अखण्ड भारत

क्या सिलेबस में लोकतंत्र की विषय-वस्तु गैरज़रूरी है?

क्या सिलेबस में लोकतंत्र की विषय-वस्तु गैरज़रूरी है?
“सिलेबस को कभी भी केवल क्लास पास करने या फेल करने को आधार बनाकर नहीं देखना चाहिए। सिलेबस कट करने के नाम पर सरकार अपना एजेंडा थोपने की कोशिश कर रही है।”

 

सच के साथ|कोविड-19 महामारी की वजह से सब कुछ प्रभावित है। स्वास्थ्य और रोज़गार के अलावा इसका शिक्षा पर भी बहुत बड़ा असर पड़ा है। स्कूल बंद हैं। स्कूल में मौजूद शिक्षकों की मदद से मिलने वाली वाली शिक्षा बंद है। और इस तरह सीखने और सिखाने का पूरा माहौल ही बदल गया है। इस असर से निपटने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय ने NCERT के किताबों पर चलने वाली CBSE की कक्षा 9 से लेकर 12 तक के सिलेबस को साल 2020-21 के लिए 30 फ़ीसदी कम कर देने का फैसला लिया है। लेकिन छात्रों पर बोझ कम करने के नाम पर यहां भी गड़बड़ कर दी गई।

 

 

अगर शिक्षा के मंत्री यानी मानव संसाधन विकास मंत्री की बात को साफ़ लफ़्ज़ों में समझा जाए तो मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का कहना है कि सिलेबस में कोर कॉन्सेप्ट्स को रखकर बाकी के सिलेबस को हटा दिया गया है और यह बाकी का सिलेबस कोर कांसेप्ट के अंतर्गत नहीं आता है। मंत्री जी के इस बयान से यह सवाल उठता है कि क्या अभी तक जो सिलेबस था, उसमें कोर कॉन्सेप्ट्स और गैर कोर कांसेप्ट से जुड़े विषय थे? या सिलेबस ऐसा था जिसमें से कुछ हिस्से बहुत अधिक महत्वपूर्ण थे और कुछ हिस्से ऐसे थे जिनसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता भले ही रहे या न रहे। कहने का मतलब यह है कि कोविड-19 महामारी का कारण तो ठीक है लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय का बयान सरकार की निगाह में मौजूदा सिलेबस को लेकर कई तरह के सवाल खड़ा करता है।

 

 

अब बात करते हैं कि सिलेबस में 30 फ़ीसदी की कमी बताकर आखिरकर सिलेबस से किन हिस्सों की छंटनी की गई है। कक्षा 11 की पोलिटिकल थ्योरी यानी राजनीतिक सिद्धांत के सिलेबस से नागरिकता, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद, लोकतांत्रिक अधिकार और संघवाद जैसे अध्याय हटा दिए गए हैं। कक्षा 12 के सिलेबस से भारत का अपने पड़ोसी राज्यों से संबंध, जाति और लिंगभेद को लेकर सामाजिक न्याय से जुड़े आंदोलन, क्षेत्रवाद, भारत के आर्थिक विकास की बदलती प्रकृति, योजना आयोग जैसे टॉपिक हटा दिए गए हैं।

 

 

बिजनेस स्टडीज के विद्यार्थियों के लिए इस साल डीमोनेटाइजेशन (नोटबंदी), गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी), उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की वजह से भारतीय राज्य की नीति में पढ़ने वाले प्रभाव से जुड़े टॉपिकों से हटा दिया गया है। इतिहास में भारत के बंटवारे, किसानी और ज़मींदारी से जुड़े अध्याय इस बार की सिलेबस में शामिल नहीं किए जाएंगे। इसी तरह से कॉमर्स, अर्थशास्त्र, भूगोल, विज्ञान, गणित, अंग्रेजी जैसे कक्षा 9 से लेकर 12वीं तक के सिलेबस में पढ़ाए जाने वाले सभी विषयों के सिलेबस से 30 फ़ीसदी हिस्सा इस साल के सिलेबस के लिए कम कर दिया गया है।

 

 

इस मुद्दे पर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस में एक शिक्षाविद की तौर पर पढ़ा रहे प्रोफेसर सतबीर खोरा से बातचीत हुई। प्रोफेसर सतबीर खोरा का कहना है कि समय और सिलेबस के बीच हमेशा तनाव रहता है। हमेशा दबाव रहता है कि समय पर सिलेबस पूरा करा दिया जाए। सच्चाई तो यह है कि क्लास 9th, 10th 11th 12th में पास हो जाने का मतलब यह नहीं होता कि कोई बाद में जाकर इन क्लासों से जुड़े विषयों और टॉपिकों की कभी पढ़ाई नहीं करेगा या इन विषयों में इतना पारंगत हो गया है कि क्लास पास कर जाने के बाद इन्हें पढ़ने की जरूरत ही नहीं है। कहने का मतलब यह है कि सिलेबस को कभी भी केवल क्लास पास करने या फेल करने को आधार बनाकर नहीं देखना चाहिए।

 

 

जब हम सिलेबस को मकैनिक्ली नजरिए से देखते हैं तभी हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि कुछ कांसेप्ट- कोर कांसेप्ट हैं और कुछ कांसेप्ट -ऑप्शनल कॉन्सेप्ट। कोर कॉन्सेप्ट्स को पढ़ना चाहिए और ऑप्शनल कांसेप्ट को छोड़ देना चाहिए। जीविका से सीधे जुड़ने वाले विषयों को ज्यादा तवज्जो देनी चाहिए और जीवन मूल्य बनाने वाले विषयों को कम तवज्जो देनी चाहिए। इस टेक्निकल लिहाज से देखने पर ही अचनाक से सिलेबस का 30 फ़ीसदी कम कर दिया जाता है। और सिलेबस से किसी हिस्से को निकालते वक्त यह विचार नहीं आता कि आखिर कर हम किसी अवधारणा को किस बुनियाद पर कमतर , बेहतर, कोर और ऑप्शनल जैसे कैटेगरी में बांट रहे हैं।

