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जस्टिस मिश्रा का अडानी को 8000 करोड़ रुपये का अंतिम “तोहफ़ा”

जस्टिस मिश्रा का अडानी को 8000 करोड़ रुपये का अंतिम “तोहफ़ा”

31 अगस्त को जस्टिस अरुण मिश्रा के नेतृत्व वाली बेंच ने बिजली नियंत्रकों द्वारा अडानी पावर को 8000 करोड़ रुपये के टैरिफ़ मुआवज़ा दिए जाने के फ़ैसले पर मुहर लगा दी। अडानी पावर द्वारा इस बिजली का उत्पादन राजस्थान में किया गया है। 2 सितंबर को जस्टिस मिश्रा के रिटायर होने से ठीक पहले आया यह फ़ैसला, 2019 की शुरूआत से सातवां ऐसा फ़ैसला है, जिसमें जस्टिस मिश्रा के नेतृत्व वाली बेंच का फ़ैसला अडानी समूह की कंपनियों के पक्ष में आया है।

बेंगलुरू/गुरुग्राम: 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट बेंच ने राजस्थान में “सार्वजनिक क्षेत्र ऊर्जा वितरण कंपनियों (डिस्कॉ़म्स)” के साथ अडानी समूह के एक विवाद में अडानी के पक्ष में फ़ैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस विनीत सारण और जस्टिस एम आर शाह शामिल थे। जस्टिस अरुण मिश्रा के 2 सितंबर को रिटायर होने से महज़ तीन दिन पहले ही यह  फ़ैसला सुनाया गया है। इस फ़ैसले के तहत “अडानी पॉवर राजस्थान लिमिटेड (APRL)” को 5000 करोड़ रुपये का टैरिफ मुआवज़ा और 3000 करोड़ रुपये का जुर्माने व ब्याज़ का पैसा देने का फैसला हुआ है। APRL के पास बारां जिले के कवई में 1,320 मेगावॉट क्षमता वाला ताप विद्युत गृह है।

इस 8000 रुपये का भार जयपुर, जोधपुर और अजमेर के बिजली उपभोक्ता वहन करेंगे। 2019 की शुरुआत से यह सातवां फैसला है, जो जस्टिस मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंचों ने अडानी समूह की कंपनियों के पक्ष में दिया है। 

यह फ़ैसला तीन शहरों की ऊर्जा वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) और ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) द्वारा लगाई गई एक याचिका पर आया है। यह याचिका ‘अपीलेट ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी (APTEL)’ द्वारा सितंबर 2019 में दिए गए एक फ़ैसले के खिलाफ़ लगाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने APTEL के इस तर्क से सहमति जताई कि ‘कानून में हुए फेरबदल’ से APRL को नुकसान हुआ है। 

कोर्ट ने माना कि सरकार ने मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर किए जाने के वक़्त, कवई में अडानी के ऊर्जा संयंत्र की खपत के लिए, घरेलू कोयला खदान का आवंटन दिलाए जाने का ‘भरोसा’ दिया था। इसी के आधार पर अडानी समूह की कंपनियों ने राजस्थान डिस्कॉम्स के साथ ‘ऊर्जा खरीद समझौते (PPAs- पॉवर पर्चेज़ एग्रीमेंट)’ पर हस्ताक्षर किए थे। जबकि PPA, नीलामी में APRL द्वारा सफलता के आधार पर किए गए थे। इस नीलामी में भाग लेने के लिए APRL ने अपनी सहयोगी कंपनी “अडानी एंटरप्राइज़ लिमिटेड (AEL)” के साथ “कोयला आपूर्ति समझौते (CSA- कोल सप्लाई एग्रीमेंट)” पर हस्ताक्षर किए थे, जो उसकी नीलामी में भाग लेने की योग्यता का आधार था। AEL के साथ यह समझौता इंडोनेशिया से कोयला आयात करने को लेकर हुआ था। 

यहां कोर्ट ने माना है कि ऊर्जा संयंत्र द्वारा सरकार से कोयला आवंटन हासिल न कर पाना “कानून में बदलाव” है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि आवंटन हासिल ना कर पाना और 2011 की तुलना में इंडोनेशिया में कोयले की कीमतों में भारी उछाल के चलते APRL को मुआवज़ा दिया होगा। 2011 में CSA में इंडोनेशियाई कोयले की कीमतें दर्शाईं गईं थीं, इसी CSA के आधार पर APRL ने नीलामी में हिस्सा लिया था। 

घरेलू या आयातित कोयला?

