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ये वैक्सीन अगर बन भी जाए तो क्या है!

ये वैक्सीन अगर बन भी जाए तो क्या है!

कोरोना वायरस से जुड़े दो नये शोध बताते हैं कि इसकी वैक्सीन बनाना जितनी बड़ी बात है उससे ज्यादा बड़ी बात उसके असर को टिकाऊ बनाना है.

सच के साथ |कोरोना वायरस महामारी ने पूरी दुनिया को बेहद गंभीर स्तर पर प्रभावित किया है. दुनिया भर के तमाम वैज्ञानिक और फार्मा कम्पनियां इस महामारी से निपटने के लिए एक वैक्सीन खोजने के काम में जुटी हुई हैं. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे वैक्सीन के कई उम्मीदवारों के रसायनों की दक्षता और उनके दुष्प्रभावों को जांचने के लिये परीक्षण किये जा रहे हैं. इनमें से कुछ ने प्रारंभिक ट्रायल्स पूरे करते हुए ऐसा विश्वास दिलाया है कि अब कोरोना वायरस की वैक्सीन बहुत दूर नहीं. रूस ने तो वैक्सीन बना लेने का दावा भी कर दिया है. भारत भी इस दौड़ में शामिल है और यहां भी कोरोना वायरस के दो टीकों के परीक्षण को हरी झंडी मिल चुकी है और कुछ और को जल्द ही मिल सकती है. दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने भी ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय और एस्ट्राजेनेका द्वारा विकसित किये जा रहे कोविड-19 के वैक्सीन को भारत में बनाने के लिए एक समझौता किया है.

लेकिन हाल ही में प्रसिद्ध जर्नल नेचरमेडिसिनमें प्रकाशित एक शोध के अनुसार कोविड-19 के संक्रमण से जूझ चुके मरीजों के शरीरों में विकसित हुए एंटीबॉडीज दो से तीन महीनों में कम होने शुरू हो जाते हैं. असल में एंटीबॉडीज वे खास तरह के प्रोटीन अणु होते हैं जिन्हें कोरोना वायरस से लड़ने के लिए हमारा प्रतिरोधक तंत्र विकसित करता है. ये एंटीबॉडीज हमारे शरीर में वायरस के आक्रमण के समय वायरस की बाह्य परत पर उपलब्ध उन चाभियों को ढंककर बेकार कर देते हैं जिनकी सहायता से वायरस हमारी कोशिकाओं को चकमा देकर उनकी झिल्लियों से अन्दर घुस जाते हैं. वायरस की बाह्य परत पर उपस्थित चाभियों पर एंटीबॉडीज के चिपक जाने से वायरस हमारे शरीर में उपस्थित कोशिकाओं के अन्दर नहीं घुस पाते और हम होने वाले संक्रमण से बच जाते हैं. बता दें कि कोरोना वायरस एक खास तरह के स्पाईक्स प्रोटीन अणुओं को हमारे शरीर की कोशिकाओं में झिल्ली पार करके घुसने के लिए इस्तेमाल करता है.

वानझोऊपीपुल्सहॉस्पिटल, चीन के वैज्ञानिकों ने विभिन्न बिना-लक्षणों वाले और गंभीर लक्षणों वाले कई मरीजों के नमूनों का विश्लेषण करके पाया है कि कोविड-19 संक्रमण के कारण विकसित हुए एंटीबॉडीज दो से तीन महीनों में व्यक्ति के शरीर में कम होना शुरू हो रहे हैं और इसके बाद काफी जल्दी ही शरीर से विलुप्त हो रहे हैं. इन एंटीबॉडीज के शरीर से विलुप्त होने का मतलब यह है कि कोई व्यक्ति एक बार संक्रमित होने के बावजूद दोबारा संक्रमित होने के लिए असुरक्षित हो गया है.

वैज्ञानिकों ने प्रयोगों में यह भी पाया कि उन मरीजों में शरीर के प्रतिरोधक तंत्र ने अपेक्षाकृत कम संख्या में एंटीबॉडीज बनाये, जिन मरीजों में कोविड-19 के संक्रमण के लक्षण कमजोर थे. इसके विपरीत जिन मरीजों में कोविड-19 संक्रमण के लक्षण अधिक गंभीर थे, उनके प्रतिरोधक तंत्र ने अपेक्षाकृत अधिक संख्या में एंटीबॉडीज बनाए थे. गंभीर लक्षणों वाले संक्रमित मरीजों के शरीरों में यह प्रतिरोधक एंटीबॉडीज अधिक समय तक मौजूद भी रहे. जबकि कमजोर लक्षणों वाले संक्रमित मरीजों में एंटीबॉडीज अपेक्षाकृत कम समय के लिए विद्यमान रहे. यह समय लगभग दो से तीन महीने पाया गया. यह विश्लेषण प्रसिद्ध जर्नल नेचरमेडिसिनमें 18 जून को प्रकाशित हुआ है.

इसके अलावा स्वतन्त्र रूप से शोध कर रहे किंग्स कॉलेज लन्दन के वैज्ञानिकों ने भी अपने प्रयोगों में पाया है कि ये एंटीबॉडीज संक्रमित लोगों के शरीर में लगभग 94 दिनों तक ही विद्यमान रहते हैं. इसके बाद इन एंटीबॉडीज की संख्या शरीर में तेजी से कम होने लगती है. कमजोर लक्षणों वाले लोगों या उन लोगों में जिनमें लक्षण आये ही नहीं ऐसे लोगों में ये एंटीबॉडीज एक ही महीने के बाद तेजी से कम होने लगते हैं. इन वैज्ञानिकों का यह शोध मेडआर्काइव में प्रीप्रिंट के रूप में प्रकाशित हुआ है.

ऐसे शोध वैक्सीन की दक्षता के सम्बन्ध में नए सवाल उठा रहे हैं. जैसे कि कोरोना वायरस की इन विशेषताओं के चलते भविष्य में बनने वाली वैक्सीन कितने दिनों तक लोगों को कोविड-19 यानी कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाकर रख पाएगी? अगर कोरोना वायरस के पिछले संस्करणों की बात करें तो उनके कारण मानव शरीर में बने एंटीबॉडीज दो से तीन साल तक उपस्थित रहते हैं. उदाहरण के तौर पर मेर्स-कोव वायरस के कारण बने एंटीबॉडीज लगभग दो से तीन साल तक मानव शरीर में उपस्थित रहते हैं. पोलियो वायरस की वैक्सीन के कारण बने एंटीबॉडीज ताउम्र शरीर की सुरक्षा करते हैं. नए कोरोना वायरस से लड़ने वाले एंटीबॉडीज का शरीर से जल्दी ख़त्म हो जाना अच्छा संकेत नहीं है. और यह तथ्य वैक्सीन बनाने की राह और भी जटिल कर देता है.

अब वैज्ञानिकों को वैक्सीन के दुष्प्रभावों और दक्षता के साथ-साथ, इस दक्षता की समयावधि को सुनिश्चित करने के बारे में भी सोचना है ताकि लोगों को मंहगी वैक्सीन बार-बार न देनी पड़े और यह ज्यादा लोगों को मिल सके. इन शोधों से यह भी स्पष्ट होता है कि कोरोना वायरस से एक बार संक्रमित होकर ठीक हो चुके मरीज दो से तीन महीनों के बाद फिर से संक्रमित हो जाने के लिए असुरक्षित हो जाते हैं. ऐसे में वैज्ञानिक संक्रमण से बचे रहना ही बेहतर विकल्प मान रहे हैं, जिसके लिए मास्क लगाना सर्वोत्तम है.

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