इतिहास

संपादकीय:दूसरी महामारी का नाम बेरोज़गारी

निरंतर जारी बेरोज़गारी का यह दौर केवल एक सामाजिक संकट नहीं है, बल्कि यह एक प्रमुख वृहद आर्थिक (macro-economic) रोग है।

सच के साथ |‘‘2020 में 40,84,000 भारतीय युवाओं की नौकरियां चली जाएंगी’’- यह चौंकाने वाला आंकड़ा किसी वामपंथी संगठन के पर्चे में लिखी भविष्यवाणी नहीं है। यह एडीबी (Asian Development  Bank) और आईएलओ (International Labour Organisation) का माना हुआ आकलन है, जो उन्होंने 18 अगस्त को जारी की गई अपनी संयुक्त रिपोर्ट में प्रस्तुत किया है। यह रिपोर्ट युवा रोज़गार के परिदृश्य पर कोविड-19 महामारी के प्रभाव के संबंध में है, जिसका शीर्षक है-‘‘टैक्लिंग द कोविड-19 यूथ एम्प्लॉयमेंट क्राइसिस इन ऐशिया ऐण्ड द पैसिफिक’’(Tackling the Covid-19 Youth Employment Crisis in Asia and the Pacific).

आईएलओ का ऐसी रिपोर्ट जारी करना तो समझ में आता है, पर आईडीबी, जो एशियायी क्षेत्र में विश्व बैंक का क्लोन है, और औपचारिक अर्थव्यवसथा में प्रधान उधार देने वाला संगठन है, भला युवा बेरोज़गारी के बारे में क्यों चिंतित होने लगा? इसका उत्तर एकदम सरल हैः निरंतर जारी बेरोज़गारी का दौर केवल एक सामाजिक संकट नहीं है, बल्कि यह एक प्रमुख वृहद आर्थिक (macro-economic) रोग है।

श्रमिकों के लिए मांग पैदा करने के लिए अर्थव्यवसथा को कार्यकारी होना होगा। तभी रोजगार पैदा होंगे। जब अर्थव्यवस्था मंदी की ओर लुढ़कने लगती है-या उससे भी बुरा, वह एक अभूतपूर्व डिप्रेशन की ओर जाती है-और काफी लम्बे समय के लिए नकारात्मक विकास (negative growth) दिखाती है, वह नए रोजगार क्या पैदा करेगी, बल्कि वर्तमान रोजगार की स्थिति में भी छंटनी करने लगती है। यही है ‘बेरोज़गारी’। नौकरी न होने के मायने हैं आय न होना और क्रय शक्ति का ह्रास। जाहिर है कि इसके अनुरूप सकल मांग में गिरावट आएगी। जब अर्थव्यवस्था में पहले से ही गिरावट है, तो घरेलू मांग में और अधिक गिरावट संकट को बढ़ाने का काम करेगा और रिकवरी को भी टालेगा। तो अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित यानी रिवाइव करने हेतु मांग प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से कोई भी स्टिमुलस पैकेज को क्या करना होगा? उसे एक अलग श्रेणी के बतौर बेरोज़गारी की समस्या पर उपयुक्त नीति निर्माण के जरिये उसका हल निकालना होगा। कुल मिलाकर 42 पन्ने वाली एडीबी-आईएलओ रिपोर्ट का बुनियादी आधार यही है।

बेरोज़गारी एक वृहद् समस्या है जो महामारी से पहले से थी और उसके द्वारा अवक्षेपित हुई व बिगड़ गयी है; वह सभी को परेशान कर रही है। तो क्यों केवल युवा बेरोज़गरी की बात की जाए और कोविड-19 के प्रभाव को ही प्रधानता क्यों दी जाए? रिपोर्ट खुद ही स्पष्ट करती हैः‘‘ एशिया और पैसिफिक में युवाओं के रोज़गार की संभावनाओं पर कोविड महामारी की वजह से भारी प्रभाव पड़ा है। तत्कालीन संकट में वयस्कों की अपेक्षा युवाओं को अधिक धक्का सहना होगा। नतीजतन उन्हें ज्यादा दीर्घकालीन आर्थिक व सामाजिक घाटे सहने पड़ेंगे। महामारी से पूर्व युवा श्रम बाज़ार में पहले से ही चुनौतियों का सामना कर रहे थे। ये कोविड-19 संकट की वजह से और भी भयावह हो गया और इसके बहुआयामी प्रभाव एक ‘Lockdown Generation’ तैयार करने का खतरा पेश कर रहे हैं, जो कि काफी लम्बे समय के लिए इस संकट का बोझ सहेगा।’’