सुप्रीम कोर्ट के सामने आया मामला दो अहम सवालों के जवाब पर टिका था।

2009 में राजस्थान डिस्कॉम्स ने एक नीलामी की, जिसमें निजी ऊर्जा उत्पादकों को हिस्सा लेने के लिए बुलाया गया था और उनसे राज्य को बिजली बेचने के लिए बोलियां लगाने को कहा गया। नीलामी में हिस्सा लेने की योग्यता हासिल करने के लिए निजी कंपनियों के पास CSAs (कोयला आपूर्ति समझौतों) होने चाहिए थे या फिर उनके पास घरेलू कोयले से संबद्धता (कोल लिंकेज) होनी थी, जो PPA की पूरी अवधि के दौरान ऊर्जा के लिए कोयले की आपूर्ती सुनिश्चित करती। या फिर इनके पास विेदेश से आयातित कोयले के लिए CSA होने चाहिए थे, जिनके तहत PPA अवधि के शुरुआती 5 सालों में आधे कोयले की आपूर्ति तय होनी चाहिए थी।  

जब नीलामी की घोषणा की गई, तब 2009 में अडानी समूह की कंपनियां कवई में अपना ऊर्जा संयंत्र लगा रही थीं। लेकिन उनके पास किसी तरह का कोयला आपूर्ति समझौता (CSA) नहीं था। जब राजस्थान सरकार AEL के साथ मार्च 2008 में MoU पर हस्ताक्षर कर रही थी, तब सरकार ने प्रोजेक्ट स्थानीय कोयला संबंद्धता हासिल करने में मदद देने की बात कही थी। लेकिन इससे कोई मजबूत समझौता नहीं हुआ था, जो नीलामी में हिस्सा लेने के लिए AEL को योग्यता प्रदान कर सकता।


जब APRL अपनी नीलामी की तैयारी कर रही थी, तब कंपनी ने राजस्थान सरकार को पत्र लिखकर MoU की शर्तों के हिसाब से कोल लिंकेज दिलवाने के लिए सहायता की मांग की। इस सहायता के तहत दो विकल्प पेश किए गए। पहले विकल्प में, राज्य सरकार की मौजूदा कोयला खदानों से अतिरिक्त कोयले का आवंटन की मांग की गई, इन खदानों में छत्तीसगढ़ में मौजूद परसा ईस्ट केंते बसन खदान भी शामिल थी, जिसमें खनन का ठेका अडानी समूह की ही एक कंपनी के पास था। दूसरे विकल्प में, केंद्र सरकार के पास अडानी समूह द्वारा ‘कैप्टिव कोल ब्लॉक’ की मांग के लिए लगाए जाने वाले आवेदन का समर्थन करने की मांग की गई। 

लेकिन CSA द्वारा कोयला आपूर्ति को सुनिश्चित किए बिना, APRL नीलामी में हिस्सा लेने के योग्य नहीं हो पाती। इसलिए जून, 2009 में APRL ने अडानी समूह की ही एक कंपनी AEL के साथ कोयला आपूर्ति के लिए समझौता कर लिया, जिसके तहत कवई के ताप विद्युत गृह के लिए इंडोनेशिया से कोयला लाया जाना था। साथ में APRL ने जुलाई, 2009 में केंद्रीय कोयला मंत्रालय के पास लंबे वक़्त के लिए कोयला आपूर्ति तय करने के लिए समझौता करने का आवेदन लगा दिया। इंडोनेशिया से आयातित कोयले के CSA के हासिल करने बाद APRL ने नीलामी में अपनी बोली लगा दी।

इसी CSA को योग्यता बनाकर APRL की बोली को नीलामी में शामिल करने दिया गया था। जब कंपनी को योग्यता हासिल हो गई, तो सरकार ने APRL से अपनी बोली के बारे में स्पष्टीकरण मांगा।  APRL ने साफ़ किया कि कंपनी “घरेलू और आयातित, दोनों तरह के कोयले का उपयोग करेगी।” CSA की तरफ ध्यान दिलाते हुए कंपनी ने कहा, “बोली के साथ, 5 साल की अवधि के लिए ऊर्जा आपूर्ति समझौते को ज़मा कर दिया गया है।”

कंपनी ने आगे कहा, “…हमने बोली के साथ राजस्थान सरकार और AEL के बीच हुए MoU को भी ज़मा किया है, जिसमें…राज्य सरकार ने ऊर्जा प्रोजेक्ट के लिए कोयला लिंकेज/ब्लॉक या किसी दूसरे स्त्रोत् से कोयला उपलब्ध कराने के लिए कोशिशें करने का वायदा किया है।”

APRL ने कहा, “इसलिए हम आयातित कोयले में हुए समझौते के आधार पर अपनी जरूरतों को पूरा कर लेंगे”, कंपनी ने आगे कहा, “…हमें राजस्थान सरकार की मदद से घरेलू ऊर्जा संबंध हासिल का भरोसा है। इस आधार पर हम मांग करते हैं कि नीलामी की हमारी बोली को घरेलू कोयले समझौते के आधार पर आंका जाए। PPA की अवधि में घरेलू कोयला कीमतों में उछाल हमें बर्दाश्त होगा, हमने उसे ध्यान में रखते हुए ही भुगतान निर्धारित किया है।”

