January 23, 2021

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Farmer Protest:MSP पर माँग मान क्यों नहीं लेती मोदी सरकार? जानिए क्या है वजहें

नई दिल्ली |अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के मुताबिक़ उनकी अहम माँगों में से एक है, “सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम कीमत पर ख़रीद को अपराध घोषित करे और एमएसपी पर सरकारी ख़रीद लागू रहे.”

एमएसपी पर ख़ुद प्रधानमंत्री ट्वीट कर कह चुके हैं, “मैं पहले भी कहा चुका हूँ और एक बार फिर कहता हूँ, MSP की व्यवस्था जारी रहेगी, सरकारी ख़रीद जारी रहेगी. हम यहां अपने किसानों की सेवा के लिए हैं. हम अन्नदाताओं की सहायता के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे और उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करेंगे.”

उनका ये ट्वीट 20 सितंबर 2020 का है.

लेकिन ये बात सरकार बिल में लिख कर देने को तैयार नहीं है. सरकार की दलील है कि इसके पहले के क़ानूनों में भी लिखित में ये बात कहीं नहीं थी. इसलिए नए बिल में इसे शामिल नहीं किया गया है.

लेकिन बात इतनी आसान है, जैसा तर्क दिया जा रहा है?

दरअसल एमएसपी पर सरकारी ख़रीद चालू रहे और उससे कम पर फसल की ख़रीदने को अपराध घोषित करना, इतना आसान नहीं हैं जितना किसान संगठनों को लग रहा है.

कृषि मामलों के जानकार हरवीर सिंह कहते हैं कि कुछ जगहों पर विरोध प्रदर्शन तेज़ होने की वजह का नाता वहां की राजनीति और किसान संगठनों से तो है ही साथ ही अनाज ख़रीद की सरकारी व्यवस्था से भी है.

वो बताते हैं, “अगर किसान आंदोलन के इतिहास को देखें तो आपका पता चलेगा कि आंदोलन का केंद्र ज़्यादातर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश रहा है.”

वो कहते हैं, “रही महाराष्ट्र की बात तो वहां आंदोलन अधिकतर पश्चिमी हिस्से में दिखते हैं जहां गन्ने और प्याज़ की खेती होती है. मध्यप्रदेश में आंदोलन नहीं होगा ऐसी बात नहीं है. वहां कभी किसानों के मज़बूत संगठन नहीं रहे हैं. लेकिन वहां भी मंडियों में इसका विरोध हुआ है और मंडी कर्मचारियों ने हड़ताल की है.”

“महाराष्ट्र में किसान बड़ा वोटबैंक है लेकिन यहां गन्ना किसान अधिक हैं और गन्ने की ख़रीद के लिए फेयर एंड रीमुनरेटिव सिस्टम (एफ़आरपी) मौजूद है और उसका मूल्य तय करने के लिए शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर अभी भी है. उत्तर प्रदेश में भी काफी ज़मीन हॉर्टिकल्चर के लिए इस्तेमाल होने लगी है जिसका एमएसपी से कोई लेना-देना नहीं है.”

“ऐसे में जहां किसानों पर इन बिल का सीधा असर पड़ रहा है वहां किसान सड़क पर आ गए हैं लेकिन जहां ये सीधे तौर पर किसानों को प्रभावित नहीं कर रहे वहां विरोध उतना अधिक नहीं दिख रहा.”

सरकार के लिए ऐसा करना मुश्किल क्यों हैं?

ये जानने से पहले ये जानना ज़रूरी है कि एमएसपी क्या है और ये तय कैसे होता है.

एमएसपी क्या है?

किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था लागू की गई है. अगर कभी फसलों की क़ीमत बाज़ार के हिसाब से गिर भी जाती है, तब भी केंद्र सरकार तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल ख़रीदती है ताकि किसानों को नुक़सान से बचाया जा सके.

किसी फसल की एमएसपी पूरे देश में एक ही होती है. भारत सरकार का कृषि मंत्रालय, कृषि लागत और मूल्य आयोग (कमिशन फ़ॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइजेस CACP) की अनुशंसाओं के आधार पर एमएसपी तय करता है. इसके तहत अभी 23 फसलों की ख़रीद की जा रही है.

इन 23 फसलों में धान, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का, मूंग, मूंगफली, सोयाबीन, तिल और कपास जैसी फसलें शामिल हैं.

