अखण्ड भारत

चीनी एप्स पर प्रतिबंध की वजह उससे आगे जाती है जो इन दिनों लद्दाख में हो रहा है

सच के साथ |टिकटॉक और यूसी ब्राउजर जैसे 59 चीनी एप्स पर भारत के प्रतिबंध का मुद्दा गर्म है. अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने इसका स्वागत करते हुए कहा है कि इससे भारत की सुरक्षा बढ़ जाएगी. उन्होंने इन एप्स को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के जासूसी अभियान का हिस्सा बताया है. उधर, चीन ने अपने पड़ोसी देश के इस फैसले का विरोध किया है. उसका कहना है कि भारत राष्ट्रीय सुरक्षा के उन प्रावधानों का दुरुपयोग कर रहा है जो विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ के समझौतों का हिस्सा हैं.

 

 

टिकटॉक और यूसी ब्राउजर के अलावा शेयर इट, हेलो, कैम स्कैनर और लाइकी जैसे लोकप्रिय एप्स पर रोक लगाने का फैसला भारत सरकार ने आईटी एक्ट की धारा 69ए के तहत किया है. इसके तहत सरकार देश की अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस तरह की कार्रवाई कर सकती है. एक बयान में सूचना और तकनीकी मंत्रालय ने कहा है कि उसे काफी शिकायतें मिली रही थीं जिनमें कहा गया था कि इन एप्स का दुरुपयोग हो रहा है. उसके मुताबिक इन एप्स से डेटा को अवैध तरीके से भारत के बाहर पहुंचाया जा रहा था. मंत्रालय का यह भी कहना था कि देश की सुरक्षा के लिए यह बहुत गंभीर मसला था इसलिए इ्स तरह की आपात कार्रवाई जरूरी हो गई थी.

 

 

केंद्र सरकार ने चीनी एप्स के खिलाफ यह कदम ऐसे समय पर उठाया है जब भारत और चीन की सेना लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर आमने-सामने है. 15 जून को दोनों सेनाओं के बीच हुई एक झड़प में 20 भारतीय सैनिकों की मौत भी हुई थी. इसके बाद से भारत में चीनी कंपनियों के खिलाफ रोष का माहौल है. प्रतिबंध के ऐलान के बाद भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक ट्वीट में कहा, ‘यह पाबंदी सुरक्षा, संप्रभुता और भारत की अखंडता के लिए जरूरी है. हम भारत के नागरिकों के डेटा और निजता में किसी तरह की सेंध नहीं चाहते.’

 

 

कई जानकार मानते हैं कि जिस तरह से लद्दाख में चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर आक्रामक रुख अपनाए हुए है उसे देखते हुए भारत ने उसे साफ संदेश दे दिया है. संदेश यह है कि उस पर दबाव बनाने के लिए बातचीत से इतर तरीके भी अपनाए जा सकते हैं. भारत में चीनी कंपनियों को निवेश संबंधी सलाह देने वाली कंपनी लिंक लीगल के संतोष पाई द इकनॉमिक्स टाइम्स से बातचीत में कहते हैं, ‘रणनीतिक रूप से देखा जाए तो इससे जबर्दस्त आर्थिक दबाव पड़ेगा. इसकी वजह यह है कि ये एप्स भारत पर काफी निर्भर हैं.’

 

 

उनकी यह बात गलत नहीं लगती. एक अनुमान के मुताबिक टिकटॉक, यूसी ब्राउजर और तमाम दूसरे चीनी एप्स के भारत में 50 करोड़ से भी ज्यादा सक्रिय यूजर हैं. चीन से बाहर इन कंपनियों के लिए भारत ही सबसे बड़ा बाजार है. बीते साल जब टिकटॉक पर कुछ दिनों के लिए प्रतिबंध लगा था तो कंपनी राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट गई थी. वहां उसने कहा था कि प्रतिबंध से उसे रोज करीब तीन करोड़ 70 लाख रुपये की चपत लग रही है. टिकटॉक के भारत में करीब 10 करोड़ सब्सक्राइबर्स हैं और यूजर बेस के लिहाज से देखा जाए तो यह उसके लिए चीन से भी बड़ा बाजार है. इस मामले में दूसरे नंबर पर चीन है और फिर अमेरिका.

