अखण्ड भारत

जब CIA और अमेरिकी सेना ने भारत में मच्छरों पर शोध किया

जब CIA और अमेरिकी सेना ने भारत में मच्छरों पर शोध किया

 
यह भले कितना ही अजीबो-ग़रीब लगे, लेकिन अमेरिकी एजेंसियां भारत में 1960 और 70 के दशक में संदेहास्पद प्रयोग कर चुकी हैं, जिनसे उस वक़्त भारत की जनता को बड़ा ख़तरा पैदा हो गया था।

 

सच के साथ|जैसे-जैसे दुनिया पर कोरोना महामारी की चपेट मजबूत होती जा रही है, वैसे-वैसे इसके पैदा होने और फैलने की षड्यंत्र व्याख्याएं भी तेजी से सामने आ रही हैं। चमगादड़ खाने से लेकर वुहान की लेबोरेटरी में गुप्त जैविक युद्धप्रणाली संबंधी खोज, 5G सेलुलर नेटवर्क समेत दुनियाभर की षड्यंत्र व्याख्याएं कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर सामने आई हैं। इस तरह की षड्यंत्र व्याख्याएं बहुत तेजी से फैलती हैं, ऊपर से कोरोना से संबंध ने इन्हें और पर लगा दिए हैं। इन कथित व्यख्याओं में से ज़्यादातर को वैज्ञानिक तरीकों से खारिज़ कर दिया गया है। लेकिन कुछ ऐसे मामले भी हैं, जहां इस तरह की व्याख्याएं सही साबित हुई हैं।

भले ही यह सुनने में कितना भी अजीब लगे, पर भारत में 1970 के दशक में कुछ ऐसे प्रयोग किए गए, जो जनस्वास्थ्य के लिए बहुत ख़तरनाक थे। बता दें यह कोई षड्यंत्र व्याख्या नहीं थी, बल्कि सच्चाई थीं।

इन प्रयोगों में “कीटाणु युद्धप्रणाली (जर्म वॉरफेयर) के अंतर्गत मच्छर की नई प्रजातियों पर शोध शामिल था। एक दूसरे प्रयोग में ऑस्ट्रेलिया से शराब बनाने वाले हॉप प्लांट मंगाए गए, जो पहले से कीणों से संक्रमित थे। यह फ़सलों और पौधों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते थे। जबकि उस वक़्त तक यह हॉप प्लांट भारत में उपलब्ध नहीं थे। फिर एक अलग प्रयोग में पूर्वोत्त्तर में वायरस ले जा सकने वाले पक्षियों का प्रवास करवाया गया।”

कीटाणु युद्धप्रणाली से संबंधित और जल्दबाजी में किए जा रहे इन प्रयोगों को लेकर, वैज्ञानिक समुदाय और दूसरे लोगों, जिनमें संसद सदस्य भी शामिल थे, उन्होंने गंभीर चिंताएं जताई थीं। जबकि प्रयोग करने वाले दूसरे देश अपनी ज़मीन पर इन प्रयोगों को प्रतिबंध कर चुके थे।

इससे ज़्यादा गौर करने वाली बात है कि मच्छरों और पक्षियों के प्रवास पर होने वाले प्रयोगों में पैसा अमेरिकी सेना, सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी (CIA) और दूसरे अमेरिकी संगठन लगा रहे थे, वही इनका समन्वय भी कर रहे थे। यह संगठन कुछ भारतीय संस्थानों के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की आड़ में काम कर रहे थे।

1960 के दशक में अंतिम और 1970 के दशक के शुरुआती वक़्त से यह प्रोजेक्ट जारी थे। पहले परमाणु वैज्ञानिक रहे और बाद में पत्रकार बने पीटीआई से जुड़े जयरामन ने जब इनका खुलासा किया, तो पूरे देश को झटका लगा। यह प्रयोग राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में हो रहे थे। जयरामन की एक रिपोर्ट 29 जुलाई, 1974 को सामने आई और पूरे देश के कई अख़बारों में छपी। यह रिपोर्ट अमेरिका द्वारा वित्तपोषित शोध प्रोजेक्ट से संबंधित थी, जिसका क्रियान्वयन WHO और “इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR)” के समन्वय से बनी विेशेष टीम कर रही थी। इसका नाम “जेनेटिक कंट्रोल ऑफ मॉस्कीटोज़ (GCMU)” था।

