इतिहास

‘आज़ाद समाज पार्टी’ : महज़ एक सियासी दांव या नया विकल्प?

‘आज़ाद समाज पार्टी’ : महज़ एक सियासी दांव या नया विकल्प?

 

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भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आज़ाद ने ‘आज़ाद समाज पार्टी’ के नाम से अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाई है। चंद्रशेखर ने बीएसपी के संस्थापक की जयंती के मौके को नए राजनीतिक दल को लॉन्च करने के लिए चुना।

 

Suchkesath• भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आज़ाद ने रविवार को नोएडा में ‘आज़ाद समाज पार्टी (एएसपी)’ के गठन का ऐलान किया। इस दौरान बीएसपी के 15 पूर्व विधायक, पूर्व सांसद, रिटायर्ड नौकरशाह समेत कई दलित हस्तियां नए दल में शामिल हुईं।

 

 

चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि यह पार्टी दलित, पिछड़ों, कमजोर लोगों की आवाज़ बनेगी। हम सड़कों पर लड़ाई लड़ेंगे। कमजोर लोगों की आवाज़ उठाएंगे, क्योंकि हमारी नागरिकता पर सवाल उठाया जा रहा है। हमें गुलाम बनाने की तैयारी चल रही है।’

 

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, ‘यह सरकार सिर्फ पूंजीपतियों की है। नीति आयोग में अपने लोग बैठा रखे हैं, जिसकी वजह से लोगों पर अत्याचार हो रहा है, उत्पीड़न हो रहा है।’

 

 

हालांकि अपने नेताओं के चंद्रशेखर के पाले में जाने पर बसपा प्रमुख मायावती भड़क गईं। उन्होंने एक बयान जारी कर इशारों में चंद्रशेखर और पार्टी छोड़कर जा चुके नेताओं को जमकर निशाने पर लिया।

 

 

उन्होंने कहा, ‘अलग-अलग संगठन और पार्टी बनाकर इन दुखी और पीड़ित लोगों को बांटने में लगे लोगों से इन वर्गों (दलित) को कोई फायदा नहीं होगा। ऐसा करने से विरोधी पार्टियों की फूट डालो और राज करो की नीति जरूर कामयाब हो जाएगी।’

 

 

दिलचस्प है कि पार्टी लॉन्च करने से पहले चंद्रशेखर ने ट्विटर पर अपने आधिकारिक अकाउंट पर कांशीराम की तस्वीर लगाई है। पार्टी लॉन्च करने के बाद उन्होंने ट्विटर प्रोफाइल की कवर फोटो को बदलकर भी ‘आज़ाद समाज पार्टी’ का बैनर लगाया है।

 

 

उधर, भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद की नई पार्टी के ऐलान से पहले यूपी में टकराव की स्थिति बनते-बनते रह गई। रविवार को कांशीराम के जन्मदिन के मौके पर चंद्रशेखर आज़ाद के कार्यक्रम को मिली अनुमति को एक दिन पहले नोटिस चस्पा कर प्रशासन ने रद्द कर दिया था।

 

 

नोटिस में कहा गया था कि मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश सरकार राजेंद्र तिवारी और गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी के निर्देश के मुताबिक कोरोना वायरस के मद्देनजर जारी निर्देशों के तहत जनसभा का आयोजन संभव नहीं है। जनसभा में भीड़ होती है जिससे संक्रमण का खतरा होता है। ऐसे में लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ेगा। हालांकि बाद में कार्यकर्ताओं के कार्यक्रम आयोजित करने की जिद को देखते हुए पुलिस ने कार्यक्रम की इजाजत दे दी।

 

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चंद्रशेखर और भीम आर्मी

वैसे चंद्रशेखर का पुलिस के साथ टकराव का पहला मामला नहीं है। भीम आर्मी और उसके मुखिया चंद्रशेखर की पूरी पहचान ही पुलिस से टकराव और जेल जाने से बनी है। और यही वह बात थी जो उन्हें अलग पहचान दे रही है। दरअसल एक ऐसे वक्त में जब मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया और प्रेस कान्फ्रेंस के जरिये राजनीति कर रही हैं तो चंद्रशेखर का बार-बार जेल का सफर तय कर रहे हैं। एक तरह से वह परंपरागत राजनीति कर रहे हैं।

