December 5, 2020

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BiharAssembly Elections2020: क्या ‘लेनिनग्राद’ में लेफ्ट की होगी वापसी?

बिहार चुनाव: क्या ‘लेनिनग्राद’ में लेफ्ट की होगी वापसी?

“ये बात सही है कि हमारी ताकत के मुताबिक हमें उतनी सीटें नहीं मिली हैं लेकिन ये समय की मांग है। हम चाहते हैं कि इस झूठी सरकार को हटाएं और कम से कम ऐसी सरकार बने जो गरीबों से रिश्ता जोड़ सके।”

बिहार में जब भी कम्युनिस्ट आंदोलन और राजनीति की बात होती है तो बेगूसराय का नाम सबसे ऊपर रखा जाता है। हालांकि पिछले 15-20 सालों के राजनीतिक इतिहास को देखा जाय तो राज्य में पिछड़ने के साथ वाम दलों की बेगूसराय में भी पकड़ कम होती गई। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस बार जिले में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) के लिए वापसी करने का अच्छा मौका है। लोकसभा चुनाव 2019 में बेगूसराय से सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार के खिलाफ चुनाव लड़ने में आरजेडी पीछे नहीं हटी थी या फिर इसका उलट भी कहा जा सकता है। लेकिन इस बार महागठबंधन की ओर से बेगूसराय में लेफ्ट को 4 सीटें दी गई हैं। इस पर दोनों तरफ के लोग बीजेपी के खिलाफ एक जरूरी गठजोड़ होना बताते हैं।

पिछले चुनाव में जेडीयू के साथ लड़ने वाली आरजेडी 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। वहीं लेफ्ट दलों में सिर्फ भाकपा (माले) 3 सीटों पर जीत हासिल कर पाई थी। सीपीआई और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी। सीपीआई का गढ़ बनने के बाद पहली बार हुआ था कि बेगूसराय जिले में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी। 2015 में पार्टी जिले की किसी भी सीट पर दूसरे स्थान पर भी नहीं पहुंच पायी।

जिले में सीपीआई के लिए बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार वो आरजेडी और कांग्रेस के सहयोग से वापसी कर पाएगी। बिहार में ऐसा पहली बार हो रहा है कि राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां एकसाथ चुनाव लड़ रही हैं।

बेगूसराय में कुल सात विधानसभा सीटें हैं, जिसमें महागठबंधन की तरफ से लेफ्ट को 4 सीटें दी गई हैं। इनमें तीन सीटों, बछवाड़ा, बखरी और तेघड़ा सीट पर सीपीआई के उम्मीदवार हैं वहीं मटिहानी सीट से सीपीएम मैदान में है। इसके अलावा चेरियाबरियारपुर व साहेबपुर कमाल सीट से आरजेडी और बेगूसराय विधानसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार मैदान में हैं।

महागठबंधन के खिलाफ बछवाड़ा, बेगूसराय और बखरी से बीजेपी के उम्मीदवार लड़ रहे हैं। वहीं बाकी चार सीटों पर जेडी (यू) लड़ने वाली है। लेकिन जेडी (यू) जिन सीटों पर लड़ रही है, उनमें कुछ सीटों पर लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) भी अपने उम्मीदवार दे रही है। तेघड़ा सीट पर लेफ्ट के सामने आरजेडी छोड़कर जेडी (यू) में शामिल होने वाले वीरेन्द्र कुमार हैं। 2010 में बीजेपी के टिकट से इस सीट से चुनाव जीतने वाले पूर्व विधायक ललन कुंवर भी एलजेपी से मुकाबले में हैं। इसके अलावा जिले में अन्य सीटों पर भी एलजेपी उम्मीदवार उतार सकती है।

बेगूसराय के बछवाड़ा विधानसभा सीट से सीपीआई के प्रत्याशी और यहीं से तीन बार विधायक रह चुके अवधेश राय कहते हैं कि अगर इस नकारा एनडीए सरकार को हटाना है तो विपक्षी एकजुटता ही एकमात्र विकल्प है और इसके लिए लेफ्ट पार्टियां प्रतिबद्ध है।

