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देश में मंदिरों के मालिकाना हक को लेकर कुछ जरूरी सवाल!

देश में मंदिरों के मालिकाना हक को लेकर कुछ जरूरी सवाल!

 
केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रशासन और उसकी संपत्तियों के अधिकारी को लेकर 13 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया और मंदिर के प्रबंधन का अधिकार त्रावणकोर के पूर्व शाही परिवार को दिया है।

 

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सच के साथ|इतिहास को सपाट तौर पर समझने वाले कहेंगे कि मंदिर राजाओं ने बनवाई थी। लेकिन असलियत यह है कि कर के रूप में मंदिर बनवाने के लिए पैसे जनता से वसूले जाते थे। मंदिरों में मजदूरी का काम जनता ने किया था। दान-दक्षिणा जनता दिया करती थी। यही दान दक्षिणा राजा के राज्य का राजस्व का भी हिस्सा हुआ करता था।

उस समय राजाओं द्वारा समाज के बने बनाए ढांचे में रहते हुए जनहित के कामों में भी इस राजस्व का इस्तेमाल किया जाता था। यानी भारतीय समाज के इतिहास में मंदिर केवल सभ्यता के प्रतीक नहीं हैं बल्कि सभ्यता के इतिहास में मौजूद अर्थतंत्र को गढ़ने में भी उनकी अहम भूमिका रही है। यह सब होते हुए भी मंदिरों पर मालिकाना अधिकार राजाओं का ही हुआ करता था। लेकिन यह तो राजतांत्रिक ढांचे में मौजूद मंदिरों की बात थी।

लेकिन अब लोकतांत्रिक ढांचे में चल रहे समाज के लिए कहीं से भी यह सही नहीं है कि मंदिर जैसे सार्वजनिक प्रतिष्ठान पर राजा या राजा के उत्तराधिकारी या किसी एक व्यक्ति का हक हो। भारतीय संविधान द्वारा गए नियम-कानून ने भी भारत में मौजूद किसी भी मंदिर के लिए यही फार्मूला अपनाया है।

लेकिन भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अभी हाल में ही केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर के मामले में इसके उलट फैसला सुनाया है। श्री मार्तंड वर्मा बनाम केरल राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने केरल हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया। साल 2011 में केरल हाई कोर्ट का फैसला था कि श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रबंधन और नियंत्रण में त्रावणकोर रॉयल फैमिली यानी त्रावणकोर राजघराने की कोई भूमिका नहीं होगी।

9 साल बाद जाकर अब सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है कि कस्टमरी लॉ यानी परंपरागत कानूनों के मुताबिक अंतिम शासक के मर जाने के बाद भी मंदिर के शेबाइट राइट्स यानि वित्तीय प्रबंधन से जुड़ा अधिकार अंतिम शासक से जुड़े परिवार के पास रहता है। इस तरह से पद्मनाभस्वामी मंदिर के वित्तीय प्रबंधन की भूमिका रॉयल फैमिली को सौंपी जाती है।

जानकारों का कहना है कि साल 1971 में जब संविधान के 26वें संशोधन से सभी तरह के रॉयल टाइटल यानी राजघराने के अधिकार को खत्म कर दिया गया था तो सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फैसला क्यों सुनाया? यह फैसला कई तरह के विरोधाभास को पैदा कर रहा है। जब रॉयल टाइटल ही नहीं तो रॉयल फैमिली कहां से होगी? जब रॉयल फैमिली ही नहीं रही तो मंदिर का अधिकार किसी रॉयल फैमिली से जुड़े हुए परिवार को कैसे दिया जा सकता है?

बनारस हिन्दू विश्वविधालय के फैकल्टी ऑफ़ लॉ के प्रोफेसर निरंजन भी यही कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अटपटा लगता है। जब 26वें संविधान संशोधन से प्रिवी पर्स को खत्म कर दिया गया था। तब यह फैसला क्यों आया है? इस केस के इतिहास को देखा जाए तो पता चलता है पूर्व सीएजी विनोद राय की अध्यक्षता में इस मंदिर की संपत्ति पता लगाने की कमेटी बनी थी। इस कमेटी द्वारा सौंपे गए रिपोर्ट के आधार पर सीनियर एडवोकट और इस मामले में अमियूक्स क्यूरी कोर्ट मित्र गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा था कि मंदिर की संपत्ति की बहुत ही सांगठनिक तरीके से चोरी की जा रही है। मंदिर को रॉयल फैमिली के प्रबंधन से मुक्त करना चाहिए।

पद्मनाभस्वामी मंदिर से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए सबसे पहले संक्षिप्त तौर पर पद्मनाभस्वामी मंदिर का इतिहास समझ लेते हैं। इतिहासकारों का कहना है कि पद्मनाभस्वामी मंदिर का हालिया प्रारूप 10 वीं शताब्दी का बनाया हुआ लगता है। लेकिन इस मंदिर का जिक्र तीसरी शताब्दी के आसपास संगम साहित्य में मिलता है। यानी यह मंदिर तकरीबन सत्रह सौ साल पुराना है।

