क्राइम्स

संपादकीयः लापरवाही की आग

संपादकीयः लापरवाही की आग
अमदाबाद के नवरंगपुरा में स्थित अस्पताल के आइसीयू में गुरुवार तड़के तीन बजे आग लगी और वह पूरे अस्पताल में फैलती चली गई। रात में इस वक्त आमतौर पर लोग नींद में होते हैं और अचानक किसी हादसे की स्थिति में तुरंत अपने बचाव की पर्याप्त कोशिश नहीं कर पाते।

 

गुजरात/अहमदाबाद|अमदाबाद के एक कोविड अस्पताल में आग लगने और उसके विकराल रूप ले लेने की वजह से कम से कम आठ कोरोना मरीजों की मौत की घटना से एक बार फिर अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही की इंतहा सामने आई है। यह एक विचित्र स्थिति है कि मौजूदा समय में कोरोना महामारी के मद्देनजर जिन अस्पतालों को सबसे ज्यादा सावधानी, चौकसी और सुव्यवस्थित जगहों के रूप में देखा जा रहा है, वहां भी इस तरह के हादसों की स्थितियां बनने दी जाती हैं। अमदाबाद के नवरंगपुरा में स्थित अस्पताल के आइसीयू में गुरुवार तड़के तीन बजे आग लगी और वह पूरे अस्पताल में फैलती चली गई। रात में इस वक्त आमतौर पर लोग नींद में होते हैं और अचानक किसी हादसे की स्थिति में तुरंत अपने बचाव की पर्याप्त कोशिश नहीं कर पाते। यही वजह है कि आठ लोगों की नाहक जान चली गई। हालांकि बाद में अग्नि शमन दस्ते ने आग पर काबू पा लिया और कई लोगों की जान बचाई जा सकी। इसके बावजूद यह अफसोसनाक यह है कि जिस अस्पताल में यह हादसा हुआ, वह कोविड-19 के मरीजों के इलाज के लिए खासतौर पर तैयार किया गया था। यानी जब विशेष व्यवस्था और सुरक्षा प्राप्त अस्पताल में लापरवाही का यह आलम है तो लोग और कहां से उम्मीद करें!

 

 

अब एक रिवायत की तरह सरकार ने मामले की त्वरित जांच कराने और हादसे में मृतकों के परिजनों और घायलों को मुआवजा देने की घोषणा की है। क्या हादसे के बाद दुख जताने या मुआवजे की औपचारिकता से मृतकों या उनके परिवारों को होने वाले नुकसान की वास्तविक भरपाई हो पाती है! सवाल है कि ऐसी किसी बड़ी और जानलेवा घटना के बाद ही सभी संबंधित महकमों की सक्रियता क्यों दिखाई देने लगती है! अगर अस्पताल में व्यवस्था से संबंधित हर चीज की समय पर जांच और उसमें आई गड़बड़ी को दुरुस्त करने को लेकर चौकसी बरती जाए तो इस तरह के हादसों से बचा जा सकता है। लेकिन देश भर में इस तरह अस्पतालों में आग लगने की घटनाएं बार-बार सामने आने के बावजूद बाकी जगहों पर उससे सबक नहीं लिया जाता और जरूरी सावधानी नहीं बरती जाती। अमदाबाद में कोविड के मरीजों के इलाज के लिए विशेष रूप से चिह्नित जिस अस्पताल में आग लगी, उसमें खबरों के मुताबिक आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट बताया गया है। ज्यादातर बहुमंजिला इमारतों में शॉर्ट सर्किट को ही आग लगने के आम कारण के रूप में दर्ज किया जाता है। फिर ऐसा क्यों होता है कि समय रहते ऐसे उपाय नहीं किए जाते, ताकि शॉर्ट सर्किट न हो और आग लगने जैसे हादसे से बचा जा सके?
इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिन अस्पतालों में लोग अपनी जान बचाने की उम्मीद में जाते हैं, वहां कई बार पहले ही जानलेवा हादसे उनका इंतजार कर रहे होते हैं। ऐसे तमाम मामलों में आमतौर पर अस्पताल प्रबंधनों की लापरवाही का खमियाजा अस्पताल में आए मरीजों और उनके परिजनों को उठाना पड़ता है। शायद ही कभी ऐसा होता है कि सरकार की ओर से सभी अस्पताल प्रबंधनों पर नियमित निगरानी को एक ड्यूटी तरह देखा जाए, ताकि हर स्तर पर चौकसी बरतने और सभी गड़बड़ी को समय पर दुरुस्त करने का दबाव बना रहे। एक नियम या दिशा-निर्देश जारी कर दिया जाता है, लेकिन उस पर कितनी संजीदगी से अमल होता है, उस पर निगरानी या सख्ती की जरूरत नहीं समझी जाती। यह बेवजह नहीं है कि अस्पतालों में आग लगने और नाहक ही लोगों के मारे जाने की घटनाएं बार-बार सामने आती रहती हैं।

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