 

आपको बता दें कि भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर लगभग तीन साल पहले उस समय चर्चा में आए थे जब सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में जातीय हिंसा हुई थी। उस समय उनका संगठन भीम आर्मी और उसका स्लोगन ‘द ग्रेट चमार’ भी खबरों में छाया रहा। उसी समय से वह पुलिस और मायावती की बसपा दोनों के लिए परेशानी का कारण बन गए।

 

 

दरअसल हिंसा के आरोप में चंद्रशेखर समेत भीम आर्मी के कई सदस्यों को गिरफ्तार किया गया था और उस वक्त ये चर्चा हुई कि बसपा नेता मायावती ने दलितों के साथ हुई हिंसा पर संवेदना जताने में काफी देर की। मायावती शब्बीरपुर गईं जरूर लेकिन हिंसा के कई दिन बाद। हालांकि मायावती ने उस समय भी दलित समुदाय को भीम आर्मी जैसे संगठनों से सावधान रहने की हिदायत दी थी। उन्होंने भीम आर्मी और चंद्रशेखर को बीजेपी का ‘प्रॉडक्ट’ बताया था।

 

 

उसके बाद चंद्रशेखर जब कभी भी सुर्खियों में रहे, मायावती ने या तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और दी भी तो चंद्रशेखर को अपना प्रतिद्वंद्वी समझकर। हालांकि जेल से छूटकर आने के बाद चंद्रशेखर ने सीधे तौर पर बसपा और मायावती के पक्ष में ही बयान दिया और इस लड़ाई को बुआ भतीजे की लड़ाई बताया लेकिन इसे लेकर भरोसा किसी को नहीं हुआ। आखिर में यह तस्वीर तब साफ हुई जब चंद्रशेखर ने नई राजनीतिक दल की घोषणा कर दी।

 

 

मायावती से इतर चंद्रशेखर अपनी उग्र राजनीति और पुलिस से टकराव को लेकर चर्चा में आते रहे हैं। यूपी सरकार ने उन पर रासुका लगाया और वे लंबे समय तक जेल में रहे। जेल से आने के बाद भी उन्होंने अपने तेवर बरकरार रखे। सीएए-एनआरसी से पहले भी वे दिल्ली में रविदास मंदिर के मुद्दे पर जेल गए। और भी तमाम जगहों पर पुलिस-प्रशासन के सामने आते रहे।

 

 

चंद्रशेखर ने अपनी छवि एक ऐसे शख्स की बनाई जो मुद्दों के लिए सड़क पर उतरकर संघर्ष करने से पीछे नहीं हटता। यूपी, दिल्ली या हैदराबाद में वे अपने प्रदर्शनों या गिरफ्तारी से चर्चा में आ जा रहे हैं। चंद्रशेखर के तरीके उस राजनीति से अलग नजर आ रहे हैं, जहां आप विपक्ष में बैठकर केवल सत्ता का इंतजार करते हैं। बहुजन और पिछड़ों के नाम पर राजनीति करने वाले नेता जहां विरोध की रस्म अदायगी भर कर रहे हैं।

 

 

 

मायावती, चंद्रशेखर और दलित राजनीति

जानकारों के मुताबिक चंद्रशेखर के राजनीति में आने से सबसे ज्यादा नुकसान बसपा का होता दिख रहा है क्योंकि जिस दलित समुदाय को बीएसपी अपना मजबूत वोट बैंक मानती है, चंद्रशेखर और उनकी भीम आर्मी भी उसी समुदाय के हित में काम करते हैं। बता दें उत्तर प्रदेश में करीब 20 करोड़ की आबादी में 21 प्रतिशत दलित हैं और उनमें 55 प्रतिशत जाटव हैं।

 

 

