इतिहास

ब्लैक होल एक ऐसा कुआं है जहां प्रकृति के सारे नियम अपना दम तोड़ देते हैं!

ब्लैक होल एक ऐसा कुआं है जहां प्रकृति के सारे नियम अपना दम तोड़ देते हैं!

तीन वैज्ञानिकों को ब्लैक होल को समझने के लिए किए गए उनके उल्लेखनीय कार्य पर साल 2020 का फ़िज़िक्स का नोबेल पुरस्कार दिया गया है।

सच के साथ |एक सवाल हम सबने अपनी जिंदगी में कभी ना कभी तो जरूर सोचा होगा। सवाल यह कि इस ब्रह्मांड का अंत कहां होगा? इस ब्रह्मांड की सीमा क्या है? अभी तक किसी को भी इसका कोई पुख्ता जवाब नहीं मिला है। लेकिन कई जवाबों में से एक जवाब ब्लैक होल का होता है।

कई जानकार कहते हैं कि यह एक ऐसी जगह होती है जहां कोई चीज जाकर फिर वापस नहीं आती है। शायद यही पर ब्रह्मांड का अंतिम सिरा होने की संभावना है। लेकिन यह भी एक ऐसी संभावना का नाम है जो अपने आप में अंतहीन है। पहले जानकार निश्चित नहीं थे कि ब्लैक होल जैसी कोई परिघटना होती भी है या नहीं। लेकिन अब निश्चित हो गए हैं कि ब्लैक होल जैसी परिघटना होती है।

इसी निश्चितता के सत्यापन करने वाले वैज्ञानिकों को साल 2020 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिए जाने का ऐलान किया जा चुका है। इनका नाम रोजर पेनरोज़, रेनहर्ड जेंज़ेल, एंड्रिया गेज़ है। तो इस मौके पर थोड़ा यह समझते हैं कि आखिर कर यह ब्लैक होल होता क्या है?

ब्लैक होल एक ऐसा इलाका है जिसका गुरुत्वाकर्षण बल इतना अधिक मजबूत होता है कि उसके अंदर कुछ भी जाए वह लौटकर वापस नहीं आता है। यहां तक की किसी भी तरह की रोशनी का बाहर आना नामुमकिन होता है।

ये ब्लैक होल बहुत अधिक घनत्व और बहुत अधिक द्रव्यमान वाले पिंड होते हैं। यानी इनका सतह बहुत अधिक सघन और घना होता है। चूकि जब प्रकाश की किरण भी इसके अंदर घुसती हैं तो इसमें गुम हो जाती हैं। इसलिए यह अदृश्य रहता है।

अब आप पूछेंगे कि इन ब्लैक होल का निर्माण होता कैसे है? तो इसके निर्माण को समझने के लिए तारों के विकास क्रम को समझना जरूरी है। यह समझना जरूरी है कि तारे कैसे बनते हैं?

हमारा सौरमंडल तारों के एक सिस्टम का हिस्सा है। तारों के किसी भी तरह की सिस्टम वाले इलाके को आकाशगंगा कहा जाता है। जिस आकाशगंगा में हमारा सौरमंडल मौजूद है उसे मिल्की वे कहा जाता है।

इस मिल्की वे में धूल और गैस के बहुत बड़े-बड़े बादल होते हैं। इन्हें निहारिका या नेबुला कहा जाता है। इनमें हाइड्रोजन की मात्रा बहुत अधिक होती है। समय के साथ-साथ धूल और गैस के बड़े-बड़े बादल धीरे धीरे एक दूसरे के साथ मिलते हैं। मिलने पर बहुत अधिक ताप और दाब पैदा होता है। चूंकि मूल रूप से यह हाइड्रोजन के कण होते हैं। तो इनके टकराहट से नाभिकीय संलयन की क्रिया शुरू हो जाती है।

मोटे तौर पर समझा जाए तो हाइड्रोजन की टकराहट की वजह से परमाणु बम की तरह धमाका होने लगता है और बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होने लगती है। यह ऊर्जा जिन इलाकों से पैदा होती है, उन्हें ही तारा कहा जाता है। समय के साथ धीरे-धीरे ऊर्जा कम भी होती रहती है। जब तारे के अंदर की पूरी ऊर्जा खत्म हो जाती है तो उसमें एक जबरदस्त विस्फोट होता है। इसे सुपरनोवा कहा जाता है।