जब इस पर देशव्यापी हंगामा हुआ, तो संसद ने इस पर गौर फरमाते हुए 30 जुलाई, 1974 को मामले पर विमर्श करवाया। पीटीआई के लिए विज्ञान के विशेष संवाददाता डॉ के एस जयरामन की रिपोर्ट्स की जांच जल्द ही एक संसदीय समिति ने की। इसके लिए जयरामन और दूसरे लोगों का इंटरव्यू भी किया गया। संसदीय समिति ने जयरामन द्वारा खोजे गए तथ्यों की पुष्टि कर दी।

 

 

जयरामन ने क्या खोजा

 

PTI के एडिटर-इन-चीफ सी राघवन समेत शीर्ष नेतृत्व से पूरे समर्थन के साथ, जयरामन ने जांच में 15 महीने लगाए। इस दौरान उन्होंने पूरे GCMU प्रोजेक्ट और इसी तरह के दूसरे प्रोजेक्ट की बारीकी से जांच की। यह वह प्रोजेक्ट थे, जो अमेरिकी एजेंसियों की मदद से भारत में चलाए जा रहे थे। इन अमेरिकी एजेंसियों में “माइग्रेटरी एनिमल पैथोलॉजिकल सर्विस (MAPS)” भी शामिल थी। जैसा जयरामन ने MAPS के बारे में अपनी स्टोरी में लिखा, “साधारण भाषा में कहें तो MAPS अमेरिकी सेना का जैविक युद्धप्रणाली शोध से संबंधित डिवीज़न था।”

उनकी स्टोरी में आगे कहा गया, “वैज्ञानिक समुदाय के कुछ सदस्य पूछ रहे हैं कि क्या भारत में लुके-छिपे माहौल के बीच जारी कुछ संदेहास्पद प्रयोगों में हमारे देश को ‘गिनी पिग’ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। जबकि इन प्रयोगों में इकट्ठा किए जाने वाले आंकड़ों का भारत के लिए कोई इस्तेमाल भी नहीं है। क्या भारत को कुछ रसायनों के प्रयोग के मैदान पर इस्तेमाल किया जा रहा है, जिन्हें करने की अनुमति शोध को प्रायोजित करने वाले देशों में नहीं है? या फिर भारत को एक गुप्त ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल में लाया जा रहा है?”

ऐसा कहा जाता है कि GCMU तब लोगों की नज़रों में आई, “जब संस्था कुछ गांवों के कुओं को रसायनों द्वारा प्रदूषित कर रही थी। इन रसायनों से कैंसर होने का शक था और इनका प्रयोग अमेरिका में वर्जित था। इसके बाद प्रोजेक्ट की रहस्यमयता को ज़्यादा बढ़ा दिया गया।” जयरामन ने कुछ सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि ICMR आखिर WHO के ऐसे अध्ययन को मदद क्यों कर रहा है, जो ‘ऐडीज़ ऐजिप्टी'(येलो फीवर का वहन करने वाला मच्छर) से संबंधित है, जबकि GCMU की प्राथमिकता ‘एनॉफिलीज़ स्टेफेंसी’ (मलेरिया फैलाने वाला मच्छर) और क्यूलेक्स फैटिगांस ( फाइलेरिया फैलाने वाला मच्छर) होनी चाहिए। इसका मतलब हुआ कि पूरा अध्ययन मलेरिया के बजाए येलो फीवर की मच्छरों पर केंद्रित था। जबकि उन दिनों भारत में बहुत ज़्यादा मलेरिया फैलता था।

इस स्टोरी समेत कुछ दूसरी स्टोरियों के बाद, उस वक़्त जनसंघ के सदस्य डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने राज्यसभा में कहा, “अमेरिकी सेना ने बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (BNHS) को पूर्वोत्तर भारत में पक्षी प्रवास का अध्ययन करने के लिए अनुदान दिया है।” अपनी स्टोरी में जयरामन ने साफ़ किया कि WHO ने अपने अध्ययन के नतीज़ों को अमेरिकी सेना के MAPS के साथ साझा किया है। WHO-BNHS प्रोजेक्ट का शोध नॉर्थ ईस्टर्न फ्रंटियर एजेंसी (NEFA, अब अरुणाचल प्रदेश) में किया गया था।

