December 5, 2020

Such Ke Sath

सच के साथ – समाचार

Castiziam:हमें सम्मान से जीने नहीं देती है ये जाति!

हमें सम्मान से जीने नहीं देती है ये जाति!

प्रतीकात्मक चित्र

इस दमन-चक्र को रोकने के लिए लोकतांत्रिक दायरे में रहकर ही कोई राह निकालनी जरूरी है। विचार-विमर्श जरूरी है। इस पूरे परिदृश्य के मद्देनज़र आइए विचार करें कि किस तरह दलित भेदभाव मुक्त, उत्पीड़न मुक्त जीवन जी सकते हैं।

सच के साथ |हमारे लोकतान्त्रिक देश में जिस तरह से दलितों पर दबंगों द्वारा बेख़ौफ़ होकर अत्याचार किए जा रहे हैं वे लोकतंत्र पर खुद सवालिया निशान लगा रहे हैं कि ये लोकतंत्र है या तानाशाही? इस इक्कीसवी सदी में भी जाति के नाम पर दलितों पर जुल्म का सिलसिला जारी है। आखिर क्यों? कब और कैसे रुकेगा ये दलित दमन का सिलसिला? इस पर विचार करना जरूरी है।

इस दमन-चक्र को रोकने के लिए लोकतांत्रिक दायरे में रहकर ही कोई राह निकालनी जरूरी है। विचार-विमर्श जरूरी है। इस पूरे परिदृश्य के मद्देनज़र आइए विचार करें कि किस तरह दलित भेदभाव मुक्त, उत्पीड़न मुक्त जीवन जी सकते हैं।

अगर हम वर्चस्वशाली दबंग जातियों द्वारा दलितों यानी अनुसूचित जाति पर ढाए गए जुल्मों की फेहरिस्त बनाएं तो पेज-दर-पेज भरते चले जाएंगे और उनका अंत नहीं होगा। कुछ उदहारण तो ऐसे ही जुबान पर आ जाते हैं जैसे हरियाणा का गौहाना हो, मिर्चपुर हो, महाराष्ट्र का खैरलांजी हो, गुजरात का ऊना हो, बिहार का बक्सर हो, उत्तर प्रदेश का हाथरस हो, बलरामपुर हो… कितने नाम लें। पूरे देश के दलित, दबंग जातियों के अत्याचार से पीड़ित हैं।

आए दिन दलित महिलाओं को नग्न कर गाँव में घुमाया जाता है, उनसे बलात्कार किया जाता है। आत्म-सम्मान की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। दलितों का  घोड़ी चढ़ना, मूंछे रखना, किसी काम के लिए मना करना, गरबा देखना, फसल कटाई के लिए मना करने तक पर बेरहमी से पिटाई  की जाती है। आँखें फोड़ देना, हाथ काट देना,  पेशाब पीने के लिए मजबूर करना आदि अनेक ऐसी घटनाएं हैं जो आजीवन भुलाई नहीं जा सकती।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताज़ा रिपोर्ट ही देखें तो सबकुछ साफ हो जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ अपराध में साल 2019 में सात फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के कुल 3,486 मामले दर्ज किए गए। यानी हर रोज दलितों की कम से कम 9 महिलाओं के साथ बलात्कार होता है।

इन सब विषय पर मैंने कई दलितों से बात की। लोगों ने अपने-अपने अनुभव और समाधान बताए।

जी करता है कि उनसे पूछूं – आख़िर तुम्हारे मन में इतनी नफ़रत आती कहाँ से है?