न्यूजक्लिक से बातचीत में वे कहते हैं, “ये बात सही है कि हमारी ताकत के मुताबिक हमें उतनी सीटें नहीं मिली हैं लेकिन ये समय की मांग है। हम चाहते हैं कि इस झूठी सरकार को हटाएं और कम से कम ऐसी सरकार बने जो गरीबों से रिश्ता जोड़ सके। बीते 10-15 सालों को देखें रोजगार और उद्योग ना के बराबर है, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था बदतर हो चुकी है इसलिए हम विधानसभा में पहुंचकर अपनी मांगों को पूरा करना चाहते हैं।”

बिहार विधानसभा में सीपीआई और बेगूसराय का लेनिनग्राद‘ कहा जाना

बिहार विधानसभा में कम्युनिस्ट पार्टी का उदय बेगूसराय से ही हुआ, जब 1956 के बेगूसराय विधानसभा सीट से उपचुनाव में कॉमरेड चंद्रशेखर सिंह ने जीत हासिल की थी। चंद्रशेखर सिंह कांग्रेस नेता और राज्य के तत्कालीन सिंचाई मंत्री रामचरित्र के बेटे थे। बीएचयू से पढ़ाई के बाद उन्होंने जिले में पहुंचकर भूमिहीनों और दलितों के हक में युवाओं को इकट्ठा कर लड़ाई लड़ी, उन्हें जमीन का पट्टा दिलाया और वे इस आंदोलन को पूरे बिहार में लेकर गए। सवर्णों और जमींदारों के वर्चस्व के खिलाफ इस लड़ाई में सभी तबके के लोग शामिल थे। इन आंदोलनों से 1960-70 के दशक में चंद्रशेखर सिंह की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनी और उन्हें ‘लाल सितारा’ कहकर बुलाया गया था।

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(बेगूसराय में चर्चित सीपीआई नेता रहे चंद्रशेखर सिंह)

चंद्रशेखर ने जिस लड़ाई की शुरुआत की, राज्यभर में उसका परिणाम यह हुआ कि विधानसभा में सीपीआई की मौजूदगी बढ़ती चली गई। 1972 के बिहार विधानसभा चुनाव में सीपीआई सिर्फ 55 सीटों पर लड़कर 35 सीटों पर जीत हासिल की थी। यह राज्य में सीपीआई का अब तक सबसे बेहतरीन प्रदर्शन रहा था। बेगूसराय से भी पार्टी को तीन सीटें मिली और यह लंबे समय तक चलता रहा, इसलिए इस क्षेत्र को ‘लेनिनग्राद’ से संबोधित किया जाने लगा। सीपीआई के इस संघर्ष को पार्टी के विरोधी भी स्वीकारते हैं।

पिछले साल लोकसभा चुनाव में बेगूसराय से सीपीआई के खिलाफ आरजेडी उम्मीदवार रहे तनवीर हसन न्यूजक्लिक के साथ बातचीत में कहते हैं, “ये सच है कि कॉमरेड चंद्रशेखर ने जमीन पर संघर्ष किया था। इसका लाभ भी आम गरीब जनता को हुआ था। शुरुआती दौर में जनांदोलन तो इस पार्टी की पहचान रही है।”

आजादी के बाद बहुत जल्द ही बेगूसराय में औद्योगिक कारखाने मसलन, बरौनी रिफाइनरी, थर्मल पावर स्टेशन, फर्टिलाइजर प्लांट स्थापित हो गए। औद्योगिक गतिविधियों के कारण वाम दलों ने ट्रेड यूनियन को भी सक्रिय किया, जिसके कारण वे अपना आधार बनाने में सफल रहे। चंद्रशेखर सिंह के अलावा सूर्य नारायण सिंह, रामचंद्र पासवान, देवकीनंदन सिंह, सीताराम मिश्र जैसे नेताओं ने जमीन पर लगातार मेहनत की। पार्टी के नेताओं ने भू-सामंतों से जमीन छीनकर गरीबों को बसाने का काम किया। ये सभी जमींदारों के खिलाफ लड़ाई से लेकर, मजदूर संघर्ष और छुआछूत जैसी समस्याओं पर भी संघर्ष में आगे रहे।

