January 20, 2021

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Farmer Protest:कॉर्पोरेट-अकूत मुनाफ़ा और एकाधिकार

नई दिल्ली |किसान आंदोलन एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) या कृषि को कॉर्पोरेट के हाथों सौंपने के खिलाफ लड़ाई से आगे बढ़ गया है। आंदोलन ने अपनी प्रथा को निभाते हुए उस कहानी को रास्ते पर ला दिया है जो नव-उदारवाद के अधिपत्य की प्रचारित कहानी के विपरीत है। और जैसा कि आने वाले दिनों में नरेंद्र मोदी सरकार आंदोलन को तोड़ने के लिए छल-कपट का इस्तेमाल बढ़ाने वाली है, तो इससे वापसी और अधिक विस्तृत, स्पष्ट, और प्रतिरोधी होती जाएगी। ‘राष्ट्र’ के बारे में जो कहानी है,उस पर यहाँ उदाहरण देकर स्पष्ट करना चाहता हूं।

’राष्ट्र’ की अवधारणा 17 वीं शताब्दी में यूरोप में पूंजीपति वर्ग के उदय के साथ स्पष्ट हुई थी और 19 वीं शताब्दी के अंत में वित्त पूंजी के उदय से यह विशेष रूप से प्रमुख हो गई थी।  रुडोल्फ हिल्फर्डिंग ने नोट किया था कि वित्त पूंजी की विचारधारा ‘राष्ट्रीय विचार’ या राष्ट्र के विचार की महिमा है।

मार्क्स के सिद्धांत का एक अहम पहलू है- ‘अतिरिक्त मूल्य.’ ये वो मूल्य है जो एक मज़दूर अपनी मज़दूरी के अलावा पैदा करता है.

मार्क्स के मुताबिक़, समस्या ये है कि उत्पादन के साधनों के मालिक इस अतिरिक्त मूल्य को ले लेते हैं और सर्वहारा वर्ग की क़ीमत पर अपने मुनाफ़े को अधिक से अधिक बढ़ाने में जुट जाते हैं.

इस तरह पूंजी एक जगह और कुछ चंद हाथों में केंद्रित होती जाती है और इसकी वजह से बेरोज़गारी बढ़ती है और मज़दूरी में गिरावट आती जाती है.

वित्त पूंजी ने ’राष्ट्र’ का महिमामंडन किया क्योंकि यह एक साथ इस दृष्टिकोण को प्रचारित करता है कि राष्ट्र ’खुद’ इसका पर्याय है, कि, राष्ट्र के हित वित्त पूंजी के हित के समान हैं। इस प्रकार, ‘राष्ट्र’ के महिमामंडन के साथ-साथ उसकी वित्त पूंजी को ‘राष्ट्र’ की पहचान माना जाने लगा, जिसे बाद में अन्य देशों की वित्तीय पूंजी के खिलाफ संघर्ष में इस्तेमाल किया गया, जो कि अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता की अवधि के दौरान हुआ था।

इस पहचान का परिणाम लोगों को ‘राष्ट्र’ से अलग करना था। ‘’राष्ट्र’ लोगों के ऊपर एक बड़ी भारी संस्था बन गया, जिसके लिए लोगों ने केवल बड़े बलिदान दिए, लेकिन जो विशेष रूप से आम लोगों के सांसारिक और व्यावहारिक मुद्दों से संबंधित नहीं थे, जैसे लोगों के भौतिक जीवन की स्थिति आदि। इसकी यानि राष्ट्र की चिंता केवल सत्ता और महिमा से थी, न कि लोगों के कैलोरी सेवन करने या उनके स्वास्थ्य से थी।

यह अवधारणा औपनिवेशिक संघर्ष के दौरान तीसरी दुनिया में उभरी ‘राष्ट्र’ की अवधारणा से पूरी तरह अलग थी। उपनिवेशवाद ‘राष्ट्र’ के लिए दमनकारी था क्योंकि इसने लोगों पर अत्याचार किया; इस लिए लोगों ने ‘राष्ट्र’ की पहचान के साथ अपने को जोड़ा था। भारत में 1931 के कराची कांग्रेस प्रस्ताव में ‘राष्ट्रीय’ मुक्ति’ के एजेंडे की व्याख्या की गई थी और अन्य देशों में इसी तरह के दस्तावेज तैयार किए गए जिनमें मुख्य बात आम लोगों के जीवन में  सुधार लाने पर ज़ोर दिया गया था। 

