इतिहास

मुर्मू की नियुक्ति सीएजी कार्यालय में नाराज़गी का कारण बन गई है

मुर्मू की नियुक्ति सीएजी कार्यालय में नाराज़गी का कारण बन गई है
जी सी मुर्मू के भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के तौर पर नियुक्ति ने इस संवैधानिक प्राधिकार में मौजूद उच्च विभागों के क्रम को कुछ हद तक बिखेर देने का काम किया है। कई लोग इसे राजनीतिक नियुक्ति के तौर पर देख रहे हैं जिसमें उन्हें प्रधानमंत्री के साथ की नज़दीकियों के चलते प्रशासनिक सेवा में अपने से वरिष्ठ अधिकारियों को फांद कर आगे निकलने के तौर पर देखा जा रहा है।

 

नई दिल्ली|भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) के कार्यालय में इस बीच काफी नाराजगी देखने को मिल रही है। सीएजी एक संवैधानिक प्राधिकरण है और इसके पास केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और सार्वजनिक संगठनों के सार्वजनिक वित्तीय मामलों की देखरेख का कार्यभार अनिवार्य तौर पर प्राप्त है।

 

इसकी वजह: जम्मू-कश्मीर के नव-निर्मित केंद्र शासित प्रदेश के पहले उपराज्यपाल के तौर पर संक्षिप्त कार्यकाल बिताने के बाद गिरीश चंद्र मुर्मू की सीएजी प्रमुख के तौर पर नियुक्ति का फैसला। इस बीच एक वरिष्ठ अधिकारी जहाँ लंबी छुट्टी पर चले गये हैं, वहीं कई अन्य नाराज चल रहे हैं।

एक सेवानिवृत अधिकारी जिन्हें सीएजी कार्यालय में कामकाज का लंबा अनुभव रहा है का इस बारे में कहना है कि “सीएजी कार्यालय के इतिहास में इससे पहले कभी ऐसा देखने को नहीं मिला कि जिसमें ऐसे व्यक्ति को संगठन की कमान सौंप दी गई हो जो जिससे कई वरिष्ठ अधिकारी अभी भी संगठन में कर्यरत हों, भले ही वे भिन्न सिविल सेवाओं से सम्बद्ध रहे हों।”

नाम न उजागर करने की शर्त पर इस सेवानिवृत्त नौकरशाह ने बताया कि अतीत में भी ऐसे मौके आये थे जब 2008 से लेकर 2013 के बीच में विनोद राय सीएजी थे, तो उस दौरान भी एक अधिकारी जो उनसे वरिष्ठ थे, उसी ऑफिस में कार्यरत थे। “लेकिन हमें कभी भी ऐसी स्थिति देखने को नहीं मिली जब कम से कम सात सेवारत अधिकारी किसी नवनियुक्त सीएजी से वरिष्ठ हों।”

बात करते हुए इस पूर्व लोकसेवक ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि मुर्मू की नियुक्ति में तो “योग्यता और वरिष्ठता जैसी दोनों ही पूर्व-शर्तों की तिलांजली दे दी गई है।”

सीएजी के कार्यालय से लंबी छुट्टी पर जाने वाले वरिष्ठ अधिकारी विजयराघवन रविन्द्रन हैं जो इंडियन ऑडिट एंड एकाउंट्स सर्विस (IA&AS) सेवा में 1983 बैच के अधिकारी रहे हैं। वे केरल से हैं। सभी क्षेत्रों में रविन्द्रन की प्रतिष्ठा एक “ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ” अधिकारी के तौर पर रही है और अपने सहकर्मियों के बीच में उनकी छवि एक बेहद “कड़क” अधिकारी के तौर पर जानी जाती है जो अपनी राय व्यक्त करने में कभी संकोच नहीं करते।

इस अधिकारी का आगे कहना था “रविन्द्रन जैसे अधिकारी इक्का दुक्का ही हैं। ज्यादातर लोक सेवक सरकार के साथ पंगा लेने के इच्छुक नहीं रहते हैं, खासकर जब उनके कार्यकाल में कुछ ही दिन बचे रह गए हों।”

 

वर्तमान और 14वें सीएजी के तौर पर मुर्मू 1985 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी हैं, जो पिछले वर्ष सेवानिवृत्त हो चुके थे। पदानुक्रम को लेकर सिविल सेवाओं में कार्यरत लोग हमेशा से ही सचेत रहे हैं। ऐसे में IA&AS में ऐसे सात अधिकारी हैं जो भारत सरकार में सचिव रैंक वाले डिप्टी सीएजी के पदों पर कार्यरत हैं, जो तकनीकी तौर पर मुर्मू से “वरिष्ठ” हैं।

रविन्द्रन के अलावा रॉय एस मथरानी हैं, जो 1983 बैच से हैं। इसके अलावा सरोज बुनहानी, मीनाक्षी गुप्ता (दोनों 1984 बैच के), शुभा कुमार, जे महालक्ष्मी मेनन और नमिता सेखों (ये सभी तीनों 1985 बैच) से सम्बंधित हैं।

