January 23, 2021

Such Ke Sath

सच के साथ – समाचार

Bihar:हनुमान बने चिराग पासवान को माया तो मिली नहीं, राम की कृपा के भी लाले पड़े

चिराग पासवान (Chirag Paswan) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की तरफ से उनकी चुनावी भूमिका के बदले इनाम का संकेत नहीं मिला है – नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के दबाव के चलते पिता की राज्य सभा सीट भी नहीं मिलने जा रही है.

भक्तिकाल की बात और है, लेकिन राजनीति काल में हनुमान के नाम का इस्तेमाल हर कोई अपने अपने हिसाब से करने लगा है. बीजेपी नेता योगी आदित्यनाथ को हनुमान दलित समुदाय के लगते हैं तो दलित नेता चिराग पासवान खुद को ही हनुमान बता डालते हैं – क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) को वो राम मानते हैं. लेकिन हनुमान बने चिराग पासवान (Chirag Paswan) पर उनके राम कृपा बरसाएंगे, ऐसी कम ही उम्मीद है. खासकर, बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद के बयान के बाद तो ऐसी आशंका प्रबल होती लगती है.

देखने से लगा भी और बिहार चुनाव के नतीजे आने के बाद तो जेडीयू नेता खुल कर आरोप लगाने लगे कि चिराग पासवान के चलते ही उसकी सीटें कम आयीं. साथ ही, वे अपनी तरफ से बीजेपी पर दबाव बनाने की कोशिश भी करने लगे कि एनडीए से चिराग पासवान का पत्ता साफ किया जाये.

पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के निधन से खाली हुई राज्य सभा की एक सीट पर चुनाव आयोग 14 दिसंबर को उपचुनाव होना है – अव्वल तो पहली दावेदारी चिराग पासवान की ही बनती है, लेकिन राजनीतिक माहौल तो यही इशारा कर रहा है कि दूर दूर तक ऐसी कोई संभावना नहीं है.

देखा जाये तो ये चुनाव कई सवालों के जवाब देने वाला है. मसलन, चिराग पासवान के खिलाफ नीतीश कुमार (Nitish Kumar) का दबाव बीजेपी पर कितना असर करेगा और आगे भी एलजेपी, एनडीए का हिस्सा बनी रहेगी या फिर बाहर कर दी जाएगी?

बीजेपी का इशारा समझें चिराग पासवान

चिराग पासवान की नजर स्वाभाविक तौर पर मोदी कैबिनेट में अपने पिता की खाली पड़ी कुर्सी पर तो होगी ही, लेकिन राज्य सभा सीट वो अपनी मां रीना पासवाव के लिए चाहते हैं. चिराग पासवान की तरफ से तो ऐसा कोई बयान मीडिया में या सोशल मीडिया पर तो नहीं आया है, लेकिन उनके पार्टी के कुछ नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ऐसी अपील जरूर किये हैं. विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी के प्रदर्शन ने काफी चोट पहुंचायी है और आगे भी लगता है चिराग पासवान को उसकी भरपाई के साथ साथ खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है. कम से कम बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद के बयान से तो ऐसा ही लगता है.

हाल के ही एक इंटरव्यू में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद की चिराग पासवान की पार्टी के बारे में टिप्पणी रही, ‘एलजेपी, राष्ट्रीय पार्टी तो है नहीं. एक बिहार बेस्ड पार्टी है… चिराग पासवान ने बिहार में एनडीए गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नीतीश कुमार का खुला विरोध किया – ये उन्हें तय करना है कि उनको आगे क्या करना है?’

हालांकि, रविशंकर प्रसाद ने ये भी मैसेज देने की कोशिश की कि बीजेपी, एलजेपी को एनडीए से बाहर तो नहीं करने जा रही है. रविशंकर प्रसाद बोले, ‘बीजेपी अपने गठबंधन के साथियों को खुद नहीं भगाती… चाहे शिवसेना हो या फिर अकाली दल, दोनों हमसे खुद अलग हुए.’

चिराग पासवान के अपने पिता की जगह मोदी कैबिनेट का हिस्सा बनने या एनडीए से बाहर किये जाने को लेकर बीजेपी नेता ने भी वही कहा जो हर कोई समझ रहा होगा – “ये मामला ऊपर के स्तर पर तय होगा.”

