अखण्ड भारत

आरक्षण के ख़िलाफ़ तर्क क्यों हैं दोषपूर्ण

आरक्षण के ख़िलाफ़ तर्क क्यों हैं दोषपूर्ण
जब आरक्षण विरोधी भावना चर्चा का मुख्य केंद्र बन कर उभरती है तब आरक्षण नीति को सही ढंग से लागू न करने और आर्थिक रूप से संपन्न तबक़े के बारे में ग़लत धारणा जैसे मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।

 

नई दिल्ली|भारत में आरक्षण सबसे अधिक विवादित मुद्दे में से एक है, लेकिन इनमें से कई चर्चाओं में सामाजिक न्याय के सवाल को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जाता है। सामाजिक न्याय को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के तबकों को प्रतिनिधित्व और सामाजिक मुख्यधारा में लाने के संदर्भ में समझने की जरूरत है। चौंकाने वाली बात यह है कि चार भारतीयों में से एक ने अस्पृश्यता यानि छूया-छुत की परंपरा को जारी रखा, यह तथ्य 2014 में एनसीएईआर और मैरीलैंड विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययन में उभर कर सामने आए है। लगभग हर तीसरे हिंदू (यानि आबादी के 30 प्रतिशत ने) ने इस कुप्रथा को जारी रखा हुआ है, उसके बाद इस प्रथा को आगे बढ़ाने में सिख समुदाय में (23 प्रतिशत), मुस्लिम में (18 प्रतिशत) और ईसाई में (5 प्रतिशत) तबके शामिल हैं। इस प्रकार, सामाजिक न्याय प्रणाली में खामियों को रेखांकित करने के बजाय आरक्षण की व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा करना अपने आप में बहस की सबसे बड़ी विडंबना है।

आरक्षण के बारे में आम धारणा यह है कि वह “जाति व्यवस्था को स्थायी” बनाती हैं। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि यह तर्क आज चलन में है, जिसके परिणामस्वरूप ओबीसी उम्मीदवारों को राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) के तहत अखिल भारतीय स्तर पर आरक्षण से वंचित करने पर विचार किया जा रहा है। यह साफ़ है कि 2017 के बाद से पिछड़े वर्गों के 11,000 उम्मीदवारों को देश भर के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा में शामिल होने का अवसर नहीं मिला है। इस तबके के प्रतिनिधित्व को मना करना केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में उनकी लगभग नगण्य उपस्थिति के साथ मेल खाता है।

ओबीसी के बीच क्रीमी लेयर यानि संपन्न तबके की अवधारणा ने उनके संस्थागत प्रतिनिधित्व को बेअसर कर दिया है। एक तरह से, वर्ग भेद करने के बजाय, क्रीमी लेयर अवधारणा ने आरक्षण के उद्देश्य को बेअसर बनाने में अधिक योगदान दिया है, जिसका उद्देश्य उत्पीड़ित जनता और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को समान स्तर पर लाना सुनिश्चित करना था। क्रीमी लेयर का तर्क अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तक भी जा सकता है।

आरक्षण विरोध के अधिकतर तर्कों में नएपन का अभाव है, क्योंकि ये सभी तर्क मोटे तौर पर अपेक्षाकृत विशेषाधिकार प्राप्त लोगों में अभाव की भावना या डर की भावना पर आधारित हैं। आरक्षण का उनका विरोध भारत में सामाजिक पहचान को भी व्यापक पहचान देता है। आरक्षण के खिलाफ कई तर्क एक तरह की ब्राह्मणवादी नौटंकी है, जिसमें दलित-बहुजन को हीन दृष्टि से देखा जाता है। आरक्षण की सकारात्मक समर्थन नीति योग्यता को दरकिनार करती है और जातिवाद को बढ़ावा देती है जैसी बेतुकी अफवाह फैलाकर सोशल मीडिया में अभियान को तेज़ी से चलाया जा रहा है।

इन तर्कों का मूल आधार अभिजात्य जातियों को दोषपूर्ण लगता है, जिन्होंने अभी तक अपने सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विशेषाधिकारों को नहीं छोड़ा है। इन विशेषाधिकारों को समझने के लिए नौकरशाही, मीडिया, न्यायपालिका, शैक्षणिक संस्थानों, आदि में उच्च जातियों के विशेषाधिकार प्राप्त सदस्यों के प्रतिनिधित्व पर विचार करें। ओबीसी भारतीय रेलवे के समूह “ए” और “बी” कर्मचारियों में केवल 8.05 प्रतिशत हैं, कैबिनेट सचिवालय में केवल 15 प्रतिशत और मानव संसाधन विकास मंत्रालय में 8.42 प्रतिशत हैं, ये सब आंकड़े इंडियन एक्सप्रेस ने हाल ही में रिपोर्ट किए थे।( जबकि केंद्र सरकार के रोजगार में पिछड़ा तबका 27 प्रतिशत आरक्षण का हकदार हैं।)
आरक्षण प्रणाली के खिलाफ टकराव पूर्व प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय से है। 27 जून 1961 को, मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में, नेहरू ने लिखा, “यह सच है कि हम अनुसूचित जातियों और जनजातियों की मदद करने के बारे में कुछ नियमों और कन्वेंशन्स से बंधे हैं। उन्हे मदद की दरकार हैं, हालांकि मैं किसी भी तरह के आरक्षण को नापसंद करता हूं, विशेष रूप से नौकरियों में।