 

 

लेकिन, बहुत से जानकार यह भी मानते हैं कि भारत के इस कदम का संबंध सिर्फ तात्कालिक घटनाक्रम से जुड़ा हुआ नहीं है. उनके मुताबिक गलवान घाटी प्रकरण इसकी एक वजह जरूर हो सकता है, लेकिन इसके मूल में चीन से आता एक कहीं बड़ा खतरा है. यह खतरा है देश के डिजिटल ढांचे और ऑनलाइन इकोसिस्टम पर उसके कब्जे का.

 

 

यह तो जगजाहिर ही है कि अपनी महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) परियोजना के जरिये चीन दुनिया में अपने आर्थिक दबदबे को सबसे आगे ले जाना चाहता है. इस योजना के तहत वह एशिया और यूरोप में सड़कों और बंदरगाहों का जाल बिछा रहा है जिससे उसके सामान की दुनिया के बाजारों में पहुंच आसान हो सके. दुनिया के बहुत से देश इस परियोजना में उसके साथ चल रहे हैं. पाकिस्तान से लेकर नेपाल, म्यामांर और श्रीलंका जैसे भारत के तमाम पड़ोसी देशों में चीन ने कई अहम परियोजनाएं शुरू कर दी हैं. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह वह भारत की घेराबंदी करने की कोशिश भी कर रहा है.

 

 

चीन कई बार भारत को भी बीआरआई में शामिल करने की कोशिशें कर चुका है, लेकिन भारत इस परियोजना का ही विरोध कर रहा है. इसकी एक वजह यह है कि कि इस परियोजना का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाले उस कश्मीर से भी गुजरता है जिसे भारत अपना हिस्सा मानता है. दूसरा, एक बड़ा वर्ग है जो बीआरआई को परस्पर साझेदारी से ज्यादा आर्थिक साम्राज्यवाद कायम करने की योजना मानता है. इस वर्ग का यह भी मानना है कि इस योजना में शामिल होने से भारत के इनकार के बाद चीन अपने इस आकर्षक पड़ोसी बाजार में प्रभुत्व जमाने का लक्ष्य अपनी एक दूसरी योजना से पूरा करना चाहता है. यह योजना है डिजिटल सिल्क रूट. माना जा रहा है कि इसके तहत चीन भारत में इंटरनेट के आधारभूत ढांचे से लेकर मोबाइल फोन और एप्स तक हर मोर्चे पर पर अपनी मजबूत पकड़ कायम करना चाहता है. कुछ जानकारों के मुताबिक भारत की बड़ी और दीर्घकालिक चिंताएं चीन की इसी महत्वाकांक्षी योजना से जुड़ती हैं.

 

 

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बीते अप्रैल से अब तक एपल के एप स्टोर और गूगल प्ले से सबसे ज्यादा डाउनलोड होने वाले 25 एप्स में से आठ चीनी थे. चीनी निवेश पर निगाह रखने वाले अमेरिका के शिकागो स्थित मार्को पोलो थिंक टैंक ने भी अप्रैल में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसमें कहा गया था कि भारत में 10 सबसे ज्यादा डाउनलोड होने वाले एप्स में छह चीनी कंपनियों के हैं और बाकी चार अमेरिकी कंपनियों के. और जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है टिकटॉक, यूसी ब्राउजर और क्लब फैक्ट्री जैसे चीनी कंपनियों के एप्स के पास बीते मई में 50 करोड़ से भी ज्यादा सक्रिय यूजर थे. इसके अलावा भारत के मोबाइल बाजार को देखें तो देश में स्मार्टफोन बाजार के करीब तीन चौथाई हिस्से पर शाओमी, ओप्पो, वीवो और रियलमी जैसी चीनी कंपनियों का कब्जा हो चुका है. फीचर फोन बाजार में भी चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है.