ऊपर से उनका आशय निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से ही रहा होगा. जेपी नड्डा की तरफ से तो चिराग पासवान को कई बार मिल कर चुनाव लड़ने के संकेत दिये गये थे, लेकिन वो अपनी जिद पर कायम रहे. प्रधानमंत्री मोदी ने चिराग पासवान को लेकर सीधे सीधे कोई टिप्पणी करने से परहेज किया. एनडीए में कौन है ये तो बताया, लेकिन चिराग पासवान हैं या नहीं ये नहीं बताया.

बिहार चुनाव शुरू होने से पहले ही अमित शाह ने भी बिहार एनडीए के सहयोगी दलों का नाम लेकर साफ कर दिया था कि चिराग पासवान तो नहीं हैं, लेकिन केंद्र में उनको लेकर चुनाव बाद विचार करने को कहा था. अब वो वक्त भी आ चुका है.

लोक सभा चुनाव में भी चिराग पासवान ज्यादा सीटें चाहते थे. आखिर में कम से कम उतना चाहते जितनी 2014 में मिली थीं. जब बीजेपी और जेडीयू ने 17-17 सीटें बांट ली तो एलजेपी के हिस्से में 6 सीटें ही बच रही थीं. फिर बीजेपी ने ये कहते हुए राजी कर लिया कि बीजेपी कोटे की राज्य सभा की जो भी सीट पहले खाली होगी, राम विलास पासवान को राज्य सभा भेज दिया जाएगा और इस तरह एलजेपी सात की संख्या स्वीकार कर ली.

जब रविशंकर प्रसाद चुनाव जीत कर लोक सभा पहुंच गये तो राज्य सभा की उनकी सीट खाली हो गयी और वादे के मुताबिक बीजेपी ने वो राम विलास पासवान को दे दी थी. रविशंकर प्रसाद की बातों से तो ऐसा लगता है जैसे बीजेपी चिराग पासवान को ये संदेश देने की कोशिश कर रही हो कि वो राज्य सभा की सीट तो भूल ही जायें.

बिहार चुनाव के दौरान जब चिराग पासवान छोटी छोटी बातें गिना कर नीतीश कुमार पर हमला बोलते रहे, तो एक दिन नीतीश कुमार ने याद दिलाने की कोशिश की कि बगैर जेडीयू के सहयोग के राम विलास पासवान राज्य सभा जा पाते क्या?

अब जेडीयू की तरफ से साफ करने की कोशिश हो रही है कि अगर राज्य सभा की उस सीट से लोक जनशक्ति का कोई प्रत्याशी चुनाव लड़ता है तो वो उसका समर्थन नहीं करने वाली है. ये ठीक है कि जेडीयू की सीटें विधानसभा में कम हो गयी हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं कि उसके बगैर राज्य सभा की वो सीट कोई अकेले जीत पाएगा. हालांकि, जो नये समीकरण बन रहे हैं, लगता है फिर से ये सीट बीजेपी के खाते में चली जाने की संभावना बन रही है.

बिहार जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक चौधरी और अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह के अलावा कई साथी नेता भी कह चुके हैं कि बिहार चुनाव में चिराग पासवान ने जो हाल किया है, एलजेपी को एनडीए से बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिये. नीतीश सरकार में मंत्री बने विजय चौधरी ने भी अपनी प्रेस कांफ्रेंस में सहयोगी दल को ध्यान दिलाया कि कैसे चिराग पासवान के कारण बीजेपी भागलपुर सीट हार गयी और जेडीयू को तो कई सीटों का नुकसान हुआ. विजय चौधरी की बात में दम तो है, अगर बीजेपी भागलपुर की सीट नहीं हारती तो विधानसभा सीटों के मामले में आरजेडी से पिछड़ना नहीं पड़ता.

बीजेपी के लिए चिराग और नीतीश दोनों अहम

एलजेपी को लेकर रविशंकर प्रसाद के बयान को चिराग पासवान ऐसे समझ सकते हैं कि न तो बीजेपी से बहुत उम्मीद करने की जरूरत है और न ही नाउम्मीद होने की ही जरूरत है.

ऐसा होने की सबसे बड़ी वजह ये है कि बीजेपी बिहार में जो हासिल करना चाहती है उसमें नीतीश कुमार और चिराग पासवान के साथ होने से बहुत फायदा भले न हो, लेकिन दोनों में से किसी एक के भी न होने से ज्यादा नुकसान हो सकता है.