जबकि विरोधाभासी विचारों को आरक्षण के संदर्भ में फैलाया जा रहा है, इसलिए किसी को आरक्षण की नीति के अस्तित्व में आने के ऐतिहासिक आधार की बारीकी से जांच करने की जरूरत है। कोल्हापुर के शासक शाहूजी महाराज ने 1902 में पिछड़ों और दलितों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की शुरुवात की थी। 1932 की पूना संधि के दौरान आरक्षण पर स्पष्ट रूप से चर्चा की गई, जब बाबासाहेब अम्बेडकर ने रिटटामलाई श्रीनिवासन के साथ मिलकर अलग-अलग मतदाता बनाने का प्रस्ताव पेश किया था।

हालांकि, शिक्षा और नौकरियों में दलितों के लिए समावेशी आरक्षण पर हमला लगातार की बात है – ऊपर दर्ज़ की गई एनसीएईआर रिपोर्ट में अन्य अध्ययनों के माध्यम से सभी जगह भेदभाव को सक्रिय रूप से दर्शाता है। फिर भी, विरोधाभासी हवाएँ बहती रहती हैं, जिसमें शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण को बेअसर करने के लिए शैक्षिक संस्थानों का निजीकरण और रोजगार को अनुबंधित यानि ठेके पर दिया जा रहा है। इस नीति से सभी वंचित छात्रों की विश्वविद्यालय तक पहुंच कम हो रही है और नौकरी के अवसर नहीं मिल रहे है, विशेष रूप से कम से कम अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के छात्रों पर इसका सबसे बड़ा असर पड़ा है।

आरक्षण के अनुसार 49.5 प्रतिशत सीटें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जबकि शेष सामान्य श्रेणी के लिए हैं जिसे अनारक्षित या यूआर के रूप में भी जाना जाता है। अब क्योंकि सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग या ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों को भी 10 प्रतिशत आरक्षण दे दिया है, इसलिए सामान्य वर्ग का आरक्षण अब 40 प्रतिशत रह गया है। लेकिन वास्तव में जातिवादी मानसिकता को उजागर करने वाला एक तथ्य यह भी है कि गैर-सामान्य छात्र जो तथाकथित मेरिट सूची में उत्तीर्ण होते हैं, अक्सर उनका संस्थानों या उनके उच्च जाति के सहयोगियों द्वारा तिरस्कार कर दिया जाता है और उन्हे “आरक्षित” श्रेणी से दाखिला लेने के लिए कहा जाता है। यह इस बात को उजागर करता है कि संस्थानों के लोकतांत्रिककरण को अवरुद्ध करने कैसे “योग्यता” के सवाल का इस्तेमाल किया जाता है। तथ्य यह है कि गैर-आरक्षित सीटों को “उच्च” जाति के उम्मीदवार अपनी बपौती मानते हैं।

अस्सी के दशक के उत्तरार्ध के बाद से, नौकरी के इच्छुक दलित-बहुजन उम्मीदवारों की यह शिकायत रही है कि उन्हें परीक्षकों और साक्षात्कारकर्ताओं ने “उपयुक्त नहीं पाया” या एनएफएस के रूप में वर्गीकृत कर दिया। वे कहते हैं कि यह प्रवेश की सीमा को ऊपर उठाने की रणनीति के रूप में किया जाता है ताकि एससी, एसटी और ओबीसी सरकारी सेवा की दहलीज को पार न कर सकें।

एक और तर्क जो अक्सर आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ खड़ा किया जाता है वह यह कि इससे “बहुत कम” लोगों को लाभ हुआ है या यह कि यह एक “विफल” नीति है। हालांकि, आरक्षण का लाभ इसलिए कम मिल रहा है क्योंकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों के लिए सरकारी क्षेत्र में रिक्तियां कम पैदा हो रही हैं। यह आरक्षण नीति की समस्या नहीं है। आरक्षण का उद्देश्य उन लोगों को पर्याप्त “प्रतिनिधित्व” देना है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से संस्थागत स्थानों तक पहुंचने से विधिवत रोका गया है या जो लोग अपने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से इसलिए पिछड़े हैं क्योंकि वे एक खास जाती/वर्ग से संबंध रखते हैं।

