अखण्ड भारत

इतिहास:जानिए कौन है ये गांधी जी की लाठी पकड़कर आगे-आगे चलने वाला बच्चा, जो बड़ा होकर बना महान संत

सच के साथ |गांधी जी का व्यक्तित्व अपने आप में चमत्कारिक था। उनके संपर्क और सानिध्य में आने वाले लोग खुद को धन्य महसूस करते थे। उनकी बातें और शिक्षाएं लोगों के जीवन की दिशा बदल देती थीं। आधुनिक भारत के महानतम संत के रूप में महात्मा गांधी को लोग पूछते हैं। अहिंसा और सच्चाई के रास्ते पर चलने वाले दुनियाभर के करोड़ों लोग उन्हें अपना मार्गदर्शक मानते हैं, लेकिन कभी एक छोटा सा बच्चा महात्मा गांधी का मार्गदर्शक बना था। 

एक पुरानी तस्वीर में एक बच्चे को गांधी जी की लाठी पकड़े उनके आगे-आगे चलते देखा जाता है। यह गांधी जी की कुछ दुर्लभ तस्वीरों में से एक है। इस तस्वीर में एक छोटा सा बच्चा गांधी जी की लाठी का एक छोर पकड़कर आगे- आगे चल रहा है और गांधी जी लाठी का दूसरा छोर पकड़कर उसके पीछे चल रहे हैं। यह बच्चा उस वक्त चार वर्ष का था और यह तस्वीर साल 1933 की बताई जाती है। उन दिनाें महात्मा गांधी छत्तीसगढ़ आए थे और इस बच्चे ने उन्हें बेहद प्रभावित किया था। यह बच्चा जिसका नाम रामेश्वर था आगे चलकर स्वामी आत्मानंद के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज संत आत्मानंद की पुण्यतिथि है।

मानव सेवा के लिए जीवन को किया समर्पित

महात्मा गांधी और फिर स्वामी विवेकानंद से प्रभावित होकर संत आत्मानंद ने ब्रम्हचारी रहकर मानव सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। उन्होंने छत्तीसगढ़ में मानव सेवा, कुष्ठ उन्मूलन, शिक्षा और संस्कार की अलख जगाई। इन्होंने हिन्दु धर्म के पवित्र ग्रंथों और उपनिषदों की तात्विक व्याख्या की। इनके मुख से धार्मिक साहित्यों की व्याख्या सुनकर कई लोगों का जीवन बदल गया और इस तरह रामेश्वर, संत आत्मानंद बन गए। 

छत्तीसगढ़ के बुजुर्ग बताते हैं कि जब वे रामनाम कीर्तन करते थे तो उसे सुनना दैविय अनुभव देता था। संत आत्मानंद की गीता चिंतन पर व्याख्या से जुड़ी ऑडियो रिकॉर्डिंग आज भी उपलब्ध हैं। इनका जन्म 6 अक्टूबर 1929 को रायपुर जिले के बरबंदा गांव में हुआ था। उनके पिता मांढर के सरकारी स्कूल में शिक्षक और माता गृहिणी थीं। उनके पिता धनिराम वर्मा ने उच्च शिक्षा के लिए वर्धा में महात्मा गांधी द्वारा स्थापित हिन्दी विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और पूरे परिवार के साथ वर्धा आ गए।

रघुपति राघव राजाराम भजन गाया करते थे बालक रामेश्वर

वर्धा के सेवाग्राम आश्रम मे वर्मा परिवार का नीयमित रूप से आना- जाना होने लगा। यहां बालक रामेश्वर, गांधी जी का मनपसंद रघुपति राघव राजाराम भजन गाया करते थे और लोग उन्हें मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। धीरे-धीरे बालक रामेश्वर गांधी जी का बेहद प्रिय हो गया। गांधी जी उस बालक के प्रति असीम स्नेह रखते थे और अक्सर उसे अपने साथ ही रखते थे। कुछ समय बाद धनिराम परिवार सहित वापस रायपुर आ गए। यहां सेंट पॉल स्कूल से बालक रामेश्वर ने हाई स्कूल की परीक्षा पास की फिर नागपुर विश्वविद्यालय से एमएससी की पढ़ाई की। इसके बाद वे आईएएस की लिखित परीक्षा में शामिल हुए और इसमें सफल भी हुए, लेकिन इंटरव्यू में शामिल नहीं हुए। वे रामकृष्ण आश्रम से जुड़े और जीवन पर्यंत मानव सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। 27 अगस्त 1989 को राजनांदगांव के पास एक सड़क दुर्घटना में संत आत्मानंद का निधन हो गया, लेकिन एक संत के रूप में उनके विचार आज भी समाज में जिंदा हैं।

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