अखण्ड भारत

पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं;जानिए

पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं,

कोरोना वायरस के तमाम नकारात्मक प्रभावों के बीच कुछ छोटे ही सही लेकिन ऐसे सकारात्मक बदलाव भी हैं जिनकी भारतीय समाज को एक अरसे से जरूरत थी।


बीते दिनों खबरें आईं कि कोरोना वायरस के चलते भारत सहित पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था सिकुड़ने जा रही है. जिस तरह से इस महामारी ने आर्थिक गतिविधियों पर विराम लगाया उसके चलते यह स्वाभाविक ही है. लेकिन जानकार यह आशंका भी जता रहे हैं कि कोरोना संकट सिर्फ दुनिया की आर्थिक व्यवस्था को ही नहीं बल्कि राजनीति, देशों के आपसी संबंधों से लेकर हमारे सामाजिक-व्यक्तिगत संबंधों तक को बदलने वाला साबित हो सकता है.

एक कड़वा सच यह भी है कि इनमें से ज्यादातर बदलाव नकारात्मक हो सकते हैं और भारत भी इनसे अछूता नहीं रहने वाला है. लेकिन इन तमाम बड़े-बड़े दावों और आशंकाओं के बीच कुछ छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव भी हैं, जिन्हें पिछले दिनों भारतीय समाज ने बहुत गंभीरता और तेजी के साथ अपनाया है. ये बदलाव इसलिए ध्यान खींचते हैं क्योंकि सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाला हमारा देश कई बार सही व्यवहार करने के मामले में बड़े ढीठ स्वभाव का दिखता रहा है. ऐसे में बीते कुछ सप्ताहों में यहां के एक बड़े हिस्से में आए ये पांच बदलाव बेहद मामूली होते हुए भी सुखद ठहराए जा सकते हैं.

हाथों की सफाई

मनोविज्ञान इंसानों के कभी-कभी ऑप्टिमिस्टिक बायस या अति-आशावादी रवैया दिखाने की बात कहता है. अति-आशावादी रवैया रखने वाले लोग किसी भी विपरीत परिस्थिति में यह मानकर चलते हैं कि वे बाकी लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं. हर इंसान कम या ज्यादा इसका शिकार होता ही है और यही वजह है कि दुनिया के ज्यादातर लोगों को लगता है कि उन्हें तो कोरोना वायरस का संक्रमण हो ही नहीं सकता है. यह अति-आशावाद भारतीयों की भी सबसे बड़ी खूबी (या खामी) कहा जा सकता है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण साफ-सफाई के लिए अब तक रहा हमारा लापरवाह रवैया है. मसलन, ऑफिस में काम करने के दौरान हम भारतीय दसियों चीजों को हाथ लगाने, लैपटॉप-फोन चलाने, नाक और सिर खुजलाने के अलावा भी जाने क्या-क्या करते रहते हैं. लेकिन जैसे ही कोई सहकर्मी खाने-पीने की कोई चीज आगे करता है, लपककर यह कहते हुए ले लेते हैं, मेरे हाथ तो साफ ही हैं! लेकिन कोरोना संकट ने हमें अपने हाथों को साफ रखना सिखा दिया है. हालांकि अभी ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है इतने थोड़े समय में यह आदत हर भारतीय के जीवन का स्थायी हिस्सा बन गई है. लेकिन कोरोना संकट अभी लंबा चलने वाला है और उम्मीद की जा सकती है कि इसके खत्म होने तक हाथों से लेकर घर तक की साफ-सफाई हम में से कइयों के जीवन का एक स्थायी अंग बन चुकी होगी.

छींकते या खांसते हुए आसपास वालों का ख्याल करना

छींकने को हमारे यहां अनैच्छिक क्रिया कहकर, जो कि यह है भी, लोग अक्सर मनमाने तरीके से जोर-जोर से छींकते देखे जा सकते हैं. ऐसा करते हुए वे अक्सर इस बात का भी ख्याल नहीं करते हैं कि उनका ऐसा करना कुछ लोगों को कितना असहज कर सकता है. कोरोना संकट के दौरान बरती जाने वाली अतिरिक्त सावधानी का असर यह हुआ है कि अब लोग रूमाल, टिश्यू, मास्क या कुहनी के सहारे बहुत संभलकर छींकते-खांसते दिखाई देते हैं. दिलचस्प यह है कि पहले सर्दी-जुकाम का मरीज अक्सर इस बात से परेशान रहता था कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है और लोग उसे कह रहे हैं कि अरे बस जुकाम ही तो हुआ है. लेकिन अब लोग जुकाम को इतनी गंभीरता से लेने लगे हैं कि किसी को दो-चार बार छींक या खांसी आ जाने पर ऐसी नज़रों से देखा जाता है जैसे सामने वाले ने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो. और मरीज कुछ इस तरह के भाव देता रह जाता है कि बस जुकाम ही तो है. ऐसे में किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए लोग साधारण सर्दी-जुकाम में भी अतिरिक्त सावधानी बरतते नजर आने लगे हैं.