बिहार के दलित वोटों में से करीब पांच फीसदी पासवान वोट हैं – और इस बार ये 32 फीसदी वोट एलजेपी को मिले हैं, 17 फीसदी एनडीए को और 22 फीसदी महागठबंधन को मिले हैं, ऐसा सीएसडीएस का सर्वे बता रहा है.

चिराग पासवान और नीतीश कुमार दोनों में से किसी एक को चुनना हो तो कोई दो राय नहीं कि बीजेपी चिराग पासवान को कम ही महत्व देगी. नीतीश कुमार के साथ सुशासन बाबू का तमगा ही नहीं, अति पिछड़ों को एक खास वोट बैंक भी है जिस पर देर सबेर बीजेपी काबिज होना चाहती है. नीतीश कुमार को नाराज कर या एनडीए से छिटक जाने की स्थिति में तो बीजेपी को पूरी तरह हाथ धोना पड़ेगा.

ये भी मानकर चलना होगा कि अगर बीजेपी का चिराग पासवान से भी जी भर जाता है तो सीधे सीधे वो उनके साथ ऐसा वैसा कुछ भी नहीं करने वाली जिससे पासवान लोगों की भावना आहत हो. अगर चिराग पासवान के खिलाफ बीजेपी को कुछ करना ही होगा तो वो वैसा ही कोई इंतजाम करेगी जैसा नीतीश कुमार के साथ किया – और मुमकिन है एक दिन वो ऐसी स्थिति में पहुंच जाये कि पासवान समुदाय से कह सके कि भारतीय जनता पार्टी ने तो बहुत कोशिश की, लेकिन चिराग पासवान में वो बात नहीं जो रामविलास पासवान में रही.

जेडीयू को तो सुशील मोदी ही पसंद आएंगे

अब अगर रामविलास पासवान की राज्य सभा सीट को बीजेपी अपने पास ही रखने का फैसला करती है तो सवाल है कि टिकट किसे मिलेगा?

बीजेपी कोटे से भी फिलहाल कम से कम तीन नाम चर्चा में जरूर हैं – सुशील कुमार मोदी, सैयद शाहनवाज हुसैन और ऋतुराज सिन्हा. सुशील मोदी को डिप्टी सीएम न बनाये जाने के बाद केंद्र में ले जाये जाने की चर्चा रही. राज्य सभा की सीट इसमें मददगार और माध्यम बन सकती है. फिलहाल सुशील मोदी को आचार समिति का अध्यक्ष बनाया गया है.

भागलपुर से 2014 में लोक सभा चुनाव हार चुके शाहनवाज हुसैन को 2019 में भी टिकट से इसलिए वंचित होना पड़ा क्योंकि वो सीट जेडीयू के खाते में चली गयी. फिर भी टीवी बहसों में बीजेपी के बचाव में शाहनवाज हुसैन बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं. गुजरे जमाने में सिकंदर बख्त और नजमा हेपतुल्ला की तरह ही मौजूदा दौर में मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन ही बीजेपी के मुस्लिम चेहरे हैं, हालांकि, राजनीतिक विरोधी तो हाथी के दांत ही मानते हैं. ऋतुराज सिन्हा, बीजेपी सांसद रहे आरके सिन्हा के बेटे हैं और पाटलीपुत्र लोक सभा सीट से बीजेपी के टिकट के दावेदार भी रहे, लेकिन आखिरी वक्त में रविशंकर प्रसाद बाजी मार ले गये. ऋतुराज सिन्हा भी अमित शाह के मुंह से तारीफ वैसे ही बटोरते रहते हैं, जैसे दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान प्रवेश वर्मा को तरजीह मिलती रही.

243 सीटों वाली विधानसभा में कामयाबी उसे ही मिल पाएगी जिसके नाम पर प्रथम वरीयता के कम से कम 122 वोट हों. मौजूदा विधानसभा में एनडीए के 125 विधायक चुन कर आये हैं. मान कर चलना चाहिये कि राज्य सभा का चुनाव भी वही जीत सकेगा जिसे किसी एक या दो नहीं बल्कि एनडीए के सभी दलों का सपोर्ट मिलेगा – और इस लिहाज से सुशील मोदी ही ऐसे नेता हैं जिनको समर्थन देने के लिए जेडीयू भी दौड़ पड़ेगी.

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