इतिहास

UP:वाराणसी के बभनियांव गांव में मिली प्रारंभिक गुप्तकालीन फर्श और दीवार

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Suchkesath/Banaras|वाराणसी के दक्षिण स्थित जक्खिनी कस्बे का बभनियांव गांव गुप्तकाल के आरंभिक दिनों की दास्तान दुनिया के सामने पेश करने को तैयार है। पुरातत्वविदों की टीम द्वारा की जा रही खोदाई में शुक्रवार को कुछ ऐसे तथ्य हाथ लगे हैं जिनसे आरंभिक गुप्तकाल के किसी महत्वपूर्ण पवित्रस्थल के बारे में खुलासा हो सकता है।

 

 

पुरातात्विक उत्खनन में तीसरे दिन गड्ढे में एक मीटर उत्खनन के बाद प्रारंभिक गुप्तकालीन फर्श और दीवार मिली है। फर्श को मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों की कुटाई करके खास तरीके से बनाया गया है। फर्श के बगल में चौड़ी ईंट के टुकड़ों की दीवार मिली है। इसमें खास यह कि एक मीटर से अधिक हो चुकी खोदाई के बाद लौह अयस्क तो मिले हैं लेकिन अस्थियां नहीं मिली हैं। एक मीटर के नीचे अलग-अलग स्तरों पर निर्माण के संकेत भी मिले हैं।

 
लौह अयस्कों की मौजूदगी, मिट्टी के पात्रों को कूट कर बनाई गई फर्श और ईंट के टुकड़ों की दीवार इस बात का संकेत है कि यहां उस दौर में कोई पवित्र स्थल था। यह कितना विस्तृत था, इसका क्या महत्व था, इसे किन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाया गया था, ऐसे प्रश्नों के जवाब के लिए थोड़ा और इंतजार करना होगा। बीएचयू इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. ओंकारनाथ सिंह ने बताया कि तकनीकी टीम द्वारा इसकी ड्राइंग और फोटोग्राफी के बाद नीचे और दक्षिण दिशा की ओर उत्खनन किया जायेगा। इस उत्खनन के बाद स्थिति स्पष्ट होगी।

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लौह अयस्कों का मिलना महत्वपूर्ण
प्रो. ओंकार नाथ सिंह ने बताया कि लौह अयस्क का मिलना काफी महत्वपूर्ण है। हो सकता है यहां लौह अयस्क गलाकर लोहे की उपयोगी सामग्री बनाई जाती रही हो। वह दैनिक उपयोग की वस्तुओं से लेकर युद्ध के लिए हथियार तैयार करने तक कोई भी वस्तु हो सकती है। आगे की खुदाई के साथ इन रहस्यों से भी पर्दा उठता जाएगा। पहले गड्ढे से 100 मीटर पश्चिम एक नये गड्ढे की खुदाई शुरू हुई। शुक्रवार को उसकी ऊपरी सतह से मिट्टी हटाने का काम पूरा किया गया।

गुप्तकालीन होने का अनुमान लगाया जा रहा है। हालांकि सही उम्र का पता कार्बन डेटिंग के बाद चलेगा। अभी यहां महीने भर खुदाई चलनी है। पुरातत्वविदें ने यहां कुषाणकालीन भवनों के प्रमाण भी मिलने की संभावना जताई है।

बीएचयू की टीम ने सर्वेक्षण के दौरान मिट्टी के बर्तन, भट्टी, मंदिरों के अवशेष, मूर्तियां आदि मिलने पर यहां करीब तीन हजार साल पुरानी बस्ती होने की संभावना जताई थी। बृहस्पतिवार को खुदाई में जो मिट्टी के बर्तन मिले हैं वह भी करीब 2000 साल पहले गुप्तकाल के हैं।

बीएचयू प्राचीन इतिहास, पुरातत्व विभागाध्यक्ष प्रो. ओंकारनाथ सिंह के निर्देशन में डॉ. अशोक सिंह, डॉ. राहुल राज, प्रो. एके दूबे के साथ ही रविशंकर, संदीप सिंह के अलावा फोटोग्राफर, ड्राफ्टमैन की टीम खुदाई में लगी है।

 

ब्राह्मी लिपि की छाप ली गई
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण लखनऊ के सहायक पुरालेखाविद् डॉ. राजेश कन्नौजिया ने बभनियांव में पाये गये प्रस्तर स्तंभ पर उत्कीर्ण ब्राह्मी लिपि की छाप ली। उन्होंने बताया कि इस छाप को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण लखनऊ और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की पुरालिक शाखा मैसूर को भेजा जाएगा। उनसे प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर ही इस लिपि में उत्कीर्ण वाक्यों के अर्थ स्पष्ट होंगे। उन्होंने बताया कि ऐसी लिपि वाराणसी में सारनाथ संग्रहालय में रखे शिलालेखों और अशोक स्तंभ पर मौजूद हैं।

 

 

बुधवार को जो भट्ठी मिली थी, उसकी साफ -सफाई कराई गई तो कुछ मिट्टी के बर्तन, खिलौने भी मिले। बर्तन भी 3000 साल पहले का लग रहे हैं। इसके अलावा परात के टुकड़े, मृदभांड, मिट्टी के खिलौने भी मिले, जिसको प्रथम दृष्टया देखने पर यह 1400 से 2000 साल पहले की लग रही है।

 