यूरोपीय ‘राष्ट्रवाद’ से इस अंतर का मुख्य कारण इस तथ्य में मौजूद है कि उसे अपने-अपने देशों में नियंत्रित मीडिया के माध्यम से अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता में लगी वित्त पूंजी ने चैंपियन किया और उनका प्रचार किया था, जबकि इसके विपरीत भारत जैसे देशों में औपनिवेशिक विरोधी संघर्ष का वर्गीय आधार था जिसने इस सामाजिक संघर्ष में बड़े पूँजीपतियों के अलावा मज़दूर, किसान, छोटे उत्पादक और छोटे पूँजीपतियों को भी शामिल का लिया था,  जिनहोने खुद को औपनिवेशिक निज़ाम के तहत अधीन भी महसूस किया था।

यद्द्पि, नव-उदारवाद के आने से हमारे यहाँ एक वैचारिक प्रति-क्रांति हो गई है। यूरोपीय प्रकार के ‘राष्ट्रवाद’ का गुणगान जहां राष्ट्र को लोगों के ऊपर माना गया था, और उसे कॉर्पोरेट-वित्तीय कुलीनतंत्र के समान बनाया गया था, उसे भारत सहित तीसरी दुनिया के देशों में नव-उदारवादी पूंजीवादी निज़ाम के युग में पदोन्नत किया गया था। यह सच है कि इस दौरान अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता शांत हो गई थी, लेकिन यूरोपीय शैली का ‘राष्ट्रवाद’ अभी भी वित्त पूंजी के हितों के लिए उपयोगी है। 

मूल रूप से ’राष्ट्र’ और कॉरपोरेट-वित्तीय कुलीनतंत्र के बीच की पहचान को बढ़ावा देते हुए मूल रूप से यह दिखावा करने की कोशिश की गई कि कुलीन वर्ग की आर्थिक विकास के बारे में चिंता सबको लाभ पहुंचाने के लिए है। और जब इस दावे की पोल नव-उदारवादी पूंजीवाद के संकट के कारण खुलने लगी, तो फिर इस दावे को सिरे लगाए बिना, इसकी पहचान को फिर से स्थापित करने का एक नया तरीका खोजा गया। यह एक वैकल्पिक आध्यात्मिक यानि गूढ अवधारणा, ‘हिंदू राष्ट्र’, की अवधारणा है जिसे फिर से लोगों के ऊपर खड़ा कर दिया गया है, और इसे लागू करने के लिए लोगों को फिर से बलिदान करने के लिए कहा जा रहा है, और जिनकी नज़रों में फिर से लोगों के ज़िंदा रहने के हालात का मामूली महत्व है ।

पिछले छह वर्षों की यही एक प्रमुख कहानी रही है, जिसे हिंदुत्व की वकालत करने वालों ने जमकर उछाला और यह नव-उदारवादी पूंजीवादी के संकट दौरान की अवधि में अस्तित्व में आया जो कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठबंधन की चढ़ाई को दर्शाता है।

मोदी इस बात को लेकर किसी को भी संदेह नहीं रखना चाहते है कि ‘राष्ट्र’ से उनका तात्पर्य क्या है क्योंकि वे खुद कॉरपोरेट-वित्तीय कुलीन वर्ग को राष्ट्र का धन ‘निर्माता’ कहते हैं। इससे उनका साफ मतलब ये है कि यदि ‘राष्ट्र’ को समृद्ध करना है, तो इन ‘धन सृजनकर्ताओं’ को खुश रखना होगा। संक्षेप में मोदी जी का कहने का अर्थ ये हाकी कि देश का हित, इस कुलीन वर्ग के हित के समान है। आरएसएस द्वारा प्रस्तावित तथाकथित हिंदू राष्ट्र वास्तव में कॉर्पोरेट-वित्तीय कुलीनतंत्र की एक तानाशाही है, और यहां तक कि उसमें भी मुट्ठी भर कुलीन वर्ग, विशेष रूप से उनके हित में काम करने वाले। 

