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बनारस: ‘अच्छे दिन’ के इंतज़ार में बंद हुए पावरलूम, बुनकरों की अनिश्चितकालीन हड़ताल

बनारस: ‘अच्छे दिन’ के इंतज़ार में बंद हुए पावरलूम, बुनकरों की अनिश्चितकालीन हड़ताल

बनारस समेत उत्तर प्रदेश के बुनकरों ने योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। लॉकडाउन और उससे पहले से ही आर्थिक संकट में फंसे बुनकरों ने सरकार से बढ़ी हुई बिजली की दरें वापस लेने की मांग की है।

वाराणसी |मंगलवार की सुबह बनारस की गलियों में पावरलूम और हथकरघे की खटर-पटर की जगह प्रदेश की योगी सरकार के खिलाफ नारेबाजी सुनाई दी। बुनकरों ने गली-मोहल्लों, चौक-चौराहों पर धऱना देते हुए अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा कर दी। इस दौरान पावरलूम और हथकरघा कारखानों को पूरी तरह से बंद कर दिया गया।

बता दें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना संकट के बीच अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के समाज सेवियों और बुनकरों से वीडियो कानफ्रेंसिंग के जरिये बातचीत में ये दावा किया था कि इस महामारी के दौरान प्रभावित हुए बुनकरों का ख्याल रखा जा रहा है। लेकिन काशी समेत प्रदेश भर में मंगलवार, एक सितंबर से जारी बुनकरों की हड़ताल कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

क्या है पूरा मामला?

अपनी गंगा-जमुनी तहजीब और बनारसी साड़ी के लिए दुनियाभर में मशहूर बनारस आज अपनी ही विरासत को लेकर संघर्ष करता नज़र आ रहा है। कोरोना महामारी की मार झेल रहे बुनकर, बीते कई दिनों से प्रदेश की योगी सरकार से दिसंबर तक बिजली के बिल माफ करने और फ्लैट रेट पर बिजली बहाली की पुरानी व्यवस्था फिर से लागू करने की मांग कर रहे थे। लेकिन जब उनकी मांग पर कोई सुनवाई नहीं हुई तो बुनकरों ने हड़ताल कर, सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

बिजली की पुरानी व्यवस्था क्या थी?

जानकारी के मुताबिक, 2006 के बिजली विभाग के अधिनियम के अनुसार बुनकरों को एक पावरलूम पर प्रतिमाह 70-75 रुपये बिजली का बिल चुकाना पड़ता था। लेकिन बीते साल दिसंबर में योगी सरकार ने इस व्यवस्था को खत्म कर दिया और बिजली विभाग की ओर से नए स्मार्ट मीटर लगा दिए गए। बुनकरों के मुताबिक नई व्यवस्था के लागू होने के बाद उन्हें अब महीने के 1500-1600 रुपये बिजली का बिल देना पड़ेगा। जो कि फिलहाल उनके बस की बात नहीं है।

क्या कहना है बुनकर समाज का?

बुनकर नेताओं के मुताबिक कोरोना वायरस जैसी वैश्विक महामारी से पैदा हुए आर्थिक संकट के कारण बुनकर पहले ही भुखमरी और फाकाकशी पर मजबूर हो गए हैं। बुनकरों के सामने पेट पालने के लिए घर के ज़रूरी सामान और पॉवरलूम को कबाड़ के भाव बेचने जैसी नौबत आ गयी है। ऐसे में बढ़ी हुई बिजली की दरें बुनकर समाज की आर्थिक स्थिति और बदहाल कर देगी।

बुनकर महासभा उत्तर प्रदेश के महामंत्री हाजी अब्दुल्लाह अंसारी ने मीडिया को बताया कि इस धरना प्रदर्शन की मुख्य मांग यही है कि बुनकर समाज को 2006 से जो फ्लैट रेट पर बिजली दी जा रही थी उसे फिर से बहाल किया जाए।

उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन ने बिना बताए, बुनकरों को धोखे में रख ये बदलाव किया है और अब हमें आरसी भेजी जे रही है, हमारी लाइट काट दी जा रही है। इन सब से परेशान होकर उत्तर प्रदेश बुनकर सभा और बुनकर बिरादराना तंजीम ने मिलकर प्रदेश के सभी हैंडलूम, पावरलूम को बंद करने का फैसला किया है।

बनारस पावरलूम वीवर्स एसोसिएशन के पूर्व जनरल सेकेट्री और समाजसेवी अतीक अंसारी ने बताया कि मुलायम सरकार के समय से 72 रुपये देकर एक पावरलूम महीनेभर चलता था। यह योजना मायावती, अखिलेश और अभी तक योगी सरकार में भी लागू थी लेकिन अब फ्लैट रेट में बदलाव कर 1500 रुपये एक महीने का एक पावरलूम का कर दिया गया है। हालांकि जब बुनकर बिल जमा करेगा तो उसको 600 रुपये तक की सब्सिडी खाते में मिलने का आश्वासन दिया गया है लेकिन बावजूद इसके यह किराया बहुत ही ज्यादा है। इसे सरकार को कम करना चाहिए।

