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संपादकीय:आत्महत्या किसी इंसान के मानसिक स्वास्थ्य की समस्या मात्र नहीं है..जानिए

आत्महत्या किसी इंसान के मानसिक स्वास्थ्य की समस्या मात्र नहीं है

आत्महत्या के कारणों को समझने के लिए हमें जाति, लिंग, लैंगिकता, समर्थता, विषमलैंगिक पितृसत्ता में निहित व्यवस्थाजन्य असमानताओं के जरिये पैदा होने वाले तनावों को समझने की आवश्यकता है।

Suchkesath●“यदि इस (आत्महत्या) सम्बंध में किसी एक चीज के बारे में जानने की जरूरत है….इससे उबरने के लिए तो, आपको कुछ ऐसे लोगों की जरूरत है जो इसके बारे में थोड़ा-बहुत समझ रखते हों। कुल मिलाकर मैं समझता हूँ कि हम सबका उद्देश्य इसे समझने का होना चाहिए, क्या मैं कुछ गलत कह रहा हूँ?”

उपरोक्त पंक्तियां आत्महत्या से उबरे एक व्यक्ति रोडी और लंदन के एक शोधकर्ता और मनोचिकित्सक ज़ोए बोडेन के बीच हुये एक साक्षात्कार से उद्धृत की गई हैं, जो आत्महत्या और आत्महत्या की प्रवृत्ति के व्यक्तिपरक अनुभव के एक अध्ययन में उद्धृत हैं।

उपरोक्त उद्धरण सभी प्रकार के आत्महत्या शोधों में आने वाले गतिरोधों को व्याख्यातित करता है। हकीकत तो यह है कि आत्महंता व्यवहार को पूरी तरह से आत्मसात करने के लिए किये जाने वाला शोध का काम कम पड़ गया है। आत्महत्या विषय अपनेआप में अवलोकन योग्य बर्ताव का एक अत्यधिक-छानबीन वाला प्रारूप है, लेकिन इसे व्यक्तिगत अनुभव के तौर पर अच्छे से नहीं समझा गया है। हमारे ज्ञान में इस कमी की वजह यह है कि आत्महत्या से जुड़ी विचार प्रक्रियाएं जिन्दा रहने और जीवित रहने के सिद्धांत जो अभी तक ज्ञात हैं, की सीमा से परे तक जाती हैं।

भारत ने बेहद आवश्यक कदम के तौर पर मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 के जरिये खुदकुशी जैसे कदमों को उठाने को गैर-आपराधिक घोषित कर एक क्रांतिकारी कदम उठाया है, जिसने इस तथ्य को स्थापित किया है कि आत्महत्या का प्रयास करने वाले किसी भी व्यक्ति के बारे में मानकर चलना चाहिए कि वह इंसान बेहद गंभीर मानसिक तनाव के बीच से गुजर रहा था।

आत्महत्या से जुड़ी पूर्व धारणा को तोड़ने में यह बेहद सहायक साबित हुआ है, हालाँकि आत्महत्या को लेकर अबूझ पहेली वाली प्रवृत्ति अभी भी बनी हुई है। लोगों के बीच में आत्महत्या के बढ़ते प्रयासों की दर को देखते हुए जोकि विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक और व्यावसायिक पृष्ठभूमि से आते हैं, के चलते और ज्यादा भ्रामक स्थिति बनी हुई है।

आत्महत्या के बारे में प्रचलित अनगिनत सिद्धांतों और उसके बारे में जोखिम कारकों की पहचान के बावजूद, हम अभी भी इस बात को समझ पाने में असफल रहे हैं कि वह कौन सी चीज है जो लोगों को अपनी इहलीला समाप्त करने के कगार पर ले जाने के लिए बाध्य करती है। और हम इस बात को भी अभी तक पूरी तरह से नहीं समझ सके हैं कि कैसे कुछ लोग इन हालातों से उबर पाने में सफल हो जाते हैं। आत्महत्या अनुसंधान के पांच दशकों के विश्लेषण के निष्कर्षों में से एक यह भी था।

लेकिन ये अंतराल और उसके नतीजों के साथ यह भी देखना चाहिए आत्महत्या और आत्महत्या की प्रवृत्ति रखने वाले व्यक्ति को चिकित्सकीय, कानूनी और सार्वजनिक तौर पर रूप किस प्रकार से देखा जाना चाहिए। आखिर ऐसा क्यों है कि हम विविध विचारों, चश्मों, विचारों और अनुभवों को प्रोत्साहित करने के बजाय सिर्फ मनोवैज्ञानिक अवसाद वाले सिद्धांत से ही चिपके रहते हैं, जबकि ये पहलू आत्महत्या की मनःस्थिति से निपटने के लिए और अधिक उपायों की संभावना को मुहैय्या करा सकते हैं?