लेकिन जैसे ही APRL की बोली सफल हुई और डिस्कॉम ने उसका आंकलन किया, कंपनी ने AEL के साथ अपना CSA 10 जून, 2009 को रद्द कर दिया। उस समझौते का इस्तेमाल केवल नीलामी में शामिल होने की योग्यता पाने के लिए बस किया गया। 

APRL की बोली सबसे कम थी और कंपनी को 1,320 मेगावॉट की क्षमता वाले कवई ऊर्जा संयंत्र से राज्य डिस्कॉम को ऊर्जा आपूर्ति करने का समझौता हासिल हो गया। 17 दिसंबर, 2009 को डिस्कॉम्स ने APRL को एक ‘लेटर ऑफ इंटेंट (LoI)’ जारी किया। इसमें लिखा गया, “परिशिष्ट-1 में तय कीमतों पर 1200 MW ऊर्जा आपूर्ति और घरेलू कीमतों में उछाल का आपका प्रस्ताव आपके उस वायदे पर आधारित है, जिसमें आपने कहा है कि यह कीमतें तब भी लागू रहेंगी, जब आप अपनी कोयला जरूरतें आयातित कोयले के प्रबंधन से पूरा कर रहे होंगे।”

इसका मतलब हुआ कि अगर APRL को AEL के साथ अपने CSA में आयातित कोयला इस्तेमाल करना भी था, तो भी टैरिफ का आकलन घरेलू कोयले की कीमतों के आधार पर ही होता। इस LoI को APRL ने “बिना शर्ते के मान लिया।”

ऊर्जा ख़रीद समझौतों की शर्तें

लेकिन 28 जनवरी, 2010 को जिस PPA पर हस्ताक्षर हुए, उसमें उपरोक्त शर्तें शामिल नहीं थीं। PPA में यह माना गया कि समझौते के लिए जिस ईंधन आपूर्ति प्रबंधन का निर्धारण किया गया है, वह घरेलू कोयले की आपूर्ति के आधार पर है, जिसमें कमी आने पर पांच साल के लिए आयातित कोयले की मदद ली जाएगी। लेकिन PPA में टैरिफ के घरेलू कोयला कीमतों के आधार पर तय होने (चाहे कोयला घरेलू हो या विदेश से आयातित) की बात को स्पष्ट नहीं किया गया।

इन तथ्यों के क्रम को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट के सामने पहला सवाल यही था कि बोली घरेलू कोयले पर आधारित थी या विदेशी कोयले पर। APTEL और राजस्थान इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (RERC) ने विवाद पर अपने फ़ैसले में साफ किया था कि नीलामी की बोली घरेलू कोयले पर आधारित थी।  

डिस्कॉम का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ वकील सी आर्यमा सुंदरम कर रहे थे। उन्होंने तर्क दिया कि भले ही बोली को घरेलू कोयला लिंकेज के आधार पर आंका गया है, लेकिन ऐसी कोई लिंकेज समझौता होने के वक़्त नहीं थी। आयातित कोयले पर जो CSA हुआ था, जिसके तहत ऊर्जा संयंत्र को पांच साल तक 50 फ़ीसदी कोयला आपूर्ति होती, उसके आधार पर APRL की बोली को योग्यता मिली थी। बल्कि कुल मांग में CSA का हिस्सा 61 फ़ीसदी था। 

डिस्कॉम ने तर्क दिया कि अगर ‘कानून में बदलाव’ की वजह से कोई मुआवज़ा बनता भी है, तो वह सिर्फ़ 39 फ़ीसदी घरेलू कोयले पर ही आधारित हो सकता है, क्योंकि APRL ने साफ़ कहा था कि कंपनी प्रोजेक्ट के लिए शुरुआती पांच सालों के लिए घरेलू कोयले का इस्तेमाल करेगी। 

सीनियर एडवोकेट और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी अडानी समूह की तरफ से केस लड़ रहे थे। उन्होंने तर्क दिया कि CSA सिर्फ अर्हता हासिल करने के लिए एक दस्तावेज़ है। इसका टैरिफ तय करने पर कोई प्रभाव नहीं है। टैरिफ पूरी तरह घरेलू कोयले पर ही तय होती है। पूरी बोली घरेलू कोयले के आसपास गढ़ी गई और मानी गई। इसलिए सरकार द्वारा कोल लिंकेज उपलब्ध कराने में नाकाम रहने से “कानून में बदलाव” होने के आधार पर APRL को मुआवज़ा दिया जाए।

अरुण मिश्रा के नेतृत्व वाली बेंच ने अडानी समूह के पक्ष को मानते हुए कहा कि पूरी नीलामी घरेलू कोयले पर आधारित थी।