 

 

यही नहीं, टेक्नॉलीज स्टार्ट अप्स के मोर्चे पर बिग बास्केट, बायज्यूज, फ्लिपकार्ट, मेक माइ ट्रिप, ओला, ओयो, पेटीएम, पॉलिसी बाजार, क्विकर, स्नैपडील, स्विगी और जोमैटो जैसे बड़े नामों में भी चीनी कंपनियों की मोटी हिस्सेदारी है. विदेश नीति संबंधी विषयों के लिए चर्चित थिंक टैंक गेटवे हाउस : इंडियन काउंसिल ऑन ग्लोबल रिलेशंस ने अपनी एक हालिया रिपोर्ट में कहा है कि भारत के शीर्ष 30 यूनिकॉर्न्स (ऐसे स्टार्टअप्स जिनका बाजार पूंजीकरण एक अरब डॉलर यानी फिलहाल के हिसाब से करीब साढ़े सात हजार करोड़ रुपयों से ज्यादा हो चुका हो) में से 18 में चीनी कंपनियां बड़ी हिस्सेदार हैं।

 

चर्चित डेटा एंड एनैलिटिक्स फर्म ग्लोबल डेटा की एक रिपोर्ट कहती है कि बीते चार साल में भारतीय स्टार्ट अप्स में चीनी कंपनियों के निवेश में चार गुनी बढ़ोतरी हुई है. उधर, गेटवे हाउस की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में अब तक 6.2 अरब डॉलर का चीन का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बाकी देशों की तुलना में आंकड़े के लिहाज से छोटा कहा जा सकता है, लेकिन आम लोगों तक तकनीक की लगातार बढ़ती पहुंच को देखते हुए इसका असर कहीं ज्यादा हो चुका है. रिपोर्ट के शब्द हैं, ‘भारत के टेक स्टार्ट अप्स में चीनी फंडिंग का आंकड़ा भले ही छोटा हो, लेकिन इसका असर कहीं बड़ा है. बाइटडांस के मालिकाना हक वाला टिकटॉक भारत में सबसे मशहूर एप्स में शुमार हो चुका है. इसने यूट्यूब को भी (सब्सक्राइबर्स के मामले में) पीछे छोड़ दिया है. शाओमी के फोन सैमसंग से ज्यादा बिक रहे हैं. ह्वावे के राउटर व्यापक तौर पर इस्तेमाल हो रहे हैं. अलीबाबा, बाइटडांस और टेनसेंट जैसे दिग्गजों की अगुवाई में करीब दो दर्जन चीनी कंपनियों ने भारत के 92 स्टार्ट अप्स में निवेश किया है जिनमें पेटीएम, बायज्यूज, ओयो और ओला जैसे यूनिकॉर्न शामिल हैं. चीन अब भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और तकनीक जगत का अभिन्न हिस्सा बन चुका है.’

 

 

वापस टिकटॉक और हेलो जैसे एप्स पर आते हैं. कई जानकार इन एप्स को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की उस रणनीति का हिस्सा मानते हैं जिसे मिलिट्री-सिविलियन फ्यूजन नाम दिया गया है. इसके तहत बड़े स्तर पर डेटा हासिल किया जाता है और फिर उसे राजनीतिक और सैन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इसे एक हालिया उदाहरण से समझा जा सकता है. बीते महीने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुनावों के प्रचार के लिए अपनी पहली रैली करने ओकलाहोमा के टुलसा पहुंचे. माना जा रहा था कि कोरोना वायरस महामारी के बीच यह सबसे बड़ी रैली होगी. लेकिन यह फ्लॉप हो गई. असल में डोनाल्ड ट्रंप की प्रचार टीम ने इस रैली के टिकट फ्री में बांटे थे. टिक-टॉक यूजर्स ने बड़ी संख्या में ये टिकट बुक कर डाले और फिर जान-बूझकर रैली में पहुंचे ही नहीं. जानकार मानते हैं कि ऐसे कामों को टिकटॉक जैसे एप्स पर मौजूद चीनी सरकार के लोग या बॉट्स भी अंजाम दे सकते हैं. माना जा रहा है कि फेशियल रिकग्निशन और निगरानी तकनीक में चीनी कंपनियों की असाधारण प्रगति का राज टिकटॉक जैसे एप्स से उन्हें मिला विशाल डेटा ही है.

