इतिहास

मानवाधिकार और पुलिस सुधार

मानवाधिकार और पुलिस सुधार

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कानून के राज पर कितनी ही भाषणबाजी के बावजूद, मानवाधिकारों की सुरक्षा और उन्हें प्रोत्साहन के लिए संवैधानिक प्रावधानों और संस्थानों की मौजूदगी के बावजूद यह तथ्य है कि पुलिस एक सरकारी विभाग है, जिसमें व्यवहारिक तौर पर थोड़ी-बहुत ही स्वायत्तता है।

 

सच के साथ|फरवरी में दिल्ली चुनावों के बाद उत्तर-पूर्व दिल्ली में बड़ी हिंसा हुई, जिसमें कई लोगों की हत्या कर दी गई। इनमें से ज़्यादातर मुस्लिम थे। चुनाव में जीत हासिल करने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कहना था कि पड़ोसी राज्य उत्तरप्रदेश से करीब़ 2000 असामाजिक तत्वों को हत्याएं करवाने के लिए लाया गया। क्योंकि उस इलाके में ज़्यादातर मुस्लिमों ने विपक्षी पार्टी बीजेपी के बजाए आम आदमी पार्टी को वोट दिया था। इन घटनाओं में पुलिस की भूमिका बेहद विवादास्पद रही। बड़े स्तर पर आम लोगों के मानवाधिकारों का हनन किया गया। दिलचस्प है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कानून-व्यवस्था की तारीफ़ की थी।

 

 

2 जुलाई को उत्तरप्रदेश में 8 पुलिस वालों की विकास दुबे और उसके साथियों ने गोलियां मारकर हत्या कर दी। इस घटना से पुलिस, राजनेताओं और अपराधियों के बीच जारी सांठ-गांठ एक बार फिर खुलकर सामने आई है। 19 जून को एक दूसरी घटना में तमिलनाडु के शथंकुलम में पुलिस ने एक छोटे से अपराध के आरोपियों को बुरे तरीके से टॉर्चर किया और उनकी हत्या कर दी।

 

 

इन सभी मामलों और अतीत की कई घटनाओं में पुलिस, नेता और सामाजिक ढांचे के बीच समन्वय रहा है। इनमें आम आदमी के मानवाधिकार, कानूनी अधिकारों और सामाजिक अधिकारों का खूब उल्लंघन हुआ। इन सभी मामलों में पुलिस की भूमिका बेहद अहम रही है।

 

 

मानवाधिकार निगरानी रिपोर्ट/ह्यूमन राइट्स वाच (HRW) रिपोर्ट

HRW एक अहम अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जो मानवाधिकारों की रक्षा और उनके प्रोत्साहन के लिए काम करती है। संस्था ने बड़े स्तर पर पुलिस और अपराधी न्याय व्यवस्था के सुधार का सुझाव दिया है। इसकी रिपोर्ट पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है। एक अहम लेकिन नजरंदाज़ कर दी गई HRW रिपोर्ट, “Broken System: Dysfunction, Abuse and Impunity in the Indian Police, 2009” ने भारतीय पुलिस और अपराध न्याय व्यवस्था के बारे में बेहद अहम योगदान दिया है। यह पाठकों के सामने भारतीय पुलिस की ज़मीनी हकीक़त को सीधा परोसती है, इस हकीक़त को अलग-अलग पुलिस सुधार कार्यक्रमों में नकार दिया जाता है।

 

 

भारतीय पुलिस पर HRW का विश्लेषण

भारत में जारी हथियारबंद लड़ाई, संगठित अपराध, धार्मिक और जातिगत हिंसा से निपटने के लिए पुलिस में जवानों की संख्या पर्याप्त नहीं है, पुलिस अपनी क्षमता से कहीं ज़्यादा बड़े इलाके में तैनात है। पुलिस के पास जरूरी प्रशिक्षण भी नहीं है और उनके हथियार भी दोयम दर्जे के हैं। लोग डर के चलते सामान्य तौर पर पुलिस से व्यवहार ही नहीं करते। राजनीतिक लोग, पुलिस ऑपरेशन्स में दखलंदाजी कर अकसर उन्हें जटिल बना देते हैं।

 

 

मामलों में स्वतंत्र जांच के आभाव में अपराधी छूट जाते हैं। काम करने की खराब स्थितियों और अपराधियों के छूट जाने से पुलिसिया ढांचे में शॉर्टकट अपनाने का प्रचलन बढ़ा है। अवैध हिरासत, टॉर्चर, बुरा व्यवहार और अपराधियों को सजा दिलाने में नाकामी से गलत अपराध स्वीकृति करवाने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