IA&AS में दो अन्य अधिकारी ऐसे भी हैं जो समकक्ष वरिष्ठता के साथ सीएजी कार्यालय से बाहर से डेपुटेशन पर हैं, जिनमें 1983 बैच की अधिकारी सुधा कृष्णन जोकि वित्त, अन्तरिक्ष आयोग और परमाणु उर्जा आयोग में समान पद पर रहते हुए अतिरिक्त प्रभार देख रहे थे, और 1984 बैच की अधिकारी गार्गी मल्होत्रा हैं जो रक्षा मंत्रालय में सचिव स्तर की अधिकारी हैं।

जब 2008 में विनोद राय सीएजी नियुक्त किये गए थे तो उस दौरान 1971 बैच के एक IA&AS अधिकारी भारती प्रसाद थे, जो सीएजी में उनसे एक साल वरिष्ठ थे। एक अन्य सीएजी वी के शुंगलू (1996-2002) ने भी इसी तरह सिविल सेवाओं में अधिकारी के साथ काम किया था।

जब राय से इस सम्बंध में संपर्क साधने की कोशिश की गई तो उन्होंने सीएजी कार्यालय में वर्तमान में चल रहे इस किस्से पर कुछ भी बोलने के प्रति अनिच्छा जाहिर की। न्यूज़क्लिक से बात करते हुए उनका कहना था कि “सीएजी ऑफिस के साथ मेरे गर्भनाल को मैंने सात साल पहले ही तोड़ दिया था, और इस बारे में मुझे कुछ भी नहीं कहना है।”

यह पूछे जाने पर कि क्या सीएजी का पद किसी राजनीतिक नेतृत्व पर निर्भर देखा जाना चाहिये तो उनका कहना था “सीएजी एक तरह से राजनीतिक नेतृत्व द्वारा नामांकित किया जाता है लेकिन एक बार पदभार ग्रहण करने के बाद उसकी निष्ठा उस कुर्सी के प्रति होनी चाहिए, जिस पर वह बैठता है न कि किसी राजनीतिक नेतृत्व पर।”

 

मुर्मू क्या मोदी के करीबी हैं?

गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी रहे मुर्मू का जन्म ओडिशा के मयूरभंज जिले के एक संथाल परिवार में हुआ था। आठ भाई बहनों में वे सबसे बड़े हैं। उन्होंने उत्कल विश्वविद्यालय से राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की है और बर्मिंघम विश्विद्यालय से बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन में आपने स्नातकोत्तर किया है।

2001 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्य मंत्री नियुक्त हुए थे तो मुर्मू राहत आयुक्त के पद पर कार्यरत थे। इसके बाद वे माइंस एवं मिनरल्स के आयुक्त और गुजरात मेरीटाइम बोर्ड के प्रबंध निदेशक पद पर रहे। 2004 में मुर्मू अमित शाह के अधीन गृह विभाग के संयुक्त सचिव पद पर भी काम कर चुके हैं।

भारतीय पुलिस सेवा में एक अधिकारी रहे आर बी श्रीकुमार ने आरोप लगाया था कि मुर्मू “नानावती कमीशन (जिसने 2002 के गुजरात के साम्प्रदायिक दंगों की जाँच की थी) के सामने पेश होकर गवाही देने वाले अधिकारीयों को ब्रीफिंग देने और सिखाने-पढ़ाने के काम में नियुक्त किये गए थे।” इस बयान को 2011 में सर्वोच्च न्यायालय को अपनी एक रिपोर्ट में एमिकस क्यूरी रामचंद्रन द्वारा प्रस्तुत एक नोट में दर्ज किया गया था।

अदालत की ओर से नियुक्त विशेष जांच दल ने बाद में कहा था कि ये आरोप साबित नहीं किये जा सकते हैं और यह कि श्रीकुमार ऐसा बयान देने लिए “प्रेरित” किये गए थे। सर्वोच्च न्यायालय में पेश किये गए रामचंद्रन के नोट में से एसआईटी के निष्कर्षों को स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन उसने पाया कि श्रीकुमार को “प्रेरित” कहना सही नहीं था।

इस बात के भी दावा किया गया था कि मुर्मू ने इशरत जहाँ और सोहराबुद्दीन शेख इनकाउंटर मामले में अमित शाह से सम्बंधित कागजात को संभालने का काम किया था।

2014 में मोदी के प्रधानमंत्री के तौर पर दिल्ली जाने के बाद तो मुर्मू की किस्मत में भी जबर्दस्त उछाल देखने को मिला है। 2015 में उन्हें वित्त मंत्रालय में व्यय विभाग में संयुक्त सचिव पर नियुक्ति किया गया था। इसके दो साल बाद ही उन्हें इसी मंत्रालय में राजस्व विभाग में विशेष सचिव का पदभार ग्रहण करने का अवसर मिला। श्रीनगर में जम्मू कश्मीर के एलजी के तौर पर नियुक्ति से पहले 2019 में मुर्मू व्यय विभाग के सचिव के तौर पर कार्यरत थे।

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