इतिहास

अयोध्या से इस्तांबुल तक धार्मिक स्थलों की राजनीति का दौर

नई दिल्ली|राम मंदिर के निर्माण के बाद बाबरी मस्जिद का नाम इतिहास के पन्नों तक सीमित रह जाएगा. बिल्कुल वैसे ही जैसे छठी शताब्दी में तुर्की में बने ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च हागिया सोफिया के साथ हुआ.

साल 1453 के बाद से एक चर्च के तौर पर उसकी पहचान सिर्फ़ इतिहास के पन्नों तक ही सीमित होकर रह गई है, क्योंकि पहले उसे मस्जिद, फिर म्यूज़ियम और अब एक बार फिर मस्जिद बना दिया गया है.

 

मस्जिद की जगह मंदिर और चर्च की जगह मस्जिद! पूजा स्थलों के परिवर्तन का विश्व भर में इतिहास पुराना है. आज के दौर में भी तालिबान और आईएस धार्मिक स्थलों और ऐतिहासिक स्मारकों को तबाह करते रहे हैं.

 

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने 2001 में बामियान में बौद्ध मूर्तियाँ तबाह कीं. आईएस ने सीरिया और इराक़ में प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासतों को बर्बाद किया.

बीस साल पहले, इसराइली नेता अरियल शेरॉन दर्जनों पुलिस वालों को लेकर मुसलमानों की पवित्र अल-अक़्सा मस्जिद में घुस गए और उस पर इसराइल की मिल्कियत जताई.

कहा जाता है कि उन्होंने ये क़दम उस समय उनकी लिकुड पार्टी के उभरते सितारे बिन्यामिन नेतन्याहू की लोकप्रियता से घबरा कर उठाया था और उन्होंने राजनीतिक फ़ायदे के लिए धार्मिक भावनाओं का सहारा लिया.

 

धार्मिक राष्ट्रवाद

प्रजातंत्र हो या तानाशाही, दोनों तरह की सरकारों में इस तरह की मिसालें मिलती हैं.

सियासी विश्लेषकों और धार्मिक नेताओं के अनुसार तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी धार्मिक भावनाओं के राजनीतिक इस्तेमाल के लिए जाने जाते हैं.

 

दिल्ली के कैथोलिक ईसाई धर्म के नेता एसी माइकल कहते हैं कि राम मंदिर और हागिया सोफ़िया को इसी संदर्भ में देखना चाहिए, “दोनों में समानता है. मक़सद तो एक ही है ना. मक़सद ये है कि सत्ता में आना है या बने रहना है. तो सत्तावाद ही चल रहा है जिसके लिए धर्म मोहरा है.”

वो आगे कहते हैं, “मंदिर इसलिए बना रहे हैं ताकि सत्ता में अगले 15 -20 साल तक बने रहें. शुरू से ही बोला जा रहा है कि 20-25 साल मोदी और बीजेपी की सरकार ही चलेगी. मंदिर जब 2024 तक बन जाएगा उसके बाद फ़ाउंडेशन मज़बूत हो जाएगा.”

 

भारत में पीएम नरसिम्हा राव के वक्त में धार्मिक स्थानों की सुरक्षा के लिए 1991 में एक क़ानून पारित किया गया था, जिसमें अयोध्या के मामले को अलग रखा गया था क्योंकि ये मामला अदालत में था. उदार लोकतंत्र के हित में इस क़ानून को सराहा गया था.

इस क़ानून के तहत तय हुआ था कि सभी धर्मों के उपासना स्थलों की मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा.

 

आसान लोकप्रियता

कैलिफ़ॉर्निया की सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अहमत कुरु कहते हैं, “उनकी (अर्दोआन) शासन शैली भी एक वैश्विक रूझान का ही हिस्सा है. भारत में मोदी की भी. रूस में पुतिन चर्च का इस्तेमाल कर रहे हैं. अमरीका में हम ट्रंप को राजनीतिक प्रतीक के रूप में बाइबल का इस्तेमाल करते हुए देखते हैं और राजनीतिक-धार्मिक प्रवचन के साथ वे ईसाइयों को प्रेरित करने की कोशिश कर रहे हैं. तो यह वास्तव में एक दुनिया भर में जारी प्रवृत्ति है.”