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शिल्पकारों के यहां रहने का अनुमान
निदेशक प्रो. ओंकारनाथ ने बताया कि मुताबिक जिस तरह से सर्वेक्षण के दौरान गांवों में जगह-जगह पड़ी मूर्तियां, मदृभांड, शिवलिंग आदि मिल रहे हैं, इससे यह कहा जा सकता है कि यहां तीन हजार साल पहले शिल्पकारों का बसेरा था और लोग शिवलिंग बनाया करते थे। बभनियाव भी बनारस का एक अहम हिस्सा था। पंचक्रोशी मार्ग होने की वजह से यहां धार्मिक यात्राएं भी निकलती थी, इसी वजह से शिवलिंग, देवी देवताओं की मूर्तियां, मृदभांड आदि मिलते जा रहे हैं। पुरावशेषों के मिलने पर कहा जा सकता है कि तब खेतों में जुताई, मकान बनाने के समय नींव की खुदाई में भी पत्थरों के टुकड़े भी यहां मिले हैं, जो जगह-जगह रखे गए हैं।

 
1200 साल पहले की हैं देवी देवताओं की मूर्तियां
बभनियाव में अब तक चले सर्वेक्षण के दौरान 1200 साल की प्राचीन काल की मूर्तियां, कुछ शिवलिंग मिलने की जानकारी मिली है। टीम के सदस्यों के मुताबिक गांव में कई जगह मूर्तियां भी रखी गई हैं। इसके अलावा पिछले सप्ताह तक चले सर्वेक्षण में अलग-अलग आकार के शिवलिंग की भी जानकारी मिली है। जो मूर्तियां मिली हैं, उस पर दोनों तरफ आकृतियां बनी हैं। इसमें देवी देवताओं में दुर्गा, शिव-पार्वती, हनुमान, सूर्य की मूर्तियां है। प्राचीन इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. ओंकारनाथ सिंह के मुताबिक प्रथम दृष्टया देखने से करीब 1200 साल पुरानी मूर्तियां लग रही है।

 
शिवलिंग बनाने के पत्थर भी मिले
खुदाई स्थल के आसपास गावों में शिवलिंग बनाने के लिए के टुकड़े भी यहीं मिले हैं। जो पांच से छह फीट लंबा और डेढ़ से दो फीट चौड़ाई है। इसमें कुछ पर शिवलिंग बना है जबकि कुछ अर्द्धनिर्मित हैं। एक शिवलिंग पर ब्राह्मी लिपि में आलेखन भी है, जो करीब 1800 साल पहले का देखने से लग रहा है। खुदाई के लिए चल रहे प्रोजेक्ट के कोआर्डिनेटर प्रो. ओंकारनाथ सिंह के मुताबिक यहां मिलने वाले पुरावशेषों को देखकर यह भी कहा जा सकता है कि यहां पहले नदी की धारा भी बहती रही होगी। जिन पत्थरों के शिवलिंग बने हैं, वह चुनार के लग रहे हैं।

 

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ग्रंथों से पता लगाते हैं मूर्तियों की प्राचीनता
सर्वेक्षण के दौरान मिलने वाली मूर्तियां कितनी पुरानी हैं, इसका महत्व क्या हैं, इसकी जानकारी ग्रंथों से पता चलती है। प्रो. ओएन सिंह के मुताबिक 600 ई.के ग्रंथों में विशेष तौर पर मूर्ति विन्यास से जुड़ी अहम जानकारियां हैं। प्राचीनता जानने के लिए इसका सहारा लिया जाता है। अलग-अलग ग्रंथों में अहम जानकारियां मिल जाती हैं। बताया कि हर कालखंड की अपनी विशेषता होती हैं। जहां तक लिपि की बात है तो हर लिपि की अपनी बनावट होती है। यहां मिलने वाली लिपियां ज्यादात्तर कुषाण काल की प्रतीत होती है। अब सही जानकारी कार्बन डेटिंग के बाद ही पता चलेगा।

 

 

पचास जगहों पर होनी है खुदाई
राजातालाब के पंचक्रोशी मार्ग के पास अभी तो बभनियाव में खुदाई चल रही है लेकिन बीएचयू की टीम पंचास जगहों पर खुदाई कराने की तैयारी चल रही है। अनुमान है कि यहां 3 से 4 हजार साल पहले के पुरावशेष मिलेंगे। बभनियाव के साथ ही औढ़े, ढलना, खुशीपुर, महाबन आदि जगहों पर खुदाई होगी।

 

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यह भी जानना अहम है
– सर्वेक्षण के दौरान ब्राह्मी लिपियों में लेखन मिलने के बाद यह माना जा सकता है कि यहां शैव, वैष्णव और ब्राह्मण धर्म के लोग रहते थे।
– भगवान शंकर, माता पार्वती, दुर्गा जी की पूजा भी यहां लोग करते थे।
– 600 से 900 साल की शिव की मूर्तियां भी गांव में जगह-जगह मिली है।
– समय के साथ-साथ लिपियां बदलती रहती हैं
– बभनियाव में गुप्तकाल, कुषाण काल, पाषाणक ाल से जुड़े बर्तन, धातुएं भी मिल रही हैं।

 

 

यह है काल का क्रम
-गहड़वाल-वर्तमान से 1300 साल पहले
-गुप्तोत्तर काल-वर्तमान से 1500 साल पहले
-गुप्तकाल-वर्तमान से 1500 से 2000 साल पहले
-कुषाणकाल-वर्तमान से 2000 से 2200 साल पहले

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