अच्छी सोच

सत्ता के लिए चुनौती बन गए धर्म

सच के साथ|1843 में हेगेल की ‘एलीमेंट्स ऑफ दि फिलॉस्फी ऑफ दि राइट’ की आलोचना में लिखी गई एक किताब की भूमिका में कार्ल मार्क्स ने लिखा था: धर्म दमित प्राणियों की आह, हृदयहीन दुनिया का हृदय और आत्माहीनों की आत्मा है। यह लोगों का अफीम है।

 

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असल में मार्क्स मानते थे कि धर्म भ्रमजाल खड़ा कर जनता के दुखों को तत्काल कम करने का राज्य का हथकंडा है। धर्म उन्हें जुल्म और दमन के प्रति संवेदनशून्य बना देता है और भाग्यवादी भावना से भर देता है। निश्चित तौर पर, हेगेल राज्य को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानते थे। दोनों अब लंदन और बर्लिन में बनी अपनी कब्र में यह देखते हुए करवट ले रहे होंगे कि किस तरह से उनके विचारों ने भारत में आकार लिया है। नशे में चूर होने की बजाय धर्म अब एक खतरनाक विचार प्रक्रिया में तब्दील हो गया है जो राज्य को तबाह करने की धमकी दे रहा है।

 

 

ऐसा धर्मों के भीतर पंथों के प्रसार की वजह से हुआ। धार्मिकता की जगह पूजा और भक्ति को स्थापित किया जा रहा है जिसकी दिशा किसी खास व्यक्ति या छवि की तरफ है। विडंबना है कि निर्जीव मूर्तियों की उपासना की चिंता की वजह नहीं, बल्कि वे पंथ हैं जो सत्ता को चुनौती देने का प्रयास कर रहे हैं। सभी प्रमुख धर्मों में इस तरह के विशाल पंथों या बाबाओं का उभार हुआ है जो अपने ही धर्म पर हावी होकर भक्ति के पात्र बन जाते हैं।

 

भक्ति के पात्र बनने से लेकर देवत्व का दावा करना सिर्फ एक छोटी सी छलांग है। कई प्रधानमंत्रियों, प्रतिष्ठित सैन्य अधिकारियों, नामी वैज्ञानिकों और पूंजीपतियों को अपना वफादार भक्त बताने वाले पुट्टपार्थी के दिवंगत सत्य साईं बाबा बाजार प्रचार और कमाई के मामले में सबसे सफल धर्मगुरू या बाबा रहे हैं। उन्होंने रहस्यमय अंदाज में कहा था, ‘मैं भगवान हूं, मैं साई हूं।’ उन्होंने भौतिकता की शक्ति के रूप में हाथ की सफाई के कौशल से अपने श्रद्धालुओं को पवित्र राख, हाथ के बंधन या अंगुठियां या फिर जो भी हाथ में आ जाए, उसे देकर यह स्थान हासिल किया था।

 

 

संभव है कि धर्मगुरू अलग-अलग कई ईश्वरों की सिफारिश करते हों, लेकिन एक बात सभी में समान है कि सभी बाबाओं का अपने श्रद्धालुओं और भक्तों पर मंत्रमुग्ध कर देने वाला नियंत्रण होता है। उन्हें जो बात आपस में अलग करती है, वह उनके अनुयायियों की संख्या है और वे अजीबोगरीब मांगें हैं जो अपने अनुयायियों की निष्ठा की जांच के लिए वे उनके सामने रखते हैं। कभी एक बाबा ने रॉल्स रॉयस की मांग की थी और हाल ही में दोषी ठहराए गए डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम ने सेक्स की मांग की, जिसे वह बड़े कमाल के साथ माफी के रूप में अपने अनुयायियों को बांटा करता था।

 

 

धर्मगुरुओं के पास मंत्रमुग्ध करने वाली शक्ति होती है, इसलिए नेता वोटों के रूप में उनका आशीर्वाद हासिल करने के लिए उनकी शरण में जाते हैं। तब ये धर्मगुरू अपनी दिव्य शक्ति को साबित करने के बदले अपने या अपने चहेतों के लिए फायदा चाहते हैं।

 

 

साईंबाबा के दर्शन के लिए एक प्रमुख उद्योगपति के घर पर बैठ कर प्रधानमंत्री वाजपेयी के घंटों इंतजार किया था। दर्शन नहीं होने पर वाजपेयी जब 7 रेस कोर्स रोड पहुंचे तो बहुत ज्यादा परेशान थे। सत्ता के शीर्ष पर बैठे इस हस्ती को मानसिक शांति तभी जाकर मिली जब साईंबाबा ने नरम पड़ते हुए उन्हें दर्शन दिए। इसके लिए उन्हें कहां-कहां हस्ताक्षर करने पड़े, यह बात आज भी बड़ी पहेली बनी हुई है।

 

