January 19, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

3 एकड़ में लगाया थाई अमरुद का बाग, सालाना 5 लाख की हो रही कमाई; जानिए

इंदौर (मध्य प्रदेश)। इंदौर के किसान राजेश पाटीदार अपने आसपास के ज्यादातर किसानों की तरह आलू, प्याज और लहुसन की खेती करते थे लेकिन लागत के अनुरूप में मुनाफा नहीं हो रहा, इसलिए राजेश ने अमरुद की बागवानी शुरु की। 3 एकड़ जमीन के मालिक राजेश पाटीदार पिछले 4 साल से थाई अमरुद की खेती कर रहे हैं, जिससे उन्हें सालाना करीब 5 लाख रुपए की कमाई होती है।

मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर से करीब 55 किलोमीटर जमली गांव में राजेश पाटीदार की जमीन है, जिसमें वो अमरुद की खेती और उसके बीच में मौसम के हिसाब से सफेद मूसली, अदरक या हल्दी की इंटरक्रॉपिंग करते हैं।

 

“पहले मैं भी परंपरागत तरीके से आलू, प्याज और लहसुन की खेती करता था, जैसे बाकी लोग करते थे लेकिन बढ़ती लागत के कारण काफी काफी नुकसान हुआ, जिसके साल 2017 में मैंने उन्हें बंद कर दिया और बागवानी के साथ औषधीय पौधों की खेती शुरु कर दी।” राजेश अपनी शुरुआती कहानी बताते हैं।

 

 

राजेश पाटीदार (51 वर्ष) ने अमरुद का बाग (Thai Guava) लगाने के वक्त किस्म और तकनीक का सही चुनाव किया। छत्तीसगढ़ के रायपुर से वीएनआर किस्म के पौध मंगवाए। 3 एकड़ जमीन में उन्होंने करीब 1800 पौधे लगवाए हैं। औसतन किसान एक एकड़ में 600-800 पौधे अमरुद जैसी फसलों के लगवाते हैं, जिन्हें बीच ज्यादा दूरी चाहिए होती है और दूसरी फसलों को प्रमुखता से लेना होता है वो पौधे से पौधे और लाइन से लाइन के बीच की दूरी बढ़ा देते हैं। राजेश के पौधों की दूरी 7 गुणा 10 फीट है। राजेश बताते हैं, “पौधों में पोषण और सिंचाई का काम सही तरीके से हो और कम खर्च में हो इसलिए हमने शुरुआत में ही ड्रिप इरीगेशन लगवा दिया था।” अमरुद की बाग में अमूमन 18-20 महीने में फल आने शुरु हो जाते हैं और समय के साथ उत्पादन बढ़ता जाता है।

 

साल में 7-8 लाख की होती है उपज, 2-3 लाख रुपए आता है खर्च

कमाई के बारे में पूछने पर राजेश बताते हैं, “पिछले साल लॉकडाउन में अमरुद 50-60 रुपए किलो में बिका था, और करीब 20 टन उत्पादन हुआ था, इस साल और 30 टन का उत्पादन और 50 रुपए किलो के रेट का अनुमान है। पूरी फसल से सालभर में करीब 5 लाख रुपए सलाना की आमदनी कमाई होती है।”

राजेश बताते हैं, ” पूरे साल में अमरुद से करीब 7-8 लाक रुपए की आय होती है, जिसमें से 2-3 लाख रुपए की लागत निकल जाती है। इस तरह 5 लाख के आसपास का मुनाफा होता है। वहीं अमरुद की बाग में मूसली की खेती से सालाना 3-3.5 लाख की उपज मिलती है और खर्च हटाकर औसतन डेढ़ से से 2 लाख रुपए तक बच जाते हैं।”

 

राजेश पाटीदार के मुताबिक अमरुद जैसे फलों में हार्वेटिंग के समय की बहुत अहमयित होती है, फल ज्यादा बड़ा होने पर ही उसका अच्छा रेट नहीं मिलता है।

