क्राइम्स

दूषित मानसिकता और पुरुषसत्ता की दोहरी मार झेलती दलित स्त्री

दूषित मानसिकता और पुरुषसत्ता की दोहरी मार झेलती है दलित स्त्री

दलित स्त्रियों का आत्मसंघर्ष बहुत गहरा है। वह निरंतर दो स्तरों पर चलता है। राजस्थान की भंवरी बाई और बसमतिया, पश्चिम बंगाल की चुन्नी कोटाल और आज हाथरस की युवती, न जाने कितने उदाहरण इस तरह के हैं जो शोषण के दोहरे शिकंजे का प्रमाण देते हैं।

हाथरस में दलित लड़की के यौन उत्पीड़न और हत्या की जांच 360 डिग्री घूमने को है। पिछले दिनों जितने भी सवर्ण नेताओं, पत्रकारों और अधिकारियों से बात हुई वे सब इसे ऑनर किलिंग बताकर पूरी गाज पीड़ित परिवार पर ही गिराने वाले हैं। इस कहानी से ब्राह्मणवाद, पुरुष सत्ता और उसके साथ खड़ी राजसत्ता एकदम पाक साफ होकर निकल आएगी और मानवाधिकार और सामाजिक परिवर्तन का सारा संघर्ष फुस्स हो जाएगा।

जैसे वैसी कहानी होने पर समाज और राजसत्ता की कोई जिम्मेदारी ही नहीं बनती। ऐसा होने के बाद फासिस्ट शक्तियों को फिर किसी प्रतिरोध को दबाने और विपक्ष को साजिशी साबित करने का मौका मिल जाएगा। लेकिन यह मामला इतना सीधा भी नहीं है।

दरअसल दलित स्त्रियों की पीड़ा दोहरी है। ‘दलित महिलाओं की त्रासदी यह है कि उन्हें एक गाल पर ब्राह्मणवाद और दूसरे गाल पर पितृसत्ता का थप्पड़ खाना पड़ता है। साहित्य, इतिहास, राजनीति और समाजशास्त्रीय स्रोतों को खंगालने से दलित महिलाओँ के संदर्भ में मुक्तिकामी भीमस्मृति और दासता की प्रतीक मनुस्मृति के बीच सहअस्तित्व के तथ्य सामने आ सकते हैं।’(आधुनिकता के आइने में दलित; संपादक-अभय कुमार दुबे)।

यह जानना दिलचस्प है कि हिंदी जगत के सर्वाधिक प्रखर दलित विचारक डा धर्मवीर ने दलित स्त्रियों के बारे में ऐसा आख्यान रचा कि दलित स्त्रियां ही उनके विरुद्ध हो गईं। एक सभा में तो उन पर हमला भी हुआ। डा धर्मवीर ने ‘कबीर के आलोचक’ के बहाने उनकी ब्राह्मणवादी आलोचना की कलई उतार दी थी। इसी तरह उन्होंने प्रेमचंद के भीतर भी पूर्वाग्रह देखा था।

उन्होंने ‘हिंदी की आत्मा’ जैसी पुस्तक लिखकर हिंदी को सरल और सहज बनाने की पैरवी की थी। लेकिन निजी जीवन में पत्नी के व्यवहार से परेशान होकर उन्होंने अलग दलित संहिता की ही मांग कर डाली। उनका कहना था कि दलित स्त्रियां ज्यादा स्वच्छंद होती हैं और उन पर अंकुश लगाने की जरूरत है।

शायद यही कारण था उनकी दलित लेखकों और बौद्धिकों में जो प्रतिष्ठा होनी चाहिए थी वह बन नहीं पाई। दूसरी तरफ स्थापित मार्क्सवादी आलोचकों से पंगा लेने के कारण उनकी नजरों से वे पहले ही गिरे हुए थे। हालांकि यह यह दिक्कत हिंदू कानून में तलाक ले पाने में दिक्कत के कारण शुरू हुई थी।  

लेकिन दलित स्त्रियों का यह आत्मसंघर्ष बहुत गहरा है। वह निरंतर दो स्तरों पर चलता है। राजस्थान की भंवरी बाई और बसमतिया, पश्चिम बंगाल की चुन्नी कोटाल और आज हाथरस की युवती, न जाने कितने उदाहरण इस तरह के हैं जो शोषण के दोहरे शिकंजे का प्रमाण देते हैं।

