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि परंपरानुसार यह स्मृति स्वायंभुव मनु द्वारा रचित है, वैवस्वत मनु या प्राचनेस मनु द्वारा नहीं। महाभारत ने स्वायंभुव मनु एवं प्राचेतस मनु में अन्तर बताया है, जिनमें प्रथम धर्मशास्त्रकार एवं दूसरे अर्थशास्त्रकार कहे गए हैं। उन्हीं के कुल में आगे चलकर इंद्रसावर्णि ने इस ग्रंथ को परिष्कृत किया।

 

हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार राजा वैवस्वत मनु का जन्म 6382 विक्रम संवत पूर्व वैशाख कृष्ण पक्ष 1 को हुआ था अर्थात ईसा पूर्व 6324 को हुआ था। इसका मतलब कि आज से 8,340 वर्ष पूर्व राजा मनु का जन्म हुआ था। वैवस्वत मनु को श्राद्धदेव भी कहते हैं। इन्हीं के काल में विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इनके पूर्व 6 और मनु हो गए हैं। स्वायंभुव मनु प्रथम मनु हैं, तो क्या प्रथम मनु के काल में मनुस्मृति लिखी गई? स्वायंभुव मनु 9057 ईसा हुए थे। ये भगवान ब्रह्मा की दो पीढ़ी बाद हुए थे।

 

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उनका काल 9000 से 8762 विक्रम संवत पूर्व के बीच का था अर्थात 8942 ईसा पूर्व उनका जन्म हुआ था। इसका मतलब आज से 10,956 वर्ष पूर्व प्रथम राजा स्वायंभुव मनु थे। तो कम से कम आज से 10,000 वर्ष पुरानी है हमारी ‘मनुस्मृति’।

 

 

टिप्पणी : कुछ लोग बगैर किसी आधार के मानते हैं कि कोई दो हजार साल पहले ब्राह्मणों ने ‘मनुस्मृति’ की रचना उस वक्त की जब देश से ब्राह्मणों और ब्राह्मणवादी विचारों का वर्चस्व खत्म हो रहा था। ऐसे में ब्राह्मणों ने अपने वर्चस्व को पुन: स्थापित करने के लिए मनु स्मृति लिखी और इसमें ब्राह्मणों को देवतुल्य घोषित किया गया। लेकिन ऐसा मानने वाले इतिहास को गहराई से शायद ही जानते होंगे। यदि वे गुलामी के काल का अच्छे से अध्ययन कर लेते, तो संभवत: ऐसा नहीं मानते। लेकिन यह भी सच ही है कि दुनिया के कानून का नक्षा मनु स्मृति को आधार मानकर ही बनाया गया है।

 

यदि वेद कंठस्थ नहीं होते और वे विशेष छंदों में नहीं लिखे गए होते, तो उनका हाल भी मनु स्मृति की तरह होता। तब हिन्दू समाज को विभाजित करने के लिए एक और ग्रंथ मिल जाता। यहां पहली बात यह समझने की है कि मनु स्मृति को कभी भी हिन्दुओं ने अपना धर्मग्रंथ नहीं माना। इसका कभी भी किसी मंदिर में पाठ भी नहीं होता और न ही इसे कोई पढ़ता है। कोई इसे खरीदकर घर में भी नहीं रखता है। कुछ का मत है कि पहले एक ‘मानव धर्मशास्त्र’ था जो अब उपलब्ध नहीं है। अत: वर्तमान ‘मनुस्मृति’ को मनु के नाम से प्रचारित करके उसे प्रामाणिकता प्रदान की गई है। परंतु बहुमत इसे स्वीकार नहीं करता।

 

 

मनु स्मृति में हेरफेर : ऐसी मान्यता अधिक है कि अंग्रेज काल में इस ग्रंथ में हेरफेर करके इसे जबरन मान्यता दी गई और इस आधार पर हिन्दुओं का कानून बनाया गया। जब अंग्रेज चले गए तो भारत में जो सरकार बैठी उसने यह कभी ध्यान नहीं दिया की अंग्रेजों द्वारा जो गड़बड़ियां की गई थी उसे ठीक किया जाए। उन्होंने भी अंग्रेजों का अनुसरण करते हुए अंग्रेजों की ही परंपरा को आगे बढ़ाया।