AIPEF के संयोजक पद्मजीत सिंह ने न्यूज़क्लिक को इंटरव्यू में बताया कि यह राजस्थान डिस्कॉम्स द्वारा खुद का नुकसान खुद करना था। उन्होंने कहा, “राजस्थान डिस्कॉम्स ने सावधानी बरतते हुए लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) में यह शर्त जोड़ी थी कि अडानी पॉवर चाहे घरेलू या विदेशी किसी भी कोयले का इस्तेमाल करे, उसे घरेलू कोयला कीमतों के हिसाब से टैरिफ तय कर भुगतान किया जाएगा। यह चीज सुप्रीम कोर्ट में भी बताई गई। लेकिन समस्या तब पैदा हुई कि जब यह शर्त ऊर्जा खरीद समझौते (PPA) में नहीं जोड़ी गई।” 

सिंह पूछते हैं, “अगर अडानी पॉवर को एक निश्चित समझ के तहत ठेका दिया गया है, जो उस शर्त को PPA में क्यों नहीं डाला गया। जबकि वह एक अहम स्थिति थी।” सिंह कहते हैं कि उसी आधार पर तो PPA किया गया था।

सिंह आगे कहते हैं, “अडानी ने LoI को बिना शर्त स्वीकार कर लिया था, तो उस शर्त को PPA में डालने पर कोई चुनौती का डर तो था ही नहीं। मामला भी वहीं खत्म हो जाता।” 

पद्मजीत के मुताबिक़, “वहीं राजस्थान डिस्कॉम्स खेल हार गईं। वह खुद का गोल करने जैसा था। वह बहुत बड़ी गलती थी या शायद डिस्कॉम के अधिकारियों पर दबाव बनाया गया। इसकी कुछ भी ठीक-ठीक व्याख्या नहीं है।”

राजस्थान सरकार द्वारा लॉबीइंग

राजस्थान सरकार ने MoU में APRL को घरेलू कोल लिंकेज खोजने में मदद देने का भरोसा दिया था। अगर सरकार 2018 तक ऐसा नहीं कर पाई, तो क्या यह APRL के लिए “कानून में बदलाव” वाली स्थिति का निर्माण हो गया? यही सुप्रीम कोर्ट के सामने दूसरा बड़ा सवाल था। PPA में शामिल शर्तों के मुताबिक़, “कानून में बदलाव” वाली स्थिति में किसी भी पक्ष को टैरिफ को दोबारा तय करने का अधिकार है। यह सवाल भी राजस्थान डिस्कॉम द्वारा “खुद के गोल” द्वारा ही हल हुआ।

अगस्त, 2007 में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) ने AEL के पक्ष में एक लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) जारी किया था। इसके तहत परसा ईस्ट और केंते बासन (PEKB) खदान को AEL द्वारा विकसित किया जाना था। यह खदान उत्तरी छत्तीसगढ़ में स्थित है। LoI में कहा गया कि कोयले का इस्तेमाल राजस्थान सरकार आने वाले ताप विद्युत गृहों के लिए अपनी मर्जी के हिसाब से कर सकती है। 

मार्च 2018 में राजस्थान सरकार और AEL के बीच कवई में कोयला आधारित ताप विद्युत गृह के निर्माण को लेकर एक MoU पर हस्ताक्षर हुए। इसमें भी राज्य सरकार ने कोल लिंकेज खोजने में मदद देने का भरोसा दिलाया। मई और जून 2008 के बीच AEL ने राजस्थान सरकार को 6 ख़त लिखे, जिसमें PEKB कोयला खदान का आवंटन दिलवाने की बात कही गई, तब उस खदान में काम करना शुरू किया जा रहा था। लेकिन जब इसमें सफलता नहीं मिली, तो AEL ने राज्य सरकार से कोयला मंत्रालय से कवई प्रोजेक्ट के लिए कोयला ब्लॉक आवंटित करवाने के लिए आवेदन करने की मांग की।

जुलाई 2009 में जब AEL डिस्कॉम को ऊर्जा बिक्री के लिए नीलामी में अपनी बोली की तैयारी कर रही थी, तब कंपनी ने सरकार को कोल लिंकेज के लिए आवेदन दिया। कंपनी ने ऐसा राष्ट्रीय कोयला वितरण नीति, 2007 के तहत किया, जिसमें ‘स्टैंडिंग लिंकेज कमेटी’ द्वारा अनुमित प्राप्त प्रोजेक्ट को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया लिमिडेट (CIL) से 100 फ़ीसदी कोयला जरूरतों की पूर्ति होती।