नट जाति की भंवरी बाई को एक ओर घर के भीतर पिता अपसकुनी कहते थे तो दूसरी ओर उसके स्वाभिमान से सवर्ण समाज के लोग जलते थे। वजह थी कि उसके तीन भाई मर गए और बाद में पति भी मर गए। उसने जब ईसाई मिशनरियों से संपर्क किया तो उसे विधर्मी कहा जाने लगा और जब आंबेडकर जयंती मनानी शुरू की तो उस पर हमले होने लगे। गांव के ही बैरवा जाति के लोग भंवरी बाई के विरुद्ध हो गए।

भंवरी के दूसरे पति की पिटाई होती थी और पुलिस के चक्कर काटने के बावजूद उसके साथ न्याय नहीं होता था। एक बार भंवरी ने गंगाजली लेकर कसम खाने की बात कही तो पुलिस ने कहा कि तेरा हाथ लगा तो गंगाजल भी अपवित्र हो जाएगा। इस तरह भंवरी ने जो भी संघर्ष किया वह सवर्ण समाज से तो किया ही अपने समाज से भी किया।

राजस्थान की ही दलित महिला बसमतिया मजदूर थी। खेत पर काम करती थी। मालिक ने उसे गर्भवती कर दिया। उसके बाद मालिक ने संबंध स्वीकार करने से इनकार किया और पंचायत बैठी। पंचायत ने उसे पतित घोषित कर दिया।

नब्बे के दशक के आरंभ में चुन्नी कोटाल की कहानी दलित स्त्री पर अत्याचार की राष्ट्रीय कहानी बनकर चर्चित हुई। चुन्नी कोटाल मिदनापुर के लोध सबर आदिवासी समाज की पहली लड़की थी जिसने बीए की परीक्षा पास की थी। वह आगे पढ़ना चाहती थी और उसने विद्यासागर विश्वविद्यालय में एम.एससी. में दाखिला लिया। वहां उसे सवर्ण और पुरुष समाज ने मिलकर इतना प्रताड़ित किया कि उसे 1992 में आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा। तब इस मामले में प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी ने हस्तक्षेप करते हुए उसके लिए न्याय की अपील की। इस पूरे मसले पर उन्होंने 1994 में ‘ब्याधखंड’ नामक रचना रची।

दलित स्त्री की इस पीड़ा को समझने की कोशिश करते हुए कभी वरिष्ठ कथाकार और हंस के तत्कालीन संपादक राजेंद्र यादव ने कहा था, ‘हमारे समाज में नैतिकता के सारे मानदंड स्त्री शरीर से तय होते हैं। उनका निर्वाह केवल स्त्री को ही करना पड़ता है। सेक्स के मामले में स्त्री का जो शोषण होता है उसका अनुभव केवल स्त्री ही जानती है। उम्मीद है दलित स्त्रियां उस अनुभव को लिखेंगी।’ इसीलिए दलित महिला लेखन में ब्राह्मणवादी परंपरा के साथ पितृसत्ता पर भी चोट की जाती रही है।

उनके लेखन में दोहरी तिलमिलाहट मिलती है। इस संदर्भ में दलित लेखिका कौशल्या बैसंत्री की आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे लिखती हैं, ‘मेरे उच्च शिक्षित पति, लेखक और भारत सरकार में उच्च पद पर सेवारत रहे। उन्हें ताम्रपत्र भी मिला है और स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन भी। पति ने मेरी कदर नहीं की, बल्कि रोज रोज के झगड़े, गालियों से मुझे मजबूरन घर छोड़ना पड़ा और कोर्ट केस लड़ना पड़ा।’

मराठी दलित साहित्य में ऐसी आत्मकथाओं की भरमार है। वहां कौशल्या बैसंत्री के अलावा कुमुद पांवड़े, मीनाक्षी मून, बेबी कांबले, नामदेव ढसाल की पत्नी मल्लिका अमरशेख का नाम प्रमुख है। मल्लिका अमर शेख ने अपनी आत्मकथा ‘मैं खाक में मिलना चाहती हूं ’ इस दोहरे अभिशाप का वर्णन किया है।

हालांकि वे पैदाइशी दलित नहीं हैं। उनका दलित पैंथर आंदोलन के संस्थापक और प्रसिद्ध मराठी कवि नामदेव ढसाल के साथ अनुभव इतना बुरा रहा कि उन्होंने लिखा, ‘किसी एक नामदेव के लिए मेरी समूची जिंदगी नहीं हो सकती। हर सफल मर्द की जड़ मे एक औरत होती है। इस धारणा को मैं पूरी शिद्दत के साथ झुठलाना चाहती हूं। मर्द औरत प्रवृत्ति के दो रूप हैं-अपूर्ण फिर भी समर्थ। अलग दिमाग, अलग मन और अलग मेधा होने के बावजूद पुरुष प्रधानता को भला औरत क्यों स्वीकार करे?’