इसके बाद एक ऐसा इलाका बनता है जिसका गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक होता है कि उसमें रोशनी भी आकर समा जाए। यह इलाका ब्लैक होल होता है। तो मोटे तौर पर यह समझिए कि ब्लैक होल की परिघटना तारों के बर्बाद होने से जुड़ी है, जिसके बाद बहुत अधिक मजबूत गुरुत्वाकर्षण लिए हुए जिस जगह का निर्माण होता है उसे ही ब्लैक होल कहते हैं।

साल 1783 में पहली बार ब्लैक होल के बारे में बतलाया गया। लेकिन वैज्ञानिकों ने इसे नहीं माना। बहुत सारे वैज्ञानिकों ने विरोध जताया। 19वीं शताब्दी में इस सिद्धांत को ख्याली पुलाव कहकर खारिज किया जाता रहा। तब आया साल 1915 और इस साल महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी का सिद्धांत दिया।

इस सिद्धांत के बाद ब्लैक होल होने की बात को गंभीरता के साथ लिया जाने लगा। लेकिन यह इतना भी गंभीर नहीं था कि ब्लैक होल होने की संभावना पर निश्चित हुआ जा सके। खुद अल्बर्ट आइंस्टीन इसे लेकर संकोची थे। निश्चित नहीं थे।

जनरल थियरी ऑफ रिलेटिविटी या कह लीजिए सापेक्षता का सिद्धांत के जरिए अल्बर्ट आइंस्टीन न्यूटन द्वारा दिए गए गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की बुनियादी कमियों को दूर करते हैं। न्यूटन ने तो यह कहा था कि हर दो कण या आसान भाषा में कह लीजिए किन्हीं भी दो चीजों के बीच गुरुत्वाकर्षण लगता है।

यह गुरुत्वाकर्षण चीजों के द्रव्यमान बढ़ने पर बढ़ता है। द्रव्यमान घटने पर घटता है। यानी गुरुत्वाकर्षण और द्रव्यमान के साथ सीधा संबंध होता है। लेकिन चीजों के बीच की दूरी बढ़ने पर गुरुत्वाकर्षण घटता है और चीजों की बीच की दूरी घटने पर गुरुत्वाकर्षण बढ़ता है। यानी गुरुत्वाकर्षण और चीजों की बीच की दूरी के बीच उल्टा संबंध होता है।

आइंस्टीन से पहले न्यूटन की थ्योरी के हिसाब से बने फार्मूले के आधार पर ही गुरुत्वाकर्षण की गणना की जाती थी। अब भी न्यूटन की थ्योरी के हिसाब से ही गुरुत्वाकर्षण की गणना की जाती है। लेकिन मामला जब जटिल होता है। अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ा होता है। परिणाम बिल्कुल सटीक चाहिए होते हैं। ताकि रॉकेट या स्पेसक्राफ्ट उड़ाया जा सके तो आइंस्टीन की जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी ही काम आती है। अब आप पूछेंगे कि आखिर कर आइंस्टीन ने न्यूटन की थ्योरी में किस कमी को दूर किया और इसका ब्लैक होल से क्या संबंध है?

न्यूटन की थ्योरी की सबसे बड़ी कमी यह थी कि न्यूटन ने यह नहीं बताया था कि दो कण आपस में आकर्षित क्यों होते है। उनके ऊपर गुरुत्वाकर्षण बल क्यों काम करता है? इस क्यों का जवाब आइंस्टीन ने दिया। आइंस्टीन ने स्पेस टाइम और कर्वेचर तीन अवधारणाओं के सहारे यह बताया कि दो वस्तुएं एक दूसरे के सापेक्ष में क्यों मौजूद होती हैं। स्पेस का मतलब जगह किसी भी तरह का जगह। हमारे बालों के बीच में मौजूद जगह से लेकर अंतरिक्ष का पूरा संसार स्पेस कहा जा सकता है। इसमें लंबाई चौड़ाई और ऊंचाई तीन चीजें होती हैं और यह एक समय में मौजूद होता है। और जब इसमें अपने द्रव्यमान के साथ कोई पिंड आता है तो स्पेस और टाइम यानी जगह और समय दोनों में बदलाव हो जाता है।