दिल्ली में एक निजी कम्पनी में काम करने वाले 50 वर्षीय अशोक सागर कहते हैं कि जब से हाथरस के बूलगढ़ी बेटी का प्रकरण हुआ है तब से दलितों के सामाजिक संगठन जागरूक हुए हैं। ये संगठन अब एकता का महत्व समझने लगे हैं। अगर ऐसी ही एकता दलित दिखाएं तो दबंगों की जल्दी हिम्मत नहीं होगी कि वे किसी बर्बर वारदात को अंजाम दें।

वह कहते हैं, “कई बार मेरे मन में विचार आता है कि वर्चस्वशाली जातियों में इतनी नफरत कहाँ से आती है कि वे दलितों के साथ इंसान की बजाय दरिंदो की तरह पेश आते हैं। कौन भरता है उनके दिमाग में इतनी नफरत इतना जहर। क्यों होता है उनके अन्दर इतना अहम् भाव, इतना ईगो। क्या विरासत में मिली मनुस्मृति उन पर इतनी हावी हो जाती है कि वे देश के संविधान को भूल जाते हैं। मनुस्मृति को ही अपना संविधान मानने लगते हैं।”

अशोक कहते हैं- “मुझे लगता है कि हम दलितों पर अत्याचार तभी रुकेंगे जब हम अधिक से अधिक संख्या में पॉवर में होंगे। हम लोगों का बड़ी संख्या में राजनीति में आना बेहद जरूरी है। जब सता में हमारी मेजोरिटी होगी तो हम दलितों पर अत्याचार करने से पहले अत्याचारी दस बार सोचेंगे।”

इस जाति में जन्म लेना ही अपराध हो जैसे 

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के राजा करोसिया (40) कहते हैं, “मैंने बचपन से ही जाति का दंश सहा है। जब मैं अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान शिक्षकों से ट्यूशन पढ़ाने को कहता था तो वे मुझे मेरी जाति के कारण टयूशन नहीं पढ़ाते थे क्योंकि मैं अछूत जाति से था। मैं उच्च जाति के बच्चों के साथ नहीं बैठ सकता था। फिर एक दलित जाति के टीचर से मैंने ट्यूशन पढ़ाने को कहा तो वे राजी हो गए और मैं उनके यहां ट्यूशन पढने जाने लगा। लेकिन दो-तीन दिन बाद ही उन्होंने भी मना कर दिया क्योंकि उनके पास जो उच्च जाति के बच्चे पढ़ते थे उन्होंने मेरे साथ पढ़ने से मना कर दिया था। उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि अगर आप राजा को पढ़ाओगे तो हम नहीं पढेंगे। क्योंकि वह नीच जाति से है।”

“इस तरह का अनेक बार मेरे साथ जातिगत भेदभाव हुआ। तब मुझे लगता कि इस जाति में जन्म लेना ही अपराध है। अगर इस जाति में जन्म ले लिया तो जन्म से लेकर मृत्यु तक किसी न किसी प्रकार का भेदभाव सहना पढ़ेगा। पर किस जाति में जन्म लेना है यह कहाँ हमारे वश में होता है।

पर अब मैं जागरूक हो गया हूँ। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के विचारों से अवगत हो गया हूँ। अब मुझे लगता है कि इस जातिवाद से डरने की नहीं लड़ने की जरूरत है। अगर हम आर्थिक रूप से मजबूत यानी समृद्ध  हो जाएं। उच्च शिक्षित हो जाएं। गैर सफाई इज्जतदार पेशे से अपनी आजीविका कमाने लगें। अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाएं। दलित आपस में मिलकर रहने लगें तो परिदृश्य बदलेगा। फिर इनकी हिम्मत नहीं होगी हमारी ओर आँख उठाकर देखने की। अभी तो ये हमारी गरीबी, कमजोरी और मजबूरी का फायदा उठाते हैं।”

हमें सम्मान से जीने नहीं देती है ये जाति

दिल्ली में कोठियों में झाड़ू-पोछे का काम करने वाली विनीता वाल्मीकि (35) कहती हैं कि इस जाति के होने के कारण हमें इज्जत-सम्मान नहीं मिलता। लोग काम भी बताएंगे तो झाड़ू-पोछा जैसा सफाई का काम ही बताएंगे। जैसे हमारे नसीब में सफाई का काम करना ही लिखा हो। ऊंची जाति के मकान मालिक हमारी जाति जानने पर कमरा किराए पर नहीं देते। कई बार हमें अपनी जाति छुपानी पड़ती है।

अब सोचती हूँ कि बच्चे पढ़ लिख कर कोई इज्जत का काम करें तब भले हमें इज्जत से जीने को मिले।