एकात्मक राष्ट्र की ओर बढ़ते कदम इस एजेंडे का हिस्सा है। एक संघीय राष्ट्र में जहाँ राज्य सरकारों के पास महत्वपूर्ण संसाधन और निर्णय लेने की शक्तियाँ होती हैं, जैसे छोटे स्थानीय बुर्जुआ, छोटी घरेलू इकाइयों या यहाँ तक कि राज्य सरकार के उद्यमों के साथ कुछ बिखरे विकास की गुंजाइश होती है, और ये सब बड़े कॉर्पोरेट-वित्तीय कुलीन वर्ग के स्वामित्व वाली बड़ी इकाइयों के साथ विकसित होता है। लेकिन, अगर संसाधनों और निर्णय लेने की शक्ति को केंद्रीकृत किया जाता है, तो ऐसे बिखरे हुए विकास की गुंजाइश तेजी घट जाती है।

मुट्ठी भर कॉरपोरेट-वित्तीय कुलीन वर्गों के सदस्यों ने केंद्र सरकार का पक्ष लिया है क्योंकि वे इसके वित्तीय समर्थक हैं, जिन्हे इस समर्थन के एवज़ में अपनी मर्ज़ी हाँकने की छूट मिलती हैं, जैसा कि 1930 के दशक में जापान में शिंको ज़ाइबात्सु के साथ हुआ था। मोदी के अधीन संसाधनों और शक्तियों का अपार केंद्रीकरण हो रहा है और वे इजारेदार पूंजीपति घरानों के प्रभुत्व को बनाने में उनके सहयोगी है। और अब इजारेदारी पूंजी के प्रभुत्व को पूरा करने के लिए किसानों की बलि दी जा रही है।

लेकिन यहाँ केंद्रीकरण का मतलब केवल राज्य सरकारों के खिलाफ केंद्र सरकार की मजबूती नहीं है। इसका अर्थ केंद्र सरकार के भीतर भी एक केंद्रीकरण से है, जहाँ सारी शक्ति एक “नेता” के हाथों में केंद्रित हो जाती है, जो वह शक्तिशाली/तानाशाह बन जाता है, जो हमेशा ऐसा संकेत देता है कि वह जानता है कि लोगों के लिए क्या अच्छा है, और क्या गलत है। कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ का ‘राष्ट्रवाद’ ‘नेता’ को राष्ट्र के प्रतीक के रूप में परिभाषित करता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि राज्य के अंग, जैसे कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी, मोदी के किसी भी विरोधी को ‘राष्ट्र-विरोधी’ मानती हैं, और इसलिए उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाता हैं।

किसान आंदोलन की प्रथा ने न केवल ‘राष्ट्र’ की इस अवधारणा पर सवाल उठाया है, बल्कि कामकाजी लोगों के साथ पहचान वाली वैकल्पिक राष्ट्र की अवधारणा को मुख्य केंद्र ला दिया है। मोदी के इस दावे को खारिज करने के बाद कि विवादित तीन कृषि-कानून उनके पक्ष में हैं, मोदी की उस धारणा को भी बड़ा झटका है कि, नेता को सबसे अच्छा पता है, जो कॉर्पोरेट-हिंदुत्व ’राष्ट्र की अवधारणा का एक मुख्य विश्वास’ है।

कई लोगों ने किसान की बात नहीं सुनने या उनसे सार्थक बात न करने के लिए केंद्र की सरकार की आलोचना की है। हालांकि, सुनना ‘राष्ट्र’ की इस अवधारणा में मूल रूप से विरोधाभासी है, जो वार्ता के माध्यम से राष्ट्रीय एकता के निर्माण में नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रीय’ एकता के पूर्ववर्ती अस्तित्व में विश्वास करता है, और जो धारणा ‘नेता’ में परिलक्षित होती है, जो सवाल करता है कि किसकी बुद्धिमत्ता का वास्तविक है या तो “राष्ट्र-विरोधी” है या ज्ञान की कमी से उत्पन्न भोलेपन में निहित है