 

कुछ विद्वान मानते हैं कि मनुस्मृति में वेदसम्मत वाणी का खुलासा किया गया है। वेद को कोई अच्छे से समझता या समझाता है तो वह है मनुस्मृति। लेकिन फिर भी राजा मनु ने इसमें कुछ अपने विचार भी प्रक्षेपित किए हैं। अब मनु स्मृति की बात करें तो अब तक 14 मनु हो गए हैं। प्रत्येक मनु ने अलग मनु स्मृति की रचना की है। इसी तरह प्रयेक ऋषियों की अलग अलग स्मृतियां हैं और इस तरह कम से कम 20-25 स्मृतियां मौजूद हैं।

 

यह मनस्मृति पुस्तक महाभारत और रामायण से भी प्राचीन है। गीता प्रेस गोरखपुर या फिर गायत्री परिवार से प्रकाशित मनुस्मृति को ही पढ़ना चाहिए, क्योंकि अन्य प्रकशनों की मनुस्मृति पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि वह सही है या नहीं। ऐसे भी मनुस्मृति है जिसमें कुछ सूत्रों श्लोकों के साथ छेड़कानी करके उसे खूब प्रचारित और प्रसारित किया गया है।

 

मनुस्मृति के बहुत से संस्करण उपलब्ध हैं। कालान्तर में बहुत से प्रक्षेप भी स्वाभाविक हैं। साधारण व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं है कि वह बाद में सम्मिलित हुए सूत्रों या अंशों की पहचान कर सके। कोई अधिकारी विद्वान ही तुलनात्मक अध्ययन के उपरान्त ऐसा कर सकता है। क्योंकि बहुत ही चालाकी से यह जोड़े गए हैं। पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार मनु परंपरा की प्राचीनता होने पर भी वर्तमान मनुस्मृति ईसा पूर्व चतुर्थ शताब्दी से प्राचीन नहीं हो सकती।

 
मनुस्मृति के अनेक मत या वाक्य जो निरुक्त, महाभारत आदि प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलते हैं, उनके हेतु पर विचार करने पर भी कई उत्तर प्रतिभासित होते हैं। इस प्रकार के अनेक तथ्यों का बुहलर (Buhler, G.) (सैक्रेड बुक्स ऑव ईस्ट सीरीज, संख्या 25), पाण्डुरंग वामन काणे (हिस्ट्री ऑव धर्मशात्र में मनुप्रकरण) आदि विद्वानों ने पर्याप्त विवेचन किया है। यह अनुमान बहुत कुछ संगत प्रतीत होता है कि मनु के नाम से धर्मशास्त्रीय विषय परक वाक्य समाज में प्रचलित थे, जिनका निर्देश महाभारतादि में है तथा जिन वचनों का आश्रय लेकर वर्तमान मनुसंहिता बनाई गई, साथ ही प्रसिद्धि के लिये भृगु नामक प्राचीन ऋषि का नाम उसके साथ जोड़ दिया गया। मनु से पहले भी धर्मशास्त्रकार थे।

संदर्भ :
Education in the Emerging India (R.P. Pathak)
मनु धर्मशास्त्र : ए सोशियोलॉजिकल एंड हिस्टोरिकल स्टडीज’ (मोटवानी)

 

 

मनुस्मृति में आख़िर है क्या?
इतिहासकार नराहर कुरुंदकर बताते हैं, “स्मृति का मतलब धर्मशास्त्र होता है. ऐसे में मनु द्वारा लिखा गया धार्मिक लेख मनुस्मृति कही जाती है. मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय हैं जिनमें 2684 श्लोक हैं. कुछ संस्करणों में श्लोकों की संख्या 2964 है.”

 
कुरुंदकर अब तक मनुस्मृति पर तीन लेक्चर दे चुके हैं. इन तीनों भाषणों को एक किताब की शक्ल दी गई है जो मनुस्मृति के अंदर की दुनिया के बारे में बताती है.