केरल के तिरुवनंतपुरम में मौजूद यह मंदिर विष्णु के उपासकों से जुड़ा हुआ मंदिर है। द्रविड़ स्थापत्य कला का शानदार नमूना है। आजादी से पहले इस मंदिर पर त्रावणकोर राजघराने का राज चला करता था। साल 2011 में इस मंदिर में मौजूद कुछ तहखाना को खोला गया तो यह मंदिर चर्चा में आया। जब कुछ तहखानों के दरवाजे को खोला गया तो उनसे इतनी अधिक संपत्ति निकली जिसे गिनने मे साल भर से अधिक का समय लग गया। अभी तक सरकार ने इस मंदिर से निकले हीरे, मोती, सोना, चांदी जैसे बेशकीमती पत्थरों की कीमत तय नहीं की है।

विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका फोर्ब्स का आकलन है कि पद्मनाभस्वामी मंदिर दुनिया का सबसे अमीर मंदिर है। इसमें तकरीबन 75 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति मौजूद है। यानी की भारत के मौजूदा साल के बजट से देखा जाए तो तकरीबन चार गुना अधिक की संपत्ति। इसके अलावा अभी भी पद्मनाभस्वामी मंदिर के कई दरवाजे बंद है। इन दरवाजों को खोला नहीं गया है। वजह यह कि लोगों का कहना है कि अगर मंदिर में मौजूद इन तहखाना को खोल दिया जाएगा तो दुनिया को भयंकर तबाही का सामना करना पड़ सकता है।

 

 

यानी आस्था के नाम पर अभी भी पद्मनाभस्वामी मंदिर के कुछ दरवाजे बंद हैं। इस इतिहास से यह बात तो साफ है कि श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर एक सामान्य मंदिर नहीं है बल्कि अपने भीतर मौजूद संपत्ति की वजह से एक असाधारण मंदिर है। इसलिए इस मंदिर पर मालिकाना हक की लड़ाई केंद्र, राज्य और रॉयल द्वारा लड़ी गयी तो इसमें अचंभित होने वाली बात नहीं है। इस सवाल का जवाब तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दे दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस मंदिर के वित्तीय प्रबंधन का अधिकार रॉयल फैमिली से जुड़े हुए लोगों को मिल चुका है। लेकिन इसके साथ सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिशा-निर्देश भी दिए हैं। जिसका संबंध मंदिर के प्रशासन से जुड़ा हुआ है। इस दिशा निर्देश के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाने को कहा है।

इस कमेटी में सभी पक्षकारों जैसे कि राज्य का सदस्य, केंद्र सरकार का सदस्य, रॉयल फैमिली का सदस्य, न्यायालय का सदस्य मौजूद होंगे। मंदिर के वित्तीय प्रशासकीय प्रबंधन में इस कमेटी की भी भूमिका होगी। लेकिन अंततः सवाल यही है कि कोर्ट ने मंदिर को राज्य की संपत्ति क्यों नहीं कहा? और उसे आखिरकार रॉयल फैमिली की संपत्ति क्यों माना। लोकतंत्र में सार्वजनिक संपत्ति को लेकर राजाओं के हक में फैसला क्यों किया गया? अब इसका जवाब पता नहीं। पता नहीं कि आखिर कर सुप्रीम कोर्ट ने कौन सी दूर दृष्टि अपनाकर यह फैसला लिया है?

इस सवाल के जवाब पर रौशनी डालते हुए इंडियन एक्सप्रेस में प्रताप भान मेहता लिखते हैं, ‘ श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का फैसला केवल इसी मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसका व्यापक राजनीतिक फैलाव होगा। कई लोग बहुत लंबे समय से यह तर्क देते आ रहे हैं कि हजारों मंदिरों को राज्य के मालिकाना अधिकार से छुटकारा मिल जाना चाहिए। इसमें सबसे अधिक मंदिर दक्षिण भारत के शामिल हैं। उन्हें यह भी लग रहा है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल उनकी रायशुमारी के लिए पका हुआ समय है। श्री पदमनाभस्वामी मंदिर का फैसला भी ऐसे ही लोगों के पक्ष में आया है। मंदिरों का मालिकाना अधिकार राज्य के हाथ से निकाल कर प्राइवेट हाथ में रख दिया गया।

वो आगे लिखते हैं कि कुछ लोग कहते हैं कि राज्य द्वारा मंदिरों को कई सरकारी डिपार्टमेंट द्वारा चलाया जाना राज्य के सेकुलर स्टेटस के खिलाफ है। एक सेकुलर राज्य को ऐसा नहीं करना चाहिए। हिंदुत्व के पक्ष में नैरेटिव गढ़ने वाले लोग भी राज्य द्वारा किए जा रहे इस काम को हिंदुओं के उत्पीड़न की तरह दिखाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। जबकि राज्य द्वारा संभाले जा रहे किसी भी मंदिर में किसी भी तरह की हिंदू आस्था और धार्मिक पूजा को रोका नहीं जाता है। फिर मंदिर पर किसका अधिकार होगा यह सवाल एक पहेली की तरह बना रहता है। लेकिन यहीं पर भारतीय राज्य के मंदिरों के संबंध में सेकुलर स्टेटस को समझना चाहिए। राजाओं के जमाने में राजा मंदिर को प्रशासित करते थे और मंदिर से जुड़ा वित्तीय प्रबंधन का रखरखाव करते थे। जबकि धार्मिक पहलू पूरी तरह से पुजारियों के हक में था।

