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कोरोना वायरस से लड़ने के लिए क्या अधिक से अधिक लोगों के टेस्ट की ज़रूरत है?

कोरोना वायरस से लड़ने के लिए क्या अधिक से अधिक लोगों के टेस्ट की ज़रूरत है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के निदेशक का कहना है कि कोरोना वायरस फैलने से रोकने के लिए टेस्टिंग बहुत जरूरी है। लेकिन इंडियन मेडिकल कॉउंसिल ऑफ़ रिसर्च के हेड इससे इंकार करते हैं। उनका कहना है कि भारत की स्थिति यूरोप से अलग है।

 

सच के साथ|सुबह एक सोसाइटी के गेट पर देखा कि एक गार्ड साहब हाथ में सेनिटाइज़र की बोतल लिए हुए खड़े है। जो भी गेट से गुजर रहे हैं, वो गॉर्ड साहब के हाथ में सेनिटाइज़र की बोतल देखकर पहुंच जा रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे मंदिरों में लोग पुजारी के सामने हाथ फैलाकर प्रसाद मांगने चले आते है। पहली नज़र में मेरे लिए यह हंसने वाली बात थी। लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे यह बात ठीक भी लगी। मुझे कोरोना वायरस से फैले इस डर पर हंसी आयी कि लोग मौत से बदतर जिंदगी क्यों न जिए, लेकिन मौत से बहुत डरते हैं। ठीक लगने वाली बात यह थी कि मुझे पता था कि यह सब एक ऐसे वायरस से बचे जाने के लिए किया जा रहा है, जिसका दुनिया अभी तक कोई इलाज नहीं ढूंढ पायी है। इसलिए रोकथाम से जुड़े उपायों का अपनाना अच्छी बात है।

 

 

यहीं पर उस सवाल का भी जवाब मिल गया जो बहुत दिनों से दिमाग में कौंध रहा था। सवाल यह था कि सोशल मीडिया और इन्फॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी के ज़माने में हम पहली बार ऐसी किसी संक्रामक वायरस के चपेट में आएं है। इसलिए बहुत अधिक हो-हल्ला हो रहा है। अगर सूचनाओं का ऐसा जंजाल फैला न होता तो कुछ भी महसूस न होता। लेकिन मैं गलत था। मेरे दिमाग में साल 1918 में वायरस की संक्रमण की वजह से भारत में हुए तकरीबन दो करोड़ से अधिक लोगों के मौत का आंकड़ा गूंज रहा था, जिसके बारें में अब से पहले कभी बात नहीं हुई थी। इसलिए मुझे लग रहा था कि कोरोना वायरस में मौतें कम हो रही है और बहुत अधिक हो हल्ला है। लेकिन जरा इसे सोचिए अगर उस जमाने में सूचनाओं का जंजाल होता तो बहुतों की जान भी बच सकती थी। मौत का आंकड़ा दो करोड़ का न होता। यानी डरना सही है। डरकर सही पहल करना भी जरूरी है। लेकिन बिना डरे मरने के मुहाने पर चले जाना बिल्कुल गलत है।

 

 

सेंटर फॉर डिजिस डायनामिक्स के निदेशक प्रोफेसर लक्ष्मीनारायण कहते हैं कि यह बात तो सबको पता है कि कोरोना वायरस एक तरह का वायरस है। किसी भी तरह से कोई व्यक्ति अगर वायरस के सम्पर्क में आता है तो वह उससे प्रभावित हो सकता है। लेकिन कोरोना वायरस के साथ तीन चीजें हैं, जो इसे बेहद गंभीर किस्म का वायरस बना देती हैं। पहला, यह बहुत तेजी के साथ फ़ैल रहा है। दूसरा, यह रेगुलर इन्फ्ल्युंजा के वायरस से तकरीबन 20 गुना ज्यादा घातक है। और तीसरा- इस वायरस से लड़ने के लिए जरूरी हेल्थ सिस्टम की हालत दुनिया के अधिकतर इलाकों में बहुत बुरी है।

 

