March 5, 2021

Such Ke Sath

सच के साथ – समाचार

IMF की मुख्य अर्थशास्त्री ने किया कृषि कानूनों का समर्थन, ‘बुद्धिजीवी वर्ग’ खामोश क्यों है?

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने मोदी सरकार के विवादित कृषि क़ानूनों की तारीफ़ की है.

नई दिल्ली|गीता गोपीनाथ के मुताबिक़, केंद्र सरकार की ओर से लाए गए क़ानूनों में किसानों की आय बढ़ाने की क्षमता है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है कि कमज़ोर किसानों को सामाजिक सुरक्षा देने की ज़रूरत है.

वॉशिंगटन स्थित इस वैश्विक वित्तीय संस्थान से जुड़ीं गीता गोपीनाथ ने मंगलवार को कहा कि ‘भारत में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहाँ सुधार की ज़रूरत है और कृषि क्षेत्र उनमें से एक है.’

भारत सरकार ने पिछले साल सितंबर में कृषि क्षेत्र से संबंधित तीन नए क़ानूनों को लागू किया था और इन्हें ‘कृषि क्षेत्र में बड़े सुधारों’ के रूप में पेश किया गया.

दिल्ली की सीमाओं पर दो महीनों से भी ज्यादा समय से किसान आंदोलन (Farmer Protest) जारी है. किसान संगठनों की मांग है कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानून (agricultural Laws) रद्द किए जाएं. साथ ही न्यूनतम समर्थम मूल्य (MSP) पर कानून बनाने की मांग को लेकर अड़े हुए हैं. इन किसान संगठनों का मानना है कि कृषि कानूनों के लागू होने से किसान की जमीन पर कॉरपोरेट का कब्जा हो जाएगा. किसान संगठनों के अनुसार, इन कानूनों के लागू होने पर किसान और खेती दोनों ही खत्म हो जाएंगे. वहीं, सरकार कानूनों में जरूरी बदलाव करने को तैयार है. MSP को लेकर लिखित गारंटी भी देने को राजी है. इन सबके बावजूद किसानों और मोदी सरकार (Modi Government) के बीच गतिरोध जारी है. अंतरराष्ट्रीय पॉप सिंगर रिहाना (Rihanna) और कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियों द्वारा किसान आंदोलन के समर्थन में ट्वीट करने के बाद बड़ी तादात में लोग इस विरोध प्रदर्शन को सही ठहरा रहा हैं. देश का एक बड़ा कथित ‘बुद्धिजीवी वर्ग’ इन हस्तियों के ट्वीट के जरिये किसान आंदोलन के पक्ष में माहौल बनाने के प्रयासों में जुट गया है. लेकिन, ये ‘बुद्धिजीवी वर्ग’ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ (Gita Gopinath) को लेकर कुछ कहते नहीं दिखते हैं. जो भारत में इन कृषि कानूनों को लागू करने के पक्ष मे हैं. आखिर ऐसा क्यों है कि इस बुद्धिजावी वर्ग को केवल विरोध ही पसंद है? कृषि कानूनों का पक्ष लेने वालों से ये अपना मुंह क्यों मोड़ लेते हैं?

वैश्विक वित्तीय संस्थान की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कृषि कानूनों की तारीफ की थी.वैश्विक वित्तीय संस्थान की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कृषि कानूनों की तारीफ की थी.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ के अनुसार, मोदी सरकार के कृषि कानूनों में किसानों की आय बढ़ाने की क्षमता है. इसके साथ ही कमजोर किसानों को सामाजिक सुरक्षा देने की जरूरत है. गीता गोपीनाथ ने कहा कि भारत में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां सुधार की जरूरत है. इन कानूनों से किसानों के लिए बाजार और ज्यादा बड़ा हो जाएगा. कुल मिलाकर एक वैश्विक वित्तीय संस्थान की मुख्य अर्थशास्त्री ने कृषि कानूनों की तारीफ की थी. उन्होंने इस बदलाव से होने वाले नुकसान से किसानों को बचाने के लिए सामाजिक सुरक्षा की भी सलाह दी. गीता को इस बुद्धिजीवी वर्ग ने केवल इस वजह से दरकिनार कर दिया कि उन्होंने कानूनों की बड़ाई कर दी थी. गीता गोपीनाथ चाहे जितनी बड़ी अर्थशास्त्री हों, अगर वे कृषि कानूनों के विरोध में नही हैं, तो इस वर्ग की नजर में उनकी अहमियत नहीं है.