आखिर इस महामारी के चलते वयस्कों की तुलना में युवाओं को क्यों अधिक झटका लगेगा? रिपोर्ट के अनुसार एशिया व पैसिफिक क्षेत्र में करीब आधे जवान श्रमिक ऐसे चार सेक्टरों में कार्यरत हैं जो इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित हैं। ये चार क्षेत्र हैं: थोक व खुदरा व्यापार और रिपेयर, मैनुफैक्चरिंग, रेंटल व बिजनेस सर्विसेस (Rental and Business Services), एकोमोडेशन ऐण्ड फूड सर्विसेस (Accomodation and Food Services)। यह एक कारण है जिसकी वजह से कोविड-19 के दौर में वयस्कों की तुलना में युवाओं को श्रम बाज़ार में विघ्न और रोज़गार संकट का सामना करना पड़ रहा है। शिक्षण और प्रशिक्षण में रोक लगने की वजह से यह प्रभाव और भी अधिक बढ़ा है, जिसके कारण श्रम बाज़ारों तक और उनके भीतर उनके आवागमन पर असर पड़ेगा। पूर्व संकटों की भांति इसका प्रभाव भी ‘‘झुलसाने वाला’’ साबित होगा।

महामारी से पहले भी वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर अग्रसर थी और अब कोविड-19 ने उसे संभावी डिप्रशन की और धकेल दिया है। रिपोर्ट में इसपर विस्तार किया गया हैः‘‘कोविड-19 महामारी से भी पहले, युवाओं को सम्मनजनक काम पाने में कई सारी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा था। एशिया पैसिफिक क्षेत्र में युवा बेरोज़गारी दर 2019 में 13.8 प्रतिशत था जबकि वयस्कों का 3.0 प्रतिशत था और वैश्विक युवा बेरोज़गारी दर 13.6 था। 16 करोड़ युवा यानी जनसंख्या का 24 प्रतिशत 2019 में न ही रोजगार में थे और न शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। उक्त क्षेत्र में बेरोज़गारी का दर इसलिये बढ़ रही है कि युवा महिलाओं के ऊपर घरेलू काम और बच्चों, बूढ़ों व बीमारों की देखरेख का बोझ बहुत अधिक है। पांच में से चार श्रमिक इस क्षेत्र में अनौपचारिक रोज़गार में लगे हैं, जो वयस्कों की तुलना में काफी अधिक है; और चार में एक युवा श्रमिक चरम या मध्यम स्तर की गरीबी में जी रहा/रही थी।’’

आगे, रिपोर्ट बताती है कि युवाओं के लिए रोज़गार में कमी 2020 भर जारी रहेगी, जिसकी वजह से बेरोज़गारी की दर दूना हो जाएगी। 2020 में भारत (जिसके लिए आकलन हो चुका है) सहित एशिया व पैसिफिक के 13 देशों में 1 से 1.5 करोड़ युवाओं के रोज़गार खत्म हो सकते हैं। ये आंकलन नॉन-कोविड परिदृष्य की तुलना में इस वर्ष के आउटपुट में अपेक्षित गिरावट और उसके फलस्वरूप लेबर डिमांड में कमी पर आधरित हैं।

रिपोर्ट के पृष्ठ 21 की तालिका 4 में भारत के आकलन दिये गए हैं। भारत में रोज़गार में गिरावट लॉकडाउन (lockdown) जैसे नियंत्रणात्मक (containment) कदमों की समयावधि के अनुपात में है। यदि हम माने कि नियंत्रण अप्रैल से सितम्बर 2020 तक, यानी 6 महीने तक है, तो युवाओं के लिए कुल रोज़गार में कमी इस वर्ष के लिए 61 लाख होगी। यदि लॉकडाउन जून में समाप्त हुआ होगा, नियंत्रण की इस छोटी अवधि के लिए भी युवाओं के लिए जॉब लॉस 41 लाख होगा। परंतु लॉकडाउन से पूर्व 2019 में भारत का युवा बेरोज़गारी दर 23.3 प्रतिशत थी, जैसा कि रिपोर्ट ने आकलन किया है। 2020 में, पूरे वर्ष के लिए युवा बेरोज़गारी दर 29.5 प्रतिशत होगी, यदि नियंत्रण या कन्टेनमेंट छोटा है, पर यदि कन्टेनमेंट 30 सितंबर 2020 तक यानी छह महीने तक होगा तो युवा बेरोज़गारी की दर 32.5 प्रतिशत होगी। इन आंकडों में एक ही कमी है कि ये आंकलन इस अनुमान पर आधरित हैं कि 2020 में भारत की जीडीपी का नकारात्मक विकास होगा यानी विकास -4 (माइनस चार) प्रतिशत होगा। पर रिपोर्ट जारी होने की पूर्वबेला में विश्व बैंक ने आकलन प्रस्तुत किया कि भारत के जीडीपी का नकारात्मक विकास 5.1 प्रतिशत होगा। आंकलन करने वाली कुछ प्राइवेट एजेंसियों ने भविष्यवाणी की है कि देश के जीडीपी का नकारात्मक विकास 11 प्रतिशत तक हो सकता है। तो रोज़गार में वास्तविक गिरावट का आंकड़ा काफी अधिक हो सकता है।


