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सच के साथ:किसान की मुश्किल

किसान खेती पर मौसम की मार के अभ्यस्त हैं। पर तैयार फसल की कटाई, मंड़ाई न हो पाए, उसे मंडी तक न पहुंचाया जा सके, तो वह दर्द असह्य हो जाता है। इस वक्त बहुत सारे मजदूर जो शहरों में दिहाड़ी करते थे या मनरेगा वगैरह में काम करते थे, वे गांवों में खाली बैठे हैं।

 

सच के साथ|पूर्ण बंदी के इस माहौल में कल-कारखाने, दुकानें, व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं, तो किसानों के सामने भी बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। कोरोना विषाणु का प्रकोप ऐसे समय में हुआ जब गन्ने, आलू, प्याज, दलहन वगैरह की फसलें खेतों में तैयार थीं और गेहूं की फसल तैयार हो रही थी। चीनी मिलें पेराई अवधि समाप्त होने से पहले ही बंद हो गर्इं, जिसके चलते गन्ने की बहुत सारी फसल अभी खेतों में खड़ी है। इससे गन्ना किसानों की परेशानियां समझी जा सकती हैं। अब गेहूं की फसल पक कर तैयार है, पर कटाई के लिए न तो पर्याप्त मजदूर मिल पा रहे हैं और न मशीनें। सामाजिक दूरी बना कर रहने और पांच से अधिक लोगों के एक साथ इकट्ठा न होने का नियम है, सो जहां स्थानीय मजदूर उपलब्ध हैं, वहां भी कटाई में मुश्किलें पेश आ रही हैं। इस साल थोड़े-थोड़े अंतराल पर मौसम का मिजाज भी बदलता देखा जा रहा है। बारिश की वजह से पहले ही फसलों को काफी नुकसान पहुंच चुका है। ऐसे में गेहूं की कटाई, मंड़ाई और फिर बाजार तक पहुंचाना किसानों के लिए बड़ी चिंता का विषय बन चुका है। इसलिए किसान संगठनों की ओर से मांग उठ रही है कि सरकार इस मामले में कुछ ढिलाई बरते और किसानों के लिए भी राहत पैकेज की घोेषणा करे, जैसे मजदूरों के लिए किया है।

 

 

 

दरअसल, खेती में काम करने वाले बहुत सारे मजदूर एक से दूसरे प्रदेशों में आवाजाही करते हैं। मसलन, कटाई के मौसम में बहुत सारे मजदूर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से पंजाब और हरियाणा का रुख करते हैं और फिर वापस अपने घर लौट जाते हैं। इसी तरह गेहूं की कटाई और मंड़ाई करने वाली बहुत सारी मशीनें राजस्थान, पंजाब और हरियाणा से दूसरे प्रदेशों में जाती हैं। मगर पूर्ण बंदी की वजह से मजदूरों और मशीनों का आना-जाना भी बाधित हो गया है। हालांकि पंजाब सरकार ने छूट दे दी है कि खेती के काम में इस्तेमाल होने वाली मशीनों के आवागमन पर रोक नहीं रहेगी। इसी तरह मजदूरों पर से भी पाबंदी हटा ली गई है। यों खेती के काम में कभी वैसी भीड़भाड़ नहीं होती जैसी दूसरी व्यावसायिक गतिविधियों में देखी जाती है। सामाजिक दूरी के तय पैमाने जितनी दूरी वहां प्राय: रहती ही है, पर खेतिहर मजदूरों की आवाजाही खोलने से खेतों के अलावा दूसरी जगहों पर इसके पालन न हो पाने का खतरा बना रहेगा। इसलिए पंजाब सरकार अगर यह छूट दे रही है, तो उसे इस पर मुस्तैदी से नजर रखने की जरूरत है।

 

 
किसान खेती पर मौसम की मार के अभ्यस्त हैं। पर तैयार फसल की कटाई, मंड़ाई न हो पाए, उसे मंडी तक न पहुंचाया जा सके, तो वह दर्द असह्य हो जाता है। इस वक्त बहुत सारे मजदूर जो शहरों में दिहाड़ी करते थे या मनरेगा वगैरह में काम करते थे, वे गांवों में खाली बैठे हैं। उनकी मदद से कटाई-मंड़ाई का कुछ काम हो भी रहा है, पर पांच से अधिक लोगों के एक स्थान पर काम करने पर पाबंदी बाधा बन रही है। इतने कम लोगों से काम पूरा होना मुश्किल है। अब बंदी की अवधि में विस्तार होने के संकेत मिल चुके हैं, कोरोना संक्रमितों की पहचान और उनके उपचार की चुनौतियां बढ़ ही रही हैं। ऐसे में सरकारों को खाद्य उत्पादन का भंडारण और लोगों तक उसकी पहुंच सुगम बनाने का कोई न कोई रास्ता निकालना ही होगा।

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