मिलन वैष्णव अमरीका के कार्नेगी एंडॉमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में दक्षिण एशिया कार्यक्रम के वरिष्ठ विशेषज्ञ हैं. उन्होंने बीजेपी की 2019 आम चुनाव में भारी जीत के कारणों की छानबीन की है.

 

वो इस नतीजे पर पहुँचे कि धार्मिक राष्ट्रवाद का दौर केवल भारत में ही नहीं चल रहा है.

वो कहते हैं, “दुनिया भर में कई लोकतंत्र में इस तरह के राजनीतिक आंदोलनों का दौर देखा जा रहा है. तुर्की और भारत के अलावा धार्मिक रूप से प्रेरित राजनीति का व्यापक उपयोग लैटिन अमरीका, पश्चिमी यूरोप और सोवियत संघ से टूटकर अलग हुए देशों में पाया जाता है.”

 

हागिया सोफ़िया

इस्तांबुल के मशहूर हागिया सोफ़िया की ऐतिहासिक इमारत एक म्यूज़ियम के रूप में सेक्युलर तुर्की की शान थी.

तुर्की के प्रसिद्ध लेखक ओरहान पामुक कहते हैं, “तुर्क एक धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम राष्ट्र होने पर गर्व करते हैं. अब हागिया सोफ़िया को मस्जिद में बदलने से देश का ये गौरव ख़त्म हो जाएगा. मेरे जैसे लाखों धर्मनिरपेक्ष तुर्क हैं, जो इस फ़ैसले से दुखी हैं लेकिन उनकी आवाज़ नहीं सुनी जा रही है.”

 

ईसाई सम्राट जस्टिनियन ने छठी शताब्दी में हागिया सोफ़िया की मौजूदा इमारत का निर्माण एक चर्च के रूप में किया था. तुर्क सम्राट सुल्तान मेहमेत ने 1453 में इसे चर्च से मस्जिद में बदल दिया. आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष तुर्की की स्थापना करने वाले मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क ने इसे संग्रहालय में तब्दील कर दिया.

अर्दोआन के 17 साल से जारी शासन काल में अतातुर्क की विरासत कमज़ोर पड़ती जा रही है, ठीक उसी तरह जिस तरह से विशेषज्ञों के अनुसार मोदी सरकार के छह सालों में नेहरू की धर्मनिरपेक्ष विरासत कमज़ोर पड़ गई है.

हागिया सोफ़िया को मस्जिद में बदला जाना इसी उभरते रुझान का नतीजा है.
प्रोफेसर एके पाशा कहते हैं, “अर्दोआन और उनकी ऐके पार्टी 2002 से चुनाव जीतती आ रही है और उनका एक मक़सद ये है कि वहाँ के लोग जो सेक्युलर माहौल में मुस्तफ़ा कमाल की हुक़ूमत के बाद से या पहले विश्व युद्ध के बाद से रहते आ रहे थे, उनको दबाना. जो उन्होंने वादा किया था, हागिया सोफ़िया में नमाज़ पढ़कर पूरा कर दिया. वो बताना चाहते थे कि मुसलमानों ने जो 1453 में चर्च फ़तह की थी उस पर अब उनका पूरा असर, रसूख़ और कंट्रोल है.”

इधर भारत में राम जन्मभूमि आंदोलन के कारण शुरू के सालों में बीजेपी का सियासी सितारा चमका, फिर वर्ष 2000 के बाद इसका सितारा कुछ सालों तक गर्दिश में रहा. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी पिछले छह वर्षों में अपने इतिहास के सबसे क़ामयाब दौर से गुज़र रही है. इसमें धार्मिक राष्ट्रवाद का योगदान अहम माना जाता है.

 

अभिजात्य और लोकलुभावनवाद के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन है, जैसा कि तुर्क मूल के प्रोफेसर अहमत कहते हैं, “भारत और तुर्की में अभी जो लोकतंत्र है वो बहुसंख्यक लोकतंत्र है जिसमें बहुसंख्यक समुदाय की चलती है. इसका असर अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों पर भी होता है.”