कुरुंदकर मनुस्मृति पर अपनी सोच को बताते हुए कहते हैं, “मैं उन लोगों में शामिल हूं जो मनुस्मृति को जलाने में विश्वास करते हैं.”

मनुस्मृति के फॉर्मैट को समझाते हुए कुरुंदकर कहते हैं, “इस किताब की रचना ईसा के जन्म से दो-तीन सौ सालों पहले शुरू हुई थी. पहले अध्याय में प्रकृति के निर्माण, चार युगों, चार वर्णों, उनके पेशों, ब्राह्मणों की महानता जैसे विषय शामिल हैं. दूसरा अध्याय ब्रह्मचर्य और अपने मालिक की सेवा पर आधारित है.”

Image copyright GETTY IMAGES
“तीसरे अध्याय में शादियों की किस्मों, विवाहों के रीति रिवाजों और श्राद्ध यानी पूर्वज़ों को याद करने का वर्णन है. चौधे अध्याय में गृहस्थ धर्म के कर्तव्य, खाने या न खाने के नियमों और 21 तरह के नरकों का ज़िक्र है.”

“पांचवे अध्याय में महिलाओं के कर्तव्यों, शुद्धता और अशुद्धता आदि का ज़िक्र है. छठे अध्याय में एक संत और सातवें अध्याय में एक राजा के कर्तव्यों का ज़िक्र है. आठवां अध्याय अपराध, न्याय, वचन और राजनीतिक मामलों आदि पर बात करता है. नौवें अध्याय में पैतृक संपत्ति, दसवें अध्याय में वर्णों के मिश्रण, ग्यारहवें अध्याय में पापकर्म और बारहवें अध्याय में तीन गुणों व वेदों की प्रशंसा है. मनुस्मृति की यही सामान्य रूपरेखा है.”

“मनुस्मृति में अधिकार, अपराध, बयान और न्याय के बारे में बात की गई है. ये वर्तमान समय की आईपीसी और सीआरपीसी की तरह लिखी गई है.”

 

 

पंजाब यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाने वाले राजीव लोचन बताते हैं कि ब्रितानी लोगों के भारत आने से पहले इस किताब को क़ानून की किताब के रूप में प्रयोग नहीं किया गया था.

 

 

मनुस्मृति को इतनी प्रसिद्धि कैसे मिली?
राजीव लोचन मनुस्मृति के इतिहास को समझाते हुए कहते हैं, “जब ब्रितानी लोग भारत आए तो उन्हें लगा कि जिस तरह मुस्लिमों के पास क़ानून की किताब के रूप में शरिया है, उसी तरह हिंदुओं के पास भी मनुस्मृति है. इसकी वजह से उन्होंने इस किताब के आधार पर मुक़दमों की सुनवाई शुरू कर दी. इसके साथ ही काशी के पंडितों ने भी अंग्रेज़ों से कहा कि वे मनुस्मृति को हिंदुओं का सूत्रग्रंथ बताकर प्रचार करें. इसकी वजह से ये धारणा बनी की मनुस्मृति हिंदुओं का मानक धर्मग्रंथ है.”

 

 

ब्राह्मण के प्रभुत्व के लिए मनुस्मृति ?

राजीव लोचन बताते हैं, “जब बुद्ध संघों की भारत में ख्याति फैलने लगी थी तो ब्राह्मणों ने प्रभुत्व कम होता देख इस किताब को लिखकर अपने प्रभुत्व को फिर से जमाने की कोशिश की. उन्होंने एक मिथक रचा कि ब्राह्मण का स्थान समाज में सबसे ऊपर है और समाज में ब्राह्मणों और दूसरे लोगों के लिए अलग-अलग नियम हैं.”

 

 

“वर्णों के मुताबिक़, इसी वजह से ब्राह्मणों की कम सज़ा मिलती थी लेकिन दूसरे लोगों को कड़ी सज़ा मिलती थी. ये कहा गया कि जो व्यक्ति ग़लत काम करेगा, उसे कड़ी सज़ा का सामना करना पड़ेगा. ये किताब बताती है कि किसी भी स्थिति में ब्राह्मणों का सम्मान किया जाना चाहिए. किसी भी महिला का कल्याण तभी हो सकता है, जब एक पुरुष का कल्याण हो जाए. एक महिला को किसी तरह के धार्मिक अधिकार नहीं हैं. वह अपने पति की सेवा करके स्वर्ग प्राप्त कर सकती है. मनुस्मृति में यही सब लिखा है.”

