इतिहास

कोविड-19 वैश्विक महामारी हमारे समाज के सभी तबक़ों के लिए बुनियादी चुनौती है.

बड़ी संख्या में तेज़ी के साथ टेस्टिंग और संदिग्धों को एकांत में रखने से कोरोनावायरस के फैलाव को रोका जा सकता है। इसके लिए अति-राष्ट्रवाद और अति-पूंजीवाद की कोई ज़रूरत नहीं है।

 

Suchkesath•अब यह साफ़ हो चुका है कि वैश्विक महामारी Covid-19 का केंद्र यूरोप बन गया है। वहां इटली, स्पेन, फ्रांस और जर्मनी बुरे तरीके से इस वैश्विक महामारी की चपेट में हैं। चीन और बुरे तरीके से प्रभावित हुए दक्षिण कोरिया ने इस संक्रमण पर काबू पाने में सफलता पाई है। लेकिन यूरोप के देश में इसमें असफल हैं। अमेरिका और ब्रिटेन में कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। किसी भी पल इनमें बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो सकती है। अमेरिका में ट्रंप प्रशासन की कम टेस्टिंग की वजह से आंकड़े कम दिखाई दे रहे हैं। इस कम टेस्टिंग जानबूझकर भी हो सकती है या योग्यता और क्षमता की कमी भी इसका कारण हो सकती है। जैसे-जैसे वहां टेस्टिंग का दायरा बढ़ रहा है, वैसे आंकड़ों में उछाल आ रहा है।

 

 

भारत में संक्रमण के मामलों की संख्या इस वक्त बेहद कम है। लेकिन यहां भी असली संख्या ज़्यादा हो सकती है। क्योंकि अभी केवल एक छोटी आबादी की ही टेस्टिंग हो पाई है। ICMR की गाइडलाइन के मुताबिक़, उन्हीं लोगों की जांच हो सकती है जो उच्च संक्रमण का शिकार देशों से वापसी कर रहे हैं या वे लोग जो संक्रमित देशों से लौटे लोगों के सीधे संपर्क में आए हैं। चीन और दक्षिण कोरिया की तरह बड़े स्तर पर जांच करने की बजाए, जबतक टेस्टिंग गाइडलाइन बदल नहीं जाती, भारत अनियमित छिटपुट जांच करता रहेगा।

 

 

ICMR का कहना है कि भारत में अब तक सामुदायिक संक्रमण का स्तर नहीं आया है, साथ ही संसाधनों की कमी भी है। ICMR के पास महज़ एक लाख टेस्ट किट ही मौजूद हैं। हांलाकि संगठन ने दस लाख टेस्ट किट बटोरे जाने का निर्देश दे दिया है। WHO के मुताबिक़ भारत में संक्रमण का जो स्तर है, उसे देखते हुए फिलहाल उन्ही लोगों की टेस्टिंग की जानी चाहिए, जिनमें Covid-19 के लक्षण दिखाई देते हैं।

 

 

16 मार्च को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस को संबोधित करते हुए WHO के डायरेक्टर-जनरल टेड्रोस एधानॉम घेब्रेयेसस ने कहा, ”सभी देशों को हमारा बिल्कुल सीधा-सरल संदेश है कि लगातार जांच की मुहिम को आगे बढ़ाएं। सभी देशों को संदिग्ध मरीज़ो की जांच करनी होगी। वे आंखे बंद कर इस वैश्विक महामारी का मुकाबला नहीं कर सकते।” जिन देशों में सामुदायिक संक्रमण शुरू हो गया है, वहां इस रोकने का एकमात्र उपाय बड़े स्तर पर टेस्टिंग ही है। दिक्कत उस बिंदु के पहचान की भी है, जब कोई देश शुरूआती संक्रमण चरण से सामुदायिक संक्रमण फैलाव के चरण में पहुंचता है। ICMR की सांस संबंधी लोगों की अनियमित तरीक़े से टेस्टिंग इस दिशा में एक अच्छा कदम साबित हो सकता है।

 

 

WHO के मुताबिक, संक्रमण के शिकार व्यक्ति को जल्द एकांत में पहुंचाकर इस संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है। कोरोना के शुरूआती संक्रमण के दौर में लोगों को आपसी मेल-जोल से बचना चाहिए, एक-दूसरे से दूरी बनानी चाहिए और हाथ धोने जैसे उपाय अपनाना चाहिए। इस चरण में हम उन लोगों की जांच कर रहे हैं, जो ज़्यादा गंभीर तरीक़ेे से संक्रमण का शिकार हुए इलाकों से लौटे हैं और जो लोग संक्रमण का शिकार लोगों के संपर्क में आए हैं।