अतीक अंसारी के अनुसार काशी में ही केवल 30 हजार से ज्यादा बुनकर हैं जबकि डेढ़ लाख के करीब पावरलूम हैं। अगर सरकार ने बुनकरों की मांग नहीं मानी तो बुनकर पावर डिस्कनेक्ट का एप्लिकेशन देंगे और पावरलूम को बांद कर दिया जाएगा।

अन्य संगठनों ने भी किया समर्थन

बुनकरों के इस हड़ताल को ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट और वर्कर्स फ्रंट ने भी समर्थन दिया है। आइपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व आईजी एसआर दारापुरी और वर्कर्स फ्रंट के प्रदेश अध्यक्ष दिनकर कपूर ने कहा कि उत्तर प्रदेश में वन डिस्टिक- वन प्रोजेक्ट का सरकारी दावा छलावा साबित हुआ है। पूरे प्रदेश में सिवाय हवा-हवाई घोषणाओं के कहीं भी छोटे-मझोले उद्योगों और बुनकरी को बचाने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है।

इन संगठनों के मुताबिक योगी सरकार ने बुनकरों को मिलने वाली सस्ती बिजली की पासबुक को खत्म कर उन्हें इस महामारी के दौर में बर्बादी की ओर धकेल दिया है। उनके उत्पादों पर टैक्स लगातार बढ़ाए जा रहे हैं और लागत सामग्री की कीमतों में वृद्धि हो रही है। वहीं योगी सरकार और उसके आला अधिकारी सिर्फ घोषणाएं करने और सब्जबाग दिखाने में व्यस्त हैं।

दोनों नेताओं ने मांग की कि तत्काल प्रभाव से बुनकरों का बिजली बिल, सभी प्रकार का कर्जा माफ करना चाहिए, लागत सामग्री पर लगे टैक्सों को खत्म करना चाहिए, पुरानी सस्ती बिजली की पासबुक व्यवस्था बहाल करनी चाहिए और साथ ही हैंडलूम और हथकरघा निगम जैसे सरकारी संस्थानों के जरिए उनके उत्पाद की खरीद को सुनिश्चित कर उसे देसी-विदेशी बाजारों में बेचने की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि बुनकरों को बेमौत मरने से बचाया जा सके और उनकी जिंदगी की सुरक्षा हो।

बुनकरों का 15 दिन में ही 300 करोड़ रुपये का नुकसान होने की संभावना

उत्तर प्रदेश बुनकर सभा अध्यक्ष हाजी अहमद अंसारी ने बताया कि मेरठ, वाराणसी, मऊ, आंबेडकर नगर, भदोही, मिर्जापुर समेत पूरे प्रदेश में 15 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित होंगे। साथ ही 15 दिनों में तो करीब 200 करोड़ का जीएसटी और 100 करोड़ से ज्यादा का कारोबार का नुकसान होगा।

बुनकर नेता हाजी ओकास अंसारी ने बताया कि फ्लैट रेट पर बिजली 1 जनवरी 2020 से खत्म कर दी गई है। बनारस में हिंदू और मुसलमान दोनों ही बुनकरी के काम से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि इस सरकार का फैसला समझ के परे इसलिए है कि जो बुनकर कारोबार एक हजार करोड़ का कारोबार करता है, उससे सरकार 150 करोड़ के फायदे के नुकसान पहुंचा रही है।

विपक्ष ने किया हड़ताल का समर्थन

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी ट्विट कर योगी सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा, “वाराणसी समेत पूरे उत्तर प्रदेश के बुनकर इस समय भयानक संकट का सामना कर रहे हैं। सरकार ने न तो बिजली बिल के मुद्दे पर कोई बात सुनी है और न ही इस लॉकडाउन से उपजे संकट से उबारने के लिए उन्हें कोई मदद की है।…”

प्रियंका ने आगे लिखा कि अपनी कला के जरिए पूरे विश्व में यूपी का नाम रोशन करने वाले बुनकर आज हड़ताल करने को मजबूर हैं। सरकार को बुनकरों की मांग सुननी चाहिए।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने सोमवार, 31 अगस्त को बुनकरों के साथ जनसंवाद कर उनके आंदोलन को समर्थन देने का ऐलान किया। हालांकि इसके बाद अजय कुमार लल्लू, कांग्रेस नेता अजय राय, बुनकर सरदारों समेत 10 के खिलाफ नामजद और अन्य कांग्रेस कार्यकर्ताओं व बुनकरों के खिलाफ कोविड19 के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में जैतपुरा थाना में मुकदमा दर्ज कर लिया गया।

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि लाखों बुनकर आर्थिक तंगी झेल रहे लेकिन उनको राहत न देकर योगी सरकार उन पर बिजली बिल का बोझ बढ़ा रही है ये सरकार की मानसिकता को बताता है।

कांग्रेस के बाद समाजवादी पार्टी ने भी इस हड़ताल को समर्थन दिया है। विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता राम गोविंद चौधरी व वाराणसी महानगर अध्यक्ष विष्णु शर्मा ने बुनकर बिरादराना तंजीम बावनी पंचायत के अध्यक्ष हाजी मुख्तार अहमद महतो से बात की और इस हड़ताल को अपना समर्थन दिया। इसके साथ ही सपा ने बुनकरों के बिजली के फ्लैट रेट के मुद्दे पर उनकी लड़ाई में अंत तक सहयोग का आश्वासन भी दिया।

जानकार क्या कहते हैं?