रिपोर्ट प्रस्तावित करती है कि युवा बेरोज़गारी की समस्या को हल करने के लिए क्षेत्र की सरकारों को अविलंब व्यापक पैमाने पर ऐसे टार्गेटेड रिस्पांस अपनाने चाहिये जो निम्नलिखित मुद्दों पर केंद्रित हों:

1.         वेतन सब्सिडी (wage subsidy) और सार्वजनिक रोज़गार कार्यक्रमों सहित समग्र श्रम बाज़ार नीतियां बनें

2.         शिक्षण व प्रशिक्षण में पड़ी बाधा का युवा छात्रों पर पड़ने वाले प्रभाव को कम से कम करना। कोविड-19 की रोकथाम के लिए कदम यदि प्रभावशाली तरीके से लागू हों तो सबसे गरीब व कमज़ोर युवाओं तक पहुंचा जा सकेगा और युवाओं को अर्थपूर्ण तरीके से नीति के प्रश्न पर और सामाजिक सवालों पर भी संवाद में शरीक किया जा सकता है।

ठोस रूप से एडीबी और आईएलओ का प्रस्ताव है:-

  •   युवाओं को टार्गेट करते हुए वेतन सब्सिडियां और सार्वजनिक रोज़गार कार्यक्रम प्रदान किये जाएं
  •   नौकरी तलाशने वाले युवाओं को युवा रोज़गार-संबंधित सुचनाएं और रोज़गार सेवाएं प्रदान की जाएं
  •   एप्रेंटिसशिप कार्यक्रमों का विस्तार करें और मांग के अनुसार कौशल विकास का समर्थन करें
  •   कौशल बढ़ाने ओर पुनर्कौशल (re-skilling) विकास, खासकर विकासशील क्षेत्रों के लिए, फंड बढ़ाये जाएं
  •   सभी को शिक्षा, प्रशिक्षण व उद्यमिता तक न्यायसंगत पहुंच हासिल करने के लिए डिजिटल तकनीक के दायरे में लाने हेतु    निवेश हो
  •   पूंजी तक पहुंच हासिल करवाने के जरिये युवा उद्यमियों को सहयोग देना; साथ में गैर-वित्तीय सेवाएं उपलब्ध कराना।

महामारी से पूर्व भारत में बेरोज़गारी की समस्या से निपटने के लिए मोदी का क्या रिकार्ड रहा है? मोदी सरकार ने हाल के बेरोज़गारी से संबंधित आंकड़ों को दबाया है। वर्तमान डिजिटल युग में रोजगार दफ्तरों के ताज़ा या लाइव रजिस्टरों में पंजीकृत बेरोज़गारों के आंकड़े श्रम व रोज़गार मंत्रालय के सरकारी साइट पर उपलब्ध है, पर आश्चर्य की बात है कि ये 2017 तक के हैं। अंतिम सरकारी आंकड़ों में 424.4 लाख नौकरी ढूंढने वालों के नाम दिसम्बर अंत 2017 के देश के 997 रोज़गार दफ्तरों के रजिस्टरों में दर्ज हुए हैं। इनमें से 1115.2 लाख लोग जो नौकरी तलाश रहे थे, महिलाएं थीं! जहां तक कि प्लेसमेंट की बात है तो केवल 4.25 लाख नौकरी तलाशने वालों को 2017 में रोज़गार दफ्तरों के माध्यम से प्लेसमेंट मिला। यानी एक वर्ष में ठीक 1 प्रतिशत की रफ्तार से। इस रफ्तार से यदि चला जाए तो पिछले बैकलॉग को खत्म करने के लिए 100 साल लग जाएंगे! हम याद करें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने वायदा किया था कि प्रतिवर्ष 2 करोड़ रोज़गार पैदा करेंगे, पर विमुद्रीकरण (demonetization) के जरिये वे 1 करोड़ नौकरियां खा गए। फिर 2019 में जो आर्थिक मंदी आई, उसके चलते बाकी के कई करोड़ रोज़गार खत्म हो गए। हम अनुमान लगा सकते हैं कि कोविड-19 संकट और उसके फलस्वरूप आने वाले आर्थिक डिप्रशन में कितने और रोज़गार समाप्त हो जाएंगे।

