क्राइम्स

वर्दी की हनक और सत्ता की सनक ने मध्य प्रदेश के एक किसान परिवार को बर्बाद कर दिया!

वर्दी की हनक और सत्ता की सनक ने मध्य प्रदेश के एक किसान परिवार को बर्बाद कर दिया!

 
मध्य प्रदेश के गुना में अतिक्रमण हटाने के नाम पर पुलिस ने किसान की खड़ी फसल को उजाड़ना शुरू कर दिया। पीड़ित दलित दंपती ने खड़ी फसल को नष्ट करने से बचाने के लिए सरकारी अधिकारियों व पुलिस के सामने ही कीटनाशक पी लिया। दंपती का इस वक्त इलाज चल रहा है।

 

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सच के साथ|वर्दी की हनक और कमजोरों की याचना के बीच आप किसका पक्ष चुनेंगे? पुलिस वालों के डंडे और अपनी जमीन बचाने के लिए लड़ रहे परिवार के बीच आप किसका पक्ष चुनेंगे? प्रशासन की तानाशाही और कीटनाशक जहर खाकर मरने की कोशिश कर रहे दंपति के बीच आप किसका पक्ष चुनेंगे? किसी जमीन पर सरकार का कब्ज़ा और गरीब की उसी जमीन पर खेती के बीच आप किसका पक्ष चुनेंगे? अफसर की बात मानकर लाठी भांजने वाली पुलिस और अपने बच्चे को बचाने के लिए लाठी खाती अधेड़ उम्र की औरत के बीच आप किसका पक्ष लेंगे?

 

 

भविष्य में किसी जमीन पर सरकारी कॉलेज बनने की योजना और दो लाख रुपये का कर्ज लेकर खेती कर रहे दलित परिवार के बीच आप किसका पक्ष लेंगे? पुलिस वालों की जूतों की मार और मरने की हालात में पहुंच चुके बाप से लिपटकर रोते हुए बच्चों के बीच आप किसका पक्ष लेंगे? इस सवाल का जवाब आप तय कीजिये। आप तय कीजिये कि सच का पलड़ा किधर झुकना चाहिए? क्योंकि इस दौर की सबसे बड़ी लड़ाई यही है कि लोग सच देखकर भी सच की तरफ झुकना नहीं चाहते हैं? पावर की बेईमानी समझकर भी पावर की प्रकृति पर सवाल नहीं खड़ा करना चाहते हैं। कमजोरों की आसुंओं को देखकर उनके पक्ष में खड़ा नहीं होना चाहते हैं। और जो ऐसा करते है उन्हें देशद्रोही कहकर जेल की सलाखों में डाल दिया जाता है।

 

 

जिस तस्वीर को मैंने उकेरा है वह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। इस तस्वीर से जुडी घटना के बारें में न्यूज़क्लिक के मध्यप्रदेश के सहयोगी राजू कुमार ने बड़े तफ्सील से लिखा है। राजू कुमार लिखते हैं कि 14 जुलाई को मध्य प्रदेश के जिला गुना शहर से लगे कैंट थाना क्षेत्र के जगनपुर चक में सरकारी जमीन से कब्जा हटाने के लिए राजस्व अमले के साथ पुलिस गई थी। उस जमीन पर राजू अहिरवार ने फसल बोई है। जब नपाई के बाद सरकारी अमले ने फसल उजाड़ना शुरू किया, तो राजू अहिरवार और उसकी पत्नी ने विरोध किया।

 

 

उन्होंने अधिकारियों से कहा कि यह जमीन उसने गप्पू पारधी से बटाई पर लेकर फसल लगाई है। इसके लिए उसने 2 लाख रुपए का कर्ज लिया है। वह पहले से भी कर्जदार है। ऐसे में जब फसल अंकुरित हो गई है, तो फसल काटने तक उसे जमीन से नहीं हटाया जाए। फसल कट जाए, उसके बाद उसे हटाया जाए। लेकिन उसकी गुहार पुलिस ने नहीं सुनी।

 

 

जब परिवार विरोध करने लगा, तो प्रशासन ने जबर्दस्ती की तो राजू अहिरवार उसकी पत्नी सावित्री ने कीटनाशक पी लिया। पुलिस इसे नाटक समझती रही। बच्चे बेहोश महिला के पास रोते रहे। जब उसका भाई विरोध करने आया, तो पुलिस ने उस पर लाठियां बरसानी शुरू कर दी। इस बीच इस परिवार की महिलाओं के कपड़े तक फट गए। तहसीलदार के अनुसार परिवार ने महिला पुलिस के साथ बदसलूकी की, इसलिए सख्ती की थी। इस मामले में राजू और उसके परिवार पर पुलिस ने केस दर्ज किया है।