संसद की पब्लिक अकाउंट्स कमेटी की 167वीं रिपोर्ट में कहा गया कि जयरामन जुलाई, 1974 में बेहद अहम रिपोर्ट सामने लेकर आए, जो वैज्ञानिक समुदाय के वर्गों में WHO की आड़ में रहस्यमयी काम से जुड़ी गहरी चिंताओं को दिखाती है। “मदरलैंड” में 29 जुलाई, 1974 को छपी रिपोर्ट से भी बहुत मदद मिली। इस रिपोर्ट का शीर्षक था- “WHO works for US secret research in India?(WHO भारत में अमेरिका की गुप्त शोध के लिए काम करता है?”

इतना ही नहीं, पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (PAC) ने सरकार को तुरंत कार्रवाई करने का निर्देश दिया। तब PAC चेयरमैन और CPI(M) के नेता ज्योतिर्मय बसु ने भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लिखा। उन्होंने अपना ख़़त मूलत: तीन बातों पर ध्यान दिलाया।

(1) भारत में कुछ ऐसे प्रयोग कर रहे हैं, जो यहां की आबादी के लिए ख़तरा हैं और यह प्रयोग खुद उनके देश अमेरिका में प्रतिबंधित हैं।

(2) वे लोग प्रयोग कर रहे हैं और ऐसी स्थिति के लिए चीजें तैयार रख रहे हैं कि अगर अमेरिका कभी हमारे देश के खिलाफ़ रासायनिक, बैक्टीरियोलॉजिकल या वायरस युद्ध करना चाहे, तो सब तैयार मिले।

(3) भारत को अड्डे की तरह इस्तेमाल कर किसी दूसरे देश के खिलाफ़ रासायनिक, बैक्टीरियोलॉजिकल या वायरस युद्ध के लिए तैयार रहना।

“…. इन प्रयोगों से जो भी नतीज़े हासिल हासिल होंगे, वे सभी अमेरिकी सरकार की संपत्ति होंगे। यह तय करने के लिए कि इस तरह की चीजें आगे जारी न रह सकें, मैं यह ख़त लिख रहा हूं, क्योंकि मैं इस कार्यक्रम के बारे में बेहद चिंतित हूं। यह सब मैं अपने देश और लोगों के भले के लिए कर रहा हूं। मैं पूरी ईमानदारी से कहता हूं कि सबसे ज़्यादा सक्षम इंटेलीजेंस एजेंसी द्वारा पूरे मामले की तह तक जांच होनी चाहिए।”

पीटीआई की न्यूज़ रिपोर्ट, उसके बाद जयरामन और पीटीआई प्रमुख राघवन से सवाल-जवाब करने के बाद खुद PAC ने अपनी 167वीं रिपोर्ट की पृष्ठभूमि में लिखा, “भारत में कई स्वास्थ्य और कृषि शोध कार्यक्रम और प्रयोग चालू हुए हैं। इनका संचालन देश में WHO, अमेरिकी कृषि विभाग विभाग, रॉकफेलर फॉउंडेशन, स्मिथ्सोनियन इंस्टीट्यूट, MAPS, अमेरिकी रक्षा विभाग और जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी आदि, जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और विदेशी संगठनों की आड़ में हो रहा है। “

“उदाहरण के लिए जेनेटिक कंट्रोल ऑफ मॉस्कीटोज़ का प्रोजेक्ट भारत में WHO के साथ साझेदारी में स्थापित किया गया है। पक्षी प्रवास के अध्ययन के लिए बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी और ‘माइग्रेटरी एनीमल पैथोलॉजिकल सर्वे (MAPS)’ के बीच समन्वय हुआ है। शहरी क्षेत्रों में अल्ट्रा लो वॉल्यूम स्प्रे टेक्नीक द्वारा मलेरिया से निपटने पर शोध WHO की मदद के साथ किया जा रहा है। रॉकफेलर फॉउंडेशन, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसयटी और पूना की वायरस रिसर्च सेंटर के साथ जुड़ा हुआ है। वही स्मिथ्सोनियन इंस्टीट्यूट, बर्ड माइग्रेटरी स्टडीज़ से संबंधित है। अमेरिकी कृषि विभाग पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के साथ माइक्रोबियल पेस्टीसाइड प्रोजेक्ट में जुड़ा है। जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी भारतीय संस्थानों के साथ कई शोध प्रोजेक्ट से जुड़ी है।”

