January 16, 2021

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Farmer Issues:सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों पर लगाई रोक, सुप्रीम कोर्ट के कदम से केंद्र सरकार और किसानों को क्या मिला, जानें- आगे क्या होगा ?

नई दिल्ली|नए कृषि कानून की वापसी को लेकर पिछले करीब दो महीनों से हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं। इस पूरे मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। केंद्र सरकार द्वारा पास किए गए तीन कृषि कानूनों के अमल होने पर अभी रोक लग गई है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार-किसान संगठनों में कोई समझौता न होते देख, ये सख्त फैसला लिया और एक कमेटी का गठन कर दिया। अब कमेटी ही अपनी रिपोर्ट अदालत को देगी, जिसपर आगे का फैसला होगा। आइए एक नजर डालते है सुप्रीम कोर्ट के फैसले से किस पक्ष को क्या मिलता दिख रहा है, आगे क्या हो सकता है?

सरकार-किसानों के बीच बना गतिरोध टूटेगा

किसानों और सरकार के बीच करीब आठ राउंड की बात हो चुकी है, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। साथ ही कई मौकों पर दोनों पक्षों में सख्ती देखी गई, ऐसे में अब जब सुप्रीम कोर्ट की कमेटी बनी है तो सरकार-किसानों के बीच बना हुआ गतिरोध टूटेगा और किसी निर्णय की ओर आगे बढ़ते दिखेंगे।

सुप्रीम कोर्ट में नहीं चल पाई सरकार की दलील

कृषि कानून का विरोध जबसे शुरू हुआ है, सरकार इसका काउंटर करने में लगी रही। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मौकों पर सीधे किसानों को संबोधित किया और इन कानूनों को कृषि क्षेत्र का सबसे बड़ा सुधार बताया। पीएम मोदी ने किसानों को विपक्ष की बातों में ना आने को कहा, लेकिन सरकार की दलील कोर्ट में ना चली और आखिरकार कानूनों पर रोक लग गई।

नए कृषि कानूनों के खिलाफ देशभर के किसान संगठन करीब डेढ़ महीने से राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन कर रहे हैं। केंद्र सरकार और किसानों के बीच लंबे वक्त से चल रही बातचीत के बावजूद कोई हल नहीं निकलने पर सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनों के अमल पर रोक लगा दी। जानिए क्यों कानून वापस लेने की मांग कर रहे हैं किसान…

शीर्ष अदालत ने मोदी सरकार के नए कृषि काूननों के लागू होने पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। अदालत ने इन कानूनों की समीक्षा के लिए चार सदस्यीय समिति गठित की है। समिति में भारतीय किसान यूनियन के भूपेंद्र सिंह मान, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी (कृषि विशेषज्ञ), अशोक गुलाटी (कृषि विशेषज्ञ) और अनिल घनावंत (शेतकारी संगठन) हैं।

कृषि उपज वाणिज्य एवं व्यापार (संवर्द्धन एवं सरलीकरण) विधेयक-2020’
इसमें सरकार कह रही है कि वह किसानों की उपज को बेचने के लिए विकल्प को बढ़ाना चाहती है। किसान इस कानून के जरिए अब एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों पर बेच पाएंगे। निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर पाएंगे, लेकिन सरकार ने इस कानून के जरिए एपीएमसी मंडियों को एक सीमा में बांध दिया है।

इसके जरिए बड़े कॉरपोरेट खरीदारों को खुली छूट दी गई है। बिना किसी पंजीकरण और किसी कानून के दायरे में आए हुए वे किसानों की उपज खरीद-बेच सकते हैं। किसानों के लिए एक अलग विवाद समाधान तंत्र की स्थापना का प्रावधान भी किया गया है। सरकार के अनुसार, यह विधेयक भारत में ‘एक देश, एक कृषि बाजार’ के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगा।