 

 

गुना की यह शासकीय जमीन कॉलेज के लिए आबंटित है। इस जमीन पर राजू अहिरवार ने खेती की है। उसका कहना है कि यह जमीन उसने गप्पू पारदी से बटाई पर ली है। इस जमीन पर सालों से पूर्व पार्षद गप्पू पारदी का कब्जा रहा है। जब जमीन कॉलेज के लिए आबंटित कर दिया गया, तो लगभग 8 महीने पहले उस पर से प्रशासन ने कब्जा हटाया था। लेकिन जब उस पर कोई काम शुरू नहीं हुआ, तो गप्पू ने उस पर फिर से कब्जा कर लिया और इसे बटाई पर राजू अहिरवार को दे दिया।

 

 

यह उक्त की घटना की शुरुआती पत्रकारीय छानबीन है। पूरा सच नहीं है लेकिन यह छानबीन भी बहुत सारे सवाल खड़ा करती है। किसी भी व्यक्ति के साथ अचानक से राजस्व विभाग पुलिस के साथ मिलकर ऐसा हमला कैसे कर सकती है? क्या राजस्व विभाग को पहले जमीन खाली करने का नोटिस नहीं देना चाहिए था? क्या कानून इसकी इजाजत देता है कि बिना नोटिस के जमीन खाली करवाई जाए? जब जमीन पर फसल बोई जा चुकी है और बटाईदार राजू अहिरवार यह गुहार लगा रहा है कि इस बार फसल छोड़ दी जाए, वह अगली बार खाली कर देगा, फिर भी पुलिस ने बर्बर रवैया क्यों अपनाया?

 

 

क्या राजू अहिरवार का परिवार अगर अमीर परिवार होता, सत्ता के रसूख से जुड़ा हुआ परिवार होता फिर भी पुलिस वाले यही रवैया अपनाती? कहने के लिए तो यह भी कहा जा सकता है कि कोरोना के काल में गरीबों के साथ ऐसा सलूक नहीं करना चाहिए था लेकिन क्या सरकारी नौकरों को सामान्य दिनों में भी ऐसा करने का हक मिलना चाहिए? अगर जमीन 8 महीने से खाली है तो जमीन का मालिक क्यों न समझे कि जमीन को कुछ समय के लिए दूसरी तरह से भी इस्तेमाल किया जा सकता है?

 

 

क्या राजस्व विभाग की पहली बातचीत जमीन के मालिक से नहीं होनी चाहिए थी? फसल अचानक तो बोई नहीं गयी होगी? अगर फसल अंकुरित हो चुकी है तो यह कहाँ से जायज प्रसाशनिक कदम लगता है कि फसल पर जेसीबी चलवाकर जमीन कर लिया जाए? क्या अफ़सरों ने संविधान, नियम, कानून की पढ़ाई नहीं की है या अफसरों ने भाड़े के गुंडों की तरह हरकरत की है?

 

 

इन सवालों का क्या जवाब है? क्या आपको ऐसे मुद्दों में एक तरह की बीमारी नजर नहीं आती? एक ऐसी बीमारी जो आजादी के बाद से लेकर अब तक चली आ रही है? क्या अफसरों में पावर की बीमारी, पुलिस में वर्दी के हनक की बीमारी, इंसानों में अपने से कमजोर लोगों को निर्जीव समझने की बीमारी इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं? क्या यह केवल किसी को सस्पेंड करने मात्र से सुधर जाएगी?

 

 

निर्मल चंद्र अस्थाना केरल के डीजीपी रह चुके हैं। निर्मल चंद्र अस्थाना ने ट्वीट कर इस मुद्दे पर लिखा कि पुलिस पर आत्महत्या के लिये उकसाने का केस चले। ग़रीब आदमी खेती ही किया था, कोई बिल्डिंग नहीं बनाया। सारा क़ानून ग़रीब के लिये ही है? कब्ज़े की मल्टीस्टोरी बिल्डिंगें हाईकोर्ट के आदेश पर ही गिरती हैं। फिर पुलिस को पीटने का अधिकार किसने दिया? शासन ग़रीब के लिये कितना संवेदनहीन है! यह मसला मानव अधिकार आयोग द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर उठाया जाना चाहिए। लेकिन इस समय देश की कई संस्थाओं की तरह मानव अधिकार आयोग भी बर्बाद हो चुका है।

 

 

राजू अहिरवार का परिवार दलित समुदाय से आता है। इसलिए कोई चाहे या ना चाहे भारत जैसी सामाजिक स्थिति में इस मुद्दे से दलित उत्पीड़न का दृष्टिकोण भी जुड़ जाता है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि राजू अहिरवार के परिवार की दीन हीन स्थिति को देखकर और दलित समुदाय से नाते को जानकर पुलिस का मन पसीजा नहीं बल्कि बर्बर रवैया अपनाने के लिए और अधिक उतारू हो गया।