पुरुष और वर्णसत्ता झेल रही दोहरे अभिशाप के बारे में तेलुगू लेखिका चल्लापल्ली स्वरूपरानी लिखती हैं…
अरे हां…….अपनी जिंदगी को मैंने जिया कब?
घर में पुरुषाहंकार एक गाल पर थप्पड़
मारता है तो
गली में वर्ण आधिपत्य दूसरे गाल पर चोट करता है

इसी पीड़ा को व्यक्त करते हुए शशि निर्मला लिखती हैं—-
कहते हैं कोई
मुझे बना कर पीढ़ा
खींच -खींच कर बैठेंगे
डाल कर नकेल
मुझे हांकेंगे-नचाएंगे

इसीलिए दलित आंदोनकारियों और आंबेडकरवादियों को चेतावनी देते हुए रमणिका गुप्ता लिखती हैं—‘इस बात का जिक्र करना चाहूंगी कि दलित मुक्ति के झंडाबरदारों को अधिक उदार और सहनशील होना होगा और अपनी कमियों को स्वीकार करना होगा। अन्यथा वे ब्राह्णवादी परंपरा के अनुयायी बनकर ………अपने आंदोलन को संकुचित कर लेंगे।’

दलित महिलाओं के समक्ष उपस्थित दोहरी चुनौती का मूल्यांकन करते हुए चल्लापल्ली स्वरूपरानी लिखती हैं—
‘उच्च जाति की स्त्रियों द्वारा चलाए जाने वाले आंदोलन को मिलने वाली पब्लिसिटी में और दलित स्त्रियों द्वारा चलाए जाने वाले आंदोलन को मिलने वाली पब्लिसिटी में अंतर है। जो पब्लिसिटी मेधा पाटकर द्वारा चलाए जाने वाले पर्यावरण आंदोलन को मिली वैसी पब्लिसिटी आंध्र प्रदेश में साधारण स्त्रियों द्वारा चलाए गए शराबबंदी आंदोलन को नहीं मिली।’

इसीलिए राजस्थान की दलित लेखिका कुसुम मेघवाल कहती है, ‘दलित वर्ग की महिलाओं के उत्थान, कल्याण और उनकी समस्याओं को निपटाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अलग से दलित महिला आयोग, दलित महिला कोष की स्थापना की जाए, जो पूर्ण रूप से इस वर्ग की महिलाओं के लिए काम करे।’


 
हाथरस की घटना के बारे में यह बहुत सकारात्मक बात है कि वहां लगभग सभी पार्टियों के राजनेता और कार्यकर्ता पहुंच रहे हैं। इससे कम से कम वह निराशा तो कम होती दिखती है जो आमतौर पर दलित समाज के भीतर व्याप्त है कि उनके संघर्ष में सवर्ण समाज नहीं उतरता। लेकिन इस देश में दलित और स्त्री आंदोलन की विडंबना यह है कि वह जब भी तेज होता है तो उस पर विदेशी फंड लेकर दंगा कराने और देश तोड़ने की साजिश करने का आरोप लगा दिया जाता है। जबकि ब्राह्मणवादी आंदोलन चाहे जो करे उसे देशभक्त होने का ही तमगा दिया जाता है।

ऐसा आरोप सावित्री बाई फुले, पंडिता रमाबाई और दूसरी कई नारीवादी महिलाओं पर लग चुका है। यहां तक कि जब देवराला में रूपकंवर के सती होने के बाद स्त्री अधिकारों का आंदोलन खड़ा हुआ तो उस पर भी यूरोपीय प्रभाव में भारतीय संस्कृति को नष्ट करने का आरोप लगा।

जब उत्तर प्रदेश में कांशीराम का आंदोलन खड़ा हुआ तो यह कहने और लिखने वाले कई अग्रणी पत्रकार थे कि यह आंदोलन सीआईए के इशारे पर चल रहा है। जब भी दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को रंगभेद के साथ जोड़ा गया तब भी इस तरह का विरोध हुआ। इसलिए आज यह संयोग नहीं है कि हाथरस कांड को नया नया मोड़ दिया जा रहा है और इस मामले में ब्राह्मणवादी और पुरुषवादी सत्ता दोनों शामिल है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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