June 25, 2022

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CRPF छोड़ो, सरकार तो आर्मी के शहीदों को भी ‘शहीद’ नहीं मानती!

शहीद…शहीद…शहीद..! पुलवामा में सीआरपीएफ के 40 जवानों की शहादत ने इस शब्द को हर तरफ चर्चा में ला दिया है. देश भर में शहीदों के लिए भावनाएं उमड़ रही हैं. लोग अपने-अपने तरीके से शहीद जवानों के प्रति सम्मान जाहिर कर रहे हैं. लोग इन रणबांकुरों को भले शहीद मान रहे हों मगर हमारी सरकार की नजर में इनमें से कोई शहीद नहीं है. सीआरपीएफ के जवान तो छोड़िए ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले आर्मी, एयरफोर्स और नेवी के कई जवानों को सरकार ‘शहीद का दर्जा’ नहीं देती. क्या है ये पूरा माजरा? आइए समझते हैं…

सरकार किसे मानती है शहीद?
आजादी के 72 साल बाद भी देश में ये तय नहीं है कि शहीद किसे कहा जाएगा? देश में तीन तरह के लोगों के लिए शहीद शब्द का प्रयोग किया जाता है. पहले वे, जो आजादी की लड़ाई में मारे गए. दूसरे वो, जिन्होंने युद्ध या आतंक में अपनी जान गंवाई. तीसरे वे, जिनकी हत्या देश की खातिर काम करते हुए या राजनीति के दौरान हो गई. अप्रैल, 2015 में गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने संसद में एक बयान दिया. इसमें उन्होंने कहा,’शहीद शब्द की कोई परिभाषा नहीं है. सशस्त्र सेना और रक्षा मंत्रालय ने इसकी कोई व्याख्या तय नहीं की है.’ साधारण तौर पर शहीद उन सैनिकों को कहा जाता है जो युद्ध में मारे गए हों. और युद्ध भी ऐसा हो, जिसका ऐलान हुआ हो. इस तरह भारत के सिर्फ वही सैनिक शहीद कहे जाते हैं, जो पाकिस्तान और चीन के साथ युद्ध में मारे गए हों. किरण रिजिजू ने 22 दिसंबर, 2015 को लोकसभा में एक बार फिर कहा,

‘भारतीय सशस्त्र सेनाओं यानी आर्मी, नेवी और एयरफोर्स में किसी तरह की केजुअल्टी के बाबत शहीद शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता है. केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों यानी सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ, एसएसबी और असल रायफल्स के जवानों के जान गंवाने पर भी इस शब्द का इस्तेमाल नहीं होता है. हां, उनके परिजनों को सेवा शर्तों के मुताबिक पेंशन और क्षतिपूर्ति राशि दी जाती है.’

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सरकार सबको शहीद क्यों नहीं मानती?
सवाल उठता है कि सरकार सबको शहीद का दर्जा क्यों नहीं दे देती? इसका जवाब यही है कि सरकार के पास ऐसे कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं. जानकारों के मुताबिक इसके लिए संसद में कानून बनाना पड़ेगा. बिना कानून बनाए, इस मसले पर विवाद ही रहेगा. असल में किसी भी सैनिक या अर्धसैनिक की मौत पर उनके परिजन शहीद का दर्जा मांगने लगते हैं. रक्षा विशेषज्ञ मारूफ रजा के ‘पत्रिका’ में छपे एक बयान के मुताबिक घोषित युद्ध में मरने वाले सैनिकों के साथ अंदरूनी दुश्मनों से लड़ते हुए मरने वालों को भी शहीद माना जाना चाहिए. इस बारे में स्पष्टता बहुत जरूरी है. देश के लिए जान देने वालों के जज्बे को सलाम किया जाना चाहिए. भले ही वे श्रीलंका में जान गंवाएं या कश्मीर में या फिर देश के अंदर दुश्मनों से लड़ते हुए अपनी जान दें.