वाराणसी में सिल्क निर्माताओं व कारोबारियों की प्रमुख संस्था काशी वस्त्र उद्योग संघ से जुड़े रजत मोहन ने मीडिया को बताया कि बिजली का बिल बढ़ने के बाद सबसे बड़ी परेशानी उत्तर प्रदेश के बुनकरों के लिये बाजार में टिके रह पाने की है।

रजत के अनुसार गुजरात के सूरत के मुकाबले अब उत्तर प्रदेश के पावरलूम पर बनने वाला कपड़ा महंगा पड़ेगा लिहाजा यहीं के खरीदार इसे क्यों खरीदेंगे। इसके अलावा भिवंडी या सूरत में पावरलूम का काम काफी हद तक संगठित है और वहां पहले ही से सस्ता माल बन जाता है। उत्तर प्रदेश में बहुत बड़ी तादाद में हथकरघा बुनकरों ने कुछ पूंजी लगाकर एक, दो या चार लूम लगा लिए हैं जिनके लिए तीन चार गुना बिजली का बिल दे पाना धंधे से हाथ धोने का कारण बन जाएगा।

आर्थिक पत्रकार और समाजिक कार्यकर्ता विकास सिंह बताते हैं कि मौजूदा दौर में बनारसी साड़ी उद्योग पहले से ही मंदी के दौर से गुजर रहा है। सूरत और बैंगलूरु की साड़ियों के मुकाबले बनारसी साडियां बाजार में पिछड़ गई हैं। ऊंची कीमत के चलते ग्राहक बनारसी साड़ी खरीदने से बचते हैं। धीरे-धीरे हालात ऐसे बनते चले गए कि धंधा मंदा पड़ने लगा और अब लॉकडाउन ने बुनकरों को बर्बादी की कगार पर ला दिया है।

विकास के मुताबिक ऐसीकई खबरे हैं जिनके मुताबिक ऐसे कई बुनकर हैं जो साड़ी के धंधे से हटकर सब्जी की दुकान, चाय या फिर दूसरे रोजगार से जुड़ गए हैं। सिर्फ बनारस को ही देखें तो साड़ी उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर लगभग दो लाख परिवार जुड़े हैं। मतलब लगभग आठ लाख लोगों की रोज़ी-रोटी का जुगाड़ साड़ी उद्योग से होता है। लेकिन योगी सरकार के नए फैसले ने इस धंधे की कमर तोड़ दी है। एक मोटा अनुमान है कि बुनकरों की हड़ताल से राज्य सरकार को लगभग 100 करोड़ रुपये प्रतिमाह राजस्व का नुकसान उठाना पड़ेगा।

पहले से ही बुनकरों की हालत खस्ता है!

पत्रकार ऋचा सिंह बताती हैं कि साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि हर साल सात अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाएगा। लेकिन इस साल 27 जुलाई को हथकरघा बोर्ड को भंग कर दिया गया। ऐसे समय में जब बुनकरों और इस उद्योग से जुड़े लोगों पने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं, हथकरघा बोर्ड जैसी संस्था एक अहम मंच हो सकती थी।

ऋचा आगे बताती हैं कि लॉकडाउन से पहले केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय की ओर से कराए गए सर्वेक्षण में भी यह बात सामने आई है कि बनारस के हथकरघा बुनकरों की माली हालत काफी खराब है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जन धन योजना हो या फिर प्रधानमंत्री बीमा योजना, मगर ज्यादातर बुनकर इन योजनाओं से दूर हैं और सामाजिक सुरक्षा के नाम पर भी उनके पास कुछ नहीं है। लेकिन फिर उन बुनकरों को मिला क्या? शायद आश्वासन के अलावा कुछ भी नहीं।

गौरतलब है कि ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी तमाम योजनाओं को सरकार भले ही प्रमोट करने में लगी हो लेकिन लॉकडाउन शुरू होने के बाद से ही बुनकरों का 80 प्रतिशत पावरलूम और हैंडलूम बंद पड़ा है। अनलॉक में छूट के बाद जिन बुनकरों के पास धागा व ताना-बाना था, उनका काम चल रहा है। इस बंदी की वजह से अब उनका काम भी बंद हो गया है। एक आंकलन के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कपड़ा उद्योग में 80 फीसदी पावरलूम तो 20 फीसदी पर हथकरघे का कब्जा है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में इस समय 2.72 लाख पावरलूम हैं। वाराणसी, मऊ, मुबारकपुर, मोहम्मदाबाद, सीतापुर के खैराबाद, बाराबंकी, झांसी के मउरानीपुर और टांडा में हजारों की तादाद में पावरलूम हैं जिनसे 20 लाख बुनकर जुड़े हैं। ऐसे में यूपी में लाखों  बुनकरों और  इस से जुड़े अन्य कारोबारी और मजदूरों के लिए भी सरकार को कुछ सोचना होगा।

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