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि कोरोना वायरस एक तरह का महामारी बन चुका है। कोरोना वायरस से जुड़े मामलों की संख्या तकरीबन 45 दिनों में एक लाख हुई थी। लेकिन अगले एक लाख लोगों को अपनी चपेट में लेने में कोरोना वायरस को मात्र नौ दिन लगे। हर नौ दिन में कोरोना वायरस से मरने वाले लोगों में दोगुनी रफ़्तार से इज़ाफ़ा हो रहा है। अभी तक कोरोना वायरस से मरने वाले लोगों की पूरी दुनिया में संख्या 8248 पहुंच चुकी है। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि महामारी फैलती कैसे है। वायरस की वजह से फ़ैल रही यह महामारी लोगों में घुसने के बाद वहाँ से और अधिक एनर्जी हासिल करती और आगे बहुत तेजी से फैलती है। यानी अगर वायरस पर काबू नहीं पाया गया तो प्रभावित लोगों की संख्या जितनी ज्यादा होगी , वायरस आगे और उतनी ही तेजी के साथ फैलेगा।

 

 

भारत में अभी तक कोरोना वायरस के 176 मामले बताये जा रहे हैं। जबकि भारत से बहुत छोटे देश आइसलैंड में कोरोना वायरस के 250 मामले मिले। क्या यह आंकड़े सचमुच वास्तविकता से रूबरू कराते हैं। तो जवाब है बिल्कुल नहीं। इसकी वजह है कि भारत में कोरोना वायरस की टेस्टिंग ही बहुत कम लोगों की हो पा रही है। दस लाख में से केवल दस लोगों की टेस्टिंग हो रही है। जबकि थाईलैंड में दस लाख लोगों के बीच में यही आंकड़ा 120 बैठता है और वियतनाम में 40 , यानी कोरोना वायरस के टेस्टिंग के मामलें में भारत बहुत पीछे है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि दुनिया के कई देशों की तरह भारत में भी टेस्टिंग किट की उपलब्धता बहुत कम मात्रा में है। किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि दुनिया ऐसे वायरस के चपेट में आने वाली है।

 

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के निदेशक टेड्रोस घेबरेयेसस का कहना है कि कोरोना वायरस फैलने से रोकने के लिए टेस्टिंग बहुत जरूरी है। अगर टेस्टिंग होगी तभी अमुक व्यक्ति को पूरी तरह अलग रखा जा सका जाएगा। संक्रमण के फैलाव का पता चलेगा और उचित कदम उठाया जा सकेगा। निदेशक साहेब के बात को आसानी से ऐसे समझिये कि अगर गांव का कोई व्यक्ति कोरोना वायरस से संक्रमित है तो उससे होने वाले संक्रमण से पूरे गाँव को तभी बचाया जा सकेगा जब यह बात पुख्ता तरीके से पता हो कि गांव का कोई व्यक्ति कोरोना वायरस से प्रभावित है। चीन ने कोरोना वायरस के संक्रमण से प्रभावित अपने शहर वुहान के साथ ऐसा ही किया।

 

 

वुहान को पूरी दुनिया से काट दिया औरवुहान शहर के अंदर के लोगों के एक दूसरे के साथ आपसी संपर्क से अलग कर दिया। जो रोज़ मजदूरी करके अपने भोजन लायक पैसा जुटा पाते थे, उन तक फ्री में खाना पहुँचाया। ऐसे कदम उठाने के लिए ज़रूरी है कि यह पता चले कि बीमारी कहाँ तक फैली है। इसलिए रोकथाम के लिए टेस्टिंग की बहुत जरूरत है। जबकि इंडियन मेडिकल कॉउंसिल ऑफ़ रिसर्च के हेड डॉक्टर भार्गव इससे ठीक उलट बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि भारत की परिस्थितियां यूरोप जैसी नहीं है। इसलिए टेड्रोस की टेलीविजन पर कही गयी टेस्ट … टेस्ट .. की बात भारत पर लागू नहीं होती है।

 

 