 

 

लेकिन इन विचारों को चुनौती किसने दी?

मनुस्मृति ने शूद्रों के शिक्षा पाने के अधिकार को खारिज कर दिया था. शिक्षा देने की विधि मौखिक हुआ करती थी. ऐसे में कुछ ब्राह्मणों को छोड़कर कोई ये नहीं जानता कि मनुस्मृति आख़िर क्या है.

ब्रिटिश राज के दौरान ये किताब क़ानूनी मामलों में इस्तेमाल होने की वजह से ख़ासी चर्चित हो गई.

विलियम जोनास ने मनुस्मृति का अंग्रेजी में अनुवाद किया है. इसकी वजह से लोगों को इस किताब के बारे में पता चला.

राजीव लोचन बताते हैं, “महात्मा ज्योतिबा फुले मनुस्मृति को चुनौती देने वाले पहले व्यक्ति थे. खेतिहर मजदूरों, सीमांत किसान और समाज के दूसरे वंचित और शोषित तबकों की सोचनीय हालत देखकर उन्होंने ब्राह्मणों और व्यापारियों की आलोचना की.”

 

 

जब आंबेडकर ने जलाई मनुस्मृति
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने 25 जुलाई, 1927 को महाराष्ट्र के कोलाबा ज़िले में (वर्तमान में रायगड) के महाद में सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति को जलाया.

 
आंबेडकर अपनी किताब ‘फ़िलॉसफ़ी ऑफ हिंदूइज़्म’ में लिखते हैं, “मनु ने चार वर्ण व्यवस्था की वकालत की थी. मनु ने इन चार वर्णों को अलग-अलग रखने के बारे में बताकर जाति व्यवस्था की नींव रखी. हालांकि, ये नहीं कहा जा सकता है कि मनु ने जाति व्यवस्था की रचना की है. लेकिन उन्होंने इस व्यवस्था के बीज ज़रूर बोए थे.”

उन्होंने मनुस्मृति के विरोध को अपनी किताब ‘कौन थे शूद्र’ और ‘जाति का अंत’ में भी दर्ज कराया है.

उस दौर में दलितों और महिलाओं को एक सामान्य ज़िंदगी जीने का अधिकार नहीं था. इसके साथ ही ब्राह्मणों के प्रभुत्व की वजह से जाति व्यवस्था का जन्म हुआ.

डॉ. आंबेडकर बताते हैं कि जाति व्यवस्था एक कई मंजिला इमारत जैसी होती है जिसमें एक मंजिल से दूसरी मंजिल में जाने के लिए कोई सीढ़ी नहीं होती है.

उन्होंने कहा है, “वर्ण व्यवस्था बनाकर सिर्फ कर्म को ही विभाजित नहीं किया गया बल्कि काम करने वालों को भी विभाजित कर दिया.”

 

 

मनुवादी और मूलनिवासी
आंबेडकर के मनुस्मृति जलाने के बाद देश भर में कई जगह इस किताब को जलाया गया. इससे अख़बारों में देश और समाज पर मनुस्मृति के प्रभाव जैसे मुद्दों पर चर्चा शुरू हो गई.

 

 
ये चीज़ें भारत की स्वतंत्रता के बाद भी चलती रहीं.

साल 1970 में कांशी राम ने बामसेफ का गठन किया और ऐलान किया कि समाज दो हिस्सों में बंटा है जिसमें से एक हिस्सा मनुवादी हैं और दूसरा हिस्सा मूलनिवासी है.

जेएनयू में पढ़ाने वाले प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं, “कांशी राम कहा करते थे कि जातियों की रचना मनु स्मृति के आधार पर हुई है. इससे असमानताओं वाले समाज की रचना हुई. इस वजह से ये समाज छह हज़ार जातियों में बंट गया.”

