अखण्ड भारत

Hathras: 132 साल पहले…जब हाथरस में स्वामी विवेकानंद को मिला था अपना पहला शिष्य

स्वामी विवेकानंद की मुलाकात 132 साल पहले 1888 में वृंदावन से हरिद्वार जाते समय हाथरस स्टेशन पर स्टेशन मास्टर शरत चंद्र गुप्ता से हुई, जिन्होंने हाल ही में नौकरी जॉइन की थी। मूल रूप से बंगाल के निवासी शरत उस वक्त युवा संत से प्रभावित हो गए थे। शरत ने भी अपनी नौकरी त्याग दी और विवेकानंद साथ हो लिए।

हाइलाइट्स:

  • यूपी के हाथरस में विवेकानंद को मिला था पहला शिष्य
  • वृंदावन से हरिद्वार जाते वक्त स्वामी से मिले थे शरत
  • युवा संत के प्रभावित हुए स्टेशन मास्टर, त्याग दी नौकरी

हाथरस
एक दलित लड़की के साथ गैंगरेप और फिर हत्या की वजह से उत्तर प्रदेश का हाथरस (Hathras) सुर्खियों में आया हुआ है। घटना के बाद उपजी परिस्थितियों को सही तरीके से हैंडल नहीं कर पाने की वजह से सीएम योगी आदित्यनाथ भी आलोचना के घेरे में हैं। लेकिन दुनिया में भारत की अलग पहचान स्थापित करने वाले ‘योगी’ स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekanand) को अपना पहला शिष्य इसी हाथरस में ही मिला था।

ब्रिटिश राज में हाथरस औद्योगिक केंद्र हुआ करता था। यह कपास फैक्ट्री के साथ ही हींग और देसी घी के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था। 132 साल पहले 1888 में वृंदावन से हरिद्वार जाते समय हाथरस स्टेशन पर स्टेशन मास्टर शरत चंद्र गुप्ता से हुई, जिन्होंने हाल ही में नौकरी जॉइन की थी। मूल रूप से बंगाल के निवासी शरत उस वक्त युवा संत से प्रभावित हो गए थे।

नौकरी छोड़कर संत बन गए
चेहरे पर तेज लिए चौड़ी आंखों वाले विवेकानंद से स्टेशन मास्टर शरत ने उनके बारे में पूछा। और साथ ही उन्हें अपने क्वार्टर पर चलने को कहा। एक दिन बाद जब विवेकानंद आगे की यात्रा के लिए ट्रेन पकड़ने गए, तब शरत ने भी अपनी नौकरी त्याग दी और साथ हो लिए। स्वामी विवेकानंद पर 1947 में लिखी अपनी किताब में स्वामी विरजानंद ने हाथरस में स्वामी विवेकानंद और शरत के बीच बातचीत का जिक्र किया है।

अनेक यात्राओं में रहे स्वामी के साथ

तपस्वी बनने के बाद स्वामी सदानंद बन गए शरत ने 1897-98 में विवेकानंद के साथ उत्तरी भारत और कश्मीर की यात्रा भी की थी। अल्मोड़ा और खेतरी में स्वामी विवेकानंद के साथ प्रवास के दौरान शरत ने बेलगाम घोड़ों को साधकर अपने साहस का प्रमाण भी दिया था।

देश-विदेश में किया विचार का प्रसार
रामकृष्ण परंपरा में ‘गुप्ता महाराज’ के नाम से प्रसिद्ध शरत को मद्रास में मठ स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है। शरत ने विवेकानंद की शिक्षाओं और विचारों का प्रसार करने के लिए 1903 में जापान की यात्रा भी की। बाद में वह भगिनी निवेदिता के साथ भी बतौर गाइड जुड़ गए थे। 1911 में कोलकाता में शरत का निधन हो गया।

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