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बायोटेक्नोलॉजी पढ़ा रहे मनोरम शर्मा कहते हैं कि इसमें शर्माने वाली कोई बात नहीं है कि हम यह स्वीकार करें कि अभी हमें कोरोना वायरस से संक्रमित कम लोगों की जानकारी है। भारत में संक्रमण इससे अधिक हो सकता है। यूके (ब्रिटेन) ने स्वीकारा है कि भले ही उसके यहां दर्ज किये गए मामले बहुत कम है। लेकिन हो सकता है कि कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या दस हजार से अधिक हो। सरकार अगर कह रही है कि दफ्तर से लेकर स्कूल बंद किये जायें, पब्लिक प्लेस पर ताले लगाए जाएं तो इसका मतलब है कि परेशानी गंभीर है। उससे बहुत अधिक है जितनी की दिख रही है।

 

 

लेकिन क्या सोशल डिस्टेन्सिंग (सामाजिक दूरी) पूरी तरह से ममुकिन है। यह बात सही है कि आज के ज़माने में कई तरह के काम घर से किये जा सकते हैं। अलग थलग रहकर किये जा सकते हैं। लेकिन इन कामों का हिस्सा दुनिया को चलाने वाले सारे कामों में एक फीसदी से भी कम है। ट्रेन से लेकर बस के बारे में सोचिये, दुकान से लेकर झुग्गी के बारे में सोचिये। फैक्ट्री से लेकर अस्पताल के बारे में सोचिये। हर जगह लोगों के साथ की संभावना है। इसे कैसे रोक पाएंगे। बहुत दिनों तक सोशल डिस्टेन्सिंग के सहारे काम नहीं चल सकता। लेकिन सोशल डिस्टेन्सिंग ज़रूरी भी है। इस तरह से बड़े ध्यान से सोचा जाए तो हमें पता है कि हम एक ऐसी परेशानी से गुजर रहे हैं। जिससे उबरना अभी बहुत मुश्किल लग रहा है और उबरने के लिए जो उपाय किये जा रहा है। वह बहुत दिनों तक कारगर नहीं रह पाएंगे।

 

 

लक्ष्मीनारायण कहते हैं कि भारत में इस वायरस की बड़े स्तर पर फैलने की सम्भावना कम नहीं हुई है। अभी तक इसके पुख्ता सबूत नहीं मिले है कि गर्मी के समय यह वायरस कमजोर हो जाएगा। अगर यह वायरस कमजोर हो सके तो अच्छा हो। भारत का जनसंख्या घनत्व बहुत ज्यादा है इसलिए यह तेजी से फ़ैलेगा। लेकिन यह बात समझने के लिए है। बहुत ज्यादा परेशान होने के लिए नहीं है। कोरोनावायरस से प्रभावित होने का मतलब यह नहीं है कि सीधे मर जाना। इससे जुड़े 98 फीसदी से ज्यादा लोग फिर से ठीक हो जाते है। केवल दो फीसदी लोग ही इससे मरे हैं। उनमें भी साठ साल से अधिक उम्र के लोगों के मरने की संख्या ज्यादा है। अनुमान का मतलब सिर्फ इतना है कि हम सही तरह से तैयारी में लगे रहें।

 

 

जानकारों का कहना है कि मौजूदा समय में भारत के पास तकरीबन 70 से 1 लाख इंटेंसिव केयर यूनिट की क्षमता है। अगले दो हफ्ते में इस क्षमता को बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। भारत की मौजूदा टेस्टिंग क्षमता 70 लैब + एनआईवी, पुणे = प्रति दिन 8,000 नमूने प्रतिदिन देखे जा सकते हैं। लेकिन भारत प्रति दिन केवल 500 लोगों का टेस्ट कर पा रहा है। इसका विस्तार होना बहुत जरूरी है।

 

 

उम्मीद तो यही की जा रही है कि आगे चलकर सबकुछ ठीक हो जाएगा। अगर सबकुछ ठीक हो जाएगा तो केवल इस बात की आलोचना होगी कि हम बहुत डर गए थे। इसलिए इस छोटी आलोचना के सामने बड़े खतरे की संभावना से लड़ने की तैयारी ज़रूरी है।

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