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National Water Way: मोदी सरकार के प्रिय प्रोजेक्ट की खातिर पर्यावरण एवं तटीय आजीविका की अनदेखी

अंतर्देशीय जलमार्ग: मोदी सरकार के प्रिय प्रोजेक्ट की खातिर पर्यावरण एवं तटीय आजीविका की अनदेखी

वर्तमान में 17 से अधिक राष्ट्रीय जलमार्गों के निर्माण का कार्य विभिन्न चरणों में जारी है। इस बारे में कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये परियोजनाएं कॉर्पोरेट को पानी के जहाजों को मनमाने ढंग से चलाने की छूट प्रदान करते हैं, जिसके चलते तटीय समुदायों में रह रहे लोगों की आजीविका के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो चुका है।

सच के साथ |

पिछले छह वर्षों से मोदी सरकार सक्रिय तौर पर पर्यावरणीय सुधारों को लागू करने को लेकर कटिबद्ध है, जिसके हालिया उदाहरण को पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के मसौदे में देखा जा सकता है। जहाँ एक तरफ इस ईआईए अधिसूचना के मसौदे को लेकर बवाल मचा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ एक और सरकारी प्रोजेक्ट ने एक्टिविस्टों के गुस्से को अपनी और आकर्षित करने का काम किया है।

इस सम्बंध में सरकार का मानना है कि तटीय जल के साथ एकीकृत होकर अंतर्देशीय जल प्रणाली के जरिये देश में बेहद अहम परिवहन व्यवस्था मुहैय्या कराई जा सकती है। मौजूदा समय में भारत के तटों पर 12 प्रमुख बंदरगाह मौजूद हैं और इसके साथ ही केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा तकरीबन 180 स्थलों की पहचान छोटे बंदरगाहों के तौर पर की गई है। प्रमुख बंदरगाहों के विस्तार का काम जहाँ सरकारी सहयोग से किया जा रहा है, वहीँ छोटे बंदरगाहों के विकास को सरकार की मदद से निजी भागीदारी के जरिये किया जा रहा है।

निजी भागीदारी के कारण तटीय समुदायों को अपने हितों की अनदेखी की चिंता सता रही है  
लगभग 5,423 किलोमीटर की दूरी वाले तटीय किनारों की मौजूदगी के साथ-साथ 200 मील के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र बना दिए जाने की वजह से देश में करीब 100,000 वर्ग किलोमीटर का जलीय क्षेत्रफल आर्थिक तौर पर इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है।

अंतर्देशीय जलमार्ग के जरिये परिवहन को बढ़ावा देने का काम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रिय परियोजनाओं में से एक है, जिसके लिए सरकार अंतर्देशीय पोत विधेयक, 2020 को लागू करने को लेकर भी विचार कर रही है। इससे पूर्व राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016 में भारत में मौजूद 111 नदियों अथवा नदियों के छोरों, खाड़ियों एवं मुहानों को राष्ट्रीय जलमार्गों के तौर पर घोषित किया गया था। राष्ट्रीय जलमार्ग परियोजना का इरादा इन सभी 111 जलमार्गों पर वाणिज्यिक नौ-परिवहन एवं नौवहन प्रणाली को विकसित करने का है।  

सरकार का दावा है कि प्रस्तावित बदलावों के जरिये अंतर्देशीय जलमार्ग पर आर्थिक तौर पर किफायती, सुरक्षित यातायात एवं व्यापार को सुगम बनाया जा सकता है, जिसमें अंतर्देशीय जहाजों को निर्देशित करने वाली प्रक्रियाओं को मजबूती प्रदान की जा सकती है। अभी तक कुलमिलाकर 17 एनडब्ल्यू (इसमें वे 5 एनडब्ल्यू शामिल हैं जिन्हें 2016 से पहले ही मौजूद थे) को विकास के लिए चिन्हित किया गया है। इन 17 एनडब्ल्यू में से 13 एनडब्ल्यू में विकास कार्य पहले से ही शुरू किये जा चुके हैं, जबकि बाकी के बचे चार में अभी शुरुआत होनी शेष है।

इस बारे में कार्यकर्ताओं का कहना है कि जलमार्गों के कारण जिस प्रकार से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और उनकी बढ़ती दखलंदाजी के कारण भारत के खस्ताहाल ताजे पानी पर और अधिक ध्यान देने और जाँच की जरूरत है। सबसे प्रमुख चिंता इस बात को लेकर बनी हुई है कि इस क्षेत्र में मौजूद निजी खिलाड़ी पर्यावरणीय मंजूरी को आसानी से धता बता सकते हैं। हाल ही में प्रस्तावित ईआईए मसौदे की अधिसूचना ने अंतर्देशीय जलमार्ग को ‘बी2’ श्रेणी वाली परियोजनाओं में डाल दिया है। इसके लिए सिर्फ पर्यावरणीय मंजूरी की आवश्यकता है, जिसमें किसी भी प्रकार के जाँच-पड़ताल एवं जन सुनवाई की आवश्यकता नहीं है। पर्यावरण मंत्रालय की एक विशेषज्ञ समिति ने 2017 में अंतर्देशीय जलमार्ग को ए श्रेणी में डाले जाने की अनुशंसा की थी। हालाँकि इसे लागू नहीं किया गया है।