राजेश के बाग में इस वक्त 400-700 ग्राम वजन के अमरुद लगे हैं। वो कहते हैं, “हमारी बाग में पहले चरण की हार्वेस्टिंग जारी है। जो फसल 500-700 ग्राम का होगा उसी की तोड़ाई होगी। फिर उन्हें पैक करके 20-20 किलो के बॉक्स में रखकर बाजार भेजा जाता है। जिस फल का वजन एक किलो तक हो जाता है, बाजार में उसका रेट कम हो जाता है इसलिए समय पर फलों को तोड़ा जाना जरुरी है। इंदौर मंडी के अलावा वो दिल्ली और मुंबई भी अपने अमरुद भेजते हैं।

लहसुन, आलू और प्याज की खेती छोड़ने के बाद उन्होंने बागवानी के अलावा खेतों में दो और प्रयोग किए थे, पहला उन्होंने अपनी खेती को जैविक किया और दूसरा बाग में पौधों के बीच में बची जगह में मूसली, हल्दी और अदरक जैसी कंद वाली फसलें उगानी शुरु की।

अपनी यात्रा के बारे में राजेश पाटीदार बताते हैं, “कुछ साल पहले मैं एक प्राइवेट कंपनी में काम भी करता था लेकिन जल्द ही मन उकता गया और गांव वापस आ गया फिर अपने गांव जमली से 15 किलोमीटर दूर 3 एकड़ की अपनी जमीन पर बाग लगाया।

 

जैविक खेती के लिए करते हैं गाय पालन

अमरूद की बागवानी के साथ राजेश अपने फार्म पर गौ पालन करते हैं। राजेश का कहना है कि जैविक खेती के लिए गाय पालन बेहद जरूरी है। गाय के गोबर का उपयोग खाद निर्माण में किया जाता है। उन्होंने फार्म पर गोबर गैस का प्लांट भी लगा रखा है, जिससे निकलने वाली गैस का उपयोग रसोई में करते हैं। वहीं अपशिष्ट पदार्थ का उपयोग खाद के रुप में होता है। जबकि गौ मूत्र का उपयोग जैविक छिड़काव के निर्माण में करते हैं।

मध्य प्रदेश जैविक खेती में अव्वल

मध्य प्रदेश में जैविक खेती के प्रति किसानों का रूझान काफी बढ़ा है। मध्य प्रदेश कृषि विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, मध्य प्रदेश में सबसे पहले 2001-02 जैविक खेती को बढ़ावा देने की पहल की गई थी। इस वर्ष प्रदेश के हर जिले के प्रत्येक विकास खंड के एक गांव में जैविक खेती करने का लक्ष्य रखा गया था। वहीं इन गांवों को ‘जैविक गांव’ का नाम दिया गया था। पहले साल यानि 2001-02 में प्रदेश के 313 गांवों में जैविक खेती की गई।

एग्रीकल्चर एण्ड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट एक्सपोर्ट डेव्हलपमेंट अथॉरिटी (एपीडा) के अनुसार, मध्य प्रदेश जैविक में देशभर में अव्वल है। मध्य प्रदेश के 0.76 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती की जाती है। राज्य में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2011 में जैविक कृषि नीति लागू की गई। इसके बाद इंदौर, उज्जैन, सीहोर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर, रायसेन, भोपाल, जबलपुर, मंडला, बालघाट समेत कई जिलों के जैविक उत्पादों की देश-विदेश में मांग बढ़ने लगी।

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2: अमरूद बेचकर सालाना 32 लाख कमा रहा ये किसान, जानिए खेती का उसका तरीका

मध्य प्रदेश में अमरूद किसान के रूप में अपनी पहचान बना चुके दिनेश बगड़ के बाग में जब आप जाएंगे तो आपको कई सौ विशाल अमरूद लटके हुए नजर आएंगे. उनका बगान इस वक्त बहुत बड़े क्षेत्रफल में फैला है, जिससे उन्हें हर साल 32 लाख रुपये का मुनाफा हो रहा है. आने वाले समय में वह इसे और भी फैलाने की योजना पर काम कर रहे हैं. द बेटर इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले तक उनके बगान ऐसे नहीं थे जैसे आज दिखाई दे रहे हैं।

कीट और कवक बन गए थे परेशानी
साजोद-राजोद गांव के रहने वाले दिनेश बताते हैं कि करीब 11 साल पहले अपनी 4 एकड़ की पुश्तैनी जमीन पर वह परंपरागत रूप से मिर्च, भिंडी, टमाटर, करेला व अन्य मौसमी सब्जियों को उगा रहे थे. ज्यादा लोगों की मेहनत वाले इस काम पर उनकी फसल पर कीटों और कवक के प्रकोप ने उनके मुनाफे और आय को कम कर दिया. उन्हें अपनी फसल पर इच्छानुसार दाम भी नहीं मिल पा रहा था. इसी से दुखी हो उन्होंने पारंपरिक खेती छोड़ अमरूद की खेती करने का मन बनाया.