2010 की शुरुआत में APRL के राजस्थान डिस्कॉम के साथ PPA हो चुके थे, लेकिन उसके पास कोल लिंकेज नहीं थी। उस मौके पर एक बार फिर APRL ने राज्य सरकार से कवई प्रोजेक्ट के लिए कोयला ब्लॉक आवंटित करने की मांग लगाई। कंपनी ने यह मांग भी रखी, कि राज्य सरकार RRVUNL और APRL के बीच एक ईंधन आपूर्ति समझौता करवाए। बता दें RRVUNL के पास PEKB कोयला खदान के विवेकाधीन उपयोग का अधिकार मौजूद है। जनवरी, 2011 की शुरुआत से राजस्थान सरकार ने कवई प्रोजेक्ट के लिए कोयला ब्लॉक का आवंटन करने के लिए केंद्र सरकार के सामने लाबीइंग शुरू कर दी। 

न्यूज़क्लिक के लिए पुराने लेख में इस लेख के लेखकों ने पूरी प्रक्रिया को विस्तार से बताया है: 

राजस्थान सरकार ने कोयला मंत्रालय को जनवरी, 2011 में पत्र लिखकर सरकार से छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा चिन्हित कोयला ब्लॉक्स को राजस्थान में कवई समेत अन्य प्रोजेक्ट में कोयला  आपूर्ति के लिए आवंटित करने की मांग की। एक साल तक कोई जवाब ना मिलने पर, फरवरी, 2012 में राजस्थान सरकार ने केंद्र सरकार से फिर गुहार लगाई। इस बार कोयला मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय, दोनों से अपील की गई। अपील में कहा गया कि कवई प्रोजेक्ट को केंद्र सरकार की 11 वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के अन्य ऊर्जा कार्यक्रमों के स्तर पर माना जाए, जबकि कवई प्रोजेक्ट 12 वीं पंचवर्षीय (2012-17) योजना का हिस्सा था।

अपनी प्रतिक्रिया में ऊर्जा मंत्रालय ने कहा कि कवई प्रोजेक्ट 12 वीं पंचवर्षीय योजना का हिस्सा है और उसके साथ संबंधित अवधि में ही विचार किया जाएगा। इस बीच मंत्रालय ने राजस्थान सरकार को छत्तीसगढ़ में आवंटित कोयला ब्लॉक्स में उत्पादन क्षमता बढ़ाने का सुझाव दिया और इनसे कवई प्रोजेक्ट के लिए कोयला हासिल करने को कहा। 

ठीक इसी वक़्त, फरवरी 2012 में स्टैंडिंग लिंकेज कमेटी ने तय किया कि CIL द्वारा कोयले की कमी से संबंधित कोई भी ईंधन आपूर्ति समझौते (FSAs) नहीं किए जाएंगे।

राजस्थान सरकार ने नवंबर, 2012 में केंद्र सरकार को बताया कि अपने लिए आवंटित खदानों में अनुमति प्राप्त निकासी मात्रा को बिना बढ़ाए, नई जरूरतों के हिसाब का अधिशेष कोयला उत्पादन नहीं हो सकता। कुलमिलाकर राजस्थान सरकार कवई प्रोजेक्ट के लिए घरेलू कोयले के प्रबंधन का भरोसा दिलाकर, जब APRL और केंद्र सरकार भी उससे छत्तीसगढ़ में अपनी कोयला खदानों से आपूर्ति करने के लिए कह चुकी थीं, राजस्थान सरकार ऐसा करने से इंकार कर रही थी। 

इसके बाद राजस्थान सरकार ने नई दिल्ली में लॉबीइंग की अपनी कोशिशों में तेजी ला दी। 26 नवंबर, 2012 को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कोयला और ऊर्जा मंत्रालयों को खत लिखा, जिसमें कोयले के आवंटन की मांग की गई, जिसके लिए कवई प्रोजेक्ट द्वारा काम शुरू ना कर पाने की वज़ह बताई गई। राजस्थान सरकार ने जनवरी, 2013 में योजना आयोग को एक दूसरा ख़त लिखा। दिसंबर, 2012 में कवई ऊर्जा संयंत्र में इंडोनेशिया से आने वाले कोयले से प्रायोगिक आधार पर उत्पादन शुरू किया गया। अगस्त, 2013 में इसे राज्य की ऊर्जा ग्रिड के साथ जोड़ दिया गया। 

फरवरी, 2013 में APRL ने डिस्कॉम को पत्र लिखकर बताया कि राजस्थान सरकार द्वारा घरेलू कोल लिंकेज हासिल करने के लिए की गईं लगातार कोशिशें असफल हो गई हैं। चूंकि संयंत्र इंडोनेशियाई कोयले से चल रहा है, जहां इंडोनेशिया की सरकार द्वारा एक नई नीति लाने से कोयले की कीमत बढ़ गई है, इसलिए टैरिफ को दोबारा तय किया जाना जरूरी है, ताकि निजी कंपनी को विदेशी कोयले के इस्तेमाल के चलते ऊंची कीमतों का मुआवज़ा दिया जा सके।