 

 

HRW ने पुलिसिया व्यवहार और भारत में उनके मानवाधिकारों पर गहन शोध का विश्लेषण किया है। HRW ने उन मामलों को उठाया, जिनमें सामान्यत: पुलिस द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए जाते हैं। कुछ पीड़ित और गवाहों, जिनमें ऐसे पीड़ित भी शामिल थे, जिन्हें पुलिस द्वारा यातना दी गई, उनके इंटरव्यू किए गए। साथ में पुलिस कस्टडी या शूटऑउट में मारे गए पीड़ितों के वकीलों और परिवारों के इंटरव्यू भी लिए गए। कुछ इंटरव्यू उन लोगों के भी लिए गए जिनकी शिकायत दर्ज कर जांच करने से पुलिस ने मना कर दिया। HRW ने अलग-अलग शहरों और गांवों के पुलिस थानों में दौरा किया। कुछ अधिकारियों ने HRW के साथ लंबा वक़्त बिताया और उनके रोजाना के व्यवहार की गहरी समझ हासिल करने का मौका दिया।

 

 

असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में कई पुलिस अधिकारियों का थाने के बाहर और भीतर इंटरव्यू किया गया। दूसरे निचले अधिकारियों से उनके वरिष्ठों की मौजूदगी में बातचीत की गई। कुछ दूसरे छोटे अधिकारी, जो पुलिस स्टेशन के इंचार्ज हैं या वरिष्ठ अधिकारियों के सहायक या फिर जांचकर्ता हैं, उनसे भी चर्चा की गई। कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से पूर्व पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में बात की गई। इनमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व सदस्य भी शामिल हैं। HRW द्वारा जो कवरेज और दस्तावेज़ीकरण किया गया, वह बेहद विशाल और प्रभावित करने वाला है।

 

 

इस चर्चा में पुलिस द्वारा आरोपियों से ज़्यादती और उन स्थितियों पर विमर्श किया गया, जिनमें पुलिस को ज़्यादतियां करने पर मजबूर होना पड़ा।

 

 

रिपोर्ट में पता चला कि पुलिस का खराब व्यवहार गहरे तौर पर सांस्थानिक व्यवहार में छिपा हुआ है। सरकार द्वारा जवाबदेही तय करने और मौजूदा खराब आचरण करने वाले ढांचे में नाकामी से पुलिस के खराब व्यवहार को बल मिला। बहुत सारे मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है। इममें पुलिस द्वारा अपराधों की जांच न करना, गलत चार्ज पर गिरफ़्तारी, अवैध हिरासत, बुरा व्यवहार और अतिरिक्त न्यायिक हत्याएं शामिल हैं।

 

 

पहले तीन तरह की ज़्यादतियों के लिए वंचित तबके खासतौर पर संवेदनशील हैं। पुलिस की ज़्यादतियों का उत्पाद असुरक्षा है, यह ज़्यादतियां कई चीजों से नियंत्रित होती हैं, जैसे- रिश्वत देने की हैसियत, सामाजिक दर्जे और राजनीतिक संबंधों, ज़्यादतियों का स्त्रोत्, पुलिसिया ढांचे की खस्ता हालत, राजनीतिक हस्तक्षेप और रुके हुए सुधार, शिकायत दर्ज ना करना और जांच ना करना, अवैध हिरासत, पुलिस टॉर्चर, अतिरिक्त न्यायिक हत्याओं के लिए सजा न मिलना और पुलिस की जवाबदेही के बीच में बाधाएं।

 

इस रिपोर्ट समेत दूसरी रिपोर्टों से उस तरह के सुधारों के ख़तरे पता चलते हैं, जिनमें पुलिस को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त कर पुलिस की जनता के प्रति जवाबदेही तय नहीं होती। 2006 में प्रकाश सिंह केस में सुप्रीम कोर्टके फ़ैसले से भी पुलिस को गंभीर दुर्व्यवहार के लिए जो संरक्षण प्राप्त है, उसे भी नहीं छुआ गया। यह संरक्षण सीपीसी के सेक्शन 197 के तहत दिया गया है। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी भी सुधार एजेंडे में निचले दर्जे के पुलिसकर्मियों की रहने और काम करने की स्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह लोग अकसर ही ज़्यादतियों को अंजाम देने वाले होते हैं, इसकी वजह इनका अपने वरिष्ठ के निर्देश के मुताबिक काम करना या फिर मौजूदा पुलिस तौर-तरीकों में ढला होना होता है।