इसके पीछे की एक वजह यह हो सकती है कि किसी परिघटना की व्याख्या करने के लिए हम जिस भाषा का उपयोग करते हैं, जोकि अपनी प्रकृति में बेहद वस्तुगत होती है और अनुभवों पर लेबल चिपकाने की होड़ लग जाती है। पॉप साइकोलॉजी कल्चर के साथ भ्रामक सूचनाओं ने “अंतिम लक्षण” या “अंतिम विकल्प” और “कायरपन” जैसे विशेषणों को आत्महत्या के बारे में बहस करने के सांचे में ढाल दिया है। वहीँ इसकी दूसरी वजह यह है कि आत्महत्या के लिए जवाबदेही को केवल उन्हीं व्यक्तियों के इर्द-गिर्द केंद्रित कर दिया जाता है जो इसकी कोशिश करते हैं – गोया उन्होंने खुद को ऐसा करने के लिए “उकसाया” हो और इसलिए उन्हें ही अपनी मानसिकता को “दुरुस्त” करने की ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए।

शोधार्थी द्युति सुदीप्ता का कहना है “मैं दो बार आत्महत्या की कोशिश कर चुकी हूँ। जब मैंने ये कोशिशें की थीं तो उस दौरान मैं भारत के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक में पढ़ रही थी और मेरे काफी अच्छे ग्रेड आते थे। अपनी आत्महत्या के कारणों को जायज ठहराने के पीछे कोई स्पष्ट वजह समझ नहीं आती। दूसरी कोशिश के दौरान एक गैर-आलोचनात्मक मित्र मेरे साथ था, जिसकी कैंपस में मुफ्त मानसिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच थी। लेकिन मैं इस मामले में खुद को विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति में पाती हूँ क्योंकि कई कैंपसों में ऐसी सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं।”

सुदीप्ता कहती हैं, “ज्यादातर पेशेवर लोग उन अवसादों की कल्पना तक नहीं कर पाते हैं जो जातीय चौधराहट, लैंगिक, लैंगिकता, समर्थता, विधर्मी पितृसत्ता इत्यादि में निहित असमानताओं के चलते उपजती हैं, जो अक्सर व्यक्तियों को खुद के आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराने का एहसास कराती हैं। यही वजह है कि मात्र मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपस्थिति से ही काम नहीं चलने वाला है।”

सुदीप्ता उस तर्क के खिलाफ महत्वपूर्ण बारीकियों को उठाती हैं जो आत्महत्या की ज़िम्मेदारी किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के लिए तनाव के कई स्रोतों की ओर इंगित करती हैं। अक्सर इस बात को कहा जाता है कि अपनी मौत के लिए आत्महत्या का रास्ता चुनने वाले अधिकांश लोगों में मनोरोगियों वाली समस्या होती है। लेकिन सारे संकटों के स्थानीयकरण कर देने से बात खत्म नहीं हो जाती है, क्योंकि इसके पीछे सामाजिक राजनीतिक निर्धारक छिपे होते हैं जो इस संकट को बढाने और बरकरार रखने में अहम योगदान अदा करते हैं। यह अपने साथ ऐसे अनेकों व्यक्तियों को भी छोड़ देता है जो अपनी इहलीला समाप्ति के समय किसी भी प्रकार के मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों का सामना नहीं कर रहे थे।

इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री में प्रकाशित एक सेमिनल पेपर में किसानों की आत्महत्याओं के अध्ययन के सिलसिले में इसी प्रकार के मुद्दे को उठाया गया है जिसमें कौन सी मानसिक स्वास्थ्य की समस्या है या नहीं है की परिभाषा पर ही सवाल खड़े करता है।

यह कहता है “मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े पेशेवरों की भूमिका के बारे में सुझाव देना निश्चित तौर पर मूर्खता होगी यदि यह कहे कि इन पेशेवरों को हर सीजन में एक खेत से दूसरे खेत जाकर फसल की बर्बादी पर उन किसानों को एंटीडिप्रेसेंट और मनोचिकित्सा की पेशकश करनी चाहिए, जिनके परिवार वित्तीय तबाही से जूझ रहे हैं? हम यह नहीं कह रहे कि इस प्रकार के माध्यमिक और तृतीयक रोकथाम के उपाय पूरी तरह से व्यर्थ हैं, बल्कि इसके बजाय अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इसके प्राथमिक रोकथाम के तौर पर समस्या की जड़ को हल करने के बारे में काम किया जाये।”

एक समाजशास्त्री होने के नाते सुदीप्ता एमिल दुर्खीम के काम को संदर्भित करती हैं जिन्होंने आत्महत्या पर सबसे व्यापक तौर पर लिखा है और इसके विभिन्न उपप्रकारों की व्याख्या की है, जो हर व्यक्ति की सामाजिक स्थितियों के साथ मेल खाती हैं। “दुर्खीम ने आत्महत्या से जुड़े कई शास्त्रीय मिथकों का पर्दाफाश कर दिया है, जो या तो इसके लिए जैविक स्थिति को जिम्मेदार ठहराते थे। उन्होंने साबित किया कि इसके लिए जिम्मेदार वास्तव में किसी समाज की संस्कृति, राजनीति होती है जो किसी व्यक्ति को आत्महत्या की ओर धकेलने के लिए बाध्य करती है। यदि यह सिर्फ एक मानसिक बीमारी का मुद्दा होता तो यह जटिलता मौजूद नहीं होनी थी।”