मुकेश अंबानी के जियो मोबाइल फोन नेटवर्क का किसान आंदोलन द्वारा बहिष्कार करने का आह्वान; मोदी सरकार के पुतले के साथ-साथ अंबानी और अदानी का पुतला जलना; जो नकली ‘राष्ट्र’ के नाम पर कुछ व्यापारिक घरानों के लिए ‘धन सृजन’ करने के मोदी के  षड्यंत्र या धारणा के प्रति किसानों में जागरूकता का संकेत हैं।

विडंबना यह है कि किसानों के जियो के बहिष्कार के आह्वान के ठीक एक दिन पहले, अंबानी ने जियो 5  के लॉन्च की घोषणा की थी। इसे हर टीवी चैनल पर एक बड़ी ’राष्ट्रीय’ उपलब्धि के रूप में दिखाया गया था। जियो उत्पादों का बहिष्कार करने का किसानों का आह्वान केवल एक विशिष्ट रणनीतिक चाल नहीं है; बल्कि यह उस पूरी कहानी के विपरीत है जो चंद कॉरपोरेट घरानों को ‘राष्ट्र‘ के समान मानता है।


लेकिन किसान सिर्फ इस कहानी का मुकाबला नहीं कर रहे हैं; बल्कि वे एक वैकल्पिक और बिलकुल विरुद्ध कहानी/धारणा पेश कर रहे हैं, जो औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष का वास्तविक राष्ट्रवाद रहा है। विरोध स्थलों पर एक आम नारा है जहां वे एकत्र हुए हैं: जय भारत, जय किसान, जिसका दोहरा महत्व है। एक ओर बात कि यह किसानों के साथ ‘राष्ट्र’ की पहचान करता है, अर्थात, मेहनतकश लोगों से राष्ट्र बंता है। दूसरी ओर, जो महत्वपूर्ण है वह यह कि यह भारत माता की जय नहीं कहता है।  जो ‘राष्ट्र’ को एक माँ के रूप की कल्पना करता है, जिसे फिर लोगों को ऊपर माना जाता है, और इसलिए इसके लिए केवल बलिदान करने की अपेक्षा की जाती हैं। यह कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ द्वारा प्रचारित ‘राष्ट्रवाद’ की विशेषता है जो लोगों को राष्ट्र की भलाई के लिए कॉरपोरेट्स के लिए बलिदान करने को कहता है।

इसी तरह, किसानों द्वारा हिंदी के बजाय पंजाबी और अन्य भाषाओं में नारे लगाना देश की क्षेत्रीय-भाषाई राष्ट्रीयताओं की बहुलता में एकता को दर्शाती है, जो एक केंद्रीकृत ‘राष्ट्र’ की धारणा से बिलकुल अलग है’। 

किसान आंदोलन के प्रतीक चिल्ला-चिल्ला कर इस बात को कह रहे हैं। किसान आंदोलन द्वारा इस्तेमाल किए गए सभी प्रतीक, सरकार द्वारा इसके खिलाफ उठाए गए रुख की प्रकृति, संक्षेप में इसकी पूरी प्रथा, कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ द्वारा प्रचारित ‘राष्ट्रवाद’ की सशक्त अस्वीकृति तो है साथ ही यह आंदोलन वास्तविक राष्ट्रवाद की धारणा को पुन परिभाषित करती है, जिसने उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के माध्यम से आज़ाद भारत की नींव रखी थी। 

पूंजीवाद शब्द उस सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था के लिए प्रयोग होता है जिसमें कि अधिकांश विश्व आज रह रहा है। यह आम तौर से धारणा रही है कि, यदि हमेशा नहीं तो यह मानव इतिहास में अधिकांश समय रहा है। पर यह सत्य है कि, पूंजीवाद अभी कुछ शताब्दियों से ही विश्व में आया है। पूंजीवाद की शुरूआत ब्रिटिश पूंजीवादी क्रांति से मानी जाती है। (इग्लैण्ड का गृहयुद्ध, 1639-48) जब इग्लैण्ड के तानाशाही राजतंत्र-चाल्र्स प्रथम का सिर काट कर अंत कर बांस पर लटका कर, इग्लैण्ड में इसका अंत कर दिया गया था। इस घटना को, पूंजीवादी व्यवस्था की शुरूआत माना जाता है।