लेट इंडिया ब्रीद के संस्थापक यश मारवाह ने बताया है कि अंतर्देशीय जलमार्ग और नदियों को आपस में जोड़ने वाली परियोजनाओं को “किसी फैंसी मसीहा के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है, गोया इससे धरती पर मौजूद हर समस्या को छूमन्तर करना संभव है, जबकि इनके चलते होने वाली मूलभूत समस्याओं की पूरी तरह से अनदेखी संभव है। पिछले दो से तीन वर्षों के दौरान जिस प्रकार से एक के बाद एक अंतर्देशीय जलमार्ग की राह में आने वाली सभी क़ानूनी अडचनों को दूर किया जा रहा है वे बेहद चिंताजनक हैं और हमें इस सम्बंध में बात करने की आवश्यकता है।”

मंथन में शोधकर्ता के तौर पर कार्यरत अवली वर्मा के अनुसार इस परियोजना का शुभारंभ “बड़े-बड़े दावों और वायदों के साथ किया गया था। यह दावा किया गया था कि राष्ट्रीय जलमार्ग असल में भारी एवं खतरनाक माल की ढुलाई के लिए बेहद कारगर हैं और रेलवे या सड़क मार्ग की तुलना में इसके जरिये काफी बचत होगी, और ये पर्यावरण के अनुकूल हैं। लेकिन सभी जलमार्गों के लिए इन दावों को सार्वभौमिक तौर पर सत्य नहीं कहा जा सकता है। जलमार्गों के विकास एवं मरम्मत के साथ-साथ नदियों में विशाल बजरों की आवाजाही के चलते नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र में भारी मात्रा में दखलंदाजी होगी। इसके साथ ही नदियों में गाद के जमा होने की समस्या, जहाजों से उत्पन्न होने वाले ध्वनि प्रदूषण, ईंधन के रिसाव, दुर्घटनावश तेल-रिसाव इत्यादि से नदियों में मौजूद मछली की आबादी पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इस प्रकार यह अंतर्देशीय मछुआरों की आजीविका पर सीधा असर डालने का काम करता है।”

वे आगे कहती हैं कि इनमें से ज्यादातर मछुआरे अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह से नदियों पर ही निर्भर हैं। उनके अनुसार न सिर्फ मछली बल्कि अन्य जलीय प्रजातियाँ भी इस नौपरिवहन चैनलों के विकास और बजरों के आवाजाही की प्रक्रिया के नुकसानदायक प्रभावों को झेलने के लिए अभिशप्त हैं।

आईडब्ल्यूएआई अधिकारियों के अनुसार एनडब्ल्यू-1 के माध्यम से 2016 तक जहाँ मात्र तीस से चालीस लाख टन माल ढुलाई हो रही थी, वह अब बढ़कर करीब सत्तर लाख टन तक पहुँच चुकी है। नदियों के तटों पर यात्रियों की आवाजाही बढ़ चुकी है और साथ ही तटीय क्षेत्रों में भी इसमें इजाफा हुआ है। निजी क्षेत्र के खिलाडियों द्वारा नई रोरो वाहिकाओं, रोपैक्स वाहक, अंतर-द्वीपीय वाहक और नौकायन जहाजों की खरीद का क्रम जारी है।

कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस योजना में भारतीय नदियों में मानसूनी जल के उतार-चढाव से होने वाले प्रभाव पर विचार नहीं किया गया है, जिसमें या तो ये नदियाँ पानी से लबालब भरी रहती रहती हैं या इनमें पानी की कमी रहती है। इस योजना में उन अदृश्य समुदायों, जो उस भूमि पर बसे हुए हैं और उस भार की भी अनदेखी की गई है जो परिवहन कार्गो के जरिये आये माल से उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर असर डालती है।

सरकार (राष्ट्रीय जलमार्ग विधेयक, 2015) में दावा करती है कि परियोजना “ईंधन में बचत, कम खर्चीली और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन के साधन के तौर पर….।” हालाँकि ऐसे दावे न तो वैध हैं और ना ही सार्वभौमिक तौर पर इन्हें सत्य ही कह सकते हैं, क्योंकि इन 111 जलमार्गों को 24 राज्यों एवं दो केंद्र शासित प्रदेशों (20,274 किमी) से होकर गुजरना है, और इसमें 138 नदी प्रणाली, क्रीक, मुहाने और नहर प्रणाली शामिल हैं। इसके साथ ही साथ इसे कम से कम 20 वन्यजीव संरक्षित इलाकों से होकर भी गुजरना है।

अपने वक्तव्य में वर्मा कहती हैं  “यहाँ तक कि आर्थिक दृष्टि से भी घोषित राष्ट्रीय जलमार्गों में से कई अलाभकारी साबित होने जा रहे हैं। भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण  की हालिया रिपोर्ट (भारत में अंतर्देशीय जलमार्गों के विकास एवं रेगुलेशन हेतु निर्मित नोडल एजेंसी) में इस बात का जिक्र किया गया है कि माल ढुलाई या पर्यटन के लिए एनडब्ल्यू के 63 जलमार्ग उपयुक्त नहीं हैं। यदि इन जलमार्गों में पर्याप्त गहराई ही नहीं है या कार्गो उपलब्ध नहीं हैं तो बिना पूर्व व्यवहार्य अध्ययन के इन्हें राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किये जाने की जरूरत ही क्या थी? जिस प्रकार से इन मार्गों को लेकर योजना बनाई गई है और उसे लागू किया जा रहा है, वे सब भी गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं।”

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