अप्रैल 2013 तक भी कोई कोल लिंकेज हासिल नहीं हो पाई। इसके बाद APRL ने RERC में याचिका दाखिल की, जिसमें 2010 की नीलामी में तय किए गए बिजली टैरिफ को बढ़ाने की मांग की गई।

इसके बाद मई, 2013 में सरकार ने राष्ट्रीय कोयला वितरण नीति (NCDP) में बदलाव लाने का फ़ैसला किया। इसे 2013 में सूचित कर दिया गया। नई संशोधित नीति में जिन ऊर्जा संयंत्रों को कोल लिंकेज मिलना बाकी है, उनकी जरूरत का एक हिस्सा कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा पूरा किया जाना था। बाकी की आपूर्ति के लिए कोयले का आयात करवाया जाना था।

क़ानून में बदलाव?

कोर्ट के सामने सवाल था कि क्या APRL द्वारा घरेलू कोल लिंकेज ना खोज पाने की स्थिति “कानून में बदलाव” है। यहां तर्क और वितर्क का परीक्षण करना फायदेमंद नहीं रहेगा, क्योंकि दिसंबर 2013 में अशोक गहलोत सरकार के जाने से महीनों पहले RERC में जमा किए गए एक शपथपत्र में डिस्कॉम्स ने माना था कि कानून में बदलाव हुआ है!

सिंह के मुताबिक़ डिस्कॉम द्वारा इस तथ्य का माना जाना एक आत्मघाती कदम था। इस चीज को सुप्रीम कोर्ट से लेकर RERC और APTEL तक, हर जगह बताया गया। 

सिंह कहते हैं, “केस के बीच में नज़रियों में कहीं ना कहीं बदलाव आया था। यह एक दोस्ताना मैच जैसा था, जहां राजस्थान सरकार अडानी पॉवर के पक्ष में झुकी हुई नज़र आ रही थी। सरकार ने उन्हें किसी तरह के मुआवज़ा दिए जाने के खिलाफ़ कड़ा रुख नहीं अपनाया। लेकिन बाद में वो किसी तरह जाग गए और उन्होंने आखिर तक जंग लड़ने का फैसला कर लिया। लेकिन यह बदलाव बहुत देर से आया। तब तक वे बहुत सारे आत्मघाती गोल कर चुके थे।”

‘एनर्जी वॉचडॉग’ केस के फ़ैसले का दुरुपयोग

डिस्कॉम द्वारा कोर्ट में तथ्य स्वीकारे जाने के बाद, सुप्रीम कोर्ट के 2017 में आए “एनर्जी वॉचडॉग” फैसले की तरफ निगाहें घूम गईं। उस मामले में अडानी समूह के ही एक ऊर्जा संयंत्र- मुंद्रा ऊर्जा संयंत्र ने मुआवज़े वाले टैरिफ की मांग की थी। यह संयंत्र गुजरात सरकार और कुछ दूसरे राज्यों को ऊर्जा उपलब्ध करवाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि कानून में बदलाव के आधार पर मुंद्रा संयंत्र को कुछ हिस्से का मुआवज़ा दिया जाना होगा, क्योंकि संयंत्र का CIL के साथ CSA था, जिसमें 2013 की कोयला नीति द्वारा कुछ बदलाव हो गए थे। 

लेकिन उसी फ़ैसले में जस्टिस रोहिंगटन नरीमन और पिनाकी चंद्र घोष की बेंच ने कहा था, “कोयले की आपूर्ति का जो भी वहन है, वह ऊर्जा संयंत्र लगाने वाले शख्स को ही वहन करना होगा। यह साफ़ है कि कोयल में आए एक अप्रत्यक्ष उछाल से ऊर्जा उत्पादन कंपनियां समझौते में बताया गया अपना काम नहीं रोक सकती हैं। इसका एक बहुत अच्छा कारण है। जब यह कंपनियां नीलामी में शामिल हो रही होती हैं, तब वे जानबूझकर यह जोख़िम लेती हैं। तय टैरिफ पर बिजली की आपूर्ति का जोखिम उत्पादन कंपनियां लेती ही हैं।”

ताजा फैसला कानून में आए बदलाव पर अपनी समझ एनर्जी वॉचडॉग केस के फैसले से बनाता है। लेकिन यह फैसला उत्पादक कंपनियों के जोखिम वाले इस नियम को भूल जाता है। इस मामले में तो CSA भी मौजूद नहीं था, लेकिन जस्टिस अरुण मिश्रा के नेतृत्व वाली बेंच ने माना कि राजस्थान सरकार और APRL के बीच हुआ MoU इस बात का आधार है कि APRL को कानून में बदलाव का नुकसान हुआ है।