 

 

सतवीर खोरा अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि कॉविड 19 के समय में सब कुछ अबनॉर्मल (असामान्य) हो गया है। नॉर्मल (सामान्य) जैसी कोई बात ही नहीं रही है। तो पता नहीं क्यों शिक्षा को जबरदस्ती नॉर्मल बनाने की कोशिश की जा रही है। बच्चे पूरी क्लास रूम में ठीक से नहीं पढ़ पाते थे, वह बच्चे मोबाइल के एक छोटे से स्क्रीन पर कैसे ठीक से पढ़ सकते हैं? ऑनलाइन एजुकेशन का भद्दा मजाक चल रहा है। सिलेबस कट करने के नाम पर सरकार अपना एजेंडा थोपने की कोशिश कर रही है। इंसान की उम्र औसतन 70 से 80 साल की होती है। उसमें से अगर 1 साल बोर्ड परीक्षा ना ही करवाया जाए तो आखिर कर कौन सी आफ़त आ जायेगी? हम सबकुछ मशीनी तौर पर अपनाने के आदि हो चुके हैं, इसलिए हमारे आसपास जो प्राकृतिक और स्वाभाविक घट रहा होता है, उसे हम हू-ब-हू वैसे ही स्वीकारने से कतराते हैं।

 

 

कक्षा 11 की राजनीतिक सिद्धांत की किताब प्रोफेसर योगेंद्र यादव और प्रोफेसर सुहास पालिशकर ने मिलकर लिखी थी। एनडीटीवी पर सुहास पालिशकर कि इस मुद्दे पर रखी गयी राय प्रसारित की जा रही है। सुहास पालिशकर का कहना है कोई भी किताब तार्किक शैली में लिखी जाती है। किताब के हर मुद्दे और हर अवधारणाएं एक दूसरे से जुड़े होते हैं। जब किताब के किसी हिस्से को हटा दिया जाता है तो इसे किताब पर हिंसक कार्यवाही की तरह देखा जाना चाहिए। बड़े ध्यान से देखें तो राजनीतिक सिद्धांत के किताब से जिन मुद्दों को हटाया गया है वह भारतीय समाज के विविधता, लोकतंत्र और संविधान से जुड़े सबसे गहरे मुद्दे हैं।

 

 

एनसीईआरटी के भूतपूर्व डायरेक्टर प्रोफेसर कृष्ण कुमार के निर्देशन में एनसीईआरटी की किताबों की विषय वस्तु तैयार हुई थी। एनडीटीवी से प्रोफेसर कृष्ण कुमार का कहना था कि सरकार का यह फैसला बच्चों द्वारा समाज, लोकतंत्र और संविधान जैसे पहलुओं के अधिकार को जानने का खारिज करता है। जरा सोच कर देखिए कि बिना नागरिकता और लोकतांत्रिक अधिकारों को जाने कोई कैसे लोकतंत्र को समझ सकता है? बिना संघवाद को जाने कोई कैसे भारतीय संविधान को समझ सकता है? बिना जाति प्रथा, सामाजिक न्याय से जुड़े आंदोलन को पढ़े कोई कैसे भारतीय समाज को समझ सकता है?

 

 

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के महासचिव सीताराम येचुरी ने ट्वीट कर लिखा है कि यह फैसला पूरी तरह से दमनकारी है। मोदी सरकार महामारी का बहाना लेकर भारतीय समाज की विविधता,बहुलता, धर्मनिरपेक्षता जैसी अहम पहलुओं को सिलेबस से खारिज कर रही है। शिक्षा के मामलों में अहम हस्तक्षेप रखने वाले कार्यकर्ता डॉक्टर अशोक अग्रवाल का कहना है कि लग रहा है कि सरकार ने मान लिया है कि ऑनलाइन शिक्षा से पढ़ाई नहीं करवाई जा सकती, इसीलिए आनन-फानन में आकर सिलेबस से 30 फ़ीसदी हिस्से की कटौती कर दी है। यह कटौती भी ऐसी है जिससे लगता है कि सरकार अपना एजेंडा थोप रही हो।

 

 

छात्र संगठन एसएफआई ने भी सरकार के इस फ़ैसले की कड़े शब्दों में निंदा की है। एसएफआई की केंद्रीय कार्यकारिणी ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा स्कूल सिलेबस में तोड़फोड़ करने के फैसले के खिलाफ देश भर में व्यापक और एकजुट प्रतिरोध होना चाहिए। यह लोकतांत्रिक संघर्ष और आकांक्षाओं पर सीधा प्रहार है। यह देश को विभाजित करने और अपने तर्कसंगत विचारों को कमजोर करने के लिए एक आपराधिक और सांप्रदायिक परियोजना का हिस्सा है। एसएफआई ने सरकार से NCERT की पाठ्य पुस्तकों में वास्तविक कोर कांसेप्ट को तुरंत बहाल करने की मांग की है।

 

 

इन सारी राय से गुजरने के बाद आपको भी खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि वह सरकार कैसी होगी जो लोकतांत्रिक अधिकार, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता जैसे विषयों को अपनी शिक्षा तंत्र का कोर कांसेप्ट नहीं मानती।

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