बीते कुछ समय में भारत काफी कुछ बहुत तेजी से बदला है. असहिष्णुता को लेकर अवार्ड वापसी से लेकर CAA विरोधी प्रदर्शन तक आपको एक व्यवस्थित और विशिष्ट तरीके का विरोध प्रदर्शन नजर आएगा. ये कथित ‘बुद्धिजीवी वर्ग’ पर्दे के पीछे रहते हुए आंदोलन को अपने हिसाब से नचाता रहता है. इस वर्ग का पूरा ध्यान रहता है कि किसी भी तरह से आंदोलन कमजोर न पड़े. 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड में हुई हिंसा और लाल किला पर अराजकता के बाद किसान आंदोलन कमजोर पड़ने लगा. दो दिनों के अंदर ही गाजीपुर बॉर्डर पर इस आंदोलन के एक नए ‘नायक’ राकेश टिकैत सामने आ गए. यह वर्ग विशेष 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद साने आया है. आप मानें या नहीं, ये ‘बुद्धिजीवी वर्ग’ हर बार सरकार के खिलाफ किसी न किसी मुद्दे पर एक जैसी ‘मॉडस ऑपरेंडी’ अपनाते हुए आगे बढ़ता है. इसका उद्देश्य सीधे तौर पर अराजकता को बढ़ावा देना ही नजर आता है. शाहीन बाग की तरह किसी भी सड़क को घेरकर बैठ जाओ, सरकारी अवार्डों को वापस करो, कुछ बड़े और खास लोगों से मुद्दे का समर्थन प्राप्त करो. ये वर्ग ऐसा करता ही नजर आता है.

आंदोलन में मुख्य रूप से पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसान ही हिस्सेदारी निभा रहे हैं.आंदोलन में मुख्य रूप से पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसान ही हिस्सेदारी निभा रहे हैं.

ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कह चुके हों कि किसान उनसे बस एक फोन कॉल की दूरी पर हैं. तब भी किसान संगठनों की ओर से बातचीत करने की कोशिशों का नजर न आना, एक प्रोपेगेंडा की तरह दिखता है. हालांकि, किसान संगठन 26 जनवरी को हुई हिंसा से सबक लेते हुए दिख रहे हैं. इसी की वजह से किसान नेता राकेश टिकैत ने 6 फरवरी को प्रस्तावित चक्का जाम को दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में करने से मना कर दिया है. गौर करने वाली बात ये भी है कि इस आंदोलन में मुख्य रूप से पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसान ही हिस्सेदारी निभा रहे हैं. इसकी वजह से सरकार को ये कहने का मौका मिल रहा है कि किसानों का एक खास धड़ा ही इन कानूनों का विरोध कर रहा है. किसान संगठनों की कानूनों को रद्द करने की जिद की वजह से कोई हल नहीं निकल पा रहा है. 40 किसान संगठनों को मिलाकर बने संयुक्त किसान मोर्चा में अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले संगठन जुड़े हैं. किसान संगठन सरकार के कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं और इनकी आड़ लेकर ये कथित ‘बुद्धिजीवी वर्ग’ मोदी सरकार के विरोध की अपनी मंशा पूरा कर रहा है. कृषि कानूनों के लागू होने के बाद किसान खत्म हो जाएंगे, इस काल्पनिक स्थिति को ये ‘बुद्धिजीवी वर्ग’ किसान संगठनों के जरिये किसानों तक पहुंचाने में लगातार कामयाब रहा है.