इसे ऐसे समझ गए कि एक बड़ा सा चादर है। जब इस चादर पर कोई द्रव्यमान लिए हुए पिंड या वस्तु रखते हैं तो वह पिंड या वस्तु चादर के बीच में चला जाता है चादर धंस जाता है। चादर के सतह में थोड़ा कर्व यानी मुड़ाव आ जाता है। इसे ही कर्वेचर कहते हैं। जब इस कर्वेचर में कोई दूसरा पिंड डालते हैं तो यह दूसरा पिंड पहले पिंड के सापेक्ष घूमने लगता है। इस सापेक्षता में एक तरह का त्वरण मौजूद होता है। जिसे गुरुत्वाकर्षण बल कहा जाता है।

इसी आधार पर यह सिद्धांत बना कि ग्रह एक निश्चित रास्ते पर सूर्य का चक्कर लगाते हैं। और यह चक्कर इसीलिए संभव हो पाता है क्योंकि सूर्य और पृथ्वी जैसे ग्रहों के बीच एक तरह का गुरुत्वाकर्षण बल काम करता है। आइंस्टीन ने अपनी थ्योरी में कहा कि जब गुरुत्वाकर्षण बल बहुत अधिक मजबूत होगा तो वह रोशनी यानी प्रकाश को भी अपनी तरफ खींचेगा। अगर ऐसा होगा तो जिस तरह से चादर में कर्वेचर बनता है ठीक उसी तरह से प्रकाश की रोशनी में भी कर्व या मुड़ाव बनेगा।

बाद में जाकर सूर्य ग्रहण के दिन पर वैज्ञानिकों ने यह देखा कि प्रकाश की रोशनी में भी कर्व बन रहा है। यानी प्रकाश की रोशनी भी मुड़ रही है। इस तरह से ब्लैक होल होने की परिघटना पर मुहर लगनी शुरू हुई। आइंस्टीन ने ही बताया कि जब किसी स्पेस में गुरुत्वाकर्षण बल बहुत अधिक होगा यानी त्वरण बहुत अधिक होगा तो उस स्पेस में जाने वाली वस्तुएं बहुत छोटी होती चली जाएंगी और समय बहुत धीमा होता चला जाएगा।

यानी अगर ब्लैक होल में हम या आप गए तो हमारा और आपका आकार छोटा होकर एक बिंदु में तब्दील हो सकता है और हमारे और आपके द्वारा ब्लैक होल में गुजारा गया 5 मिनट का वक्त पृथ्वी पर साल भर का वक्त हो सकता है। आइंस्टीन की इस थियरी और ब्लैक होल के विषय पर हॉलीवुड में इंटरस्टेलर नाम से एक बड़ी ही शानदार फिल्म बनी है। आइंस्टीन के इस उम्दा सिद्धांत में अगर गोते लगाने का मन हो तो यह फिल्म देखी जा सकती है।

इस बार का भौतिकी का नोबेल जिन वैज्ञानिकों को दिया गया है, उनमें से एक रॉजर पेनरोज ने उन शर्तों की व्याख्या की है जो पूरी तरह से आइंस्टीन के जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी से जुड़ी हुई है। और ब्लैक होल होने की संभावना पर गारंटी की मुहर लगाते हैं। पेनरोज ने यह बात आइंस्टीन के मरने के 10 साल बाद यानी साल 1965 में सत्यापित कर दी थी। रॉजर पेनरोज के अलावा एंड्रिया गेज़ और रेन हार्ड गेंजल दो ऐसे वैज्ञानिक है जिन्हें ब्लैक होल पर भौतिकी का नोबेल मिलने जा रहा है।

इन दोनों का योगदान है कि इन्होंने यह खोजा कि हमारी गैलेक्सी में एक अदृश्य और बहुत बड़ा ऑब्जेक्ट है। इस ऑब्जेक्ट का द्रव्यमान सूरज के द्रव्यमान से 40 लाख गुना अधिक है। किस ऑब्जेक्ट का एरिया एक सौर मंडल के बराबर है। यही ऑब्जेक्ट पूरे गैलेक्सी और तारों के चक्रण को नियंत्रित कर रहा है। और इस ऑब्जेक्ट की व्याख्या यह है कि यह ब्लैक होल है।

इस तरह से मौजूदा समय में विज्ञान ने तो एक व्याख्या कर दी है कि अगर सूरज जैसा तारा बर्बाद हो गया तो ब्लैक होल में समा जाएगा और ब्लैक होल पृथ्वी समेत पूरा सौरमंडल समा जाएगा।

नोट  सभी वैज्ञानिक अवधारणाओं को पाठकों तक पहुंचाने के लिए कुछ फेरबदल किया गया है लेकिन मूल तत्व वही है, जो विज्ञान कहता है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.