मेहता लिखते हैं कि ठीक है ऐसे ही मंदिरों के मामले में लोकतांत्रिक समाज में राज्य का चरित्र है। सेकुलर स्थिति को अपनाते हुए राज्य केवल मंदिरों से जुड़े सेकुलर हिस्से पर ही अपना प्रभुत्व रखता है, धार्मिक हिस्से अभी भी उस धर्म के लोग ही संचालित करते हैं। मंदिर के धार्मिक हिस्सों पर राज्य का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। इसलिए यह कहा जाना बिल्कुल गलत है कि राज्य द्वारा हिंदुओं का उत्पीड़न हो रहा है। जिस तरह से हिंदुओं ने अपनी संप्रभुता राजाओं को सौंपी थी ठीक उसी तरह से लोकतांत्रिक समाज में हिन्दू या किसी भी धर्म की संप्रभुता राज्य को सौपी गयी होती है। इसलिए राज्य द्वारा मंदिर के प्रशासन और वित्तीय प्रबंधन में हस्तक्षेप करना कहीं से भी हिंदुओं का उत्पीड़न नहीं है बल्कि एक सार्वजनिक संस्था यानी पब्लिक इंस्टीटूशन पर ऐसा मालिक का हक है जिसका चुनाव सर्वजन यानी पब्लिक करती है।

 

 

मंदिरों के साथ एक और बात है। मंदिर केवल रजवाड़े के केंद्र नहीं थे या केवल धार्मिक आस्था से जुड़े हुए मसले नहीं हैं। बल्कि मंदिरों के पास अकूत धन संपदा और जमीन हुआ करती थी और अब भी है। इतिहास की किताबें पढ़ी जाए तो साफ दिखता है कि मंदिर राजस्व का जरिया हुआ करते थे। साथ में मंदिरों के जरिये समाज को नियंत्रित भी किया जाता था। मंदिर समाज के अंदर बने रहने और समाज से बाहर निकाले जाने के नियम कानून तय करते थे। मंदिर में आना जाना विशेष अधिकारों का मसला था।

अभी भी कई ऐसे मंदिर हैं जहां ना तो निचली जातियों को घुसने दिया जाता है और ना ही औरतों को प्रवेश मिलता है। खुद श्री पदमनाभास्वामी मंदिर में आजादी के बाद तक निचली जातियों के लोगों की एंट्री नहीं होती थी। राज्य मंदिरों में मौजूद इस तरह की व्यवस्थागत खामियों के साथ मंदिरों द्वारा अपनाई जाने वाली भेदभाव की व्यवस्था को दूर करने का काम करता है। मंदिरों को अपने नियंत्रण में लेकर राज्य मंदिरों के विशेषाधिकार को खत्म करता है। मंदिरों को एक लोकतांत्रिक सिस्टम में ढालने की कोशिश करता है। जो लोग मंदिर से जुड़े इन खामियों को दूर नहीं करना चाहते हैं मंदिरों के विशेषाधिकार से खासा लगाव रखते हैं, वही मंदिरों के मालिकाना हक के संबंध में राज्य की भूमिका पर सवालिया निशान खड़ा करते रहते हैं।

हालांकि इस फैसले के बाद से डिबेट चल रही है कि मंदिर की संपत्ति पर हक किसका हो? प्राइवेट लोगों का या राज्य का। मंदिर की संपत्ति का इस्तेमाल कहां किया जाए जनहित में या किसी की निजी हित में।

लोकतांत्रिक समाज में इन सवालों को नैतिक परिप्रेक्ष्य में सोचा जाए तो जवाब आसान है कि जो सार्वजनिक है, उस पर जनता का हक है। जनहित का हक है। श्री पदमनाभास्वामी मंदिर के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भले मंदिर के प्रशासन के लिए एक कमेटी का बनाने का दिशा निर्देश दिया हो लेकिन मंदिर के वित्तीय प्रबंधन पर मालिकाना हक रॉयल फैमिली के नाम पर प्राइवेट हाथों में ही सौंपा है। इसलिए श्री पदमनाभास्वामी मंदिर का फैसला मंदिर के मालिकाना हक को लेकर धार्मिक रंग में डूबती जा रही मौजूदा भारतीय राजनीति के सामने ऐसा नजीर बन कर प्रस्तुत है जिसका भारतीय राजनीति अपने गलत फायदे के लिए इस्तेमाल करना बखूबी जानती है। मंदिरों की जगह भले ही अपने सबसे गहरे रूप में आस्था और पवित्रता की जगह हो लेकिन दुनिया की कड़वी हकीकत में यह भी राजनीति के गंदे तौर तरीकों से बच नहीं सकती है।

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