 

 

2010 में शुरू किया था अमरूद लगाना
दिनेश ने कहा, 2010 में उन्हें अमरूद की एक अलग किस्म के बारे में पता चला. इस किस्म का नाम थाई किस्म था. अमरूदों की जांच करने के लिए वह पड़ोस के बाग में गए, जहां उन्हें 300 ग्राम तक के वजनी अमरूदों के बारे में जानकारी मिली. वैज्ञानिक भाषा में इस किस्म को VNR-1 कहते हैं, पकने के बाद यह 6 दिनों तक टिकते हैं और उनमें संक्रमण का खतरा भी कम रहता है. इसी को देखते हुए उन्होंने इसे बाजार में बेचने का प्लान बनाया. इसी कारण उन्होंने अमरूद उगाना शुरू किया.

 

सालाना 32 लाख की होती है कमाई
2010 में चार एकड़ से शुरू किए गए बाग से बढ़ाकर आज उन्होंने 4000 पौधे लगा लिए, उन्हें सालाना 32 लाख रुपये की कमाई हो रही है. उनसे प्रेरित होकर राज्य के करीब 400 और किसानों ने भी अमरूद लगाना शुरू कर दिया. दिनेश बताते हैं, ‘शुरू में, मुझे संदेह था कि फलों की किस्म को अपने बड़े आकार को प्राप्त करने के लिए हार्मोन या कुछ रसायनों के साथ इंजेक्ट किया गया था. लेकिन अपने खेत में कुछ पौधे लगाने के बाद, पारंपरिक कृषि तकनीकों का पालन करते हुए मुझे 11 महीने में पहली बार फल मिले. जिसमें सबसे बड़े फल का वजन 1.2 किलो था.’

 

आय में हुई पांच गुना की वृद्धि
पहले साल मिली सफलता को देखते हुए उन्होंने अपने भाइयों के साथ 10 साल में 4 हजार पेड़ लगाने के लिए 18 एकड़ जमीन लीज पर ली. उन्होंने बताया कि पिछले कुछ सालों में ही उनकी आय में पांच गुना की वृद्धि हुई, इससे उन्हें काफी राहत मिली. इस क्षेत्र में अमरूदों को सफलता पूर्वक उगाने वाले वह पहले व्यक्ति थे.

नहीं बिक रहे थे बड़े अमरूद
दिनेश ने बताया कि इन पेड़ों को न्यूनतम रखरखाव की आवश्यकता होती है और इन पर ध्यान भी कम दिया जाता है. मार्केटिंग के समय उन्हें परेशानी आई, लोग अमरूद को उसके बड़े आकार देखकर खरीद नहीं रहे थे. एक बार में एक किलो का अमरूद का सेवन कर पाना मुश्किल होता. उन्हें लगा अमरूदों को बेचने के लिए एक अलग बाजार की मांग है.

दूसरे राज्यों में शुरू किया बेचना
अपने क्षेत्र में बिक्री नहीं होते देख उन्होंने भीलवाड़ा, जयपुर, उदयपुर, अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत, पुणे, मुंबई, बेंगलुरु, भोपाल और दिल्ली समेत 12 से ज्यादा बाजारों में अपनी फसल को बेचना शुरू किया. 2016 में मुंबई में 185 रुपये प्रति किलो अमरूद बेचने पर उन्हें बहुत फायदा मिला. दिल्ली और मुंबई के ग्राहकों ने फल की सराहना की. उन्होंने आने वाले समय में अपने खेत को पांच एकड़ तक बढ़ाने की योजना बनाई है.

 

 

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