तरक़्क़ी का रास्ता रोके खड़ा है जाति का राक्षस

मध्य प्रदेश के सागर के रहने वाले जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता पवन बाल्मीकि (45) कहते हैं कि अगर हम कोई इज्जतदार पेशा अपनाना भी चाहें तो वर्चस्वशाली जाति के लोग हमें उस पेशे में सफल नहीं होने देते। अगर हम कुछ सामान बेचने का बिजनेस करें तो अपने को उच्च समझने वाली जातियों के लोग हम से सामान नहीं खरीदेंगे। और किसी न किसी तरह ऐसे हालात क्रिएट कर देंगे कि आप को अपना बिजनेस बंद करना पड़ेगा। अगर आप उच्च जाति की कालोनी में कमरा किराये पर लेने जायेंगे तो आपको दलित होने के कारण कमरा किराये पर नहीं मिलेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि आप अगर अपनी मेहनत से तरक्की करना भी चाहें तो जाति का राक्षस आपका रास्ता रोके खड़ा मिलेगा।

पवन कहते हैं कि अब सवाल है कि दबंग जातियों के अत्याचारों से कैसे मुक्ति मिलेगी? सबसे पहले तो हमें उच्च शिक्षित होना होगा। दूसरी बात है कानून का जानकार बनना होगा। हमारे पास एससी/एसटी एक्ट है, एमएस एक्ट है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है। इनकी भलीभांति जानकारी होने चाहिए। आईपीसी का ज्ञान हो तो और भी अच्छा है। मानव अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए। संविधान का ज्ञान होना चाहिए। आर्थिक समृद्धि सामाजिक संगठनों से जुड़ा होना चाहिए। जब हम इतने सक्षम हो जाएं कि दबंगों की ईंट का जवाब पत्थर से दे सकें तो किसी की हिम्मत नहीं होगी कि हम पर अत्याचार कर सके।

एक अभिशाप है जाति

मध्य प्रदेश रानीगंज की रविता डोम (30) कहती हैं कि हमारे लिए जाति किसी अभिशाप से कम नहीं है। एक तो इस जाति में मैला ढोने का काम करना पड़ता है। इससे लोग हम से छुआछात  मानते हैं। दुकानदार दूर से सामान देते हैं। स्कूल में हमारे बच्चों से बड़ी जाति के बच्चे भेदभाव करते हैं। बड़ी जाति के लोग गाली-गलौज और बदतमीजी से बोलते हैं। यह सब बहुत बुरा लगता है। सोचते हैं कि अगर हमारी कोई इज्जतदार पेशे में आजीविका हो जाए तो ये काम छोड़ दें और बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाएं। जब हमारे बच्चे पद्लिख कर कोई अच्छा काम करेंगे तब भले हमें इस भेदभाव से छुटकारा मिलेगा।

निष्कर्ष यह है कि वर्चस्वशाली और दबंग लोग तब तक दलित और कमजोर वर्ग पर अत्याचार करते हैं जब तक दलित गरीब और कमजोर रहेंगे। समृद्ध और सशक्त होने से उन पर अत्याचार करना मुश्किल हो जाएगा। क़ुरबानी बकरे की दी जाती है शेर की नहीं। इसलिए जब दलित आर्थिक रूप से, सामाजिक रूप से और राजनीतिक रूप से मजबूत हो जाएंगे तो उन पर होने वाले अत्याचारों का भी अंत हो जाएगा। पर ये सब होना क्या इतना आसान है? जी नहीं, इसके लिए एक लम्बा संघर्ष करना होगा। फिलहाल मंजिल दूर है।

