August 4, 2021

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Eid-al-Adha 2021:आज है बकरीद, क्यों दी जाती है इस दिन कुर्बानी, ये भी जाने

Eid-al-Adha 2021: देश में बकरीद का त्योहार 21 जुलाई को मनाया जाएगा. इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से बकरीद का त्योहार 12वें महीने की 10 तारीख को मनाया जाता है. रमजान का महीने खत्म होने के 70 दिन के बाद बकरीद का त्योहार मनाया जाता है.

इस्‍लाम मानने वाले लोगों का प्रमुख त्‍योहार है ईद-उल-अजहा यानी बकरीद।

इस दिन इस्लाम धर्म के मानने वाले नमाज पढ़ने के बाद एक दूसरे को ईद की बधाई देते है और जानवर की कुर्बानी देते हैं. यह इस्लाम धर्म का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार होता है. इस दिन बकरे या दुंबे (भेड़) की कुर्बानी दी जाती है. कुर्बानी देने के बाद बकरे के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है. एक हिस्सा गरीबों में, दूसरा हिस्सा दोस्तों में और रिश्तेदारों में और तीसरा हिस्सा अपने पास रखा जाता है. कई लोग इस दिन दान पुण्य भी करते हैं.

 

 

ईद को मनाने की हर देश में अलग तारीख होती है. सबसे पहले सउदी अरब में एक दिन पहले बकरीद मनाई जाती है. उसके बाद भारत और पाकिस्तान के इस्लाम को मानने वाले लोग ईद मनाते हैं. इस बार 19 जुलाई सोमवार की शाम से शुरू होकर 23 जुलाई शुक्रवार तक ईद मनाई जाएगी. 20 जुलाई की सुबह सऊदी अरब में ईद मनाई जाएगी और 21 जुलाई को भारत और पाकिस्तान में बकरीद मनाई जाएगी.

 

 

क्यों दी जाती कुर्बानी
बकरीद के दिन आखिर क्यों कुर्बानी दी जाती है. ये भी आपको बताते हैं. दरअसल इस्लामिक मान्यता के अनुसार हजरत इब्राहिम अपने पुत्र हजरत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा की राह में कुर्बान करने जा रहे थे तो अल्लाह ने उनके पुत्र को जीवनदान दे दिया था. उन्‍हीं की याद में यह पर्व मनाया जाता है. ये कुर्बानी पैगम्बर इब्राहीम अलैहिस्सलाम के जमाने में शुरू हुई थी. इस्लाम में कई सारे पैगम्बर आये हैं. पैगम्बर अल्लाह के दूत या मैसेंजर को कहा जाता है.

 

कैसे शुरू हुई कुर्बानी
इस्लाम के अनुसार अल्‍लाह ने एक बार इनके सपने में आकर इनसे इनकी सबसे प्‍यारी चीज कुर्बान करने को कहा था. इब्राहिम अलैहिस्सलाम को अपनी इकलौती औलाद, उनका बेटा सबसे ज्यादा प्यारा था. मगर अल्‍लाह के हुक्‍म के आगे वह अपनी सबसे करीबी चीज को कुर्बान करने को तैयार थे.

 

इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने अपने दिल पर काबू किया और अपने बेटे को कुर्बान करने चल दिए. बकरीद लोगों को सच्चाई की राह में अपना सबकुछ कुर्बान कर देने का संदेश देती है. ईद-उल-अजहा को हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है. हजरत इब्राहिम अल्लाह के हुकुम पर अपनी वफादारी दिखाने के लिए अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने को तैयार हो गए थे. जब हजरत इब्राहिम अपने बेटे को कुर्बान करने के लिए आगे बढ़े तो खुदा ने उनकी निष्ठा को देखते हुए इस्माइल की कुर्बानी को दुंबे की कुर्बानी में परिवर्तित कर दिया. तभी से ये बकरीद के रूप में मनाया जाता है.

बकरीद मनाने के पीछे का इतिहास (Bakrid festival History)

बकरीद पर्व मनाने के पीछे कुछ ऐतिहासिक किंवदंती भी है। इसके अनुसार हजरत इब्राहिम को अल्लाह का बंदा माना जाता हैं, जिनकी इबादत पैगम्बर के तौर पर की जाती है, जिन्हें इस्लाम मानने वाले हर अनुयायी अल्लाह का दर्जा प्राप्त है। एक बार खुदा ने हजरत मुहम्मद साहब का इम्तिहान लेने के लिए आदेश दिया कि हजरत अपनी सबसे अजीज की कुर्बानी देंगे, तभी वे खुश होंगे। हजरत के लिए सबसे अजीज उनका बेटा हजरत इस्माइल था, जिसकी कुर्बानी के लिए वे तैयार हो गए।

 

 

जब कुर्बानी का समय आया तो हजरत इब्राहिम ने अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली और अपने बेटे की कुर्बानी दी, लेकिन जब आँखों पर से पट्टी हटाई तो बेटा सुरक्षित था। उसकी जगह इब्राहीम के अजीज बकरे की कुर्बानी अल्लाह ने कुबूल की। हजरत इब्राहिम की इस कुर्बानी से खुश होकर अल्लाह ने बच्चे इस्माइल की जान बक्श दी और उसकी जगह बकरे की कुर्बानी को कुबूल किया गया। तभी से बकरीद को बकरे की कुर्बानी देने की परंपरा चली आ रही है।

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