एक अनुमान के अनुसार देश में केवल 6 फीसदी किसानों को एमएसपी मिलता है, जिनमें से सबसे ज्यादा किसान पंजाब हरियाणा के हैं. और इस वजह से नए बिल का विरोध भी इन इलाकों में ज्यादा हो रहा है.

एसएसपी और किसान

एनएसएसओ की साल 2012-13 की रिपोर्ट के अनुसार देश के 10 फीसदी से भी कम किसान अपने उत्पाद एमएसपी पर बेचते हैं. वहीं भारतीय खाद्य निगम की कार्य कुशलता और वित्तीय प्रबंधन में सुधार के लिए बनाई गई शांता कुमार समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार के अनाज ख़रीदने की व्यवस्था का लाभ न तो अधिक किसानों तक और न ही अधिक राज्यों तक पहुंचा है.

किसानों से सरकार जो अनाज सबसे अधिक खरीदती है उनमें गेहूं और चावल शामिल है और अगर अनाज की ख़रीद के आंकड़ों के देखा जाए तो ये स्पष्ट होता है कि राज्य के कुल उत्पादन और ख़रीद के मामले में पंजाब और हरियाणा की स्थिति दूसरों से काफी बेहतर है.

खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग की रिपोर्ट के अनुसार बीते कुछ सालों में पंजाब और हरियाणा में हुए कुल धान उत्पादन का 80 फीसदी सरकार ने खरीदा, जबकि गेंहू के मामले में इन दो राज्यों से कुल उत्पादन का 70 फीसदी से अधिक सरकार ने खरीदा. लेकिन दूसरे राज्यों की स्थिति ऐसी नहीं है. दूसरे राज्यों में कुल उत्पादन का छोटा हिस्सा सरकार ख़रीदती रही है और किसान वहां पहले से ही बाज़ार पर निर्भर करते रहे हैं.

कृषि क़ानून से अब तक क्या बदला?

भारत सरकार के पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन कहते हैं कि एमएसपी को लेकर किसानों की चिंता के पीछे कुछ वजहें हैं. सरकार ने अब तक लिखित में ऐसा कोई ऑर्डर जारी नहीं किया है कि फसलों की सरकारी खरीद जारी रहेगी. अब तक जो भी बातें हो रही हैं वो मौखिक ही है. ये एक वजह है नए कृषि क़ानून के बाद किसानों की चिंता बढ़ने की.

यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि सरकारी ख़रीद जारी रहेगी इसका ऑर्डर कृषि मंत्रालय से नहीं बल्कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की तरफ़ से आना है.

दूसरी वजह है रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड राज्य सरकारों को ना देना. केंद्र सरकार तीन फीसद का ये फंड हर साल राज्य सरकारों को देती थी. लेकिन इस साल केंद्र सरकार ने ये फंड देने से मना कर दिया है. इस फंड का इस्तेमाल ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर (जिसमें कृषि सुविधाएँ भी शामिल है) बनाने के लिए किया जाता था.

नए कृषि क़ानून बनने के बाद ये दो महत्वपूर्ण बदलाव किसानों को सामने सामने दिख रहे हैं.

कारण 1 : फसलों की गुणवत्ता के मानक कैसे तय होंगे?

सिराज हुसैन कहते हैं कि अगर एमएसपी पर ख़रीद का प्रावधान सरकार कानून में जोड़ भी दे तो आख़िर क़ानून का पालन किया कैसे जाएगा? एमएसपी हमेशा एक ‘फेयर एवरेज क्वॉलिटी’ के लिए होता है. यानी फसल की निश्चित की गई क्वॉलिटी होगी तो ही उसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाएगा. अब कोई फसल गुणवत्ता के मानकों पर ठीक बैठती है या नहीं इसे तय कैसे किया जाएगा?

जो फसल उन मानकों पर खरी नहीं उतरेगी उसका क्या होगा?

ऐसी सूरत में सरकार कानून में किसानों की माँग को शामिल कर भी ले तो कानून को अमल में लाना मुश्किल होगा.

कारण 2: भविष्य में सरकारी ख़रीद कम होने की संभावना

दूसरी वजह के बारे में सिराज हुसैन कहते हैं कि सरकार को कई कमेटियों ने सिफारिश दी है, कि गेंहू और धान की खरीद सरकार को कम करना चाहिए. इससे संबंधित शांता कुमार कमेटी से लेकर नीति आयोग की रिपोर्ट सरकार के पास है.