 

 

अगर हम इसमें नाकामयाब होते हैं, तो फिर सामुदायिक संक्रमण फैलाव का दौर शुरू होगा। इस स्तर पर कोई नहीं जानता कि कौन किसे संक्रमण का शिकार बना रहा है। तब हमें सामाजिक एकांत, बड़े स्तर की टेस्टिंग और लॉकडॉउन जैसे कदम उठाने पड़ते हैं। बहुत सारे यूरोपीय देश, ईरान और अमेरिका के कुछ हिस्से इसी चरण में हैं।

 

 

इसका नतीज़ा बड़ी संख्या में लोगों की जान का नुकसान होगी. ख़ासकर उम्रदराज़ और अस्थमा, दिल की बीमारी डॉयबिटीज़ समेत सांस संबंधी समस्या से प्रभावित लोग इसके शिकार बनेंगे. मरीज़ो को गहरी निगरानी के लिए डॉक्टर, नर्स और ऑक्सीजन उपकरणों की जरूरत पड़ेगी, जो शायद अस्पताल उन्हें उपलब्ध न करवा सकें। इसलिए संक्रमण को धीमा करने के लिए लॉकडॉउन करवाया जाता है। ताकि मांग को कम कर अस्पतालों पर भार को कम किया जा सके और उनसे लंबे समय में ज़्यादा मरीज़ों को फ़ायदा पहुंचाया जा सके।

 

 

अगर अस्पतालों में लोगों की भीड़ आ गई, जैसा वुहान में हो चुका है और अब इटली में हो रहा है, तो मृत्यु दर काफ़ी बढ़ जाएगी। वुहान में संक्रमित लोगों में मृत्यु दर करीब 6 फ़ीसदी रही। जबकि बाकी चीन में यह दर एक फ़ीसदी से भी नीचे थी। बूढ़े लोगों और कुछ दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों में मृत्यु दर ज़्यादा थी। लॉम्बॉर्डी और आसपास के इलाकों में तो हालात और भी ज़्यादा बदतर हैं। इटली में मृत्यु दर ज़्यादा है, क्योंकि वहां बुजुर्ग आबादी भी ज़्यादा है। इटली में 23 फ़ीसदी लोग 65 साल की उम्र से ऊपर हैं।

 

 

आखिर अमेरिका और दूसरा पश्चिमी मीडिया एक वैश्विक महामारी के दौर में चीन को भला-बुरा कहने में क्यों लगा रहा। ऐसा समझ आता है कि उन्हें लगा कि Covid-19 भी चीन के खिलाफ इस्तेमाल किया जाने वाला एक आम हथियार है। वैश्विक भाईचारे की भावना पैदा करने के बजाए घृणा से भरी एक नस्लभेदी मुहिम चलाई जाती रही। कहा गया कि यह एक चीनी बीमारी है, चीनी लोग चमगादड़ और सांप खाते हैं, चीन को अकेला छोड़कर हर कोई कोरोना से बच सकता है।

 

 

चीन ने न सिर्फ़ दुनिया को इस महामारी के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए समय दिया, बल्कि उसने कोरोना वायरस से लड़ने के तरीक़े भी बताये हैं। शुरूआत में ही लॉकडॉउन और यात्राओं पर प्रतिबंध लगाकर उन्होंने कोरोना वायरस के सामुदायिक फैलाव को लगभग हुबेई राज्य तक ही सीमित कर दिया। लेकिन इटली और दूसरे यूरोपीय देश ऐसा नहीं कर पाए। चीन ने हमें यह भी सिखाया कि कैसे संक्रमण के शुरूआती संदिग्ध लोगों को ‘’फीवर क्लीनिक’’ में जांच के लिए रखा जा सकता है, धीमे संक्रमण का शिकार हुए लोगों को जिम, वेयरहाउस और स्टेडियम जैसे तात्कालिक केंद्रों में रखा जा सकता है और गंभीर तौर पर बीमार लोगों को अस्पतालों में रखा जाए, जहां उन्हें बेहतर सुविधाएं दी जा सकती हैं। चीन ने 40,000 से ज़्यादा डॉक्टर और नर्सों को दूसरे राज्यों से हुबेई भेजा। ताकि वहां डॉक्टरों की कमी को पूरा किया जा सके।

 

 