कोयले की क़ीमतों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाना

तीसरा मामला, AIPEF ने उठाया था। इसमें इंडोनेशिया से आने वाले कोयले की कीमत को बढ़ा-चढ़ाकर (ओवर इंवॉयसिंग) बताने के आरोप लगाए गए थे। यह आरोप डॉयरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस (DRI) ने अडानी समूह की कंपनियों समेत 40 कंपनियों पर लगाए थे। DRI वित्तमंत्रालय के अधीन एक जांच संस्था है।

DRI ने आरोप लगाया कि अडानी समूह, दूसरी निजी कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने आयातित कोयले की कीमतों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया, इसके लिए इंवॉयस और कीमत निर्धारण में छेड़खानी की गई। साथ में यह आरोप भी लगाया गया कि इनसे जो गैरकानूनी मुनाफ़ा हुआ है, उसे विदेशी ‘टैक्स हैवन’ में भेजा जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में DRI अडानी समूह के साथ कानूनी लड़ाई लड़ रहा है, ताकि उसकी जांच को रोका जा सके। 2018 में DRI ने सिंगापुर, हॉन्गकॉन्ग, स्विट्जरलैंड और यूएई में कोर्ट को कानूनी सहायता मांगने वाले पत्र लिखे, ताकि इन देशों में बैंकिंग और दूसरे दस्तावेज़ हासिल किए जा सकें, जो इंडोनेशिया से अडानी समूह के कोयला आयात की जांच में सहायता कर सकें। अडानी समूह इन पत्रों को खारिज करवाना चाहता है, पहले सिंगापुर में यह लड़ाई लड़ी गई, वहां हारने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट में लड़ाई लड़ी जा रही है। 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अडानी के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। अब DRI ने सुप्रीम कोर्ट में इस फ़ैसले के खिलाफ़ याचिका लगाई है। इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश के क्रियान्वयन पर अपनी सुनवाई चलने तक रोक लगा दी।

जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने मामले पर नज़र डालने से इंकार कर दिया। बता दें AIPEF की तरफ से प्रशांत भूषण मामला लड़ रहे थे। कोर्ट ने कहा, “हमारा मानना है कि जब तक इंवॉयसिंग में संबंधित अधिकार प्राप्त कोर्ट का फ़ैसला नहीं आ जाता, इस तथ्य को यहां मान्यता नहीं दी जा सकती।”

फ़ैसले का प्रभाव

डिस्कॉम को सुप्रीम कोर्ट से थोड़ी बहुत राहत मुआवज़ा वाले टैरिफ पर ब्याज़ में मिली है। इसे 2013 में संयंत्र में बिजली उत्पादन की शुरुआत से आंका जाना है। अडानी समूह ने इस ब्याज़ दर को SABR (स्टोकास्टिक अल्फा बीटा र्हो) ब्याज़ दर से भी 2 फ़ीसदी ऊपर रखे जाने की मांग की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे 9 फ़ीसदी तय किया है। 

AIPEF के सिंह इसे मात्रात्मक तरीके से बताते हैं: “फ़ैसले के प्रभाव से डिस्कॉम पर एक आपात वित्तीय भार आ जाएगा। शुरुआत में APTEL ने 5130 करोड़ रुपये के दावे को माना था, इसका 50 फ़ीसदी भुगतान एक अंतरिम आदेश के बाद किया जा चुका है। इस पर अडानी पॉवर राजस्थान ने 3000 करोड़ रुपये के ब्याज़ की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने मूल दावे (5,130 करोड़ रुपये) में बदलाव नहीं किए हैं, लेकिन इस पर लगने वाले ब्याज़ में थोड़ी सी कटौती की राहत दी है। इसलिए ब्याज़ की रकम कुछ कम हो जाएगी। फैसले में कोर्ट ने कहा कि ब्याज़ दर 9 फ़ीसदी से ऊपर नहीं जानी चाहिए। वहीं अडानी ने SABR दर से 2 फ़ीसदी ऊपर ब्याज़ लगाए जाने की मांग की थी। किसी भी हाल में यह आंकड़ा 8000 करोड़ रुपये के ऊपर पहुंच ही जाएगा।

AIPEF करेगा पुनर्विचार की मांग?