सरकार इसी उद्देश्य के तहत काम भी कर रही है. आने वाले दिनों में ये ख़रीद कम होने वाली है. यही डर किसानों को सता भी रहा है.

ऐसे में जो फसल सरकार खरीदेगी या नहीं, खरीदेगी तो कितना, और कब खरीदेगी जब ये तय नहीं है तो लिखित में पहले से एमएसपी वाली बात कानून में कैसे कह सकती है?

आरएस घुमन, चंडीगढ़ के सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल एंड इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट में प्रोफेसर हैं. कृषि और अर्थशास्त्र पर इनकी मजबूत पकड़ है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने ऊपर लिखे तर्कों के अलावा भी कई वजहें गिनाई हैं, जिस कारण सरकार किसानों की एमएसपी संबंधित माँग नहीं मान रही.

कारण 3 – निजी कंपनियाँ एमएसपी पर फसल ख़रीद को तैयार नहीं होंगी

आरएस घुमन के मुताबिक़ भविष्य में सरकारें कम खरीदेंगी तो जाहिर है किसान निजी कंपनियों को फसलें बेचेंगे. निजी कंपनियाँ चाहेंगी कि वो एमएसपी से कम पर खरीदें ताकि उनका मुनाफ़ा बढ़ सके. इसलिए सरकार निजी कंपनियों पर ये शर्त थोपना नहीं चाहती. इसमें सरकार के भी कुछ हित जुड़े हैं और निजी कंपनियों को भी इससे दिक्कत होगी.

हालांकि केंद्र सरकार में कृषि सचिव के पद पर रहे, सिराज हुसैन नहीं मानते कि कॉरपोरेट के दबदबे की वजह से सरकार ऐसा नहीं करना चाहती. उन्हें ये दलील स्वीकार नहीं है.

कारण 4 – किसान भी पड़ सकते हैं दिक्कत में

आरएस घुमन के मुताबिक़ अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी एमएसपी पर सरकार की हिचकिचाहट को एक और तरीके से समझा जा सकता है. इसके लिए दो शब्दों को समझना ज़रूरी होता है.

पहला शब्द है ‘मोनॉपली’. मतलब जब बेचने वाला एक ही और उसकी ही मनमानी चलती हो, तो वो मनमानी कीमत वसूल करता है.

दूसरा शब्द है ‘मोनॉप्सनी’. मतलब ख़रीदने वाला एक ही हो और उसकी मनमानी चलती है यानी वो जिस कीमत पर चाहे उसी कीमत पर सामान ख़रीदेगा.

आरएस घुमन का कहना है कि सरकार ने जो नए क़ानून पास किए हैं उससे आने वाले दिनों में कृषि क्षेत्र में ‘मोनॉप्सनी’ बनने वाली है. कुछ एक कंपनियाँ ही कृषि क्षेत्र में अपना एक कार्टेल (गठजोड़) बना लेंगी तो वो जो कीमत तय करेगी उसी पर किसानों को सामान बेचना होगा.

अगर एमएसपी का प्रावधान क़ानून में जोड़ दिया गया तो किसानों पर निजी कंपनियों का वर्चस्व ख़त्म हो सकता है. इसका नतीजा ये भी हो सकता है कि ये कंपनियाँ फसलें कम खरीदेंगी.

सरकार के पास कोई रास्ता नहीं है जिससे वो एमएसपी पर पूरी फसल ख़रीदने के लिए निजी कंपनियों को बाध्य कर सके. वो भी तब जब सरकार किसानों की फसल कम खरीदने का मन पहले से बना रही हैं.

ऐसे में किसान के लिए भी दिक्कत बढ़ सकती है. वो अपनी फसल किसको बेचेंगे. ऐसे में हो सकता है कि एमएसपी तो दूर उनकी लागत भी ना निकल पाए.

कारण 5 : फसल की कीमत का आधार – सरकार तय करने से बचना चाहती है

आरएस घुमन कहते हैं, “एमएसपी – किसानों को फसल की कीमत तय करने का एक न्यूनतम आधार देता है, एक रेफ्रेंस प्वॉइंट देता है, ताकि फसल की कीमत उससे कम ना हो. एमएसपी उन्हें एक सोशल सुरक्षा प्रदान करती है.

जबकि निजी कंपनियाँ, सामान की कीमतें डिमांड और सप्लाई के हिसाब से तय करती है. ये उनका तर्क है.