बेगूसराय में वरिष्ठ पत्रकार और लेखक महेश भारती कहते हैं कि कम्युनिस्टों के इन आंदोलन से जिन लोगों को फायदा मिला, वे पार्टी से जुड़ते चले गए। इससे पार्टी का भी जनाधार मजबूत हुआ। यही कारण है कि पार्टी कई सीटों पर वर्षों तक जीतती रही।

यह सच है कि पार्टी ने लगातार जमीन पर मेहनत करके जिले में अपनी मजबूती बनायी थी, जिसका फल लंबे समय तक पार्टी को मिलता भी रहा। 70 के दशक के बाद के चुनावों में पार्टी 20 से अधिक सीटें जरूर लाती रही। 1995 के विधानसभा चुनाव में जिले से लेफ्ट के पांच नेता विधानसभा पहुंचे थे, जिसमें चार सीपीआई से थे। इस चुनाव में भी पार्टी ने जनता दल के साथ गठबंधन किया था। उस वक्त सीपीआई और सीपीएम ने कुल 32 सीटें हासिल की थी। इसके अलावा भाकपा (माले) भी 6 सीटों पर जीती, हालांकि वो जनता दल के साथ गठबंधन में नहीं थी। इस बार भी जिले में यही फॉर्मूला माना जा रहा है।

बेगूसराय में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अक्सर यह कहते हैं कि लालू यादव, नीतीश कुमार या रामविलास पासवान जैसे नेता जिस सामाजिक न्याय की बात करते हैं, वो वामपंथी दलों का बनाया हुआ आधार है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान जब आरजेडी और सीपीआई बेगूसराय में अलग-अलग लड़ रही थी तो पूर्व सांसद शत्रुघ्न सिंह ने बातचीत के दौरान इस बात को दोहराया था। उन्होंने कहा था कि, “हमलोगों (सीपीआई) ने जो आधार बनाया, उसी से ये लोग आगे बढ़े।”

अगर किसानों व मजदूरों के संघर्षों और सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाली कम्युनिस्ट पार्टी यह बात कहती है कि उनके आंदोलन को कुछ राजनीतिक दल छीन ले गए, तो ये एकमात्र सच्चाई नहीं हो सकती है। किसी आंदोलन का जनाधार खिसकने के पीछे कई सारी वजहें होती हैं।

तनवीर हसन कहते हैं कि लालू यादव के सामाजिक न्याय के सामने बिहार में साम्यवादी राजनीति की सच्चाई सामने आ गई। 80 के दशक से ही कम्युनिस्ट पार्टी का जनाधार खिसक रहा था, वे जनांदोलनों से दूर जा चुके थे इसलिए उन्होंने 1995 में जनता दल के साथ गठबंधन किया था।


कैसे बिखर गया जनाधार
?

2000 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई अचानक धराशाई हो गई, राज्य भर में 26 सीट से सीधे 5 सीट पर पहुंच गई। 2010 के चुनाव में पार्टी को राज्य में एकमात्र सीट बेगूसराय के बछवाड़ा सीट से हासिल हुई थी। इसके बाद धीरे-धीरे स्थिति यह हुई कि 2015 के चुनाव में सीपीआई की विधानसभा में उपस्थिति शून्य हो गई। इसका एक कारण तो लालू यादव का उभार और उसके बाद जातिगत समीकरणों के आधार पर तैयार हुई वोटबैंक की राजनीति को बताया जाता है। ये वामदलों के नेता भी स्वीकार करते रहे हैं।

लालू यादव के अलावा जनता दल से अलग होकर नीतीश कुमार ने 1994 में समता पार्टी (बाद में जेडीयू) बनाया और फिर रामविलास पासवान ने 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) का गठन किया। बाद में नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ गठबंधन किया, जो अभी तक (कुछ सालों को छोड़कर) कायम है। इस गठबंधन में पिछड़ों और सवर्णों के वोट का बेहतरीन सामंजस्य माना जाता है। बिहार में अब जातिगत प्रतिनिधित्व देने के नाम पर कई सारे दलों का गठन हो चुका है।