 

 

मनुवाद का समर्थन किसने किया?
मनुवाद का समर्थन करने वालों की संख्या भी कम नहीं है.

इतिहासकार नरहर कुरुंदकर समझाते हुए कहते हैं, “मनुस्मृति के समर्थकों का एक गुट कहता हैं कि इस सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने की थी और दुनिया का कानून प्रजापति-मनु-भृगु की परंपरा से आया है. ऐसे में इसका सम्मान किया जाना चाहिए.”

कुरुंदकर अपनी किताब में इसके बारे में बताते हैं, “मनुस्मृति का बचाव के लिए ये भी कहा जाता है कि स्मृतियां वेदों पर आधारित हैं. और मनुस्मृति भी वेदों के हिसाब से ही है. इस वजह से इसे वेदों की तरह ही सम्मान मिलना चाहिए. शंकराचार्य के साथ-साथ दूसरे धर्मगुरुओं ने भी इसी आधार पर इसका बचाव किया. मनुस्मृति के आधुनिक समर्थक कहते हैं कि इस किताब के कुछ हिस्सों को छोड़ दिया जाए तो ये किताब समाज के कल्याण की बात करती है.”

 

“कानून लिखने वाले पहले व्यक्ति
विवादित नेता संभाजी भिड़े ने अपने एक भाषण में दावा किया है कि मनु ने विश्व कल्याण के लिए ये किताब लिखी और वह एक बड़े क़ानून विशेषज्ञ थे.

कुछ लोग कहते हैं राजस्थान हाई कोर्ट में उनकी एक मूर्ति भी लगी है.

राजस्थान से आने वाले दलित एक्टिविस्ट पी. एल. मीथारोथ बीबीसी को बताते हैं, “जयपुर बार एसोशिएसन ने ये मूर्ति लगवाई है. उन दिनों में बार एसोशिएसन में ज़्यादातर वकील ऊंची जातियों से हुआ करते थे. ऐसे में समर्थकों ने दावा किया कि मनु कानून लिखने वाले पहले शख़्स थे, ऐसे में हाई कोर्ट परिसर में उनकी मूर्ति लगना जायज़ है.”

 

 

सनातन संस्था भी मनुस्मृति का समर्थन करती है.
इस संस्था ने एक किताब प्रकाशित की है जिसका शीर्षक है “मनुस्मृति को जलाया जाए या अध्ययन किया जाए.”

इस संस्था का दावा है कि एक समय में समाज मनुस्मृति के हिसाब से ही चलता था.

सनातन संस्था एक कट्टर हिंदूवादी संगठन है जिसके मुखिया विवादित हिप्नोथेरेपिस्ट डॉ. जयंत अठावले हैं.

इस संस्था से जुड़े कुछ लोगों के नाम पर कथित रूप से गोवा और महाराष्ट्र में हुए बम धमाकों से जुड़े हुए हैं. इस संस्था के कुछ लोग तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या में अहम संदिग्ध के रूप में दर्ज हैं.

सनातन संस्था ने ये भी कहा है कि जर्मन दार्शनिक ‘नीचा’ इस किताब से काफ़ी प्रभावित हुए थे और इसमें कहीं भी जाति व्यवस्था का ज़िक्र नहीं है.

 

 

आधुनिक शिक्षा से आधुनिक दिमाग

कुरुंदकर कहते हैं, “आधुनिक शिक्षा इन लोगों के लिए आधुनिक दिमाग़ की रचना नहीं कर सकी. इसलिए ये लोग परंपरा को मानने वाले और रूढ़िवादी बने रहे. आधुनिक शिक्षा ने परंपराओं को मानते रहने के लिए नए तर्क दिए.”

“डॉक्टर आंबेडकर को ऐसे लोगों पर ग़ुस्सा आता था. उन्हें लगता था कि शिक्षा व्यवस्था पारंपरिक दिमाग़ को बदलने में नाकामयाब साबित हुई है. इसकी जगह रूढ़िवादी लोगों ने आधुनिक शिक्षा को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया. आंबेडकर सोचते थे कि यही लोग जाति व्यवस्था और पाखंडियों के संरक्षक हैं.”

1 reply »

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.