कीणे और पौधे

PAC ने जयरामन द्वारा PTI के लिए जुलाई, 1974 में की गई एक और रिपोर्ट पर काम किया। इसके बाद PAC ने कृषि उत्पादों के आयात से संबंधित कई सुझाव दिए, जिसके बाद कानून में सुधार किए गए। जयरामन की स्टोरी में एक बड़े शराब उत्पाद द्वारा नियमों को धता बताते हुए ऑस्ट्रेलिया से कीणे वाले हॉप प्लांट के आयात का ज़िक्र था। यह गोल कीणे थे, जो कभी भारतीय ज़मीन पर नहीं पाए गए। रिपोर्ट में कहा गया, “यह कीणे पहले “गलती” से भारत में आ गए और इन्होंने नीलगिरी में आलुओं की फ़सल खराब कर दी। अब “यह तमिलनाडु के दूसरे इलाकों में तबाही मचा रहे हैं।” इस न्यूज़ रिपोर्ट के देशव्यापी प्रकाशन के बाद PAC ने इस मामले में भी संज्ञान लिया और कुछ सुझाव दिए, उनमें से कई तत्कालीन सरकार ने मान लिए।

अपने पूरे तीन दशक के करियर में, पीटीआई में रहने के दौरान जयरामन ने जो रिपोर्ट्स कीं, वह बेहद हिला देने वाली थीं। क्योंकि ज़्यादातर रिपोर्ट्स में जनता के स्वास्थ्य और दूसरे वैज्ञानिक मुद्दे उठाए जाते थे, जो जनता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े होते थे। हालांकि एक न्यूज एजेंसी से जुड़े पत्रकार होने के चलते वे गुमनाम ही रहे, लेकिन इस बाद में कोई संदेह नहीं है कि जयरामन भारतीय विज्ञान पत्रकारिता के अगुआ थे।

विशेष संवाददाता जयरामन पीटीआई के पहले विज्ञान संपादक बने। वे वैश्विक तौर पर विज्ञान की प्रतिष्ठित जर्नल्स, जैसे “नेचर” से भी जुड़े रहे। जयरामन का जन्म 1936 में हुआ था, उन्होंने मद्रास से अपनी स्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद वे 1958 में “अटॉमिक एनर्जी एस्टेब्लिशमेंट” (अब भाभा परमाणु शोध केंद्र, मुंबई) में साइंटिफिक असिस्टेंट बन गए। वहां उन्होंने राजा रमन्ना और पीके अयंगर जैसे पुरोधाओं के नेतृत्व में बनने वाले अप्सरा रिएक्टर से जुड़े शोध समूह में पांच साल तक काम किया। इसके बाद जयरामन अमेरिका चले गए और उन्होंने वहां मेरीलैंड यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया। 1968 में जयरामन ने वहां से अपनी पीएचडी खत्म की। पोस्ट-डॉक के लिए उन्होंने पोट्सडैम यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क और उसके बाद मनिटोबा यूनिवर्सिटी, विनिपेग में काम किया। 1972 में जयरामन भारत लौटे और उन्होंने “डॉयरेक्टोरेट ऑफ नवल साइंस एंड टेक्नोलॉजी” में बतौर “पूल ऑफिसर” नौकरी शुरू कर दी। बाद में उन्होंने DRDO में क्लास-I ऑफिसर के तौर पर ज्वाइनिंग ली।

लेकिन जयरामन का दिमाग पत्रकारिता की ओर लगा था। जिसके लिए वे अमेरिका के प्रतिष्ठित मेडिल स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म से पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री भी ले चुके थे। उन्होंने 1973 में PTI में नौकरी शुरू की। एक हालिया किताब, “Raising Hackles: Celebrating the Life of Science Journalist Dr KS Jayaraman” बताती है कि वहां उन्हें “डॉक” या “डॉक्टर जे” पुकारा जाता था। यह किताब जयरामन द्वारा प्रशिक्षित विज्ञान पत्रकारों के लेखों का संकलन है। यह लेख इन पत्रकारों ने जयरामन पर लिखे हैं। इस किताब को दिनेश सी शर्मा लेकर आए हैं, जो पहले पीटीआई में काम कर चुके हैं। फिलहाल वे जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में फैलो हैं।

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