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शहीद का दर्जा क्यों मांगते हैं लोग?
सेना में जो लोग शहीद होते हैं, उनके परिवार को शहीद के रिटायरमेंट तक का वेतन मिलता है. पेंशन के तौर पर भरण-पोषण दिया जाता है. इसके साथ ही राज्य सरकारों की ओर से सम्मान और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है. कई बार सरकार परिवार के गुजारे के लिए पेट्रोल पंप और आवासीय भूखंड जैसी सुविधाएं देती है. रक्षा विशेषज्ञ अफसर करीम ने कुछ वक्त पहले एक अखबार से एक बात करते हुए कहा था, ‘भारतीय फौज में शहीद जैसे शब्द का कोई प्रावधान नहीं है. फौज में तो हर वो शख्स जो लड़ते हुए मारा जाए, शहीद कहा जाता है. मरने के बाद सैनिक के परिजनों को क्या वेतन, भत्ते या विशेषाधिकार मिलेगें, ये उसी समय तय हो जाता है, जब वो सेना में भर्ती होता है. शहीद का दर्जा मिलने से इसका कोई संबंध नहीं है. सरकार शहीद सैनिक को क्या सम्मान देती है, क्या आर्थिक लाभ या पुरस्कार उसे देती है, ये हर मामले में अलग होता है. इसके लिए कोई तय नियम नहीं है.’

इन दिनों मीडिया में शहीद और शहादत शब्द की ज्यादा चर्चा दिखती है. अगर कोई सैनिक भागते हुए मारा जाता है, तो शहीद नहीं कहलाएगा. आफिस में बैठा कर्मचारी भी शहीद नहीं कहा जाएगा. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसे नेताओं की हत्या को भी शहादत नहीं कहा जा सकता है, जैसा कि कुछ लोग कहने लगते हैं. सीआरपीएफ के जवानों को शहीद नहीं माना जाता, ये भी कहने की ही बातें हैं. अगर वे लड़ते हुए मारे जाते हैं, तो शहीद ही कहे जाते हैं. उनकी मृत्यु के बाद परिजनों को क्या मिलेगा, ये भी तभी तय हो जाता है, जब वे नौकरी में आते हैं. इसका शहीद के दर्जे या शहादत से कोई लेना-देना नहीं है.

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सेना में शहादत पर क्या मिलता है?
एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक शहीद होने वाले जवान के परिवार को केंद्र सरकार की तरफ से 10 लाख रुपए की मदद मिलती है. आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस के तौर पर 25 लाख रुपए परिवार को मिलते हैं. आर्मी सेंट्रल वेलफेयर फंड की तरफ से 30 हज़ार रुपए दिए जाते हैं. आर्मी वाइव्स वेलफेयर एसोसिएशन की तरफ से 10 हज़ार रुपए मिलते हैं. शहीद होने वाले जवान की आखिरी तनख्वाह के बराबर परिवार को पेंशन मिलती है. इसके अलावा सैनिक की नौकरी के हिसाब से जमा ग्रेच्युटी, फंड, छुट्टी का पैसा भी परिवार को मिलता है. जम्मू-कश्मीर सरकार अपनी ज़मीन पर किसी भी राज्य के शहीद होने वाले जवान के परिवार को दो लाख रुपए देती है. शहीद की पत्नी को हवाई और रेल यात्रा में किराए में रियायत मिलती है. सरकार एलपीजी गैस की एजेंसी और पेट्रोल पंप में आठ फीसदी का आरक्षण देती है. इसके साथ ही सरकारी नौकरियों और प्रोफेशनल इंस्टीट्यूट में सीटों पर आरक्षण रहता है.

अर्धसैनिक बलों की शहादत पर क्या देती है सरकार?
गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने 19 जुलाई, 2017 को लोकसभा में इसका ब्योरा दिया था. इसके मुताबिक केंद्रीय सुरक्षा बलों और सेना में तुलना नहीं की जा सकती है. दोनों की सेवा शर्तों में फर्क है. ड्यूटी के वक्त जवाबी कार्रवाई में किसी भी अर्धसैनिक के जान गंवाने पर परिजनों को 35 लाख रुपए और सामान्य ड्यूटी के दौरान मृत्यु होने पर 25 लाख रुपए दिए जाते हैं. जवान के आखिरी वेतन के बराबर परिजनों को पेंशन मिलती है. समूह ग और घ की नौकरियों में 5 फीसदी का रिज़र्वेशन दिया जाता है. शहीद सैनिक की बेटी को 2250 रुपए और बेटे को 2000 रुपए महीने का वजीफा. देश भर में एमबीबीएस की 15 और बीडीएस की 2 सीटें शहीद अर्धसैनिकों के बच्चों के लिए रिज़र्व हैं. देश भर में केंद्रीय पुलिस कैंटीन की सुविधा. परिजनों के कल्याण के लिए कल्याण और पुनर्वास बोर्ड बनाए गए हैं.

