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योगी के माइग्रेशन कमीशन की सच्चाई, प्रवासी मजदूर फिर प्रवास के लिए मजबूर

योगी के माइग्रेशन कमीशन की सच्चाई, प्रवासी मजदूर फिर प्रवास के लिए मजबूर

योगी आदित्यनाथ ने लॉकडाउन के दौरान कहा था कि हम प्रवासी मजदूर को उत्तर प्रदेश में रोजगार देंगे। माइग्रेशन कमीशन इन प्रवासियों के लिए बीमा, सामाजिक सुरक्षा, पुनः रोजगार सहायता, बेरोजगारी भत्ता देने के लिए जरूरी कदम उठाएगा। लेकिन हुआ कुछ भी नहीं, प्रवासी मजदूर रोजगार के आभाव में फिर से प्रवास करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। 

सच के साथ |“ये श्रमिक हमारे सबसे बड़े संसाधन हैं और हम उन्हें उत्तर प्रदेश में रोजगार देंगे…..माइग्रेशन कमीशन इन प्रवासियों के लिए बीमा, सामाजिक सुरक्षा, पुनः रोजगार सहायता, बेरोजगारी भत्ता देने के लिए जरूरी कदम उठाएगा…..” यह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री शब्द हैं। 

लगभग साढ़े तीन महीने पहले जब राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रवासी श्रमिकों की आपदा को जल्दी ही अवसर में बदलने का वादा किया था तो किसी भी श्रमिक के लिए यह पुनर्जीवन मिलने जैसा प्रतीत होने से कम नहीं रहा होगा। कोरोना और लॉक डाउन के चलते अपना रोजगार गंवाने वाले प्रवासी श्रमिक जब अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश लौटने लगे तो न उनकी जेब में पैसा था न भविष्य के सपने। 

तब ऐसे में उनके जीवन यापन की जिम्मेवारी राज्य सरकार ने यह कहते हुए ली थी कि अब किसी भी श्रमिक को अपना प्रदेश छोड़ कर जाने की जरूरत नहीं  है क्यूंकि अब यहीं पर उनके हुनर और रुचि के अनुसार उन्हें प्रशिक्षण देकर उनको रोजगार से जोड़ा जाएगा। बकायदा माइग्रेशन कमीशन बनाने की बात कही गई जो बना भी, बावजूद इसके स्थिति कुछ और ही नजर आती है। 

क्या वाकई ऐसे अवसर पैदा किए जा रहे हैं कि प्रवासी मजदूर अब वापस जाने की नहीं सोच रहे। हर हाथ को काम देने की जो राज्य सरकार की घोषणा थी क्या वह सच में पूरी हो रही है। कुल मिलाकर जमीनी हकीकत क्या है? इसे जानने के लिए मैंने  कुछ जिलों के प्रवासी श्रमिकों से बात की और उनसे जानना चाहा कि क्या सच में अब उनके लिए हालात बदलने लगे हैं?

 इसी क्रम में वामपंथी पार्टी भाकपा माले द्वारा प्रवासी मजदूरों पर विभिन्न जिलों में किए गए सर्वे को भी स्टोरी का आधार बनाया और कुल मिलाकर जो नतीजा सामने हैं, वे जमीनी सच्चाई को बयां करने के लिए काफी है l सबसे पहले मेरी बातचीत हुई बनारस जिले के तिलारी उर्फ नारायणपुर गांव के सूरज और जयहिंद से। पहले यह जिला इसलिए चुना क्योंकि हम सब जानते हैं कि बनारस हमारे प्रधानमंत्री जी का संसदीय क्षेत्र है-