आत्महत्या की प्रवृत्ति के आंतरिक अनुभव को समझ पाने में विफलता असल में आत्महत्या की सामाजिक और राजनीतिक धारणा में ही अंतर्निहित है, जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि आत्महत्या को एक बहुविषयक दृष्टिकोण के माध्यम से सबसे अच्छी तरह से न सिर्फ समझा जा सकता है बल्कि उसे रोका भी जा सकता है।

मुंबई स्थित मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ता राधिका शर्मा कहती हैं “लोगों का यह मानना कि समस्या के मूल में वे खुद हैं, अपनेआप में एक समस्या है।”

वे कहती हैं, “पूरी तरह से आत्महत्या की प्रवृत्ति की खासियत और आत्महत्या कुछ ऐसी चीज है जिसे अपने भीतर से ठीक करने की आवश्यकता है, इस प्रकार की प्रवृत्ति कुछ इस प्रकार की है जैसे हम शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपने सर को घुसाकर समस्या को खत्म मान लेते हैं। जबकि समस्या यदि इतनी परतों में है तो इसकी रोकथाम के लिए ली जाने वाली पहलकदमियों को भी बहुस्तरीय, बहु-विषयक बनाये जाने की आवश्यकता है।”

शर्मा आत्महत्या के लिए कुछ बाहरी उथल-पुथल की प्रतिक्रिया के तौर पर देखने की बात करती हैं।

वे कहती हैं, “लोग कई वजहों से हाशिये पर जा सकते हैं – वो चाहे उनकी यौन अभिरुचि, कार्य, वर्ग, जाति, लिंग, विकलांगता इत्यादि से सम्बंधित हो सकती हैं। आत्महत्या का विचार लोगों में नियंत्रण की कमी के प्रतिक्रियास्वरूप भी पैदा हो सकता है। सम्भव है कि जब वे कष्ट में होते हैं तो वे मदद माँगने की कोशिश करते हैं, लेकिन उन्हें उस भाषा में जवाब नहीं मिल पाता जो उनके लिए मददगार और समावेशी साबित हो सकती है। इसके अलावा जरूरत इस बात की भी है कि हर किसी के जीवन के विभिन्न चरणों जैसे स्कूल और कालेज के दिनों से ही ऐसे सकारात्मक वार्तालापों को करते रहने की भी आवश्यकता है”

आत्महत्या की रोकथाम के लिए संभावित उपायों पर चर्चा करते समय, समुदायों की आवश्यकताओं के अनुरूप एकीकृत प्रणालीगत परिवर्तन अत्यधिक महत्व का विषय है। इसके लिए शासन, अपराध की रोकथाम, शिक्षा, नीति-निर्धारण का कार्य और जरुरी आर्थिक बदलाव का काम जरुरी है। इनमें से प्रत्येक पहलू सार्वजनिक मानसिक बेहतरी के साथ निरंतर पारस्परिक संबंध में बने रहते हैं और इसलिए उन पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रति जिम्मेदार हैं।

आत्महत्या को लेकर मीडिया की भूमिका बहुसांस्कृतिक समझ को संभव बनाने में अपने योगदान को प्रदान कर सकती है। मीडिया चाहे तो भ्रामक सूचना को नियंत्रित कर सकता है और आत्महत्या के हानिकारक चित्रण पर पाबंदी लगा सकता है। इसके अलावा मीडिया को जानकारी और जिम्मेदार रिपोर्टिंग के सम्बंध में आवश्यक संवेदनशीलता के दिशानिर्देशों का पालन करना चाहिए। इस प्रकार के दिशानिर्देशों को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वैश्विक स्तर पर और भारत में सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ लॉ एंड पॉलिसी जैसे संगठनों द्वारा तैयार किया गया है।

आत्महत्या की परिघटना पर परिचर्चा उन शक्तियों की अनुपस्थिति में नहीं की जा सकती है जो इसकी उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार हैं। उन लोगों को संवाद के लिए आमंत्रित कर, जो इन अनुभवों से गुजर चुके हैं, और इस मुद्दे को देखने की कोशिश में हैं, के व्यक्तिपरक दृष्टिकोण और नैरेटिव के माध्यम से हम सच्चाई का सामना कर सकते हैं।

सच्चाई यह है कि आत्महत्या आमतौर पर सामाजिक वजहों से कारक बनती है बजाय किसी जैविक वजहों से। आत्महत्या के बारे में ख्याल कभी भी शून्य से नहीं टपकते। इसीलिए इसमें सुधार की गुंजाइश तबतक बेहतर तरीके से नहीं देखने को मिल सकती जबतक उन्हें “रोगविज्ञान के उपचार” के तौर पर देखा जाता रहेगा।

लेखक एक मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता और लेखक होने के साथ-साथ नैदानिक मनोविज्ञान से स्नातकोत्तर की पढाई कर रहे हैं। इनके कार्यक्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य और मनोरोग के साथ-साथ सामाजिक राजनीतिक मुद्दों और मानवाधिकारों के मुद्दे शामिल हैं।

विचार व्यक्तिगत हैं।

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