‘मोनॉपली’ से कृत्रिम तौर पर कुछ अनाज की सप्लाई की कमी पैदा की जा सकती है, ताकि उपभोग्ता से ज्यादा कीमत वसूल कर सकें. वहीं ‘मोनॉप्सनी’ से कम खरीद करके डिमांड की कमी पैदा की जा सकती है, ताकि किसान कम कीमत पर बेचने को मजबूर हों.

इसलिए सरकार दोनों पक्षों के विवाद में पड़ना ही नहीं चाहती.

सरकार इस पूरे मसले को द्विपक्षीय रखना चाहती है. अगर क़ानून में एमएसपी का प्रावधान जोड़ दिया तो इससे जुड़े हर मुकदमें में तीन पक्ष शामिल होंगे – एक सरकार, एक किसान और तीसरा निजी कंपनी.

विवाद का हल क्या है?

अनुमान के मुताबिक़ भारत में 85 फीसदी छोटे किसान है, जिनके पास खेती के लिए पाँच एकड़ से छोटी ज़मीन है.

आरएस घुमन का मानना है कि एमएसपी से नीचे ख़रीद को अपराध घोषित करने पर भी विवाद खत्म नहीं होता दिख रहा है. तीनों क़ानून को वापस लेना ही एक मात्र रास्ता है.

फिलहाल क़ानून वापस लेने पर सरकार राज़ी होती नहीं दिख रही है.

लेकिन पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन कहते हैं, इसका एक रास्ता है कि सरकार किसानों को डायरेक्ट फ़ाइनेंशियल सपोर्ट दे जैसा किसान सम्मान निधि के ज़रिए किया जा रहा है.

और दूसरा उपाय है किसान दूसरी फसलें भी उगाए जिनकी मार्केट में डिमांड है. अभी केवल गेंहू, धान उगाने पर किसान ज्यादा ज़ोर देते हैं और दलहन और ऑयल सीड पर किसान कम ध्यान देते हैं. इससे मार्केट का डायनमिक्स बना रहेगा.

कृषि विशेषज्ञदेविंदर शर्मा कहते हैं कि अगर ये सवाल है कि किसान इसका विरोध क्यों कर रहे हैं तो ये समझिए कि उन्हें ये लगता है कि ये उनके हित में नहीं है. लेकिन बाज़ार इसका विरोध नहीं कर रहा क्योंकि इससे उन्हें लाभ है.

वो समझाते हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों की समस्याएं, मुद्दे और उनकी राजनीति अलग है इसलिए उनके विरोध को देखने का तरीक़ा भी बदलना होगा.

वो कहते हैं, “सरकार जो अनाज की ख़रीद करती है उसका सबसे अधिक हिस्सा यानी क़रीब 90 फीसदी तक पंजाब और हरियाणा से होता है. जबकि देश के आधे से अधिक किसानों को ये अंदाज़ा ही नहीं है कि एमएसपी क्या है. ऐसे में उन्हें ये समझने में वक़्त लगेगा कि उनकी बात आख़िर क्यों हो रही है.”

देविंदर शर्मा कहते हैं, “ये समझने की ज़रूरत है कि जिस पर सीधा असर होगा वो सबसे पहले विरोध करेगा. एक अनुमान के अनुसार देश में केवल 6 फीसदी किसानों को एमएसपी मिलता है. लेकिन 94 फीसदी किसानों को तो पहले ही एमएसपी नहीं मिलता और वो बाज़ार पर निर्भर हैं. ऐसे में ये समझा जा सकता है कि पंजाब और हरियाणा के किसान विरोध क्यों कर रहे हैं.”

वो कहते हैं कि भारतीय कृषि क्षेत्र लगातार संकट से जूझता रहा है लेकिन कुछ ही किसान हैं जो इस संकट से बचे हुए हैं. वो कहते हैं, “जिन 6 फीसदी किसानों को एमएसपी मिलता है वो संकट से बचे हुए हैं क्योंकि उनकी आय निश्चित हो जाती है.”

बिहार और बाज़ार का मामला

बिहार देश का पहला वो राज्य था जिसने कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए 2006 में एपीएमसी एक्ट (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी यानी कृषि उपज और पशुधन बाजार समिति) को ख़त्म कर दिया था. यहां इसके बाद निजी सेक्टर के लिए रास्ता साफ कर दिया गया.

लेकिन राज्य को वाकई लाभ पहुंचा ऐसा कहा नहीं जा सकता. स्टेट ऑफ़ इंडियाज़ लाइवलीहुड 2013 के अनुसार इससे वहां कृषि उत्पाद बेचने की व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है और छोटे किसानों की निर्भरता बाज़ार पर बढ़ गई है.

