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सच के साथ - अशोक कुमार वर्मा

सच के साथ

सभ्यता या असभ्यता- एक भारतीय आवाज

दोस्तो चित्र को  कम देखना बल्कि जो लिखा है उसको ध्यान से पढ़ना और विचार करना कहि ये सब हमारे घर तो नही हो रहा है ।। लड़कियो के अनावश्यक नग्नता वाली […]

शौर्य दिवस / बाबरी कलंक धराशायी – 6 दिसम्बर, 1992

भारत में विधर्मी आक्रमणकारियों ने बड़ी संख्या में हिन्दू मन्दिरों का विध्वंस किया। स्वतन्त्रता के बाद सरकार ने मुस्लिम वोटों के लालच में ऐसी मस्जिदों, मजारों आदि को बना रहने दिया। इनमें […]

धर्म और राजनीति

पिछले दो दिनों में फेसबुक पे मिला ज्ञान ….बंगाल बारूद के ढ़ेर पे बैठा है. बंगाल में लॉ एंड आर्डर फैल हो चुका है. बंगाल के हालात भयावह है. बंगाल की हालत […]

क्यों मोदी सरकार से खुश नहीं हैं किसान?

लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर हर विपक्षी दल अब किसानों की समस्याओं को उठा रहे हैं. लंबे समय से किसानों को भारतीय राजनीतिक परिदृश्य से एक […]

हमारी सरकारें और अदालतें – चींटी चाल क्यूं

कहते हैं टर्की का रहने वाला बाबर वहां नादिरशाह और चंगेज खां का रिश्तेदार था। जो भी हो उसने अयोध्या में जिस जमीन पर मस्जिद बनवाई, वह ज़मीन न तो उसकी पुश्तैनी […]

किसान का बेटा बना इसरो प्रमुख

कैलासावदिव शिवान (जन्म 14 अप्रैल 1 9 57) एक भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अध्यक्ष हैं।  वह विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर और तरल प्रोपल्सन सेंटर के पूर्व निदेशक हैं। […]

धर्म के लिए राजनीति या राजनीति के लिए धर्म !

धर्म का कार्य है लोगों को सदाचारी और प्रेममय बनाना और राजनीति का उद्देश्य है लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुये उनके हित में काम करना. जब धर्म और राजनीति […]

अम्बेडकर के संविधान में कानून पर्सनल नहीं था

आज जब तीन तलाक, हलाला, महिलाओं और दलितों का मन्दिर प्रवेश, महिला आरक्षण,आदि विषयों पर तीखी चर्चा होती है तो अम्बेडकर का स्मरण स्वाभाविक है। भारतीय संविधान के निर्माता डाक्टर अम्बेडकर कानून […]

लोकतांत्रिक न्याय बनाम कृषि क्षेत्र और किसानों के हालात ;

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क […]

जॉर्ज कार्लिन का संदेश

जॉर्ज कार्लिन का संदेशहमारे समय का विरोधाभास यह है कि हमने इमारतें तो बहुत ऊंची बना ली हैं पर हमारीमानसिकता क्षुद्र हो गयी है। लंबे-चौडे राजमार्गों ने शहरों को जोड़ दिया है […]