सूरज राजभर ने तय कर लिया है कि वे अब किसी भी तरह अपने काम पर वापस महाराष्ट्र लौट जाएंगे। वे कहते हैं कि हम प्रवासी श्रमिकों के जीवन यापन के लिए राज्य सरकार ने जो वादे किए थे, वो हमारे पक्ष में कहीं से भी पूरे होते दिखाई नहीं दे रहे तो अब भूखे मरने से बेहतर है कि वापस लौटा जाए। बनारस जिले के तिलारी उर्फ नारायणपुर गांव के रहने वाले तैंतीस वर्षीय सूरज राजभर महाराष्ट्र के थाना तालुका ओसई में फर्नीचर की दुकान पर काम करते थे। मौजूदा हालात के चलते काम पर असर पड़ा, लॉक डाउन हुआ तो मई में गांव लौट आए। सूरज कहते हैं जब हम सब प्रवासी मजदूर अपना सबकुछ गंवा कर खाली हाथ घर लौटे तो राज्य सरकार की उन बातों और वादों से हमें सच में बल मिला था जब यह कहा गया था कि अब एक भी प्रवासी मजदूर को वापस जाने नहीं दिया जाएगा यहीं अपने ही राज्य में हर श्रमिक के हाथ को काम मिलेगा और जिसके अंदर जो कौशल क्षमता है उसे उसकी ट्रेनिंग देकर उसके लिए रोजगार के अवसर पैदा किए जाएंगे,  लेकिन ऐसा होता बिलकुल नहीं दिख रहा। सूरज ने बताया कि उनके गांव में और भी कई प्रवासी श्रमिक हैं जो बेरोजगारी के हालात में वापस अपने काम पर लौटने की योजना बना चुके हैं। वे कहते हैं हमारे पास जीवन यापन करने भर तक की खेती भी तो नहीं जो उसी के भरोसे एक लंबा समय काट लें।

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के निवासी मोहम्मद यूनुस सूरत में रहकर हीरा कारोबार से जुड़े हुए हैं उनके मालिक ने उनको फोन करके बताया कि फैक्ट्री चालू हो गई है वापस आ जाओ, इसके बाद तो उन्होंने काफी प्रयास किया रेलवे का टिकट निकालने हेतु लेकिन जब रेलवे का टिकट नहीं मिल पाया तो उन्होंने प्राइवेट बस वालों से संपर्क किया प्राइवेट बस मालिकों का कहना है कि भाड़ा थोड़ा ज्यादा लगेगा, बस वाले लगभग 4 गुना बड़ा मांग रहे हैं जो है ट्रेनों की अपेक्षा, खैर बातचीत करने के बाद पता चला कि बस वाले भाड़ा ज्यादा केवल इसलिए ले रहे हैं क्योंकि रास्ते में उन्हें पुलिस वालों को देना होता है अब इसमें बस वालों की गलती है या पुलिस वालों की गलती है अभी इस पर आप विचार करिए आप जो खुद विचार करें रास्ते में जगह-जगह चेकिंग रहती है पुलिस की पुलिस बस को रोकती है ड्राइवर बस के नीचे उतरता हजार रुपे पकड़ा देता है बोलते हैं ठीक है जाओ, अब इसमें लूट तो जनता रही है ना। जिसकी जवाबदेही सरकार को तय करनी चाहिए।


सूरज खुशकिस्मत हैं कि उनके मालिक ने उन्हें वापस काम पर बुला लिया है लेकिन इसी गांव के सत्ताईस वर्षीय जयहिंद कहते हैं अब सब्र नहीं होता न तो इधर ही सरकार हमारी सुध ले रही है, न ही मालिक काम पर बुला रहे हैं, मनरेगा का भी कोई काम नहीं हो रहा कि जो थोड़ा बहुत कमा लें। जयहिंद कर्नाटक के बेलगाम जिले के मच्छे गांव स्थित गाड़ियों के पार्ट्स बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते थे। वे कहते हैं सुन तो बहुत दिनों से रहे हैं कि सरकार ने हम जैसे प्रवासी श्रमिकों के रोजगार के लिए लिए बहुत योजनाएं बनाई  हैं,लेकिन यह कैसी योजनाएं हैं जो हमारे लिए ही बनी हैं और हमें ही नहीं बताया जा रहा। जयहिंद कहते हैं अब कितने दिन और इंतजार करें कि हमारे लिए कुछ होगा परिवार का पेट भी तो भरना है।