जुलाई 2015 में मोदी सरकार ने करीब 1000 रोज़गार दफ्तरों को डिजिटल तरीके से समन्वित किया था और नेशनल कैरियर सर्विस स्थापित किया, पर वह केवल एक सूचना केंद्र या इन्फॉर्मेशन एक्सचेंज जैसे काम करता है और पंजीकृत कम्पनियों व सरकारी सेवाओं में रिक्त पद या वेकेंसी की सूचना देता है। 1.09 करोड़ नौकरी तलाशने वालों ने इस रोजगार सूचना पोर्टल पर अपने नाम दर्ज किये हैं परंतु पिछले पांच वर्षों में उसने केवल 67.99 लाख वेकेंसियों (vacancies) के बारे में सूचना दी। और तो और नेशनल कैरियर सर्विस इस बात पर मौन रहता है कि उसके माध्यम से कितनों को रोजगार मिला। तो जो पारदर्शिता की बात आती है, उसमें सरकारी घपलेबाज़ी साफ दिखाई देने लगती है।


अब देखें कि कोविड-19 के चलते पैदा हुए संकट के दौर में युवा बेरोज़गारी के समस्या-समाधान के लिए काम करने के लिहाज से मोदी सरकार का क्या रिकार्ड था? फरवरी 2020 में केंद्रीय बजट 2020-21 पेश किया गया था; उस समय बड़े आडम्बरपूर्ण ढंग से 50,000 करोड़ के गरीब कल्याण रोजगार अभियान की घोषणा की गई थी। पर वह मोदी के 12 मई 2020 के 20 लाख करोड़ वाले आत्मनिर्भर भारत अभियान वाले भाषण से गायब हो गया। वित मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम के विस्तृत अंशों के बारे में 13 और 17 मई 2020 के बीच 5 भागों में घोषणा की। गरीब कल्याण रोजगार अभियान में, जिसका पुनः गरीब कल्याण योजना नामकरण किया गया और जिसकी घोषणा पहले भाग में की गई थी, रोज़गार को बढ़ावा देने के लिए एक भी प्रावधान नहीं था। द्वितीय भाग में वित्त मंत्री ने 50,000 रुपये का मुद्रा-शिशु लोन लेने वालों को 2 प्रतिशत ब्याज सहायता देने की घोषणा की थी। इसमें कुल व्यय 1500 करोड़ रुपये का ही होता। सरकार क्यों मुद्रा लोन धारकों और स्वयं-सहायता समूहों की महिलाओं को पूर्ण लोन माफी नहीं दे देती?

रोजगार समर्थन के लिहाज से यदि कोई प्रमुख घोषणा की गई तो वह था मनरेगा के लिए 40,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त प्रावधान। यह देखते हुए कि मोदी शासन के पिछले कुछ वर्षों में इस कार्यक्रम में भारी कटौती की गई थी, यह स्पष्ट है कि इस अतिरिक्त आवंटन के जरिये भी मनरेगा को उसके पूर्व स्तर तक पहुंचाना संभव न होगा, खासकर कुल काम के दिनों के संदर्भ में।

जिन्हें रोज़गार नहीं मिला या जिन्होंने नौकरियां खो दीं, ऐसे युवाओं के लिए बेरोज़गारी भत्ता और बेरोज़गारी बीमा ही सबसे अर्थपूर्ण समर्थन के कदम हो सकते थे। श्रमिकों के लिए अटल बीमित व्यक्ति कल्याण योजना, जो 1 जुलाई 2018 में लाई गई थी, मोदी सरकार की एकमात्र बेरोजगार बीमा योजना है जो ईएसआईसी (ESIC)के माध्यम से कार्य करती है। यह योजना इतनी सांकेतिक व छोटी योजना है कि यह केवल 90 दिनों के लिए बेरोजगारी लाभ देती है और अंतिम प्राप्त वेतन का मात्र 25 प्रतिशत है। इसलिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सितम्बर 2019 तक केवल 58 श्रमिकों ने इस स्कीम के तहत 4.53 करोड़ रुपये प्राप्त किये। कुछ राज्यों में कन्टेनमेंट ज़ोन्स में लॉकडाउन सितम्बर तक चलेगा, जो किसी-न-किसी रूप में मार्च में शुरू हुआ था, पर श्रमिकों को केवल 90 दिनों का बेरोजगारी बीमा मिलेगा। दूसरी बात कि रोज़गार दफ्तरों के ताज़ा रजिस्टरों (live registers) में जिन युवाओं के नाम दर्ज हैं और वे नौकरी पाने के इंतज़ार में हैं, उनके लिए कोई बेरोज़गारी भत्ता नहीं है। यदि मोदी सरकार 10 करोड़ लोगों के लिए 1 साल तक 1000 रुपये प्रतिमाह की राहत दिलाएं तो भी राजकोष से 1.2 लाख करोड़ रुपये जाएंगे। ये निर्मला द्वारा कॉरपोरेट घरानों को दी गई कर-माफी का केवल आधा है। पर मोदी सरकार जुमलों से आगे बढ़कर रोजगार के लिये वास्तविक सहयोग कब देना अरंभ करेगी?

(लेखक आर्थिक और श्रम मामलों के जानकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं। )

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