जबकि अमेरिका ने इसका ठीक उलटा किया। चीन जब ईराक में स्वास्थ्यकर्मियों को भेज रहा था, तब अमेरिका वहां बम गिरा रहा था! अमेरिका ने Covid-19 के लिए वैक्सीन बनाने वाली एक जर्मन कंपनी से वैक्सीन हड़पने की कोशिश की, ताकि कोरोना वायरस के इलाज़ पर अमेरिका का एकाधिकार हो सके। चीन इटली और ईरान में अपने स्वास्थ्यकर्मियों की टीम भी भेज रहा है। चीन ने अमेरिका तक मास्क भेजे हैं। इस बीच अमेरिका ने ईरान और वेनेजुएला पर अपने प्रतिबंध जारी रखे हैं। जबकि इन प्रतिबंधों की वजह से इन देशों को मास्क, स्वास्थ्य उपकरण और दूसरे सुरक्षा साधनों को समुद्र के रास्ते मंगवाने में मुश्किल हो रही है।

 

 

Covid-19 के बारे में पूरी जानकारी हासिल करना मुश्किल है, क्योंकि यह एक नया वायरस है। लेकिन कुछ सवालों के जवाब जरूरी हैं, कम से इनके तात्कालिक अस्थायी जवाब ही दिए जाएं।

 

 

क्या Covid-19 को ठीक करने में सक्षम दवाएं मौजूद हैं? इस वक्त हमारे पास कुछ ऐसी दवाईयां हैं, जो कुछ मरीजों पर काम कर रही हैं। ‘’लोपिनाविर’’ और ‘’रिटोनाविर’’ के मिश्रण को एड्स के इलाज में इस्तेमाल किया जाता था। ऐसा लगता है कि यह मिश्रण Covid-19 के खिलाफ भी काम कर रहा है। इसके अलावा चीन में ‘’एंटी-मलेरियन ड्रग कोलोरोक्यीन फॉस्फेट और हायड्रोक्सीक्लोरोक्यीन’’ भी कारगर साबित हुए हैं। दोनों जेनरिक फॉर्म में उपलब्ध हैं। इबोला के खिलाफ़ असफल साबित होने वाले ‘’रेमडेसिविर’’ से भी कोरोना वायरस के इलाज की कुछ आस बनी है। इसके चलते ड्रग की पेटेंट कंपनी गिलीड साइंस के शेयर में ज़बरदस्त उछाल आया है। जबकि शेयर बाजार लगातार नीचे की ओर जा रहा है। क्यूबा की ‘’स्ट्रांग बॉयोटेक इंस्टीट्यूशन्स’’ द्वारा निर्मित ‘इंटरफेरोन अल्फा टू बी’ का भी चीन और इटली में इस्तेमाल हुआ है।

 

 

क्या कोई ऐसी वैक्सीन है, जो जल्द ही उपलब्ध हो जाएगी? सबसे जल्दी जो वैक्सीन आ सकता है, उसे आने में भी फिलहाल 12 महीने हैं। जब कोई “कैंडिडेट वैक्सीन’’ बन जाता है, तो उसे कई टेस्ट से होकर गुजरना पड़ता है। पहला चरण ”प्री-क्लीनिकल” होता है, जिसके तहत सेल कल्चर और जानवरों पर प्रयोग किए जाते हैं। प्रयोग के ज़रिए पता लगाया जाता है कि क्या संबंधित शरीर में वैक्सीन के ज़रिए एंटीबॉडीज़ बन रहे हैं या नहीं। फिर एक मानव समूह पर प्रयोग किया जाता है। इस समूह में 100 से कम लोग शामिल होते हैं। इसके ज़रिए वैक्सीन की सुरक्षा की जांच की जाती है। अगर नतीज़़े सकारात्मक आते हैं तो फिर एक बड़े समूह पर सुरक्षा, प्रतिरोधक क्षमता और खुराक की मात्रा जानने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इसके बाद ही बड़े स्तर पर ट्रॉयल शुरू होती हैं, जिनमें हजारों लोग शामिल होते हैं। इसलिए पूरी प्रक्रिया को छोटा करना मुश्किल है। अब तक केवल जेनेटिकली बनाए गए वैक्सीन ही पारंपरिक वैक्सीन विकसित करने के कार्यक्रम से तेजी के साथ बने हैं।

 

 