 

 

किसी रेलवे लाइन या बंदरगाह के उलट तकनीक से जुड़ी कंपनियों में चीनी निवेश लगभग अदृश्य होता है. आम तौर पर इसका आकार काफी छोटा होता है और आठ या नौ करोड़ डॉलर का यह निवेश चीन के प्राइवेट सेक्टर की तरफ से होता है जिससे अचानक सबके कान खड़े नहीं होते. यह आता भी बहुत घुमा-फिराकर है. उदाहरण के लिए भारत में टिकटॉक का संचालन करने वाली बाइटडांस इंडिया की होल्डिंग कंपनी सिंगापुर में रजिस्टर्ड टिकटॉक पीटीई लिमिटेड है. टिकटॉक पीटीई लिमिटेड टिकटॉक लिमिटेड के तहत आती है और यह केमेन आइलैंड्स में रजिस्टर्ड है. कई दूसरी कंपनियों का भी यही किस्सा है.

 

 

एक बेबसाइट से बातचीत में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चीन संबंधी मामलों के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली कहते हैं, ‘भारत का 59 चीनी एप्स पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लद्दाख में सैन्य टकराव पर राजनीतिक प्रतिक्रिया से ज्यादा आर्थिक सोच के साथ उठाया गया कदम है.’ वे आगे कहते हैं कि भारत में आशकाएं हैं कि चीन टिकटॉक्स जैसे एप्स में दर्ज हो रही जानकारियों का इस्तेमाल देश के उपभोक्ताओं के व्यवहार का अध्ययन करने के लिए कर सकता है.

 

 

श्रीकांत कोंडापल्ली के मुताबिक चीन भारत के ऑनलाइन इकोसिस्टम में तो अपनी मौजूदगी बढ़ाता जा रहा है लेकिन दूसरी तरफ अपने बाजार में भारतीय कंपनियों के निवेश के लिए वह अनिच्छुक दिखता है. वे कहते हैं, ‘अब तक किसी भी भारतीय कंपनी को शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होने की इजाजत नहीं मिली है. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज जैसी कंपनियों ने ऐसा करने की तमाम कोशिशें कीं लेकिन असफल रहीं.’ चीन में भारतीय आईटी कंपनियों को सरकारी कॉन्ट्रैक्ट देने पर भी प्रतिबंध है. भारतीय फार्मा कंपनियां भी वहां निवेश करना चाहती हैं, लेकिन ट्रायल से लेकर जेनेरिक दवाइयों के उत्पादन तक जरूरी मंजूरियां लेने में इतनी बाधाएं हैं कि उनके लिए यह काम लगभग असंभव हो जाता है. यही हाल फलों से लेकर डेयरी प्रोडक्ट्स का भी है जिनके निर्यात में चीन कोई न कोई बहाना बनाकर अड़ंगा लगा देता है. जानकारों के मुताबिक ये मुद्दे कई बार चीन सरकार के साथ उठाए जा चुके हैं, लेकिन बात महज आश्वासनों तक ही सीमित रह जाती है.

 

 

भारत के साथ सहयोग से ज्यादा उसका रास्ता रोकने की यह भावना दूसरे क्षेत्रों में भी दिखती है. प्रोफेसर कोंडापल्ली कहते हैं, ‘ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां चीन ने भारत की राह न रोकी हो. ऊर्जा को ही लें. कजाकिस्तान, वेनेजुएला, सूडान, नाइजीरिया, अंगोला और ईरान जैसे तमाम देशों में चीनी कंपनियों ने ओएनजीसी का रास्ता रोका है.’

