Author Archives

सच के साथ - अशोक कुमार वर्मा

सच के साथ

धर्म के लिए राजनीति या राजनीति के लिए धर्म !

धर्म का कार्य है लोगों को सदाचारी और प्रेममय बनाना और राजनीति का उद्देश्य है लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुये उनके हित में काम करना. जब धर्म और राजनीति […]

अम्बेडकर के संविधान में कानून पर्सनल नहीं था

आज जब तीन तलाक, हलाला, महिलाओं और दलितों का मन्दिर प्रवेश, महिला आरक्षण,आदि विषयों पर तीखी चर्चा होती है तो अम्बेडकर का स्मरण स्वाभाविक है। भारतीय संविधान के निर्माता डाक्टर अम्बेडकर कानून […]

लोकतांत्रिक न्याय बनाम कृषि क्षेत्र और किसानों के हालात ;

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क […]

जॉर्ज कार्लिन का संदेश

जॉर्ज कार्लिन का संदेशहमारे समय का विरोधाभास यह है कि हमने इमारतें तो बहुत ऊंची बना ली हैं पर हमारीमानसिकता क्षुद्र हो गयी है। लंबे-चौडे राजमार्गों ने शहरों को जोड़ दिया है […]

हम मूर्ख सही, आप तो खुश हो :-

कबीर का यह दोहा आपको भी याद होगा कि रे गंधि! मतिअंध तू, अतरि दिखावत काहि, कर अंजुरि को आचमन, मीठो कहत सराहि। सुगंध बेचनेवाले तू इन लोगों को इत्र दिखाने की […]

हमें कौए की नहीं, उल्लू की नजर चाहिए;

इसलिए नहीं कि उल्लू रात के अंधेरे में देखता है और हम चारों तरफ अंधकार से घिरे हैं, बल्कि इसलिए कि कौए की आंखें सिर के दो तरफ होती हैं और वह […]

मंदिर के लड्डू भी खाता हूं, मस्ज़िद की खीर भी खाता हूं। भूखा हूं साहब, मजहब कहां समझ पाता हूं!

बुराई धर्म में नहीं इंसानों में है। जो हम एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं। मंदिर हो मस्जिद हो या कोई अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल, वहां […]

प्रेरणाश्रोत : गरीबी के बावजूद भी ये लोग बने IAS

जब सुख सुविधाओं से संपन्न युवा अपने कीमती समय को आत्मसंतुष्टि में बिता रहे होते हैं ऐसे समय में वंचित छात्रों का भी एक समूह है जो अपने दृढ़ संकल्पों के साथ […]

देश में जाति और धर्म की हावी होती राजनीति

वर्तमान राजनीति केवल सत्ता आधारित हो गई है और मूल मुद्दे गायब हो गए हैं। हमारे नेताओं के पास कोई विजन नहीं है, जो लोगों को सही रास्ता दिखाए। कोई भी पार्टी […]

धर्म क्या है? यह एक व्यक्ति के जीवन लिए क्या महत्व रखता है।

कोई भी गुण जो इंसान की मान्यता या स्वयं की उपज हो, वो धर्म ही है . यह गुण स्वाभाविक भी हो सकता है. जैसे अगर आग जलती है तो हम ये […]