 

 

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को पुलिस शिकायत प्राधिकरण गठित करने का निर्देश दिया है, ताकि पुलिस के गलत व्यवहार की शिकायत की जा सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकारों के उल्लंघन के प्रति पुलिस को किसी तरह के सुरक्षात्मक उपाय अपनाने के लिए नहीं कहा। एक तरफ पुलिस की कार्रवाई पर राजनीतिक प्रभाव खत्म करने के लिए कानून बदलने की जरूरत है, तो दूसरी तरफ यह जरूरी है कि पुलिस पर राजनीतिक नियंत्रण को पुलिस की जनता के प्रति जवाबदेही से बदला जाए।

 

 

रिपोर्ट में पुलिस द्वारा कुछ राज्यों की गई कुछ अतिरिक्त न्यायिक हत्याओं का अध्ययन शामिल है। रिपोर्ट पुलिस की जनता के प्रति जवाबदेही तय करने में बाधाओं को बताती है। कई ज़्यादतियों और आधिकारिक एजेंसियों द्वारा उनमें की गई जांच का विश्लेषण करने पर HRW ने पाया कि अब भी पुलिसकर्मियों को उनके कारनामों के लिए सजा नहीं मिलना बहुत सामान्य है। ज़्यादातर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन ही नहीं किया गया। पुलिस की आंतरिक जांच में एक किस्म की अनबोली शांति का नियम होता है, जिसके ज़रिए सबूतों को सार्वजनिक होने से रोका जाता है।

 

 

पुलिस द्वारा प्रताड़ना या डराने-धमकाने की शिकायत करना मुश्किल होता है, क्योंकि किसी भी शख़्स को शिकायत करने के लिए उसी थाने में जाना होगा, जहां उसके साथ गलत व्यवहार हुआ था। पुलिस को अपराधों के लिए सजा देने में CRPC का सेक्शन 197 बड़ी बाधा है, इस सेक्शन के तहत पुलिस वालों पर कार्रवाई करने के लिए पहले सरकारी अनुमति की जरूरत होती है। राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार आयोगों के क्रियाकलापों में भी बहुत से अवरोधक हैं।

 

लेखक की अंतर्दृष्टि

– कानून के राज पर कितनी ही भाषणबाजी के बावजूद, मानवाधिकारों की सुरक्षा और उन्हें प्रोत्साहन के लिए संवैधानिक प्रावधानों और संस्थानों की मौजूदगी के बावजूद यह तथ्य है कि पुलिस एक सरकारी विभाग है, जिसमें व्यवहारिक तौर पर थोड़ी-बहुत ही स्वायत्ता है।

 

 

– जैसा डेविड अर्नाल्ड ने अपनी किताब, ”पुलिस पॉवर एंड कॉलोनियल रूल, मद्रास, 1859-1947” में बताया है- भारतीय पुलिस का मौजूदा ढांचा आयरिश औपनिवेशक अर्द्धसैनिक पुलिस ढांचे पर आधारित है, जिसमें खास तरह के उपाय राजनीतिक प्रतिरोध को तोड़ने के लिए जोड़े गए थे। यह किताब OUP ने 1986 में प्रकाशित की थी। इस तथ्य को ध्यान में रखें तो पाएंगे कि पुलिसिया व्यवस्था का ध्यान अपराध और उसकी जांच पर नहीं है।

 

 

– भारतीय दंड संहिता, अपराध प्रक्रिया संहिता और पुलिस कानून-1861, यह सभी औपनिवेशिक दौर में राज्य की सुरक्षा, जनव्यवस्था को बरकरार रखने और राजनीतिक गुप्त सूचनाएं हासिल करने के उद्देश्य के साथ बनाए गए थे। इन्हें बनाने के पीछे मानवीय सुरक्षा और सेवा प्रावधान आधार नहीं थे।

 

 

– भारत जैसे बड़े देश को देखते हुए HRW रिपोर्ट के नमूनों (सैंपल) का आकार छोटा है।

 

 

– पुलिस के विकेंद्रीकरण और लोकतांत्रिकरण के साथ पंचायती राज संस्थानों को पुलिस पर नज़र रखने वाले मुद्दे को संबोधित करने की जरूरत है।

 

 

– जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत, मध्य जनजातीय इलाके जैसे इलाकों में रहने वाले आम लोगों के बड़े हिस्से को बेहद दबाव वाले कानूनों के तहत रहने पर मजबूर होना पड़ता है, जिनमें मानवीय आत्मसम्मान पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इस मुद्दे को भी हल करने की जरूरत है।

 

 

– एक ऐसा इंटेलीजेंस सिस्टम, जो राज्य और जनव्यवस्था की सुरक्षा करता है, पर मानवाधिकारों को नजरंदाज करता है, उसे भी ठीक किए जाने की जरूरत है।

 

 

– जैसा दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की कानून व्यवस्था पर जारी रिपोर्ट (SARC, जून, 2017) में सुझाव दिया गया है, पुलिस संगठन को जांच, कानून व्यवस्था और स्थानीय पुलिस के तौर पर तीन हिस्सों में बांटने की जरूरत है।

 

 

– कानून-व्यवस्था बनाए रखने में IAS और IPS जैसी अखिल भारतीय सेवाओं की भूमिका पर फिर से विश्लेषण करने की जरूरत है।

 

 

भारतीय राजनीति में पुलिस द्वारा मानवाधिकार उल्लंघनों पर जवाबदेही न होना और संबंधित पुलिसकर्मियों को सजा ना मिलना एक बड़ा मुद्दा बन गया है (The Little Magazine, Impunity: Getting Away with Murder, Part I: Essays, 2010)। तेलंगाना से लेकर पंजाब के गांवों तक, पश्चिम बंगाल से तमिलनाडु तक, पूर्वोत्तर से गुजरात तक, हर जगह भारतीय पुलिस ढांचे में अपराध से निपटने की प्रक्रिया में सजा से सुरक्षा का अब बड़ा हिस्सा हो चुका है। हिंसक राजनीतिक असहमतियों में भी ऐसा ही है। जैसे-जैसे प्रशासन का लोकतांत्रिक हिस्सा कमज़ोर होता जाता है, वैसे-वैसे कानून व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों को गलत व्यवहार के लिए सजा से सुरक्षा बढ़ती जाती है। एक सुचारू लोकतंत्र में यह दंड मुक्ति फली-फूली है।

 

 

भारत में जारी आततायी जाति व्यवस्था, जो पिछड़ों, जनजातियों और दलितों पर अत्याचार करती है, उसने अपने आपको पश्चिमी तौर-तरीकों वाले उदारवादी लोकतंत्र में बदल लिया है, जैसा केजी कन्नाबिरन ने अपनी किताब, ”The Wages of Impunity: Power, Justice, and Human Rights” में बताया है, इससे ”संसदीय फासिज़्म” का उद्भव हुआ है।

 

 

कई सारे विशेष कानूनों को पारित किया गया, जैसे- POTA, UAPA, TADA, AFSPA। जैसा ”दिल्ली सॉलिडेरिटी ग्रुप” ने 2009 में कहा, इन कानूनों ने अपना लक्ष्य तो हासिल नहीं किया, लेकिन इनका इस्तेमाल अकसर सुरक्षाबल गलत आचरण के लिए करते हैं।

 

 

आंध्रप्रदेश में राजनीतिक विरोधियों की हिरासत में हत्या तो प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बन गया था। 1996 से 2001 के बीच हर साल ऐसे ही 200 राजनीतिक विरोधियों की ‘फर्ज़ी’ मुठभेड़ में हत्या की गई। मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील के बालागोपाल अपने चयनित लेखों में इसे ”कॉम्बेट लॉ” के तौर पर बयां करते हैं, इसके तहत ”पहले किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जाता, फिर अतिरिक्त न्यायिक तरीके से उसकी हत्या कर दी जाती है। तब दावा किया जाता है कि संबंधित शख्स पुलिस के साथ शूटिंग में मारा गया।” जम्मू-कश्मीर में AFSPA के तहत सुरक्षाबलों को राजनीतिक असहमतियों को दबाने के लिए दंड-मुक्ति मिली हुई है। पंजाब, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, गुजरात और उत्तरपूर्व में फर्जी मुठभेड़ में हत्याएं बहुत सामान्य हैं।

 

 