शोषित और हाशिए पर धकेले गए तबकों के व्यापक प्रतिनिधित्व से राष्ट्रीय स्तर पर हर क्षेत्र में उनके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक एकीकरण को सुनिश्चित किया जा सकता है। यह अपने आप में एक मज़ाक है कि 85 प्रतिशत दलित-बहुजन वाले देश में उन्हें सबसे कम प्रतिनिधित्व मिलता है। सवाल यह है कि आरक्षण को कितने खराब तरीके से लागू किया जा रहा है ताकि उसका लाभ अपेक्षित लाभार्थियों तक न पहुंच सके?

आरक्षण का विरोध करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि यह केवल एक दाखिला का मानदंड है, लेकिन जब बेहतर प्रदर्शन की बात आती है तो इससे लाभार्थियों को कोई लाभ या सुविधा नहीं मिलती है। इसके अलावा, फिर से, आरक्षण के संबंधित सामाजिक श्रेणियों के छात्रों ने हमेशा अपनी उत्कृष्टता साबित की है। 2018 में, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय ने पाया था कि एसटी और एससी इंजीनियरिंग छात्रों, ओबीसी छात्रों ने “सामान्य श्रेणी के अभियार्थियों की तुलना में सीखने में आगे रहे हैं” जिसे व्यापक रूप से रिपोर्ट किया गया था। रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि “गैर-कुलीन संस्थानों की तुलना में कुलीन संस्थानों-जैसे आईआईटी और एनआईटी- में सीखने का लाभ अधिक है”। यह स्थिति हमारे सार्वजनिक संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार लाने और उन जैसे अधिक संस्थान बनाने की जरूरत को रेखांकित करता है बजाय इस पर ध्यान देने के कि इनमें कौन पढ़ेगा।

स्टैनफोर्ड अध्ययन साबित करता है कि जब सबको समान अवसर दिया जाता है तो एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों में क्षमता समान पाई जाती है और वे किसी भी क्षेत्र में अपने साथियों को पछाड़ सकते हैं। आरक्षण विरोधी तर्कों की आड़ में, मुख्य उद्देश्य छात्रों को जाति के आधार पर बांटने, उन्हे निशाना बनाने और उन्हें हीन महसूस कराने से संबंधित है।

 

यहाँ यह समझना जरुरी है कि आरक्षण प्रणाली जातिगत व्यवस्था को दोबारा से नहीं बनाती है, यह वह तथ्य है जो आंकड़ों से सिद्ध होता है, जो तथ्य ओबीसी, एससी, एसटी और गैर-कुलीन तबकों के सदस्यों के खिलाफ हिंसा में तेज वृद्धि को उजागर करते है। आरक्षण विरोधी प्रचारकों को अपने तथ्यों की जाँच करने की जरूरत है। जाति को स्तरीकरण की हिंसक सामाजिक संरचना पैदा करती है न कि सकारात्मक कार्रवाई जो दलित-बहुजन जातियों को उन सीमाओं को पार करने की उम्मीद देती है जिन्हे पार करने के लिए जाति के आधार पर उन्हे रोक दिया गया था।

सवाल उठता है कि क्या कुलीन जातियों के सदस्य अपने विशेषाधिकार का त्याग करने के लिए तैयार हैं? यदि नहीं, तो उनके पास इसका जवाब है कि आरक्षण की जरूरत क्यों है, क्योंकि जाति का पुराना सामाजिक पदानुक्रम अभी भी मज़बूत हैं। आरक्षण इस सामाजिक व्यवस्था का समर्थन करने वाली मनोवैज्ञानिक धारणाओं के पुनर्निर्माण या उसमें सुधार लाने का सिर्फ एक कदम है।

शोषितों के मामले में समावेशी राजनीति का राजनीतिक प्रतिरोध से तलाक नहीं होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो दमनकारी लोगों के लिए राजनीतिक दावेदारी करना जातिगत समाज में अपनी स्थिति को मज़बूत करना है। कुलीन जातियों से अभिभूत राजनीति को “जातिवादी” कहकर उसकी आलोचना नहीं की जाती है। संविधान सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक लोकतंत्र को सुनिश्चित करता है और आरक्षण असमान समाज में समान अवसर को आगे बढ़ाता है। दुर्भाग्य से, हमेशा इसके दोषपूर्ण कार्यान्वयन को अनदेखा किया जारा रहा है और आरक्षण विरोधी भावनाओं के गलत तर्क को चर्चा का केंद्र बनाया जाता रहा है।

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