 

 

निर्मल चंद्र अस्थाना ही द वायर के लेख में लिखते हैं कि इस प्रकार के भेदभावपूर्ण अत्याचार का समाजशास्त्रीय कारण सीधा-सा है। पुलिस को मालूम है कि राजनीतिक और प्रायः आर्थिक रूप से भी कमजोर लोगों के पक्ष में थोड़ा-बहुत तात्कालिक विरोध प्रदर्शन भले हो जाए, ऐसा मुश्किल से ही होता है कि उनके केस अंत तक लड़े जा सकें और दोषी पुलिस वालों को सजा दिलवाई जा सके।

 

 

पुलिस शक्तिमान की चेरी होती है। स्थानीय राजनीति और शक्ति-समीकरणों में जो ताकतवर होता है पुलिस उसके इशारे पर किसी भी कमजोर वर्ग या जाति को सताने को तत्पर रहती है।

 

इस घटना से जुड़े तस्वीरों में एक तस्वीर यह भी दिख रहे हैं। जहां बच्चें अपने मरने के हालात में पहुंच चुके पिता के बाहों में लिपटकर सुनसान आसमान की तरफ देखते हुए रो रहे हैं। इस तस्वीर को देखकर किसी को अपने होने पर शर्म आ सकती है।

 

 

पांडेय राकेश भारत के प्रसाशनिक अधिकारियों को ट्रेनिंग देने के काम से जुड़े हैं। पांडेय राकेश बच्चों से जुड़े इस विशेष पहलू पर लिखते हैं कि किसी छोटे बच्‍चे के सामने उसकी मां या पिता को उसका कोई अन्‍य परिचित भी मात्र ऊंचे स्‍वर में बोल देता है तो उतने से ही बच्‍चे के दिल में एकबारगी एक चोट पहुंचती है। गुना के इन बच्‍चों के मां-बाप के साथ सम्‍मानपूर्वक व्‍यवहार तो दूर की बात है, उन्‍हें घोर अपमानित किया गया और बेरहमी से मारा-पीटा गया, और बच्‍चों की नजर के सामने मां-बाप ने जान देने का प्रयास किया। उन बच्‍चों के मन पर जीवन भर के लिए जो खरोच लग गया उसके लिए क्‍या जवाबदेही तय नहीं की जानी चाहिए।

 

 

मैं यहां अपनी बात को बच्‍चों के अधिकार पर सीमित कर रहा हूं। उनके मां-बाप यानि उस किसान दंपत्ति के साथ जो गलत हुआ वह तो एक जरूरी प्रसंग है ही। उनका दलित होना उन्‍हें अधिक वलरिनेबल बनाता है, यह एक जरूरी संदर्भ है। पर, मैं अलग से बच्‍चों की बात को भी जरूरी समझ रहा हूं और वह करने का प्रयास कर रहा हूं। अगर थोड़ी देर के लिए यह मान भी लें कि किसान दंपत्ति के साथ कड़ाई जरूरी था, तब भी एक जिम्‍मेवार पुलिस व प्रशासन व्‍यवस्‍था बच्‍चों को पूरी संवेदनशीलता के साथ अलग ले जाती, और यह सुनिश्चित करती कि बच्‍चों की नज़र के सामने उनके मां-बाप प्रताडि़त होते न दिखें।

 

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किसान दंपत्ति पर बेरहमी बरतने और उनकी मेहनत की फसल को नष्‍ट करने का आदेश देने वाला वरिष्‍ठ प्रशासनिक अधिकारी हो, या लाठियां भाजने वाले पुरुष और महिला पुलिस कर्मी- ये लोग कम्‍पीटिशन की तैयारी में मानवाधिकार आदि प्रसंगों को कुंजी बनाकर रटते तो हैं – पर इनसे भी मानवाधिकारों के वास्‍तविक समझ और संवेदना की उम्‍मीद नहीं की जा सकती। मां- बाप को पीटते वक्‍त रोते बिलखते इन बच्‍चों की भावनात्‍मक उपस्थिति का न तो इन्‍हें भान हुआ और न ही इन्‍होंने उनके लिए कोई जवाबदेही समझी।

 

 

सरकार में बैठे शीर्षस्‍थ लोगों के लिए डर का वातावरण बनाए रखना अगर एक जरूरी शासन- कला है, तो हमारा काम डर के विरूद्ध प्रतिरोध को बनाए रखना होना चाहिए। मानव के पास मात्र मानव होने के आधार पर जो अधिकार हैं उसकी समझ और संवेदना इसका एक जरूरी प्रसंग है।

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