2015 चुनाव में शून्य पर पहुंच जाने के जवाब में सीपीआई नेता अवधेश राय कहते हैं कि नीतीश कुमार ने अपनी नाकामी को बचाने के लिए बड़ी चालाकी से विपक्ष को द्वंद्व में फंसाया और साथ में (आरजेडी और कांग्रेस) चुनाव लड़ लिया। इसके कारण वोट का ध्रुवीकरण हुआ और लेफ्ट को इसका बड़ा नुकसान हुआ।

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(बछवाड़ा विधानसभा सीट से सीपीआई उम्मीदवार अवधेश राय)

अवधेश राय कहते हैं, “जिले में हमने सामाजिक संघर्षों के जरिये व्यापक बदलाव लाया था। लेकिन इसके बाद सरकारी योजनाओं में जो भ्रष्टाचार बढ़ा, इसके खिलाफ हम लोगों को ठीक तरीके से संगठित नहीं कर सके। ये हमारी गलती जरूर है।”

बेगूसराय में इतिहास के प्रोफेसर अरविंद सिंह लेफ्ट के इस नुकसान को थोड़ा पीछे जाकर देखते हैं। वे कहते हैं कि 90 के दशक में पिछड़े लोगों ने देखा कि उनका अपना नेता आ गया है। जाति के आधार पर जो नए-नए दल बने, लोगों का रुझान उस तरफ बढ़ने लगा। कम्युनिस्ट पार्टी से बड़ी संख्या में पिछड़े और दलित जरूर जुड़े थे लेकिन उन्हें कभी नेतृत्व नहीं मिला था।

इसके अलावा उनका मानना है कि पार्टी में अब वैसे जमीनी नेता नहीं रहे जो जनता के साथ उठते-बैठते हुए काम करते थे। पहले कार्यकर्ता और नेता में अंतर नहीं होता था। इस पार्टी में भी धीरे-धीरे बुर्जुआ संस्कृति आ गई। पार्टी का चरित्र बदलना भी बिखराव का एक बड़ा कारण है।

वे कहते हैं, “रामचंद्र पासवान यहां से (बखरी विधानसभा सीट) विधायक होते थे, वे हमेशा साइकिल से चला करते थे। जनता के मन में रहता था कि इस पार्टी का नेता हमारे लायक है। लेकिन धीरे-धीरे यह सब खत्म होता चला गया। इसलिए कार्यकर्ता भी अलग होते गए।”

जिले में करीब 20 फीसदी की आबादी वाले भूमिहार जाति का हमेशा वर्चस्व रहा है और सीपीआई में भी इसी पार्टी का नेतृत्व बना रहा। जिले के ट्रेड यूनियन में भी भूमिहारों की चलती थी, क्योंकि अधिकतर ठेकेदार इसी जाति के हैं। पार्टी पर हमेशा यह आरोप लगा कि संगठन के नेताओं ने अपने करीबियों और रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाया, जिसके कारण आम लोगों (पिछड़ों) के बीच अविश्वास पैदा हुआ।

महेश भारती कहते हैं, “जाति की राजनीति के अलावा पार्टी के पतन में इस लाभ और लोभ का असर भी निश्चित रूप से पड़ा। नेता असल संघर्षों से दूर हुए, अपने लाभ को प्रमुखता देने लगे और फिर जनता भी अलग होती गई।”

तनवीर हसन कहते हैं कि समाज के हर वर्ग और हर तबके को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, जो इन्होंने नहीं किया। बेगूसराय में अल्पसंख्यकों का ही इतना बड़ा आधार है लेकिन सीपीआई में कभी जिला स्तर का कोई नेता नहीं रहा। बखरी विधानसभा सीट सुरक्षित है इसलिए पार्टी की मजबूरी के कारण वहां से उम्मीदवार देती है।

वे कहते हैं, “कई इलाकों में (बरौनी, तेघड़ा, वीरपुर) अल्पसंख्यकों ने लगातार सीपीआई का साथ दिया। उनके भीतर भी था कि इन सबके बावजूद पार्टी में प्रतिनिधित्व के नाम पर कोई पूछ नहीं रहा है।”