पूंजीवाद का असली चेहरा ऊपर की जगमगाती शान-शौकत एवं तड़क-भड़क और समान अवसरों की मीठी-मीठी लफ्फाजी की आड़ में दिखाई नहीं पड़ता। इन सब बातों की बजह से पूंजीवादी व्यवस्था के कारण उत्पन्न अनेक प्रश्नों का उत्तर देना आसान नही होता। इस व्यवस्था का मुख्य गुण है – असमानता, शोषण, भेदभाव, सामाजिक अन्याय, भूख, गरीबी, बेरोजगारी और युद्धों का होना। इस व्यवस्था में जो अन्न उगाता है वह भूखा है, जो कपड़ा बुनता है वह नंगा है, जो मकान बनाता है, वह बेघर है।

पूंजीवादी प्रणाली के ये भीतरी अंतर्विरोध उसकी सर्वाधिक विकट और लगातार बिगड़ती हुई सामाजिक और आर्थिक व्याधियों को जन्म देती है। ये व्याधियां बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, मुद्रास्फीति, अपराध, बारंबार दोहराए जाने वाले आर्थिक संकट, भविष्य की अनिश्चितता का भय आदि।

पूंजीवाद की उत्पत्ति 

पूंजीवादी, सामंतवाद के खण्डहरों में अंकुरित और सामंती समाज के ध्वंसावशेषों से उत्पन्न व्यवस्था है। अपने प्रारंभिक विकास के साथ-साथ इसने सामंतवाद को भीतर से खोखला करके नए, पूंजीवादी आर्थिक, सामाजिक संबंधों के लिए आधार तैयार किया। यह प्रक्रिया कोई संयोग नहीं था, क्योंकि सामंती व्यवस्था और पूंजीवाद दोनों में एक समानता है कि, दोनों ही उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व तथा मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण पर आधारित है।

समंती व्यवस्था मुख्य रूप से भूसंपत्ति पर आधरित था एवं आत्म निर्भर था। लेकिन व्यापार-व्यवसाय के विकास के कारण व्यापारी वर्ग पैदा हुआ, जो समृद्ध था एवं नई-नई तकनीक के अविष्कारों से प्रत्येक क्षेत्र में विशेषज्ञों की जरूरत पड़ने लगी, अत: पूंजीवाद का विकास होने लगा- मुद्रा का लेन-देन, व्यापारिक केन्द्रों-नगरों का विकास फैक्टरियों, कारखानों का विकास किसनों का नगरों की ओर पलायन, उत्पादन में बेशुमार वृद्धि आदि ने सामंती अर्थव्यवस्था को अंदर से खोखला कर धीरे-धीरे नष्ट कर दिया। यह प्रणाली नए विकसित समाज की आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ थी, क्योंकि यह व्यवस्था सड़ चुकी थी और क्रांतियों के द्वारा इसे उखाड़ फैंका गया। यह भी वैज्ञानिक सत्य है कि, जिस वर्ग के हाथ में उत्पादन के साधन होते हैं- वहीं सत्ता में रहता है और अपने वर्ग हित में सत्ता का उपयोग करता है। अत: अब क्रांतियों द्वारा सामंतों को सत्ता से बाहर कर पूंजीवाद उसमें आए और अपने वर्ग हितों के लिए कायदे-कानून और संविधान बनाए।

पूंजीपति वर्ग अपने झंण्डों में स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के नारे अंकित कर सत्ता में आया। लेकिन जल्द ही समानता, स्वतंत्रता महज एक चालू लब्ज रह गए, मात्र शोषण के तरीके बदले और कुछ नहीं। भूतपूर्व भूदास किसान मजदूरों में परिवर्तित हो गए।

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