September 19, 2021

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Exit Poll में केजरीवाल की वापसी का क्रेडिट BJP चाहे तो ले सकती है!

नई दिल्ली|दिल्ली चुनाव को लेकर आये सभी एग्जिट पोल (Exit Poll Delhi Assembly Election 2020) में आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल (AAP CM Arvind Kejriwal) की सत्ता में वापसी तय लग है. ये भी साफ है कि BJP 2015 (BJP to score more than 2015) के नंबर में सुधार कर सकती है – लेकिन कांग्रेस का खाता इस बार भी खुलने के आसार कम ही हैं.

 

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आम आदमी पार्टी की सीटें पिछली बार जितनी तो नहीं लेकिन बहुमत के आंकड़े से बहुत आगे रहने वाली हैं, ऐसा जरूर लग रहा है. 2015 के चुनाव के मुकाबले बीजेपी के प्रदर्शन में सुधार के कयास अवश्य हैं कि ये संख्या दर्जन भर से ज्यादा नहीं हो सकती. एक चैनल के पोल में कांग्रेस को एक सीट मिलने की संभावना जरूर जतायी गयी है. ये सब तब होे रहा है जब दिल्ली में तकरीबन 61 फीसदी मतदान हुआ है. (2015 के पिछलेे चुनाव में 67 प्रतिशत वोटिंग हुआ था.)

खुश होने वाले ख्याल तो अब भी मनोज तिवारी जता ही रहे हैं, एग्जिट पोल के नतीजे फेल होने वाले हैं – और बीजेपी 48 सीट जीतेगी – लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो क्या AAP की सत्ता में वापसी का श्रेय बीजेपी नहीं लेना चाहेगी?

 

 

दिल्ली में केजरीवाल जैसा कोई नहीं!

अंतिम नतीजे अभी आने बाकी हैं, लेकिन जिस तरह इंडिया टुडे एक्सिस माय इंडिया पोल (India Today Axis MyIndia Poll) के पूर्वानुमान हाल फिलहाल चुनाव दर चुनाव सटीक आते रहे हैं – 11 फरवरी तक तक तो इस पर हर कोई भरोसा कर सकता है. मनोज तिवारी का एग्जिट पोल पर बयान राजनीतिक है ऐसा समझ लेना ही ठीक रहेगा.

 

 

बीच के हल्के-फुल्के भटकावों को छोड़ दें तो शुरू से आखिर तक अरविंद केजरीवाल इस बात पर कायम रहे कि दिल्ली चुनाव काम पर होगा. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी नेतृत्व ने अरविंद केजरीवाल को फंसाने की खूब कोशिश की, लेकिन वो हर ट्रैप से बच निकले.

 

 

दिल्ली चुनाव में बिजली पानी और मुफ्त की चीजों के मुकाबले शाहीन बाग को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश तो हुई लेकिन एग्जिट पोल से मालूम होता है कि उसका कोई असर नहीं हुआ. बीजेपी के ललकारते रहने के बावजूद अरविंद केजरीवाल न तो शाहीन बाग गये और न ही कोई गैर जिम्मेदाराना बयान दिया. एक चतुर राजनेता की तरह वो खामोशी के साथ लोगों के बीच बने रहे और मौका मिलते ही हनुमान चालीसा भी पढ़ डाला और मतदान की पूर्वसंध्या पर कनॉट प्लेस के हनुमान मंदिर भी हो आये. भगवान के साथ हुई बातचीत का ब्योरा भी ट्विटर पर दे दिया.

 

 

इंडिया टुडे एक्सिस माय इंडिया एग्जिट पोल के मुताबिक दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को 59 से 68 सीटें मिलने का अनुमान है. 2015 में AAP को 67 सीटें मिली थीं. पिछली बार बीजेपी को तीन सीटें मिली थी और इस बार उसे 2 से 11 सीटें मिलने की संभावना जतायी गयी है. कांग्रेस के लिए न अच्छी खबर है न बुरी क्योंकि पांच साल बाद भी पार्टी का जीरो बैंलेंस बरकरार रहेगा ऐसा माना जा रहा है.

 

 

अगर एग्जिट पोल का पोल देखें तो दिल्ली में आप 51 सीटें मिल रही हैं. बीजेपी 18 सीटें तक जीत सकती है – और कांग्रेस का इस बार खाता खुल भी सकता है. न्यूज एक्स नेता एग्जिट पोल में कांग्रेस को एक सीट मिलने का अनुमान लगाया गया है. इस एग्जिट पोल के मुताबिक दिल्ली में आप को 53-57 सीटें और बीजेपी को 11-17 सीटें मिल सकती हैं.

 

 

टाइम्स नाउ IPSOS एग्जिट पोल के अनुसार, AAP को 44 और बीजेपी को 26 सीटें मिलने की संभावना है जबकि रिपब्लिक और जन की बात एग्जिट पोल के मुताबिक, आम आदमी पार्टी को 48-61, BJP को 9-21 और कांग्रेस को कोई सीट नहीं मिलने वाली है.