अभी सपा ,बसपा और कई ऐसे राजनीतिक दलों के नेता हैं जो किसी न किसी प्रकार से लोगों को अपनी ओर जाति ,संप्रदाय आदि के नाम पर जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं ,लेकिन जनता को चाहिए कि ऐसे लोगों से सावधान रहें और देश उन सुरक्षित हाथों में दे जो वास्तव में देश की सुरक्षा को अपने लिए सबसे पहले समझते हैं। जिनके लिए देश पहले है और दल बाद में है ।भारत में जातिवाद को अंग्रेजों ने हमारे भीतर पैदा किया और उन्होंने कहीं मराठा शक्ति को मराठा शक्ति के नाम से पुकारने में लाभ समझा , तो कहीं सिक्खों को सिक्ख , जाटो को जाट ,गुर्जरों को गुर्जर आदि आदि बिरादरियों के रूप में देखने का काम किया। उन्होंने इन लोगों को हिंदू शक्ति के रूप में कभी भी महिमामंडित नहीं किया। यही मुस्लिम समय में सुल्तान और बादशाह भी करते आ रहे थे ।

आज भी यदि हम इसी प्रकार जातीय आधार पर बांटकर देखे जाते रहे और हम राष्ट्रवाद के नाम पर एक स्थान पर नहीं आए तो देश को नीचा दिखाने वाली शक्तियां हम पर शासन करती रहेंगी और ऐसे लोग जो यहां रहकर पाकिस्तान के गीत गाते हैं या पाकिस्तान के इमरान को मोदी से अधिक वरीयता देते हैं – उन लोगों को इसका लाभ मिलता रहेगा।जो लोग हमसे सबूत मांगते हैं या देश की सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ करते हैं , ऐसे लोग राजनीति में सांप्रदायिकता और जातिवाद को हावी करके सत्ता हथियाने की कोशिश कर सकते हैं ,लेकिन देश की जनता को सावधान होकर अपना सही निर्णय लेना होगा ।अपने – अपने क्षेत्र से ऐसे- ऐसे जनप्रतिनिधियों को चुनकर न भेजना जनता का कर्तव्य है जो लोगों को जाति ,संप्रदाय, भाषा ,प्रांत आदि के नाम पर लड़ाता हो । इसके विपरीत ऐसे व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा जाना समय की आवश्यकता है ,जिसका चिंतन स्पष्ट हो , जो देश को वरीयता देता हो और जो देश के धर्म ,संस्कृति और इतिहास की अच्छी जानकारी रखता हो , देश के नागरिकों के मध्य प्रेम और सद्भाव को बढ़ाने का काम करने के लिए विख्यात रहा हो और जन समस्याओं के निराकरण में जो अधिक से अधिक रुचि रखता हो।देश के मतदाता को राजनीति के उस गंदे वायरस से अपनी रक्षा करनी चाहिए जो उन्हें जाति , संप्रदाय आदि में विभाजित करने का घिनौना काम करता आया है या कर रहा है ।

यह लोग राजनीतिक चिंतन के स्तर पर नपुंसक होते हैं , क्योंकि इनका चिंतन सर्वग्राही और सर्व लोकोपयोगी नहीं होता । इनकी संकीर्ण सोच इन को किसी क्षेत्र विशेष तक सोचने की ही अनुमति देती है। साथ ही यह लोग किसी जाति विशेष का सहारा लेकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर जाते हैं और देश के लोगों के लिए यह ना तो देश की किसी विधानसभा में जाकर कोई लाभ कर सकते हैं और ना ही देश की संसद में जाकर जनता की समस्याओं को उचित ढंग से उठा सकते हैं । यह केवल हाथ उठाने वाले प्यादे होते हैं ।