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सेना किस तरह अलग है?
हमारे यहां तमाम लोग सेना और अर्धसैनिक बलों को एक ही मान लेते हैं. जबकि सेना में Indian Army, Indian Air Force और Indian Navy शामिल हैं. तीनों सेनाओं में सैनिकों की तादाद करीब 13.50 लाख है. आज़ादी के बाद से साल 2015 तक देश के लिए शहीद होने वाले सैनिकों की संख्या 22 हज़ार 500 से ज़्यादा थी. साल 2015 तक अर्धसैनिक बल के 31 हज़ार 895 जवानों ने अपनी जान गवांकर देश की रक्षा की है. मौजूदा बजट आवंटन में सेना के लिए 1 लाख 38 हजार 85 करोड़ रुपए का इंतजाम किया गया है. एयरफोर्स के लिए 29 हजार 602 करोड़ रुपए और नौसेना के लिए 22 हजार 211 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं. रक्षा पेंशन पर 1 लाख 12 हजार 80 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का प्रस्ताव है. इससे उलट केंद्रीय अर्धसैनिक बलों का वेतन और पेंशन पर खर्च करीब 80 हजार करोड़ रुपए ही है. सेना रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करती है, जबकि अर्ध सैनिक बल गृह मंत्रालय के मातहत काम करते हैं. सेना में लेफ्टिनेंट, मेजर, कर्नल, ब्रिगेडियर, मेजर जनरल आदि रैंक होती हैं. अर्धसैनिक बलों में सिविल पुलिस की तरह कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, एएसआई, असिस्टेंट कमांडेंट और कमांडेंट, डीआईजी, आईजी और डीजी की पोस्ट होती है. अर्धसैनिक बलों को रिटायरमेंट के बाद पेंशन नहीं मिलती है. इन्हें पुलिस कर्मचारियों की तरह माना जाता है. जबकि सेना में पेंशन की व्यवस्था है.

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अर्धसैनिक बल में कौन-कौन शामिल?
Central Armed Police Forces के सुरक्षा बलों में CRPF, BSF, ITBP, CISF, Assam Rifles और SSB शामिल हैं. देश में अर्धसैनिक बलों के जवानों की संख्या 9 लाख से ज्यादा है. अर्धसैनिक बलों को बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार, चीन, भूटान और नेपाल से सटी सीमाओं पर ड्यूटी देनी पड़ती है.

# CRPF – आतंकवाद और नक्सल प्रभावित इलाकों में भी सीआरपीएफ यानी केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल को तैनात किया जाता है.

# BSF – बीएसएफ यानी बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स को बांग्लादेश और पाकिस्तान से सटी सीमा ड्यूटी पर लगाया जाता है. बीएसएफ शांति के समय तैनात की जाती है. युद्ध के समय बीएसफ की जगह सेना मोर्चा संभालती है. बॉर्डर पर शांति के वक्त सेना के जवान सीमा से दूर रहते हैं. मगर युद्ध के लिए खुद को तैयार करते हैं. सेना क्रॉस बोर्डर ऑपरेशन भी करती है.

# ITBP – भारत तिब्बत सीमा पर भारत-तिब्बत सीमा पुलिस को लगाया जाता है.

# CISF – सीआईएसएफ यानी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल पर सरकारी उपक्रमों की सुरक्षा का जिम्मा है.

# असम रायफल्स – इन्हें असम के उग्रवाद प्रभावित इलाकों में ड्यूटी देनी होती है.

# SSB – सशस्त्र सीमा बल को भारत-नेपाल सीमा पर लगाया जाता है.

हकीकत में अर्धसैनिक बल भी सेना के कदम से कदम मिलाकर देश और देश के नागरिकों की हिफाजत कर रहे हैं. ऐसे में उनकी शहादत को कम आंकना जायज़ नहीं कहा जा सकता है. देश की सुरक्षा में अर्धसैनिक बलों की भूमिका सेना से कम नहीं. तो मिलने वाले ट्रीटमेंट में भी फर्क नहीं होना चाहिए.

वन्देमातरम

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