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए सिंह ने बताया कि AIPEF पुनर्विचार याचिका लगाए जाने के विकल्प पर विचार कर रहा है। उन्होंने कहा, “अगर यह आरोप हैं कि कोयले के आयात में कीमतों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया, यह आरोप खुद सरकारी एजेंसी DRI ने लगाए हैं, जिसकी जांच अब भी जारी है, मेरा मानना है कि इस स्थिति में मुआवज़े वाले टैरिफों की अदायगी नहीं होनी चाहिए। ऐसा तब तक नहीं होना चाहिए, जब तक जांच पूरी ना हो जाए।”

उन्होंने आगे कहा, “DRI के जो आरोप हैं, उन्हें ख़ारिज नहीं किया जा सकता। वह भारत सरकार की आधिकारिक संस्था है। जांच से जुड़े एक मामले में संस्था खुद सुप्रीम कोर्ट में है, जहां वह अडानी के खिलाफ कोयला आयात मामले में विदेशी क्षेत्राधिकार के लिए ‘लेटर रोगेटॉरी’ हासिल करने की कोशिश कर रही है। इस मामले को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। हम यह मांग कर सकते हैं कि जब तक DRI यह प्रमाणित नहीं कर देता कि किसी तरह से आयातित कोयले में ऊंची कीमतों को नहीं दिखाया गया है, तब तक मुआवज़ा ना दिया जाए। हम इस मांग के साथ पुनर्विचार याचिका दाखिल कर सकते हैं। किसी बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए आंकड़े के आधार पर भुगतान करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।”

सिंह आगे कहते हैं, “मैं कभी यह नहीं जान पाया कि क्यों राजस्थान डिस्कॉम्स को आयातित कोयले की कीमतों कों बढ़ाचढ़ाकर बताने वाले मुद्दे से परेशानी नहीं हुई। ना तो उन्हें RERC में दिक्कत हुई, ना APTEL में और ना ही सुप्रीम कोर्ट में उन्हें इससे कोई परेशानी है। आखिर किस दबाव की वज़ह से डिस्कॉम इस बात को नहीं उठा पा रहे हैं? आयातित कोयले की कीमतों के गड़बड़झाले से प्राथमिक तौर पर डिस्कॉम को ही नुकसान हो रहा है, यह मुद्दा उठाने के क्रम में उन्हें मोर्चे पर सबसे आगे होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने खुद बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। यह तथ्य अपने आप में यह बोलने के लिए काफ़ी होना चाहिए कि DRI द्वारा जांच के घेरे में और न्यायालय में लंबित दावों के लिए किसी भी तरह का भुगतान नहीं किया जाएगा।”

जस्टिस मिश्रा और अडानी से संबंधित 7 फ़ैसले

एक शुरुआती लेख में न्यूज़क्लिक ने 6 ऐसे मामलों की सूची बनाई थी, जिनमें अडानी समूह एक पक्ष था और उन पर जस्टिस मिश्रा ने फ़ैसला दिया था। इन फ़ैसलों में कोर्ट ने अडानी समूह की कंपनियों के पक्ष में फ़ैसले दिए थे। 

AIPEF की तरफ से केस लड़ने वाले प्रशांत भूषण ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए इस चीज पर ध्यान दिलाया था। हाल में जस्टिस मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच से दो ट्वीट के लिए कोर्ट की अवमानना के दोषी ठहराए गए प्रशांत भूषण ने न्यूज़क्लिक से कहा, “इस फ़ैसले से एक बुरा चलन शुरू हो गया है। कई राज्यों से अब इस तरह के मामले में ऐसे ही दावे उठेंगे। यह उस श्रंखला का एक हिस्सा है, जिसमें जस्टिस अरुण मिश्रा के नेतृत्व वाली बेंचों ने ऐसे फ़ैसले दिए हैं, जिनसे बहुत बड़े पैमाने पर अडानी समूह को ग्राहकों और उपभोक्ताओं की कीमत पर फायदा हुआ है।”

उन्होंने आगे कहा, “इस फ़ैसले से अडानी को हज़ारों करोड़ रुपये का अन्यायपूर्ण फायदा हो जाएगा, जिसकी कीमत राजस्थान के आम लोग बढ़ी हुई ऊर्जा कीमतों के तौर पर चुकाएंगे।”

भूषण ने कहा, “तथ्य यह है कि टैरिफों को प्रतिस्पर्धी बोलियों के आधार पर तय होने चाहिए थे और अडानी ने बिना शर्त इस बात को माना था कि अगर उन्हें घरेलू कोयला नहीं मिलता, तो वह किसी तरह का फायदा नहीं लेंगे। यह फ़ैसला नीलामी प्रक्रिया की पवित्रता और नीलामी के वक़्त अडानी द्वारा ली गई शपथ का उल्लंघन है। ऊपर से PPA के मुताबिक़, आयातित कोयले का इस्तेमाल साफ़ तौर पर परिकल्पित था, जबकि कोर्ट का फ़ैसला कहता है कि यह पूरी तरह घरेलू कोयले के इस्तेमाल पर आधारित था।”

इस कानूनी उठापटक में सबसे बड़ा नुकसान राजस्थान के शहरो में बिजली उपभोक्ताओं का होने वाला है। यहां फायदा सिर्फ और सिर्फ भारत के दूसरे सबसे अमीर इंसान के नेतृत्व वाले औद्योगिक घराने का हो रहा है, जिसकी प्रधानमंत्री से निकटता किसी से छुपी नहीं है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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