आइडियाज़ फ़ॉर इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2001-02 से लेकर 2016-17 तक बिहार की कृषि विकास दर देश की औसत कृषि विकास दर से कम रही है.

रिपोर्ट के अनुसार, एपीएमसी के हटाए जाने के बाद यहां धान, गेहूं और मक्का की क़ीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई लेकिन किसानों की आय में अनिश्चितता भी उतनी ही अधिक बढ़ी. साथ ही क़ीमतों में भी अनिश्चितता बरकरार रही जिससे किसानों को ये समझ नहीं आया कि कितनी ज़मीन पर कितनी खेती करें तो उन्हें नुकसान नहीं होगा. रिपोर्ट के अनुसार यही अनिश्चितता शायद वहां के कृषि विकास की दर कम होने का कारण बनी.

देविंदर शर्मा कहते हैं कि हाल में जब कोरोना के कारण लॉकडाउन लगाया गया तो मज़दूरों का पलायन शुरू हुआ. पलायन करने वाले अधिकांश मज़दूर बिहार से ही थे और इसका कारण आसानी से समझा जा सकता है.

वो कहते हैं, “अगर हम ये मानें कि देश के 94 फीसदी किसान एमएसपी पर नहीं बाज़ार पर निर्भर करते हैं तो ये भी समझिए कि बाज़ार को अगर किसानों को लाभ पहुंचाना ही होता तो बीते 70 सालों में किसानों की स्थिति सुधर चुकी होती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ जो इस बात की ओर इशारा है कि बाज़ार किसानों की समस्या का हल नहीं हो सकता.”

वो कहते हैं, “इन तीनों बिल के साथ सरकार पंजाब के किसान जो अभी एमएसपी के कारण बेहतर स्थिति में हैं उन्हें बिहार के किसानों के स्तर तक ले आएगी, जो लगातार बाज़ार की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.”

वो कहते हैं, सरकार ने बिल बनाने से पहले किसानों से राय ली नहीं है और उन्हें बाज़ार के भरोसे छोड़ दिया है.

एमएसपीऔर खाद्य सुरक्षा से इसका नाता

भारत में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पैदा हुए खाद्य संकट से जूझने के लिए 1942 में खाद्य विभाग बनाया गया था. आज़ादी के बाद 29 अगस्त 1947 को इसे खाद्य मंत्रालय में तब्दील कर दिया गया. 1960 में इस मंत्रालय के तहत दो विभाग बने खाद्य विभाग और कृषि विभाग.

खाद्य विभाग पर सरकार की तरफ से खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अनाज ख़रीदने का काम सौंपा गया. आज़ादी के बाद पहली बार 60 के दशक की शुरुआत में देश को गंभीर अनाज संकट का सामना करना पड़ा.

इस दौरान कृषि क्षेत्र के लिए नीतियां बनाई गईं और अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए हरित क्रांति की शुरुआत की गई.

इसके बाद अनाज खरीदने के लिए सरकार ने 1964 में खाद्य निगम क़ानून के तहत भारतीय खाद्य निगम बनाया और इसके एक साल बाद एग्रीकल्चर प्राइसेस कमीशन बनाया ताकि उचित क़ीमत पर (न्यूनतम समर्थन मूल्य) किसानों ने अनाज ख़रीदा जा सके.

इसी अनाज को बाद में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम, पीडीएस) के तहत सरकार ज़रूरतमंदों को देती है और खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज का भंडारण भी करती है.

जहां तक बात सार्वजनिक वितरण प्रणाली की है भारत में ये व्यवस्था राशन सिस्टम की तरह थी जो आज़ादी से पहले भी कुछ शहरी इलाक़ों तक सीमित थी. लेकिन 1951 में इसे देश की सामाजिक नीति का हिस्सा बनाया गया और पहली पंचवर्षीय योजना में इसका विस्तार गांवों तक किया गया. दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान इसका दायरा और बढ़ा दिया गया.

एग्रीकल्चर प्राइसेस कमीशन बनने के बाद पीडीएस की स्थिति और अहम हो गई क्योंकि इससे एक तरफ किसानों को निश्चित आय मिलने का भरोसा मिला, दूसरी तरफ ज़रूरतमंदों को कम क़ीमत में अनाज की सुविधा मिली और तीसरी तरफ़ खाद्य सुरक्षा बेहतर हुई.

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