सूरज और जयहिंद की तरह ही चंदौली जिले के उसरी गांव (ब्लॉक साहबगंज) निवासी चंद्रशेखर पासवान भी एक प्रवासी श्रमिक हैं। मुंबई के भयंदर ईस्ट में बर्तन बनाने वाली फैक्ट्री में पिछले करीब बीस सालों से काम करते थे। इस महामारी में फैक्ट्री बंद हुई तो अप्रैल में गांव लौट आए। चन्द्रशेखर कहते हैं यदि अपने ही प्रदेश में रोजगार सरकार दे दे तो वे मुंबई नहीं जाएंगे। जब मैंने बताया कि सरकार ने एक माइग्रेशन कमीशन बनाया है आप जैसे प्रवासी श्रमिकों के लिए ताकि आप लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए जा सके तो चंदशेखर ने बताया कि इसकी न तो उन्हें कोई जानकारी है और न ही कभी सरकार के किसी आदमी ने उनके गांव में कोई सर्वे किया। चन्द्रशेखर के मुताबिक उनके गांव में और भी कई प्रवासी श्रमिक जो आज भी बेरोजगार हैं । ऐसा ही कुछ कहना है सीतापुर जिले के गुरधप्पा गांव के श्रमिक सतेंद्र कुमार का। सतेंद्र ने बताया कि उनके गांव में कम से कम पचास प्रतिशत लोग प्रवासी श्रमिक ही हैं और इस समय सब बेरोजगार हैं । वे कहते हैं हम सब मुख्यमंत्री जी से निवेदन करते हैं कि हमारे बारे में सोचा जाए और हमें रोजगार से जोड़ा जाए जैसा कि खुद उनका भी वादा था।
 
बेरोजगारी की यहीं दास्तां प्रवासी श्रमिक परशुराम जी की भी है और  इसी बेरोजगारी से हार कर आखिरकार वापस दिल्ली लौटने का पक्का इरादा भी कर चुके हैं । वे बताते हैं कि किसी तरह अपने एक परिचित की मदद से दिल्ली की एक दुकान में  मामूली से वेतन पर काम का बंदोबस्त कर लिया है।  परशुराम बस्ती जिले के  हरैया तहसील के पिपरा गांव निवासी हैं। वे बताते हैं कि केवल वे ही नहीं उनके गांव और उनके गांव के अगल बगल के गांव के लोग भी नए रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने की तैयारी कर रहें हैं। तो वहीं लखीमपुर खीरी जिले के तराई इलाके के गांव सेमरघाट, अलियापुर, पिपरी अजीज, मकसूदपुर, मैगलगंज आदि से हजारों प्रवासी श्रमिकों के पुनः पलायन की पुष्टि वहां की एपवा नेत्री माला सिंह करती हैं। वे कहती हैं सरकार की ओर से इन प्रवासी श्रमिकों के लिए बस घोषणा भर ही हुई लेकिन धरातल पर वे योजनाएं कार्यरूप लेती नहीं दिख रही । उन्होंने बताया कि ट्रक और गाड़ियां भर भर कर कई गांवों के हजारों श्रमिकों को हमने दोबारा पलायन करते देखा है वो भी तब जब लॉक डाउन ही चल रहा था। माला सिंह सवाल उठाती हैं कि आखिर लॉक डाउन में कैसे इन गाड़ियों और ट्रकों को जाने की इजाज़त मिल गई थी यह प्रश्न सरकार और सिस्टम से पूछना जरूरी हो जाता है। वे कहती हैं, बेरोजगारी और बाढ़ से बेहाल मजदूर आख़िर करे तो क्या करे जब यहां उसको कुछ नहीं मिल रहा, न रोजगार न उचित दिहाड़ी तो वे पलायन करेंगे ही।

