May 6, 2021

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सच के साथ – समाचार

Covid_19:प्रकृति और जीव पर नियंत्रण की मानव की क्षमता पर पहली बार लगा प्रश्न चिह्न

सच के साथ |प्रकृति और जीव पर नियंत्रण की मानव की क्षमता पर पहली बार प्रश्न चिह्न लगा है। विश्वास है हम इससे उबर जाएंगे, लेकिन यह डर हमेशा बना रहेगा कि एक छोटा सा अदृश्य वायरस पूरी मानव सभ्यता को चुनौती दे सकता है। बहरहाल, एक खुशखबरी यह है कि वायरस की मौजूदगी का पता लगाने वाले महंगे और घंटों चलने वाले परंपरागत आरटी-पीसीआर किट की जगह वैज्ञानिकों ने सस्ती और मिनटों में रिजल्ट देने वाली क्रिस्पर यानी सीआरआईएसपीआर किट ईजाद कर ली है।

संक्रामक बीमारी पर अंकुश का सबसे जरूरी चरण होता है रोगी में वायरस की पहचान। जिन देशों ने जितनी जल्द और जितनी ज्यादा यह प्रक्रिया अपनाई, वे उतने ही अधिक इसके प्रकोप से बच सके, जैसे दक्षिण कोरिया और जर्मनी। लेकिन, इटली और अमेरिका ने बाद में रफ़्तार पकड़ी, तब देर हो चुकी थी। भारत में अभी भी प्रति दस लाख आबादी पर केवल 36.88 टेस्ट हो सके हैं, जबकि जर्मनी ने इससे 300 गुना और दक्षिण कोरिया ने 250 गुना ज्यादा टेस्ट किए।

राजस्थान का भीलवाड़ा देश के 25 हॉटस्पॉट जिलों में होने के बावजूद इस रोग पर काबू पाने में भारत में सबसे सक्षम रहा। उसने राष्ट्रीय औसत से 200 गुना ज्यादा जांच की। भारत सरकार ने 50 लाख टेस्ट किट्स के ऑर्डर दिए हैं, लेकिन उन्हें आने में दो माह लग सकते हैं। पहली पांच लाख किट्स की खेप अमेरिका से एक माह में आने की उम्मीद है।

एक फार्मास्युटिकल कंपनी ने कहा है कि वह 50 लाख क्रिस्पर किट्स बनाने जा रही है। वायरोलॉजी के सिद्धांत के अनुसार वायरस बैक्टीरिया से भी लड़ते हैं, लिहाज़ा शरीर में बैक्टीरिया की स्थिति से वायरस की मौजूदगी और प्रकृति का पता चल सकता है।

क्रिस्पर को ईजाद करने वाली दो कंपनियों के दो वैज्ञानिकों ने सीधे आरएनए (रेबो न्यूक्लेइक एसिड) का पता लगाया न कि इसे डीएनए (डीऑक्सी रिबोन्यूक्लेइक एसिड) में बदलने में वक्त जाया किया, जो परंपरागत पीसीआर मशीन के द्वारा किया जाता था। क्रिस्पर छोटा और सामान्य स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा जगह-जगह इस्तेमाल कर मिनटों में वायरस का पता बताने वाली किट है। कई रोगियों में लक्षण न दिखने से खून की जांच भी कारगर उपाय है। बहरहाल, पूरे देश के लिए एक एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) विकसित करना जरूरी है।

 

अब जाकर दिखी तेजी

रेकॉर्ड संख्या में आ रहे कोरोना के नए मामलों के बीच देश के कई हिस्सों में टीकों की तंगी की शिकायतें आने लगी हैं। महाराष्ट्र और ओडिशा सहित कई राज्यों में टीकाकरण केंद्र बंद करने पड़े। कोविड महामारी को आए सालभर से अधिक समय हो गया। ऐसा लग रहा है कि टीके उपलब्ध कराने के ठोस उपाय करने में किसी न किसी स्तर पर सुस्ती बरती गई, जिसका नतीजा अब दिख रहा है। महामारी का जोर बढ़ने के साथ ही कई देशों ने वैक्सीन के मोर्चे पर कदम बढ़ा दिए थे। अमेरिका ने एक साथ कई कंपनियों को पैसे दिए ताकि वे तेजी से रिसर्च कर सकें। टीका अभी तैयार भी नहीं हुआ था कि पिछले साल जुलाई में ही उसने फाइजर से करीब दो अरब डॉलर में 10 करोड़ डोज खरीदने का करार कर लिया। कई दूसरी कंपनियों से भी उसने इसी तरह के करार कर लिए थे उन्हीं दिनों। नवंबर तक ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने भी इसी तरह के कदम उठा लिए थे। रूस ने रशियन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट फंड से वैक्सीन रिसर्च की फंडिंग की।

 

इधर दुनिया में टीके बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया है भारत में, लेकिन हाल यह रहा कि उससे पहले तो बात की गई शुरुआती 10 करोड़ डोज के सस्ते दाम पर। और फिर लंबे इंतजार के बाद इस साल जनवरी के दूसरे हफ्ते में टीके खरीदने का करार किया गया। वह भी केवल एक करोड़ 10 लाख डोज के लिए। एस्ट्राजेनेका का जो कोविशील्ड टीका सीरम बना रही है, उसके एक अरब डोज के लिए एस्ट्राजेनेका ने पिछले साल मई में ही सीरम से डील कर ली थी। भारत में सरकारी मशीनरी किस बात का इंतजार कर रही थी? हाल यह है कि अभी सीरम और भारत बायोटेक मिलकर भी करीब सात करोड़ डोज ही बना पा रही हैं हर महीने। इस मामले में अमेरिका से सबक लेना चाहिए। अमेरिका ने जनहित में टैक्सपेयर का पैसा दिया प्राइवेट कंपनियों को रिसर्च करने के लिए। वहीं वह उनका पहला ग्राहक भी बना। इससे कंपनियों के सामने शोध और उत्पादन के मामले में कोई दुविधा नहीं रही। भारत सरकार ने अब विदेश में बने और वहां इस्तेमाल हो रहे टीकों को मंजूरी की प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्णय किया है। रूस में बनी स्पूतनिक V वैक्सीन के आपात उपयोग की मंजूरी दी गई। देर तो हुई, लेकिन ये सही कदम है। भारत बायोटेक और ICMR ने मिलकर कोवैक्सीन के मामले में अच्छा काम किया। इस दिशा में और आगे बढ़ना चाहिए। सरकार को प्राइवेट कंपनियों को अग्रिम भुगतान कर साफ कर देना चाहिए कि कितने टीके चाहिए और किस भाव पर। इससे उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी। नवंबर में मंजूर किए गए 900 करोड़ रुपये के कोविड सुरक्षा फंड से एक भी किस्त जारी नहीं हुई है। कंपनियों को इसके जरिए जल्द मदद दी जाए। अभी एक फीसदी से भी कम लोगों को लग सका है टीका। साफ है कि चुनौती बड़ी है और जरूरत तेजी से सही फैसले करने की है।

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