”दिल्ली सॉलिडेरिटी ग्रुप” की एक तथ्य जांचने और खोजने वाली टीम ने 2009 में पाया कि पूर्वोत्तर के छोटे से राज्य में मणिपुर में स्थानीय पुलिस कमांडोज़ ने 2009 के शुरुआती 6 महीनों में ही 260 लोगों को मिलिटेंट करार देकर मार दिया। 2008 में इस तरह जान गंवाने वालों की कुल संख्या 300 थी। राज्य में बड़े स्तर का सैन्यकरण किया गया है, वहां राज्य, सेना और अर्द्धसैनिक बलों की 60 से ज़्यादा बटालियन तैनात हैं। इसके अलावा नागरिक पुलिस भी फिलहाल जारी मिलिटेंसी से निपटने के लिए लगाई गई है।

 

 

गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों की पृष्ठभूमि में कुछ लोगों को लगता है कि भारत में कानून का शासन सिर्फ तभी जिंदा रह सकता है, जब पुलिस बलों द्वारा ज्यादतियों की दशा में उन्हें दंड दिए जाने के लिए सफलतापूर्व जनकार्रवाई की जाए। ऐसा कर आम लोगों के लिए सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकार हासिल किए जा सकेंगे। The Little Magazine, Impunity: Getting Away with Murder, Part I: Essays, 2010)।

 

 

अंत में-

ब्रिटिश औपनिवेशक शासकों ने भारतीय पुलिस व्यवस्था को आर्मी के सस्ते विकल्प के तौर पर विकसित किया था। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में ब्रिटिश राज्य को बरकरार रखना था। अपराध पर नियंत्रण पुलिस की दूसरी प्राथमिकता थी, जिसे केवल पुलिस के डर से ही हासिल किया जाना था। यह आनंदस्वरूप गुप्ता के निबंध, ”लॉ एंड ऑर्डर इन अ डेमोक्रेटिक सोसायटी” में बताया गया है, इस निबंध को एस वी राव ने ”पर्सपेक्टिव इन क्रिमनोलॉजी सीरीज़, 1988” के लिए संबोधित किया है।

 

 

IPC, CrPC और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को ब्रिटिश सरकार ने उस कानूनी ढांचे के तहत लागू किया था, जिसमें ताकत के दम पर पुलिस को ब्रिटिश व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सक्षम किया गया था। IPC में राज्य और कानून-व्यवस्था के खिलाफ अपराधों को प्राथमिकता दी गई है। इसमें पारंपरिक अपराधों की शुरुआत चेप्टर XVI के सेक्शन 299 से होती है। इसी तरह CrPC में कानून और शांति व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है, इसके बाद ही इसमें जांच और अपराध की खोजबीन पर कुछ विचार किया जाता है। पुलिस कानून में जन व्यवस्था पर असर डालने वाले सूचना संचार को हासिल और इकट्ठा करने पर जोर दिया गया है। अपराध को रोकने और उसकी खोज करने वाली धाराएं इस कानून में सेक्शन 23 से ही शुरू होती हैं। यह कानून IPC और CrPC से काफ़ी छोटा है (गुप्ता, 1988)।

 

 

स्वतंत्रता के बाद इस पिछड़े ढांचे को ही अपनाया और मजबूत किया गया। 1947 में सीआरपीएफ एक छोटी सी फोर्स हुआ करती थी। गृहमंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2005-06 के मुताबिक़, 2006 तक इसमें शामिल सुरक्षाबलों की संख्या 2,46,689 पहुंच गई। कुछ दूसरे अर्द्धसैनिक बल भी हैं, उन सभी को जोड़कर कुल संख्या दस लाख के पार चली जाती है। नए कानून भी आए, लेकिन उनमें भी राज्य और कानून-व्यवस्था की सुरक्षा सर्वोच्च थी, जबकि अपराध नियंत्रण और जनसेवा बाद का मुद्दा था।

 

 

IPC में राज्य और कानून-व्यवस्था के खिलाफ अपराधों को प्राथमिकता दी गई है। इसमें पारंपरिक अपराधों की शुरुआत चेप्टर XVI के सेक्शन 299 से होती है। इसी तरह CrPC में कानून और शांति व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है, इसके बाद ही इसमें जांच और अपराध की खोजबीन पर कुछ विचार किया जाता है। पुलिस कानून में जन व्यवस्था पर असर डालने वाले सूचना संचार को हासिल और इकट्ठा करने पर जोर दिया गया है। अपराध को रोकने और उसकी खोज करने वाली धाराएं इस कानून में सेक्शन 23 से ही शुरू होती हैं। जैसा गुप्ता बताते हैं, यह कानून IPC और CrPC से काफ़ी छोटा है।

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