 

 

शायद यही वजह है कि भारत भी कोशिशें कर रहा है कि उसकी वजह से चीन को होने वाला फायदा कम हो. बीते दिनों ही खबर आई थी कि चीन के साथ उसका व्यापार घाटा पांच साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है. हालांकि अब भी 48.7 अरब डॉलर के आंकड़े के साथ यह काफी भारी-भरकम है लेकिन वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि इसे और भी कम करने के लिए रणनीतियों पर काम जारी है. इसी साल फरवरी में यह खबर भी आई थी कि चीन को पीछे छोड़ते हुए अब अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार बन गया है.

 

 

चीनी एप्स पर प्रतिबंध के बाद केंद्र सरकार अब 10-12 उत्‍पादों के आयात के लिए लाइसेंस जारी करने के बारे में भी सोच रही है. इसके बाद इन उत्पादों को चुनिंदा देशों से ही आयात किया जा सकेगा. इनमें एयर कंडीशनर, टीवी और उनके कल-पुर्जे शामिल हैं. बताया जा रहा है कि यह नीति विदेशों खासकर चीन से आयात को कम करने के लिए लाई जा रही है क्योंकि एसी और टीवी के कल-पुर्जों का एक बड़ा हिस्सा भारत में चीन से ही आता है. इस दिशा में कई महीने पहले ही काम शुरू किया जा चुका था लेकिन सीमा पर हालिया तनाव के बाद इसमें और तेजी आ गई है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार भारत सरकार ने आयात किए जाने वाले 300 ऐसे सामानों की सूची भी तैयार की है जिन पर टैरिफ बढाए जाने पर विचार किया जा रहा है. चीन का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन समझा यह जा रहा है कि चीनी आयात पर निर्भरता कम करने के लिए ही ये क़दम उठाए जा रहे हैं.

 
इसी तरह बीते अप्रैल में केंद्र सरकार ने यह फैसला किया था कि भारत की भौगोलिक सीमा जिन देशों से जुड़ी हुई है उनकी कंपनियां अब यहां सीधा निवेश नहीं कर सकतीं. उसने निवेश के नियमों में बदलाव करने की जो घोषणा की, उसमें चीन के नाम का जिक्र नहीं किया गया, लेकिन माना गया कि यह फैसला बड़ी सावधानी से उसे ही ध्यान में रखकर किया गया है. चीन से इसकी प्रतिक्रिया भी आई. उसने कहा गया कि वह इस मसले को विश्व व्यापार संगठन में उठाएगा. उधर, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने ऐलान किया है कि अब चीनी या उनकी साझीदार कंपनियों को भारत में हाइवे निर्माण का कोई प्रोजेक्ट नहीं दिया जाएगा.

 

 

क्या चीन की महत्वाकांक्षाओं से खुद को बचाने की भारत की यह योजना कामयाब होगी? कुछ जानकार मानते हैं कि इस दिशा में शुरुआत तो सही हुई है, लेकिन इसका इच्छित परिणाम इस बात पर भी निर्भर करता है कि भारत खुद के बूते उतने अच्छे विकल्प खड़े कर पाता है या नहीं. अभी तो टिकटॉक जैसे एप्स के जो विकल्प हैं भी उनमें से कई को चीनी एप्स की ही खराब कॉपी कहा जाता रहा है. यह बात अन्य क्षेत्रों और उत्पादों पर भी लागू होती है. एक वर्ग का यह भी मानना है कि प्रतिद्वंदियों को इस तरह एकतरफा तरीके से बाजार से बाहर करने के भी अपने नुकसान हैं. आखिर पेड़ों के बीच ऊंचे उठने की होड़ तो घने जंगल में ही हो सकती है.

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