प्रोफेसर अहमत की दलील ये है कि नेहरू और कमाल अतातुर्क दोनों ने ज़रूरत से अधिक बल देकर अपने देशों पर धर्मनिरपेक्षता को थोपा.

दूसरी तरफ़ वो मोदी और अर्दोआन के धार्मिक राष्ट्रवाद को भी लोकतंत्र के लिए सही नहीं मानते. उनका कहना है कि दोनों देशों को फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के बजाय अमरीका के लोकतंत्र का मॉडल अपनाना चाहिए, जिसमे मज़हब समाज में एक सीमित भूमिका अदा करता है.

 

 

इतिहास का सहारा

अर्दोआन के समर्थक ये तर्क देते हैं कि मुसलमानों की मस्जिदों को स्पेन, क्राइमिया, बाल्कन देशों में तोड़ा गया और गिरजाघरों में बदला गया. वो खास तौर से कर्दोबा, स्पेन के उस विशाल कैथेड्रल का उदाहरण देते हैं जो 1237 से पहले एक शानदार मस्जिद थी. मुस्लिम समाज में इसे आज भी इसके पुराने नाम, मस्जिद-ए- कर्दोबा से याद किया जाता है.

इस पर 20वीं सदी के बड़े उर्दू शायर अल्लामा इक़बाल ने एक कविता भी लिखी है.

 

सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफ़सर अहमत कहते हैं, “वो सब ज़रूर हुआ लेकिन अब वो बहुत पुरानी बात हो गई है. हमें पीछे मुड़कर देखने की जगह आगे की तरफ़ देखने की ज़रूरत है. अगर हम इसी तरह से पुराने हिसाब चुकाने की कोशिश करते रहे तो ये चक्र कभी ख़त्म नहीं होगा.”

शायद इसलिए अर्दोआन ने 24 जुलाई को अरबी में जो ट्वीट किया है, वह मुस्लिम दुनिया को पैग़ाम देने की उनकी कोशिश है कि अतीत में मुसलमानों के साथ जो ग़लत हुआ, हागिया सोफ़िया को दोबारा से मस्जिद बनाकर वो उसे सही कर रहे हैं.

ये बात अलग है कि बैज़ेन्टान दौर के चर्च को ऑटोमन साम्राज्य ने मस्जिद में बदला, फिर उसे कमाल अतातुर्क ने म्यूज़ियम बनाया और अब वह फिर मस्जिद है. अर्दोआन इसे ग़लती को सही करना बता रहे हैं, जबकि दुनिया भर के ईसाई से ग़लत क़दम बता रहे हैं.

 

 

आगे का रुझान कैसा हो सकता है?

प्रोफेसर अहमत के अनुसार सच तो ये है कि “दोनों नेताओं की धर्म पर आधारित सियासत को सालों तक जारी रखना लोकतंत्र में संभव नहीं है.”

प्रोफेसर पाशा कहते हैं कि धर्म का सहारा लेना अंदर से असुरक्षित नेताओं का हथियार होता है, जो बाहर से आत्मविश्वास से भरे नज़र आते हैं. “लेकिन इसे एक लंबे समय तक निभाना मुश्किल है. ऐसे नेता एक ग़लती को छिपाने के लिए कई ग़लतियाँ करते हैं और आख़िर में उनकी सियासी ताक़त ख़त्म हो जाती है.”

 

प्रोफेसर अहमत के अनुसार अर्दोआन की पार्टी एकेपी, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी दूसरी पार्टियों के साथ मिलकर सरकारें चला रही हैं, हालाँकि बीजेपी को 2019 में स्पष्ट बहुमत मिला है, लेकिन पार्टी गठबंधन सरकार चला रही है.

प्रोफ़ेसर अहमत कहते हैं, “मिली-जुली सरकारों के सहारे सालों तक मज़हब के नाम पर सियासत करना मुमकिन नहीं. आर्थिक समस्याएँ और बेरोज़गारी जैसे मुद्दे इन नेताओं के लिए चुनौती बन जाते हैं.”

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