 

कौन हैं गीता गोपीनाथ?

अक्टूबर 2018 में गीता को आईएमएफ़ का प्रमुख अर्थशास्त्री नियुक्त किया गया था.

भारतीय मूल की गीता गोपीनाथ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल स्टडीज़ ऑफ़ इकोनॉमिक्स में प्रोफ़ेसर रही हैं. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की वेबसाइट के अनुसार, आईएमएफ़ के साथ काम करने के लिए उन्होंने अध्यापन-कार्य से फ़िलहाल छुट्टी ली हुई है.

गीता ने इंटरनेशनल फ़ाइनेंस और मैक्रो-इकोनॉमिक्स में रिसर्च की है.

आईएमएफ़ में इस पद पर पहुँचने वाली गीता दूसरी भारतीय हैं. उनसे पहले भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी आईएमएफ़ में प्रमुख अर्थशास्त्री रह चुके हैं.

साल 2017 में केरल सरकार ने गीता को राज्य का वित्तीय सलाहकार नियुक्त किया था. गीता का जन्म केरल में ही हुआ था.

लेकिन जब केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने गीता की नियुक्ति की थी तो उस समय उन्हीं की पार्टी के कुछ लोग नाराज़ भी हुए थे.

गीता अमेरिकन इकोनॉमिक्स रिव्यू की सह-संपादक और नेशनल ब्यूरो ऑफ़ इकोनॉमिक रिसर्च (एनबीइआर) में इंटरनेशनल फ़ाइनेंस एंड मैक्रो-इकोनॉमिक्स की सह-निदेशक भी रही हैं.

गीता ने व्यापार और निवेश, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट, मुद्रा नीतियों, कर्ज़ और उभरते बाज़ार की समस्याओं पर लगभग 40 रिसर्च लेख लिखे हैं.

गीता ने ग्रेजुएशन तक की शिक्षा भारत में पूरी की. गीता ने साल 1992 में दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज से अर्थशास्त्र में ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की.

इसके बाद उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में ही मास्टर डिग्री पूरी की.

साल 1994 में गीता वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी चली गईं. साल 1996 से 2001 तक उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी पूरी की थी.

साल 2001 से 2005 तक गीता शिकागो यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर थीं.

इसके बाद साल 2005 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई.

साल 2010 में गीता इसी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर बनीं और फिर 2015 में वे इंटरनेशनल स्टडीज़ एंड इकोनॉमिक्स की प्रोफ़ेसर बन गईं.

जब अमिताभ बच्चन ने की गीता पर टिप्पणी

“इतना ख़ूबसूरत चेहरा इनका, इकॉनमी के साथ कोई जोड़ ही नहीं सकता…”

अभिनेता अमिताभ बच्चन ने कुछ दिन पहले ही गीता गोपीनाथ के बारे में यह टिप्पणी की थी.

उन्होंने एक महिला प्रतिभागी से गीता गोपीनाथ के बारे में सवाल पूछते समय यह टिप्पणी की थी.

लेकिन सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बच्चन की टिप्पणी कितनी ‘सेक्सिस्ट’ (महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह से भरी) है.

सोशल मीडिया पर अमिताभ बच्चन का एक वीडियो क्लिप वायरल हो गया.

हालांकि, गीता गोपीनाथ केबीसी में ख़ुद से जुड़ा सवाल पूछे जाने और अमिताभ की टिप्पणी को सुनकर बेहद ख़ुश नज़र आईं.

मगर बहुत सी महिलाओं ने लिखा कि अमिताभ की टिप्पणी बेहद सेक्सिट और मूर्खतापूर्ण थी.

जेंडर स्टडीज़ के क्षेत्र में इस बारे में लंबे वक़्त तक चर्चा होती रही कि महिलाओं को उनकी प्रतिभा और कामयाबी की जगह कैसे उनके चेहरे और शरीर से आँका जाता है.

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