पिछले दिनों इन प्रवासी श्रमिकों की स्थिति का सही सही आंकलन करने के उद्देश्य से वामपंथी पार्टी भाकपा माले ने उत्तर प्रदेश के दस जिलों (सीतापुर, बनारस, चंदौली, भदोही, सोनभद्र, मिर्जापुर, गाजीपुर, महाराजगंज, बलिया, लखीमपुर खीरी) के करीब डेढ़ सौ गांवों का सर्वे किया और पाया कि हजारों प्रवासी श्रमिक बेरोजगारी के चलते बदहाल जीवन जीने को विवश हैं। एक बड़ी संख्या दूसरे राज्यों में दोबारा पलायन कर चुकी है और जो अभी तक इस उम्मीद में यहां टिके थे कि शायद  सरकार उनकी सुध  लेगी वे भी अब हताश होकर जाने की योजना बना चुके हैं। इनमें से अधिकांश जिले अति पिछड़े जिलों की श्रेणी में आते हैं, बावजूद इसके राज्य सरकार की नजर यहां तक प्रवासी श्रमिकों की बदहाल हालात तक क्यूं नहीं जाती यह प्रश्न उठना लाजिमी है। अपनी स्टोरी के सिलसिले में जब कुछ प्रवासी श्रमिकों और इन श्रमिकों के बीच बड़े पैमाने पर काम कर रही भाकपा माले के जिलों सचिवों से  मेरी बातचीत हुई तो यह सच भी सामने आया कि जब ये श्रमिक वापस अपने घर लौट रहे थे तो तब राज्य सरकार ने प्रत्येक श्रमिक को एक हजार रूपए और तीस किलो आनाज देने की बात कही थी, अनाज तो नब्बे प्रतिशत लोगों के हिस्से में आया ही नहीं, एक हजार रूपए भी किसी को मिले किसी को नहीं इतना ही नहीं जैसा की कहा गया था कि मनरेगा में काम दिया जाएगा तो वहां भी स्थिति असंतोषजनक ही रही, कहीं मनरेगा के तहत काम हुआ ही नहीं और जहां हुआ भी वहां ज्यादा दिन मनरेगा कार्य हुआ ही नहीं।


 इसमें दो मत नहीं कि बेरोजगारी की मार ने  इन प्रवासी श्रमिकों के सामने पहाड़ जैसी विकट परिस्थितियां पैदा कर दी हैं न रोजगार बचा न सरकार से उम्मीद ही बची। जिनके पास थोड़ी बहुत भी खेती योग्य जमीन है तो वे उस खेती के भरोसे कुछ समय के लिए जीवन यापन  कर सकते हैं लेकिन भूमिहीन श्रमिक आखिर अपने परिवार का पेट कैसे भरे यह सवाल बेहद डराता है। जब एक श्रमिक कहता है की “हालात ऐसे हो गए हैं कि हम अपने पड़ोसी से भी किसी प्रकार की कोई आर्थिक मदद नहीं ले पा रहे क्यूंकि वह खुद इस हालात का शिकार है” तब निश्चित ही ऐसी बातें हृदय चीर देती है

     
 नोट– (इन माइग्रेंट लेबर्स के लिए बनाया गया प्रवासी आयोग (माइग्रेशन कमीशन) किस स्तर पर काम कर रहा है और उसकी प्रगति रिपोर्ट क्या है आदि इन सवालों को जानने के लिए जब मैंने  उत्तर प्रदेश श्रम विभाग की शाखा प्रशिक्षण एवम् सेवायोजन की वेबसाईट्स से निदेशक का नंबर प्राप्त कर उस नंबर पर फोन लगाया तो पता चला की अभी तक वेबसाईट पर जिन निदेशक का नाम दर्ज है उनका तो दो साल पहले ही ट्रांसफर हो चुका है यानी की दो साल से सरकार की यह वेबसाईट तक अपडेट नहीं हो पाई, खैर फिर पूछने पर दूसरे पदास्थापित निदेशक का नंबर मिला, जब उस नंबर पर फोन मिलाया तो निदेशक साहब के पी ए ने फोन रिसीव किया और बताया कि सर अभी मीटिंग में बिजी हैं फिर मुझसे फोन करने का कारण पूछा और मेरा फोन यह कहते हुए ले लिया कि जैसे ही सर फ़्री होते हैं बात करवा दी जाएगी जब वहां से कोई रिस्पॉन्स नहीं आया तो अगले दिन यानी को मैंने दो तीन बार फिर फोन मिलाया इस बार भी घंटी तो बजी लेकिन फोन रिसीव नहीं हुआ)

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