कानपुर

UP:पार्षद से सांसद, विधायक और कैबिनेट मंत्री तक का सफर तय करने वाली कमल रानी वरुण की कोरोना से मौत

कानपुर|उत्तर प्रदेश में कोरोना महामारी की वजह से कैबिनेट मंत्री कमल रानी वरुण का निधन हो गया है. वह योगी आदित्यनाथ सरकार में प्राविधिक शिक्षा मंत्री थीं. उनका ताल्लुक कानपुर से था. उनके निधन पर उत्तर प्रदेश में आज राजकीय शोक का ऐलान किया गया है.
कमल रानी कोरोना से संक्रमित थीं और लखनऊ के पीजीआई में उनका इलाज चल रहा था. वह पिछले महीने 18 जुलाई को कोरोना से संक्रमित हुई थीं. बाद में इलाज के लिए उन्हें लखनऊ पीजीआई में दाखिल कराया गया था.

 

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निधन से पहले किया ट्वीट
62 वर्षीय कमल रानी वरुण निधन से कुछ समय पहले तक सोशल मीडिया में लगातार सक्रिय थीं. निधन से कुछ देर पहले ही गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी को उनके जन्मदिन की शुभकामना दी थी. इससे पहले शनिवार को भी कई ट्वीट रिट्वीट किए थे. साथ ही वरिष्ठ नेता अमर सिंह के निधन पर ट्वीट के जरिए शोक जताया था.

 
पिछले साल 21 अगस्त को कमल यूपी सरकार में प्राविधिक मंत्री (टेक्निकल एजुकेशन मंत्री) बनी थीं. राजनीति के लिहाज से देखा जाए तो कानपुर के घाटमपुर क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी को मजबूत करने में कमल रानी की बड़ी भूमिका रही है. बतौर सभासद उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी.

कोरोना संक्रमण के कारण उत्तर प्रदेश कैबिनेट मंत्री और कानपुर के घाटमपुर से विधायक कमल रानी वरुण की मौत हो गई। 18 जुलाई को कोरोना पॉजिटिव आने के बाद उन्हें लखनऊ पीजीआई में भर्ती कराया गया था। जानिए कमल रानी वरुण का राजनीतिक सफर…

 

लखनऊ में 3 मई 1958 को जन्मी कमलरानी वरुण की शादी एलआईसी में प्रशासनिक अधिकारी किशन लाल वरुण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतिबद्ध स्वयंसेवक से हुई थी। बहू बनकर कानपुर आईं कमलरानी ने पहली बार 1977 के चुनाव में बूथ पर मतदाता पर्ची काटने के लिए घूंघट में घर की दहलीज पार की।

 

 

समाजशास्त्र से एमए कमलरानी को पति किशनलाल ने प्रोत्साहित किया तो वह आरएसएस द्वारा मलिन बस्तियों में संचालित सेवा भारती के सेवा केंद्र में बच्चों को शिक्षा और गरीब महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई और बुनाई का प्रशिक्षण देने लगीं। वर्ष 1989 में भाजपा ने उन्हें शहर के द्वारिकापुरी वार्ड से कानपुर पार्षद का टिकट दिया। चुनाव जीत कर नगर निगम पहुंची कमलरानी 1995 में दोबारा उसी वार्ड से पार्षद निर्वाचित हुईं।

 

भाजपा ने 1996 में उन्हें उस घाटमपुर (सुरक्षित) संसदीय सीट से चुनाव मैदान में उतारा। अप्रत्याशित जीत हासिल कर लोकसभा पहुंची कमलरानी ने 1998 में भी उसी सीट से दोबारा जीत दर्ज की। वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में उन्हें सिर्फ 585 मतों के अंतराल से बसपा प्रत्याशी प्यारेलाल संखवार के हाथों पराजित होना पड़ा था।

 

सांसद रहते कमलरानी ने लेबर एंड वेलफेयर, उद्योग, महिला सशक्तिकरण, राजभाषा व पर्यटन मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समितियों में रहकर काम किया। वर्ष 2012 में पार्टी ने उन्हें रसूलाबाद (कानपुर देहात) से टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा लेकिन वह जीत नहीं सकी। 2015 में पति की मृत्यु के बाद 2017 में वह घाटमपुर सीट से भाजपा की पहली विधायक चुनकर विधानसभा में पहुंची थीं।

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