मायावती और चंद्रशेखर दोनों एक ही जाति और उप-जाति (जाटव) से हैं। मायावती की दलित राजनीति पर पकड़ कमजोर होता देख चंद्रशेखर इसका फायदा उठाना चाहते हैं। 2007 में अकेले उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने वाली बीएसपी पिछले कई चुनावों से संकट में है। आम चुनाव 2019 में पार्टी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था। गठबंधन होने के बाद भी मायावती की अध्यक्षता वाली पार्टी सिर्फ 10 सीटें जीत सकी और उसको 19.3 प्रतिशत वोट मिला।

 

 

उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी बीएसपी कमजोर स्थिति में है। बीएसपी के पास 403 सीटों वाली विधान सभा में केवल 18 विधायक हैं। ऐसे में जानकार कहते हैं भीम आर्मी के राजनीति में आने से दलित राजनीति में बसपा को एकाधिकार के टूटने का डर है।

 

 

इसके अलावा चंद्रशेखर दलित राजनीति के पारंपरिक दायरे को तोड रहे हैं। दलित आंदोलन के कार्यकर्ताओं के साथ आम तौर पर दिक्कत होती है कि वे सामाजिक सरोकार के अन्य आंदोलनों से आसानी से नहीं जुड़ पाते हैं। लेकिन, चंद्रशेखर इस मामले में अलग हैं। वे छात्र आंदोलन से भी संवाद रखते हैं और सीएए-एनआरसी जैसे मुद्दे से सीधे जुड़ने से भी परहेज नहीं करते हैं।

 

 

इसके अलावा वह दूसरे दलों के साथ तालमेल भी कर रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले उन्होंने यूपी में कई मुस्लिम नेताओं और सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर से मुलाकात की। इससे पहले प्रियंका गांधी से अस्पताल में उनकी मुलाकात चर्चा में रही है। साथ ही दिल्ली में उनके मंच पर बसपा संस्थापक कांशीराम के परिजनों की मौजूदगी ने बसपा प्रमुख मायावती को चिंता में डाल दिया था।

 

 

क्या कहते हैं जानकार?

दलित चिंतक और मेरठ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक सतीश प्रकाश कहते हैं, ‘ किसी भी राजनीतिक दल की परीक्षा चुनाव से होती है। जब तक कोई दल इस परीक्षा से नहीं गुजरता है तब तक हम उसके भविष्य के बारे में सिर्फ कयास ही लगा सकते हैं। यह सच है कि दोनों पार्टियों का वोटबैंक एक ही समुदाय है। आरंभिक अवस्था में ये दल एक दूसरे को ही नुकसान पहुंचाएंगें। लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि बसपा घटती है तो चंद्रशेखर की पार्टी को फायदा होगा या दूसरे दलित विरोधी दल इसका फायदा उठा ले जाएंगें।’

 

 

सतीश प्रकाश आगे कहते हैं, ‘एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि जो संपूर्ण दलित आंदोलन है वह इस तरह की घटनाओं से चिंतित है। उनके बीच में इस नई पार्टी के गठन से आक्रोश है। जो बसपा से निकाले गए नेता यानी जो दलितों के खोटे सिक्के हैं उनकी राजनीतिक लालसा का परिणाम आज़ाद समाज पार्टी है।’

 

 

वहीं वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक उर्मिलेश भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं। वे कहते हैं,’ उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तौर पर मायावती को चुनौती देना अभी आसान नहीं है। अभी भी दलितों का एक बड़ा वर्ग मायावती को ही अपना नेता मानता है। दूसरी बात चंद्रशेखर की राजनीतिक लाइन अभी साफ नहीं हुई है। कई बार वो ऐसा कदम उठाते हैं जिससे लगता है कि वह दलित विरोधी खेमे के लिए काम कर रहे हैं। ऐसे में उन पर विश्वास करना मुश्किल होता है। राजनीतिक सफर में यही उनकी कमजोरी बनकर सामने आएगी।’

 

 

हालांकि इसके इतर बहुत सारे राजनीतिक विश्लेषक चंद्रशेखर को मायावती के विकल्प के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि मौजूदा हालत में दलित समाज को राजनीति में एक आवाज़ की तलाश है। अगर चंद्रशेखर जमीन पर राजनीति करते हैं तो उनकी पार्टी को भविष्य में बीएसपी के विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।

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