 
पुट्टपार्थी के साईंबाबा अपने लोगों को उच्च पदों पर बैठाने के लिए अपने राजनैतिक साथियों और श्रद्धालुओं से सिफारिश किया करते थे। ऐसे लोगों को यह भी पता होता है कि किस तरह के फायदे के लिए शक्तिशाली लोगों की आस्थाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह घटना काफी प्रसिद्ध है कि एक बार साईंबाबा के दर्शन के लिए एक प्रमुख उद्योगपति के घर पर बैठ कर प्रधानमंत्री वाजपेयी के घंटों इंतजार किया था। दर्शन नहीं होने पर वाजपेयी जब 7 रेस कोर्स रोड पहुंचे तो बहुत ज्यादा परेशान थे। सत्ता के शीर्ष पर बैठे इस हस्ती को मानसिक शांति तभी जाकर मिली जब साईंबाबा ने नरम पड़ते हुए उन्हें दर्शन दिए। इसके लिए उन्हें कहां-कहां हस्ताक्षर करने पड़े, यह बात आज भी बड़ी पहेली बनी हुई है।

 

 

पंथों में सुकून ढूढ़ना एक सामान्य मानवीय गतिविधि है। किसी समाज की शिक्षा और संपति के स्तर से आस्था के मसलों का बहुत कम लेना-देना है। अगर ऐसा नहीं होता तो टेक्सास में एफबीआई से टकराव के बाद अपने 77 अनुयायियों को दर्दनाक मौत के लिए प्रेरित करने वाला डेविडपंथियों की शाखा का प्रमुख डेविड कोरेश नहीं होता या फिर गुयाना में पीपल्स टेम्पल का जिम जोन्स भी नहीं होता जिसने अपने 900 अनुयायियों को जहर मिला ठंडा पेय पदार्थ कूल एड पीने के लिए प्रेरित किया था।

 

 

बिली ग्राहम, जिम बेकर और जेरी फेल्वेल जैसी कथित शक्तियों ने रिचर्ड निक्सन और रोनाल्ड रीगन जैसे राजनेताओं को अपने दरबार में हाजिरी लगाने और धार्मिक अधिकारों को लेकर अपनी नीतियों का समर्थन करने के लिए मजबूर किया था। जापान में टोक्यो मेट्रो स्टेशन पर भीड़-भाड़ वाले वक्त में सारीन गैस से हमला करने के लिए शोजी असारा द्वारा अपने पंथ को दिए संदेश हमने देखे हैं। तो भारत अपवाद क्यों होना चाहिए? धर्म के प्रति झुकाव मानवीय जीवन का हिस्सा है।

 

 

इसके बावजूद पंजाब और हरियाणा में डेराओं का बढ़ता प्रसार हमारी चिंता का विषय होना चाहिए। कुछ आंकड़ों के अनुसार आज की तारीख में इनकी संख्या 9 हजार है। जैसाकि इनके नाम से मालूम होता है, ये एक शांत मठ की बजाय उग्रवादियों का अड्डा है।

 
इसके बावजूद पंजाब और हरियाणा में डेराओं का बढ़ता प्रसार हमारी चिंता का विषय होना चाहिए। कुछ आंकड़ों के अनुसार आज की तारीख में इनकी संख्या 9 हजार है। जैसाकि इनके नाम से मालूम होता है, ये एक शांत मठ की बजाय उग्रवादियों का अड्डा है। हाल के दिनों में सबसे कुख्यात धर्मगुरू जनरैल सिंह भिंडरावाले था जिसके छोटे से आतंक काल का अंत स्वर्ण मंदिर को मुक्त कराने के लिए सेना की कार्रवाई में हुआ। 2014 में एक हिंदू धर्मगुरू रामपाल के अनुयायियों ने हत्या, राजद्रोह और षड्यंत्र के केस में उसे गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को हिसार स्थित डेरे में प्रवेश नहीं करने दिया था। उसे गिरफ्तार करने के लिए हरियाणा के 5 हजार से ज्यादा पुलिसकर्मियों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी।

 

 

पिछले साल सुभाषचंद्र बोस की विचारधारा पर केंद्रित एक पंथ ने मथुरा स्थित जवाहर बाग पर कब्जा कर लिया था। जवाहर बाग को मुक्त कराने के लिए उत्तर प्रदेश सशस्त्र पुलिस को एक बड़ा अभियान चलाना पड़ा, जिसमें अपने 29 अनुयायियों समेत इस पंथ का नेता रामवृक्ष यादव भी मारा गया। अभी राम रहीम सिंह का डेरा सच्चा सौदा खबरों में है। भारत के प्रधानमंत्री और हरियाणा के मुख्यमंत्री के खुले संरक्षण के बावजूद 17 साल पुराने बलात्कार मामले में पंचकूला की सीबीआई कोर्ट द्वारा अजीब से कपड़े पहनने वाले बाबा को दोषी ठहराने से इन घटनाओं की जमीन तैयार हुई। 25 अगस्त 2017 भारत की न्यायपालिका के लिए कभी न भूलने वाला दिन है जब उसने राजनीतिक दबावों और अधिकारियों की कमजोरियों को नजरअंदाज कर खुद को साबित किया।

 

 

इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि इस अजीबोगरीब बाबा की गतिविधियों को लेकर पूरे राजनीतिक जमात की आलोचना समान रूप से नीरस है, जो कतई उस छींटाकशी की तरह नहीं है जिसे वे अक्सर एक-दूसरे पर उछाला करते हैं। इतना तो तय है कि राजनीति तर्क या अच्छाई से नहीं चलती, बल्कि वोट से चलती है।

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