जिले में इस बार समीकरण अलग है। बीजेपी-जेडीयू के खिलाफ किसी को भी समर्थन देने की बात को दोहराने की बात कर पार्टी भी अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाना चाहती है। इसलिए राज्य में कभी बड़ी पार्टी की हैसियत रखने वाली सीपीआई महागठबंधन की ओर से सिर्फ 6 सीट पर भी लड़ने को तैयार हो गई।

क्या खोई हुई जमीन वापस मिलेगी?

पिछले विधानसभा चुनाव में तीनों वामदलों ने 239 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें भाकपा (माले) सिर्फ तीन सीट पर जीत पायी थी, लेकिन सीपीआई और सीपीएम अपना खाता भी नहीं खोल सकी थी। पिछले विधानसभा चुनाव में जिले की 7 विधानसभा सीटों में सीपीआई ने 5 सीट पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, सभी जगह पार्टी तीसरे स्थान पर रही। वहीं एक-एक सीट पर सीपीएम और भाकपा (माले) ने अपने उम्मीदवार उतारे थे।

पिछले चुनाव में सीपीआई ने जिन पांच जगहों पर अपने उम्मीदवार दिए थे, उनमें तीन जगहों पर आरजेडी (तेघड़ा और बखरी) और कांग्रेस (बछवाड़ा) के उम्मीदवार की जीत हुई थी। इस बार महागठबंधन की ओर से सीपीआई ने इन्हीं सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। खास बात यह है कि ये तीनों विधानसभा सीट लंबे समय तक पार्टी के लिए एक मजबूत किले जैसा रहा है।

तेघड़ा विधानसभा सीट (जहां से चंद्रशेखर चुनाव लड़ते थे) पर पार्टी लगातार 48 सालों तक (2005 तक) जीत दर्ज करती रही। वहीं बखरी विधानसभा सीट पर भी लेफ्ट लगातार 33 सालों तक जीती। फिर 2005 के चुनाव में भी जीतकर सीपीआई लौटी, लेकिन पिछले दो चुनावों से यहां से भी पार्टी को हार मिल रही है। इन क्षेत्रों में सालों रहने के बाद पार्टी आज फिर वापसी की टोह में है, लेकिन एक सवाल उठता है कि क्या इन इलाकों के लिए पार्टी ने विकास का कुछ अलग मॉडल तैयार किया।

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(बेगूसराय जिले का सीपीआई मुख्यालय)

अवधेश राय कहते हैं कि वे जब पहली बार विधायक बनकर आए तो बछवाड़ा में न एक पक्की सड़क थी और न ही एक विद्यालय था। “हमनें अपने पूरे क्षेत्र में सड़क का निर्माण किया और लगभग हर सड़क को मुख्य सड़क से जोड़ दिया। दूसरा हमनें दलितों और पिछड़ों के क्षेत्र में नए विद्यालय खुलवाए, लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसे करीब 30 विद्यालयों को बंद कर दिया गया। इसके अलावा पंचायतों के स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर और नर्सों की उपस्थिति को सुनिश्चित करवाया। इन केंद्रों में हमने स्वास्थ्य जांच की आधुनिक मशीनों को उपलब्ध करवाया, लेकिन अब ये सब धूल फांक रही है।”

लोकसभा चुनाव 2019 में कन्हैया कुमार के चुनाव लड़ने से पार्टी को जरूर लोकप्रियता मिली, लेकिन उनके जमीन पर नहीं रहने से युवा कार्यकर्ताओं में निराशा भी हुई। हालांकि विधानसभा चुनाव का गणित इस लोकप्रियता की राजनीति से बिल्कुल अलहदा है। पार्टी ने सभी सीटों पर अपने पुराने उम्मीदवारों को उतारा है और कांग्रेस-आरजेडी का सहयोग इस बार बोनस का काम कर सकता है, जो लोकसभा चुनाव में नहीं हो पाया।

( विचार व्यक्तिगत हैं।)

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