प्रमुख लाभ

  • कृषि क्षेत्र में उपज खरीदने-बेचने के लिए किसानों व व्यापारियों को अवसर की स्वतंत्रता।
  • लेन-देन की लागत में कमी।
  • मंडियों के अतिरिक्त व्यापार क्षेत्र में फार्मगेट, शीतगृहों, वेयरहाउसों, प्रसंस्करण यूनिटों पर व्यापार के लिए अतिरिक्त चैनलों का सृजन।
  • किसानों के साथ प्रोसेसर्स, निर्यातकों, संगठित रिटेलरों का एकीकरण, ताकि मध्स्थता में कमी आएं।
  • देश में प्रतिस्पर्धी डिजिटल व्यापार का माध्यम रहेगा, पूरी पारदर्शिता से होगा काम।
  • अंततः किसानों द्वारा लाभकारी मूल्य प्राप्त करना ही उद्देश्य ताकि उनकी आय में सुधार हो सकें।
  • वैकल्पिक व्यापार चैनल उपलब्ध होने से किसानों को लाभकारी मूल्य मिलेंगे, अंतरराज्यीय व राज्य में व्यापार सरल होगा
विरोध 

विपक्ष का कहना है कि यदि किसान पंजीकृत एपीएमसी के बाहर अपनी फसल को बेचेंगे, तो राज्य मंडी शुल्क जमा नहीं कर पाएंगे, इसके चलते राज्य के राजस्व को नुकसान होगा। यह अंततः एमएसपी-आधारित खरीद प्रणाली को समाप्त कर सकता है। इससे ई-एनएएम मंडी संरचना नष्ट हो जाएगी।

किसान खत्म कर सकते हैं अपना आंदोलन

किसान लंबे वक्त से सरकार के साथ बात कर रहे थे, लेकिन नतीजा नहीं निकल रहा था। साथ ही किसान ऐसा संदेश नहीं देना चाहते थे कि वो सरकार के सामने झुक गए हैं। अब जब अदालत ने इसमें दखल दिया है तो कमेटी की रिपोर्ट और अदालत के आदेश के हिसाब से आंदोलन अंत की ओर बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार के दबाव में आए बिना भी किसान अपना आंदोलन खत्म कर सकते हैं।

 

किसान संगठनों को अपनी जिद छोड़कर कमेटी के सामने जाना होगा

किसान संगठन लंबे वक्त से कानून वापसी की अपील कर रहे हैं, सरकार के संशोधन और कमेटी के प्रस्ताव को वो ठुकरा चुके थे। लेकिन अब जब सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती से कमेटी बनाने और हल निकालने की बात कही है तो किसान संगठनों को अपनी जिद छोड़कर कमेटी के सामने जाना ही होगा। कमेटी के सामने किसान पेश होंगे या नहीं, इसको लेकर किसान संगठनों में अभी एकमत नहीं है। ऐसे में अगर बड़े स्तर पर किसान संगठन कमेटी के साथ चर्चा करने में असहयोग करते हैं, तो ये सरकार के पक्ष में जा सकता है। क्योंकि इसे निर्णय को टालने और अदालत का आदेश ना मानने के तौर पर देखा जाएगा।

 

इन मुद्दों पर सरकार और किसानों के बीच था गतिरोध

गौरतलब है कि किसानों द्वारा तीनों कृषि कानूनों का विरोध किया जा रहा है। इनमें कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, एमएसपी समेत अन्य कई मुद्दों पर विरोध शामिल था। हालांकि, सरकार ने कई मसलों पर संशोधन करने की बात स्वीकार की थी। लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया था।

जानें- आगे क्या होगा

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार-किसान संगठनों में कोई समझौता ना होते देख, सख्त फैसला लिया है और एक कमेटी का गठन कर दिया है। अब कमेटी दोनों पक्षों की बात सुनकर अपनी रिपोर्ट अदालत को देगी, जिसपर आगे का फैसला होगा।

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