Covid-19 से लड़ने के लिए ब्रिटेन के पीएम बोरिस जॉन्सन की ”हर्ड इम्यूनिटी” हायपोथीसिस क्या है? यह एक ”थ्योरी” है, जिसमें कहा जाता है कि अगर 60 फ़ीसदी लोगों में कोई संक्रमण फैल गया, तो उनमें इस संक्रमण के खिलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाएगी। इसका मतलब है कि ब्रिटेन को इस बीमारी के खिलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए अपने 3.6 करोड़ (कुल आबादी 6 करोड़ का 60 फ़ीसदी) नागरिकों के बीमार होने का इंतजार करना होगा। गणना से पता चलता है कि जैसे-जैसे अस्पतालों पर भार बढ़ेगा, मृत्यु दर एक से पांच फ़ीसदी के बीच पहुंच जाएगी। ब्रिटेन के लिए यह आंकड़ा करीब 3,60,000 से 18,00,000 के बीच होगा।

 

 

जैसा बहुत सारे लोगों ने बताया, दुनिया से छोटी माता,पोलियो या दूसरी बीमारियों का खात्मा ‘हर्ड इम्यूनिटी’ से नहीं, बल्कि वैक्सीन विकसित करने के चलते हुआ। इसलिए अब ब्रिटेन ने अपने तरीके बदल लिए हैं और शुरूआती आंकड़े देने के बाद अपनी छद्म-वैज्ञानिक ”हर्ड इम्यूनिटी” की रणनीति से किनारा कर लिया है।

 

 

क्या गर्म मौसम में वायरस धीमा हो जाएगा? इस पर अब तक मामला साफ नहीं हो पाया है। फ्लू वायरस समेत ज़्यादातर वायरस मौसमी प्रभाव दिखाते हैं। यह संभव है कि उच्च ताप या उच्च आर्द्रता संक्रमण की दर को कम कर दे, लेकिन हमें इसके लिए एक मौसम का इंतज़ार करना होगा। यहां दो अध्ययन हुए हैं, जिनके नतीज़़े बिलकुल उलटे हैं। एक संक्रमण और तापमान पर आधारित है। जैसा मानचित्र बताता है, महामारी से संक्रमित ज़्यादातर देश संकीर्ण पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर पर स्थित हैं। मतलब 30 से 50 उत्तरी अक्षांश के बीच, जहां औसत तापमान 5 से 11 डिग्री होता है।

 

 

यहां आर्द्रता भी कम होती है। हांलाकि एक और पेपर दावा करता है कि तापमान का Covid-19 के संक्रमण पर कोई असर नहीं होता। इसके लिए चीन के आंकड़ों का सहारा लिया गया है। संभव है ऊपर जिस पट्टी की चर्चा हुई है, उसके बाहर भी यह संक्रमण दूसरे देशों में फैल जाए। तब तापमान-आर्द्रता वाली हायपोथीसिस काम नहीं करेगी। अगर यह हाइपोथीसिस काम करती भी है, तो भी हम संक्रमण को महज़ भविष्य के लिए ही टाल सकने में कामयाब रहेंगे।

 

 

वुहान में संक्रमण को रोकने का राज सिर्फ़ लॉकडॉउन नहीं है। दरअसल वहां संदिग्ध लोगों की जल्द जांच, उन्हें एकांत में रखने के लिए जरूरी कदम और संक्रमित लोगों के इलाज़ जैसे कदमों का एक मिलाजुला प्रयास किया गया। डॉक्टर ऑयलवर्ड कहते हैं कि जब Covid-19 महामारी बनेगी, तब हम सभी को इन्हीं मुश्किल कदमों को उठाना होगा।

 

 

भारत में चुनौती ज़्यादा है। हमारा स्वास्थ्य ढांचा कमजोर है। हमारी अर्थव्यवस्था ऐसी है कि अगर हम लॉकडॉउन की घोषणा कर दें, तो एक बड़ी आबादी के पास कोई आय ही नहीं होगी। हमारे सामने एक ऐसी योजना बनाने की चुनौती है, जिसमें ज़्यादातर लोगों की ज़रूरत पूरी हो और उससे महामारी भी दूर रहे। एक ऐसी सरकार जो अपने आलोचकों पर ध्यान केंद्रित किए हुए हो, अल्पसंख्यकों को अलग रखती हो और बड़े पूंजीवादियों को छूट देती हो, क्या वो अब भाईचारा बनाने, सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने और समाज के सभी लोगों को एकजुट करने की ओर बढ़ सकती है? या फिर मोदी सरकार ट्रंप के रास्ते पर ही चलते हुए अति-राष्ट्रवाद और अंध-पूंजीवाद के ज़रिए सभी समस्याओं के ख़ात्मे में विश्वास रखती रहेगी।

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