 

 

खास बात ये रही कि अरविंद केजरीवाल ने किसी फिल्म के हीरो की तरह रोल किया और डायरेक्टर प्रशांत किशोर के बताये अनुसार हर शॉट समझदारी के साथ दिया – निजी हमलों की स्थिति में भी संयम बनाये रखा. बीजेपी नेताओं के आतंकवादी कहे जाने के बाद भी सिर्फ दुख जताया और बताया कि ये सुन कर माता-पिता भी काफी दुखी हैं.

 

 

बाद में सोच समझ कर पलटवार किया – दिल्लीवालों अगर आतंकवादी समझते हो तो 8 फरवरी को बीजेपी को वोट दे देना. दिल्लीवालों ने न सिर्फ केजरीवाल की बातें गौर से सुनीं, बल्कि खुद भी सोच समझ कर ही फैसला किया. दिल्लीवालों का संदेश है कि वो केजरीवाल को आतंकवादी नहीं बल्कि बेटा, भाई और शुभेच्छु मानते हैं.

 

प्रशांत किशोर के नाम एक और कामयाबी की इबारत लिखी जा रही है, ऐसा लग रहा है. वैसे प्रशांत किशोर ने भी केजरीवाल को जिताने के लिए कम कीमत नहीं चुकायी है. कभी प्रशांत किशोर को जेडीयू का भविष्य बताने वाले नीतीश कुमार ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में आवाज उठाने के लिए जेडीयू से ही निकाल दिया. अंत भला तो सब भला, सोच कर प्रशांत किशोर संतोष कर सकते हैं. पांच साल पहले भी प्रशांत किशोर के सामने दिल्ली जैसा ही चैलेंज रहा और अपनी मेहनत और काबिलियत से वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुकाबले में चुनाव जीत कर नीतीश कुमार को कुर्सी पर बिठाने में कामयाब रहे थे. एक बार फिर बिलकुल वैसे ही माहौल में प्रशांत किशोर ने अपने क्लाइंट को जीत दिलायी है.

 

 

अरविंद केजरीवाल ने ये चुनाव जीत कर कई बातें साबित भी की है. सबसे बड़ी बात तो यही है कि अब तक की अपनी तमाम गलतियों से वो सबक ले चुके हैं. लोक सभा चुनाव में कांग्रेस से पिछड़ कर तीसरे नंबर पर पहुंच जाने के बावजूद अरविंद केजरीवाल ने बड़ी समझदारी से लड़ाई लगभग जीत ली है. आम चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन की बातचीत भले फेल रही, लेकिन ताजा चुनाव में ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस ने परदे के पीछे से आम आदमी का सपोर्ट कर दिया है – बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए. मान कर चलना चाहिये ये स्थिति बनाने में भी प्रशांत किशोर की ही भूमिका रही होगी. आप के चुनाव कैंपेन से पहले से वो ममता बनर्जी की पार्टी का प्रचार कर रहे हैं. ऐसी तमाम कड़ियां हैं जिन्हें जोड़ कर देखने पर कई चीजें साफ साफ समझ में आ जाती हैं.

 

 

केजरीवाल अगर आखिरी नतीजों में भी जीत की यही संख्या बरकरार रख पाते हैं तो समझा जा सकता है कि लोगों ने किस कदर बिजली-पानी और स्कूलों की फीस को अहमियत दी और शाहीन बाग के सपोर्टर और विरोधी होने के चक्कर में पड़े बिना वोट देने का फैसला किया. महिलाओं पर मुफ्त बस यात्रा की मेहरबानी के साथ ही वोटिंग के ऐन पहले केजरीवाल की अपील का भी असर माना जा सकता है.

 

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बीजेपी का कोई नुस्खा नहीं चला

अगर किसी अलग ऐंगल से एग्जिट पोल के अनुमान में चुनाव नतीजों को देखें तो लगता यही है कि बीजेपी और कांग्रेस के रवैये में बहुत फर्क नहीं रहा है. अगर कांग्रेस ने कहीं परदे के पीछे से आप का सपोर्ट किया है तो बीजेपी ने मैदान में खड़े होकर आप की जीत सुनिश्चित कर डाली.

 

 

जेपी नड्डा के लिए तो जैसे सिर मुड़ाते ही ओले पड़ गये. मेहनत भी जी तोड़ की लेकिन हासिल हार होने जा रही है. महाराष्ट्र-हरियाणा में कम सीटें मिलने और झारखंड सत्ता गंवा देने के बावजूद बीजेपी ने कोई समझदारी नहीं दिखायी. आम चुनाव के बाद बार बार राष्ट्रवाद का एजेंडा फेल हुआ लेकिन फिर भी उसी पर डटे रहे. महाराष्ट्र-हरियाणा में धारा 370 तो झारखंड और दिल्ली में CAA और राम मंदिर का सिक्का चलाने की खूब कोशिश की मगर सारी कवायद बेकार हुई. शाहीन बाग पर संयोग और प्रयोग वैसे ही समझाने की कोशिश हुई जैसे 2017 में यूपी में श्मशान और कब्रिस्तान की बहस चलायी गयी थी, इस बार दांव पूरी तरह उलटा पड़ गया.

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