अपनी बारी आने का इंतज़ार करना

कोरोना संकट की शुरूआत से ही सबसे ज्यादा ज़ोर फिजिकल डिस्टेंसिंग पर दिया जा रहा है. अब भी किसी सार्वजनिक स्थान पर खड़े लोगों को एक-दूसरे से कम से कम तीन फीट की दूरी पर खड़े होने की सलाह दी जा रही है. इसकी वजह से पिछले कुछ समय से सब्जी और राशन की दुकानों पर भी लंबी-लंबी लेकिन अनुशासनबद्ध कतारों को देखा जा सकता है. इसमें दोहरा अनुशासन यह है कि इन कतारों में भी लोग उन जगहों पर ही खड़े हो रहे हैं जहां पर उन्हें एक-दूसरे से दूर रखने वाले गोले बने होते हैं. सबसे दिलचस्प नज़ारा पिछले दिनों उन शराब की दुकानों पर दिखाई दिया जहां पहले हर वक्त भगदड़ सी मची रहा करती थी. कोरोना वायरस के प्रकोप की वजह से इन दुकानों पर भी लोग सैकड़ों मीटर लंबी लाइनों में शांति से अपनी बारी का इंतज़ार करते दिखाई दिए. ऐसा माना जा रहा है कि कोरोना प्रकोप शांत होने के बाद जीवन में जो बदलाव होंगे उसमें फिजिकल डिस्टेंसिंग एक ज़रूरी हिस्सा बनकर हमेशा के लिए रह जाने वाला है. ऐसे में हो सकता है कि हमारा समाज भी स्थायी तौर पर अपनी बारी का इंतजार करने वाला समाज बन जाये.

खाने-पीने या बाकी जरूरी सामान की बरबादी से बचना

आंकड़ों की मानें तो, सामान्य परिस्थितियों में लगभग 20 करोड़ लोग भारत में रोज़ाना भूखे पेट सोते हैं. वहीं, एक लाख क्विंटल खाना हर साल हमारे देश में डस्टबिन में फेंक दिया जाता है. इस भयावह आंकड़े में होटलों या सामाजिक आयोजनों में बरबाद होने वाले खाने के साथ-साथ वह खाना भी शामिल है जो मध्यवर्गीय घरों में बासी या बचा हुआ कहकर कूड़ेदानों या नालियों के हवाले कर दिया जाता है. कोरोना संकट के चलते खाने-पीने की चीजों की कमी का डर अब इनकी बरबादी कम होने की वजह भी बन रहा है. कुछ मध्यवर्गीय गृहणियों से हुई सत्याग्रह की अनौपचारिक बातचीत में उनका कहना था कि अब वे इस बात का ख्याल रखती हैं कि घर में उतना ही खाना बने जितना कि खपत हो सके और अगर कुछ बचता है तो पहले वह खत्म हो.

इसके अलावा, कई फिल्मी-सोशल मीडिया हस्तियों समेत आम लोगों का एक बड़ा तबका अक्सर यह कहता रहा है कि ईएमआई की सुविधा और हर समय मौजूद रहने वाले ऑनलाइन विकल्पों के चलते, वे तमाम ऐसी चीजें भी खरीद लेते थे जिनकी सही मायनों में उन्हें जरूरत ही नहीं है. लॉकडाउन ने बेज़ा खरीदारी की लत के शिकार ऐसे लोगों को भी होश में आने का मौका दे दिया है. यानी, यह कहा जा सकता है कि बहुत सारे लोग अब दाना-पानी से लेकर पैसों तक को बरबाद न करने का सबक कोरोना संकट के चलते सीख रहे हैं.

परिजनों या करीबी लोगों के संपर्क में रहना

लॉकडाउन के चलते करीब दो महीने से ज्यादा वक्त से अपने घरों में बंद लोग फोन और इंटरनेट के जरिए ही अपने परिवार और दोस्तों से जुड़ पा रहे हैं. लेकिन खास बात यह है कि वे ऐसा कर खूब रहे हैं. वे लोग जो कभी व्यस्त होने या फिर घरवालों को वरीयता न देने के चलते कभी-कभार ही उनसे संपर्क करते थे, अब घर की खैर-खबर नियमित तौर पर लेते दिखने लगे हैं. इतना ही नहीं, कई लोग तो अपने भूले-बिसरे दोस्तों और रिश्तेदारों को भी खोज-खोजकर उनका हालचाल जानने के बहाने खुद को व्यस्त और खुश रखने की कोशिश करते दिख रहे हैं. यह देखना दिलचस्प है कि एक ऐसे समय में जब लोग आपस में मिल तक नहीं पा रहे हैं, एक-दूसरे को अपेक्षाकृत ज्यादा समय दे रहे हैं.

इसके अलावा भी, कुछ ऐसे लोग जिनकी उपस्थिति हमारी रोजमर्रा का हिस्सा थी, जैसे हाउस-हेल्प, सफाईकर्मी, डिलीवरी बॉय या छोटे-मोटे काम करने वाले और कई लोग, उनका भी महत्व इस कठिन समय में समझ आने लगा है. इसलिए उनसे संपर्क रखने, उनकी मदद और सम्मान करने की ज़रूरत भी एक बड़ा तबका महसूस करता दिखने लगा है. कुल मिलाकर, आधुनिकता के चलते एकल परिवारों या अकेले होने को तरजीह देने वाले, हमारे आसपास के कई लोग अब यह बात स्वीकार करते दिखने लगे हैं कि अपने लोगों के करीब रहना, एक सोशल सर्कल का होना और जिंदगी आसान बनाने वाले कई लोगों की उपस्थिति हमारे लिए कितनी ज़रूरी है.

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