जो यहां से निकल करके विधानसभाओं में या देश की संसद में जाकर बैठ जाते हैं और जब उनके आका इन से किसी भी समय हाथ उठाने के लिए या शोर मचाने के लिए कहते हैं तो यह उस समय केवल हाथ उठाकर और शोर मचाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं । इनके पास देश को आगे बढ़ाने का कोई चिंतन नहीं होता ।देश के लिए कोई ऐसी योजनाएं नहीं होती जिससे देश विश्वगुरु के रूप में स्थापित हो और विश्व मे सम्मान पूर्ण स्थान प्राप्त करें।देश के संविधान निर्माताओं ने देश में लोकतंत्र की स्थापना इसीलिए की थी कि यहां प्रतिभासंपन्न जनप्रतिनिधि जनता के बीच से निकल प्रदेश के विधान मंडलों और संसद में जाकर बैठें । सोच थी कि देश के समाज को जोड़ने वाले ऐसे लोग देश के नेता बनें ,देश की जनता के प्रतिनिधि बनें , जिनका चिंतन इतना ऊंचा और पवित्र हो कि वे देश के लोगों को स्वाभाविक रूप से सामाजिक समरसता का पाठ पढ़ाने वाले हों । उनका चरित्र अपने आप में एक संस्था का काम करने वाला हो । हमें अपने देश के संविधान निर्माताओं की इस पवित्र भावना का सम्मान करना सीखना होगा । उन्हीं के अनुसार चलते हुए जब हम अपने देश के जनप्रतिनिधियों का इसी आधार पर चयन करेंगे तो हमें पता चलेगा कि हम वास्तव में भारत में लोकतंत्र की स्थापना करने में सफल हो सके हैं।

देश के पढ़े-लिखे मतदाता भी यदि देश के राजनीतिज्ञों के बरगलाने से जाति ,संप्रदाय ,भाषा ,प्रांत आदि के प्रवाह में बहकर जनप्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं तो समझ लेना कि वे बहुत बड़ा पाप करते हैं । जिस बुराई को इन पढ़े-लिखे मतदाताओं को अब तक देश से समाप्त कर देना चाहिए था , यदि उसी को चुन-चुन कर यह अपने लिए भेज रहे हैं तो समझिए कि इस बुराई के बनाए रखने में इनका सबसे बड़ा योगदान है । उससे नीचे जो कम पढ़े लिखे मतदाता हैं और शराब आदि में बिककर अपनी जाति ,संप्रदाय या भाषा या प्रांत के लोगों को ही वोट देना अपना धर्म समझते हैं – वह भी देश के लिए अच्छा कार्य नहीं कर रहे । जबकि उन से नीचे कुछ ऐसे मतदाता भी इस देश में है जो बेचारे यह जानते ही नहीं कि उनके वोट का क्या महत्व है ?

– लेकिन उन पर वोट लाद दी गई है , उन्हें कभी कभी तो दो जून की रोटी लेकर या सौ – दो सौ रुपये देकर ही खरीद लिया जाता है , उनका किया हुआ ऐसा कार्य इसलिए पाप नहीं है कि वह नहीं जानते कि वे कर क्या रहे हैं ? देश के राजनीतिज्ञ इन लोगों को ऐसा ही बनाए रखना चाहते हैं , वह नहीं चाहते कि उनकी अशिक्षा, भुखमरी की और ऐसी निराशापूर्ण स्थिति समाप्त हो । देश के राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता चाहे अपनी किसी पार्टी विशेष के लिए वोट मांग रहे हो , लेकिन देश के पढ़े-लिखे मतदाताओं को अपने अनपढ़ ,अशिक्षित , हताश ,उदास व निराश मतदाता भाइयों को भी समझाना चाहिए कि उनकी वोट का मूल्य क्या है ?

उन्हें अपना वोट कैसे प्रत्याशी को देना चाहिए ? इस प्रकार की चाक-चौबंद व्यवस्था और सुरक्षा होनी चाहिए कि हमारे देश का अनपढ़ व अशिक्षित मतदाता किसी भी स्थिति में इस बार शराब आदि में बिकने के लिए विवश न किया जाए ?- उसे समझा दिया जाए कि उसकी वोट भारत के भाग्य का निर्माण करेगी , इसलिए तुम भारत के भाग्य के निर्माता हो और भारत भाग्य निर्माता होने के कारण तुम्हारे वोट का बहुत अधिक मूल्य है। जब तक हमारे देश का पढ़ा लिखा मतदाता जाति ,संप्रदाय ,भाषा ,प्रांत आदि से प्रभावित होकर वोट देता रहेगा और जब तक उससे नीचे का मतदाता अपने वोट का सही मूल्यांकन करने में सफल नहीं होगा तब तक भारत में लोकतंत्र होकर भी लोकतंत्र नहीं हो सकेगा ।

(लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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